Wednesday, May 29, 2024

अलका प्रकाश
मऊ, उत्तर प्रदेश में जन्मीं, इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए. और डी.फिल. अलका प्रकाश स्त्री विमर्शकार और आलोचक के रूप में पहचानी जाती हैं। अपनी दृष्टि, विचार और विमर्श की सर्वथा नई भंगिमा के कारण उनकी उपस्थिति एक ऐसी लेखिका की है जिसमें नयापन है और स्त्री विषयक समस्याओं तथा चिंताओं को उनके पूरे परिप्रेक्ष्य में देखने-परखने की वैज्ञानिक समझ है। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित उनके लेख इन्हीं कारणों से सबका ध्यान आकृष्ट करते हैं। तमिल तथा कन्नड़ में अनुदित होकर प्रकाशित उनके लेख इस बात के प्रमाण हैं। उनकी मौलिक आलोचना कृति – ‘हाशिये के स्वर’ की बड़ी चर्चा रही है जो स्त्री, दलित तथा आदिवासी जीवन और उनके संघर्ष को लेकर लिखी रचनाओं को विमर्श के केंद्र में लाती है और शक्ति केंद्रित मुख्य धारा के लेखन को उसके समानांतर रखकर उस पर जिरह करती है। उन्होंने अनेक पुस्तकों का लेखन और सम्पादन भी किया है जिनमें स्त्री जीवन के बुनियादी प्रश्नों को उनकी पूरी संरचना में समझने की ईमानदार पहल है। इन पुस्तकों में, नारी चेतना के आयाम, तन्द्रा टूटने तक, समय समाज और स्त्री, सत्ता प्रतिष्ठान और स्त्री अस्मिता तथा स्त्री-विमर्श : साहित्य और सैद्धान्तिकी शामिल हैं।
स्त्री विमर्श और आलोचना से सम्बन्धित विषयों पर निरन्तर लिखने-बोलने वाली अलका प्रकाश एक सुपरिचित कवयित्री भी हैं जिनकी कविताएँ प्रकाशित होकर चर्चा में आईं हैं। उन्हें उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का प्रतिष्ठित रामचंद्र शुक्ल नामित आलोचना पुरस्कार ‘हाशिये के स्वर’ नामक पुस्तक पर मिल चुका है।
लंबे समय तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में अतिथि अध्यापक रहीं डॉ. अलका प्रकाश अब प्रो. राजेन्द्र सिंह (रज्जू भय्या) विश्वविद्यालय, नैनी, प्रयागराज में हिंदी की सहायक प्रोफ़ेसर हैं।

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कविताएं

इंतज़ार नहीं होता महज़ एक शब्द

इंतज़ार नहीं होता महज़ एक शब्द
उसकी पहुंच होती हमारी आत्मा तक
हम गिनते समय को उसकी माप में
जैसे पहर , दिन , सप्ताह और बरस
इस माप में बंटे रहते हम
थोड़ा थोड़ा जीते हुए
जीने को एक पूरा जीवन
 
जीवन यह जो होता इंतज़ार का
एक आग – सी जलती रहती भीतर
पकते उसमें हमारे सपने
दुनिया अच्छी से अच्छी लगती रोज़ रोज़
मौसम चाहे कोई हो
इंतज़ार में होती रहती भरपूर बारिश
हम भींग भींग जाते अक्सर
करते ख्याल और डूबते जाते 
उन मीठी चाहतों में
जो सोचते हम अपना एकांत खोजकर अक्सर ही
 
इंतज़ार एक चिट्ठी की तरह
आता रहता है
जिसके अनलिखे मज़मून
हवा की तरह हल्के करते हमें
 
न हो इंतज़ार अगर
तो यह जीवन कितना नीरस
नाउम्मीद हो जाया करे
फिर हमारा जीना कितना अर्थहीन हो जाय
 
न करें हम इंतज़ार अगर
और न हो आसरा किसी का
जिसकी आंच में तपते हुए हम
रोज़ ही बदलते अपनी काया
रोज़ ही तनिक धवल होती जाती हमारी आत्मा बेदाग सफेद चादर सी
 
तो कैसे जी सकें इस निर्मम समय में
जहां सम्बन्ध होते जा रहे बोझ
और संवेदनाएं भूल चुकीं अपना स्वभाव
इंतज़ार दिखाता है रास्ता
अपने में लौटने का
हो सकने का होने की तरह
इंतज़ार जीवन की उम्मीद है
उम्मीद में है दुनिया
और जब तक इंतज़ार है
हम नाउम्मीद होने से बचे रह जाते हैं
जीने की बेपनाह इच्छाओं के साथ…..

जीवन-समय

तुम्हारी स्मृति एक प्रार्थना गृह है
जिसमें रहती है तुम्हारी ही आकृति
हम झुके रहते प्रार्थना में तब तब
जब जब आते हो स्मृति में बेतरह
घण्टियों की तरह बजती हैं मेरी धड़कनें
शंख की तरह आत्मा करती है उदघोष
आंखों में चमक उतरती है तुम्हारी
ठीक उसी तरह जैसे
देवता हमारी श्रद्धा लेकर
उतरता है अपनी आभा के साथ
तुम एकतान होते हो हमारे ध्यान से
मंत्र के अजपा जाप से आह्लादित होते हो
स्फूर्त करते हो हमारे रोम रोम
तब एक साथ असंख्य फूलों की सुगन्ध
समा जाती है हमारे भीतर
हम बनने लगते हैं कुछ अलग
और इस तरह अपने होने का भ्रम खोकर
हम हो जाते निर्विकार
यह जो स्मृति है तुम्हारी
जीवन – समय है हमारे प्रेम का
रहते हम जिसमें निरन्तर होम होते हुए….

हमारा प्यार

प्यार हमारा
पत्तों का हिलना है
उसकी हरियाली भी
प्यार हमारा
होली का गीत है
उसका रंग-गुलाल भी
प्यार हमारा
बांसुरी की मीठी तान है
उसकी लय और रस भी
प्यार हमारा झरने का जल है
झरते जल का स्रोत भी
बांस वन में उठते स्वर
ताल में रह रह कर जाग उठता वृत्त
हमारा प्यार है
हम होते हुए प्यार में
ठीक उसी तरह उमग रहे
जैसे उमगती है धार
हर गति लय ताल स्वर में
हमारा प्यार प्यार हमारा.

प्रेम जीवन

प्रेम बांधता है अपनी डोर से हमें
धीरे धीरे खोलता भी अपनी गांठें
कि सिद्ध कर सकें हम अपनी निष्ठा
जी सकें रेत होते पलों को अपने भीतर
झुलसते आवेग को झेल सकें विषम मन से
लगा सकें विश्वास के पन्ने पर अपना अंगूठा
 
कहते जिसे प्रेम वह होता अग्नियात्रा
नहीं सहज गंतव्य वह न पाथेय परिचित
पग पग पर अपने ही भीतर उठती झंझा
तहस नहस कर देती आँधी 
सम्भाल सके जो वह करे प्रेम
दे सके जो अपना दान निर्व्याज जो
 
कितना कठिन है इस समय में प्रेम
कितनी असह्य है उसकी यातना
जो न चाहे जीवन से कुछ और
न हो प्राप्य के निमित्त सुख का आकांक्षी
जो रह सके शून्य में विचरते जीते प्रिय को
कर सकता वही प्रेम प्रिय से
 
प्रेम की राह पर होते ठूंठ गाछ हरे
होते मरुथल भी वनस्पतियों से पटे
सूखी नदी में आ जाय बाढ़
अधमरी देह पा जाए अमृत नव
हो यदि प्रेम प्रेम में हो जीवन
जीवन ही तो प्रेम प्रेम जीवन यह…..

उसका नाम

मेरे आंसुओं में जो अबूझ से अक्षर उभरते हैं
वे पता देते प्रिय का
आंखों में रह रह कर जो कौंध उठती है
वही है छवि है उसकी
साँसों की सुलगन में है उसका नाम
चाहें तो पूछ लें धड़कनों से
रखकर हाथ हृदय पर……

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किताबें

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