Thursday, May 23, 2024

पुष्पा भारती जन्मदिन समारोह

स्त्री दर्पण मंच धर्मवीर भारती जी की पत्नी व हिंदी साहित्य की महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर पुष्पा भारती जी का जन्मदिन समारोह मना रहा है। धर्मवीर भारती से विवाह के बाद पुष्पा भारती मुंबई आईं और लेखन की शुरुआत की। तमाम विशिष्ट व्यक्तियों के साक्षात्कार एवं साहित्य के कई महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों पर संस्मरण द्वारा वें हिंदी साहित्य क्षेत्र में रचनात्मकता से जुड़ी रहीं।
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हिंदी की प्रसिद्ध कथाकार मनीषा कुलश्रेष्ठ कथक के युग पुरुष बिरजू महाराज के अवदान पर स्त्री दर्पण के लिए यह सामग्री भेजी है। उन्होंने महाराज जी पर एक किताब भी लिखी है। उसका फोटो भी लगा रहे हैं। तो पढ़िए एक नृत्यांगना कथाकार की भावभीनी श्रद्धांजलि।

“बिरजू लय का अंश”

“बिरजू महाराज : तीन सौ साल पुरानी जीवित परंपरा के वाहक”

एक सितारा उगता है, अकेला. निरभ्र आकाश के कोने में संकोच के साथ और धीरे - धीरे सूर्य साबित होता है, उसका अपना सौरमंडल बनता है, ग्रह - उपग्रह और अनंत को अपने प्रकाश में डुबो लेता है. कितना ही बचें हम बिरजू महाराज के मूल्यांकन में उनकी विरासत से, वह सामने आ खड़ी होती ही है, क्योंकि वह जितनी समृद्ध थी, उतनी ही बिरजू महाराज तक आते - आते लखनऊ घराने के जहाज का मस्तूल जर्जर हो चुका था, जिसे नया स्वरूप देकर, जहाज़ को नई दिशा दी को बिरजू महाराज ने। किशोर बिरजू महाराज जब अपने पिता के समय में एक अपना बचपन वैभव में जीने के बाद, उनको खोकर, महज दो साल की तालीम पाकर अपनी मां के संरक्षण में अभावग्रस्त जीवन बिता रहे थे. तब कपिला वात्स्यायन ‘संगीत’ भारती के लिए उन्हें दिल्ली लाईं, वे चौदह वर्ष के थे और गुरु बने, तब के उनके शिष्यों में रानी कर्णावती रहीं. इस बहाने उनकी स्वयं की प्रतिभा का विकास हुआ. वे मुंबई लच्छु महाराज के पास भी आते - जाते रहते रहे. सीखते रहे. भारतीय कलाकेंद्र में निर्मला जोशी जी ने लखनऊ में विनिष्ट होते इस घराने को दिल्ली में संरक्षण देने के प्रयास में शंभू महारज को आमंत्रित किया. कहते हैं, तब पहली और अंतिम बार बिरजू महाराज और शंभू महाराज ने कर्ज़न रोड पर कॉंस्टीट्यूशनल क्लब में निर्मला जी के अनुरोध पर नृत्य किया था. चाचा ने गत निकास, गत भाव और अभिनय प्रस्तुत किया, भतीजे ने तोड़े, परण और तत्कार प्रस्तुत किए. संगीत भारती से निर्मला जोशी बिरजू महाराज को भारतीय कला केंद्र उन्हें लाईं और वे बतौर शंभू महाराज के सहायक काम करने लगे. वे दोनों चाचाओं से नृत्य सीखते भी रहे और अपने शिष्यों को सिखाते भी रहे. भारतीय कला केंद्र उन दिनों उत्कृष्ट कलाकारों का केंद्र बनने लगा था. डागर ब्रदर्स, उस्ताद मुश्ताक़ हुसैन. उस्ताद हाफिज़ अली खाँ, और सिद्धेश्वरी देवी आदि की संगीत कला की धाराएँ बहा करती थीं. “उन दिनों भारत की राजधानी दिल्ली में कई महान कलाकार एकत्रित हो चुके थे. मशहूर तबला नवाज़ पं चतुर लाल और सितार वादक पं रविशंकर आदि भी दिल्ली में संगीत के वातावरण को सजाए थे. ऎसे महत्वपूर्ण सांगीतिक वातावरण में फलते - फूलते प्रतिभावान बालक बिरजू महाराज गायन, वादन तथा नृत्य तीनों कलाओं में निपुण हो गए.” यह उल्लेखनीय है कि तत्कालीन राजनीतिक काल भी ऎसा था जब कलाओं के पुनरुत्थान और संरक्षण के लिए संस्थाएँ बन रही थीं, वह बात अलग है कि कालांतर में ये संस्थाएँ कितनी उपयोगी साबित हुईं या सफेद हाथी बन कर रह गईं, किंतु उस समय इन संस्थाओं ने बहुत से बड़े कलाकार भारत को दिए और वैश्विक स्तर पर भारत की एक सांस्कृतिक पहचान बनी. पं. बिरजू महाराज के कला - कौशल और सृजनशीलता को पल्लवित होने का अवसर और अधिक मिला. “ संगीत नाटक अकादमी के तत्वाधान में 1954 - 55 के आस पास कुछ उच्च कोटि की नृत्य नाटिकाओं का निर्माण किया गया, जिनके नाम हैं शान ए अवध, मालती माधव, कुमार संभवम, कथक थ्रू द एजेस आदि. इन सभी नृत्य नाटिकाओं में संगीत निर्देशन प्रसिद्ध घरानेदार संगीतकार ‘डागर बंधुओं ने दिया, स्वयं गाया भी बजाया भी.” बिरजू महाराज की कला यात्रा और उनके आज के बिरजू महाराज होने का श्रेय केवल बिरजू महाराज की पारंपरिक विरासत को नहीं दिया जा सकता बल्कि उन समस्त हाथों और साथों और संगतों का है जिन्होंने उन्हें बिरजू महाराज होने में अपना योगदान दिया. परिस्थितियाँ, गुरु, संस्थाएँ, वे संस्था प्रधान, वे गायक, वे वादक, राजनेता...वह समय और परिवेश और स्वयं कलावंत दर्शक, समीक्षक सभी ने मिल कर बिरजू महाराज को बनाया. और यह तभी संभव था जब स्वयं किशोर बिरजू महाराज ने स्वयं को विनम्रता के साथ सौंप दिया. इसके पीछे शायद वे अभाव और उनकी मां की शिक्षा रही होगी. सत्ताईस साल की उम्र में केंद्रीय संगीत नाटक अकादमी का राष्ट्रीय पुरस्कार आज के समय में अचंभा हो सकती है, क्योंकि आज के प्रतिस्पर्धा से भरे, सिफारिशी युग में सत्ताईस साल में तो कोई कलाकार अपनी एकल प्रस्तुति के लायक नहीं समझा जाता. 1986 में वे पद्मविभूषण से अलंकृत हुए. इसी वर्ष ‘कालीदास सम्मान’ भी मिला. आज बिरजू महाराज स्वयं कथक की अनूठी गंगा - जमनी परंपरा के महज वाहक ही नहीं, एक लाईट हाउस हैं. वे नृत्याचार्य भी हैं और नर्तक भी, जब वे मंच पर आते हैं, आते ही दर्शकों से एक सहज संबंध जोड़ लेते हैं, न केवल गुणवंतों से बल्कि आम दर्शकों से भी. यह कहना अतिशयोक्ति न होगा कि वे आम और शास्त्रीयता से परे किसी भी व्यक्ति को लय, यतियाँ, ताल और उसकी मात्राओं को, सम को आम भाषा में, सहज उदाहरणों में समझा जाते हैं, समझाते हुए, उसकी यति में रह कर भी वे अनूठे उदाहरण पेश करते हैं. यही वजह है कि भारत में एक औसत व्यक्ति भी कथक का अर्थ बिरजू महाराज ही समझता है. बिरजू महाराज की जो सबसे बड़ी उपलब्धि रही है वह है उनका कम उम्र में ख्यातनाम हो जाना. और वह ख़्यानाम होना यूँ सहज भी नहीं था, इसके पीछे एक कच्ची, लचीली और नियति के मुक्कों से खूब गुंथी हुई नम मिट्टी और बहुत से महारत भरे हाथ रहे हैं. सत्ताईस वर्ष की आयु में तो उन्हें संगीत नाटक अकादमी अवार्ड मिल गया था, अपनी उम्र के चौथे दशक में तो वे पद्मविभूषण से विभूषित हो चुके थे. अपने पिता अच्छन महाराज की मृत्यु के बाद केवल दो वर्ष की तालीम पाकर, अभाव और विषमताओं के बीच जीवंत बृजमोहन मिश्र ने, कथक की विरासत को बहुत अलग ढंग से स्वयं में विकसित किया. पिता की तालीम जो बालपन की स्मृतियों, अवचेतन और अनुवांशिक विरासत में रच - बस गई, कुछ माता ने जो सिखाया. बिरजू महाराज की माता जी को बिंदादीन महाराज के कई भजन, ठुमरी, अष्टपदी आदि कंठस्थ थे, कुछ भाव भी याद थे. जिनके आधार पर बिरजू महाराज को उन्होंने अच्छन महाराज की स्थायी अनुपस्थिति में भी रंगमंच की शोभा बनाए रखा. उसके बाद तो उन्होंने दोनों चाचाओं के शुष्क अनुशासन और उपेक्षा के चलते जो ज्ञान जब मिला एक स्पॉंज की तरह सोखा. वे जानते थे, कथक अगर उनका प्रथम प्रेम है तो वही अभाव के दिनों में ज़रिया - ए माश भी बना है. उन्होंने स्वयं को डुबो लिया कथक में, उसके लिए कितने ही धक्के खाने पड़े. अंतत: उन्होंने परंपरा के भीतर ही अपने पिता अच्छ्न महाराज की भारी देह में बसी लय और तालों के गहन ज्ञान का गांभीर्य, चाचा लच्छू महाराज का लास्य - लोच और छोटे चाचा शंभू महाराज से अभिनय में दक्षता हासिल की. अभाव और संघर्षों ने उन्हें विनम्र बनाया और कथक के प्रति पूर्ण समर्पित. वे कहते हैं - “हमारे दोनों चाचा अभिनय में माहिर रहे तो पिताजी रिदम और बंदिशों पर ज़ोर देते थे । “ कथक का लखनऊ घराना कोमल और सौंदर्यप्रधान माना जाता है - इस घराने की विशेषताओं की त्रिवेणी हैं बिरजू महाराज. उनका पालन पोषण लखनऊ के मिश्रित अवधी - मुगल वातावरण में हुआ, धार्मिक पृष्ठभूमि वैष्णव रही. जहाँ उनके समकालीन कथक को अपना रहे थे, उनकी आनुवांशिक विरासत में कथक था. मानो वे बने ही हों कथक नाचने के लिए. The Lucknow Gharana of kathak to be characterised as a dance which was graceful, lyrical, decorative, suggestive, expressive, soft and the sensuous. - Prajosh Banerji बिरजू महाराज लखनऊ घराने के वास्तविक प्रतिनिधि हैं, आज तो इस बात पर संशय करना बेमानी है, लेकिन हो सकता है कि उनकी तालीम का कम समय, या दोनों चाचाओं से बारी बारी, बिखरे तौर पर तालीम ने किसी ज़माने में विरोधी लोगों ने संशय किया हो. इस बात पर मोहनराव कल्याणपुरकर एक जगह लिखते हैं - “बिरजू महाराज ही इस घराने के वास्तविक प्रतिनिधि हैं,इस विशय पर बहुत लोग संशय व्यक्त करते हैं, क्योंकि उनके पिता की मृत्यु के समय वे केवल नौ वर्ष के थे. मैं उन लोगों को आश्वस्त कर देना चाहता हूँ कि बिरजू महाराज का जन्म से ही प्रतिभासम्पन्न हैं, और उनका जन्म कथक के लिए ही हुआ है. एक बार ही सुनने या देखने से बोल, हस्तक और संगीत याद रखने में उनकी स्मरणशक्ति विलक्षण है. एक बार गुरु अच्छन महाराज जी गणेश परण मुझे लिखवा रहे थे. उस समय पाँच या छ: साल के बिरजू भी अपने पिता के पास ध्यान से से सुन रहे थे. परण को ताल में निबद्ध करने के लिए श्रुतलेख को बार - बार दोहराना पड़ता था. अभी केवल आधा ही कार्य हो पाया था कि बिरजू महाराज ने कहा - “ बाबू हमका याद होई गया.” अच्छन महाराज ने प्यार से उन्हें झिड़का, हम पुन: ताल निबद्ध करने काम में लग गए.बालक बृज जज़्ब नहीं कर सके, उन्होंने दुबारा वाक्य दोहराया. जिज्ञासा और दुलारवश जब अच्छ्न महाराज ने परण सुनाने को कहा और जब बिरजू महाराज ने इतना लंबा परण ताल सहित बिना किसी गलती के दोहरा दिया तो सभी आश्चर्यचकित रह गए. अच्छ्न महाराज की आँखों में खुशी के आँसू थे, रुंधे गले से वे केवल इतना ही कह पाए - यह मेरा गुरु है.”(परंपरा और बिरजू महाराज - “ कलावार्ता नवंबर 1984”) स्वयं अच्छ्न महाराज के लिए प्रसिद्ध गायक उस्ताद फैय्याज़ खान कहा करते थे, “यूँ उनका आकार हाथी जैसा था, लेकिन जब अच्छ्न महाराज नाचने खड़े होते तो इतना गरिमामय लगते कि मानो कोई परी बताशों पर नाच रही हो.“ बिरजू महाराज ऎसे व्यक्ति के गुणसूत्रों के वाहक थे. बिरजू महाराज पिता की इसी नाज़ुकी को अपने नाच में लाने के संघर्ष में रहे. वे स्वयं बताते हैं बहुत बाद तक, वे अपनी ‘अम्मा जी’ से पूछा करते थे कि क्या वे अब पिता जैसे दिखते हैं नाचते में? बिरजू महाराज के पिता केवल तीन ताल ही में सिद्धहस्त नहीं थे, वे अप्रचलित तालों पर भी नाचा करते थे. वे नृत्य के सभी पहलुओं को विद्वतापूर्वक ढंग से नाच में समाहित करते थे. भाव, ताल, लय और लय की महीन यतियों के कारीगर. उनकी नृत्यरत उपस्थिति मंच पर आकर्षक होती थी, प्रयोगात्मक प्रवेश और प्रस्था, पुरुषोचित अंग उनके नाच की विशिष्टता थी, बहुत कुछ ऎसा है जो अच्छन महाराज से बिरजू महाराज तक की यात्रा में विलुप्त हुआ होगा, बहुत कुछ है जो नया जुड़ा होगा. इसी तरह कुमुदनी लखिया भी, अपने बचपन को याद करते हुए, बिरजू महाराज को मिली विरासत की एक मोहक झलक देती हैं -“I was ten years old when my parents moved to Lucknow, my father gave us a detailed lecture on the great architecture of the city. The architecture of a place he said reflects the philosophy and lifestyle of its people. My mother was not interested, she was ecstatic only about the fact that we would be in the city in which lived the great Kathak maestro Pt.Achhan Maharaj. She was hell bent to taking me to train with him. As I was reluctant it was some time before we actually made it to maestro’s house. He was very hospitable and gentle but there was a three year old kid with only a string around his waist making his presence felt by trying to play Pkhavaj even though his arms did not reach the two sides of the drum. This child would grow up to be the great performer and the torch bearer of the Lucknow Gharana - Pt. Birju Maharaj. “( Nartnam 2007 April - July issue Pt. Birju Maharaj...- Kumudani Lakhiya) ( मैं दस साल की रही होऊंगी जब मेरे अभिभावक लखनऊ जाकर बसने जा रहे थे. मेरे पिता ने शहर की वास्तुकला पर एक लंबा भाषण दिया, उन्होंने बताया कि किस तरह किसी शहर का आर्किटैक्चर वहाँ के लोगों के दर्शन और जीने के ढंग को उजागर करता है. मेरी माँ की इसमें रुचि नहीं थी. वे केवल इस बात को लेकर प्रफुल्लित थीं कि वे उस शहर में जा रही हैं, जहाँ कथक के महान कलाकार पं. अच्छ्न महाराज रहते हैं. वे मुझे उनसे तालीम दिलवाने पर उतारू थीं, और मैं पंडित जी के घर जाने के ठीक पहले तक आनाकानी करती किंतु वे सौम्य और मेहमाननवाज़ थे. वहाँ एक तीन साल का बच्चा था जो अपनी उपस्थिति से सबको आकर्षित कर रहा था, केवल एक धागा उसकी कमर में था. वह पखावज बजाने की कोशिश में था, और उसके हाथ तक उसके दोनों सिरों तक नहीं पहुँच पा रहे थे. यह वह बच्चा था, जिसे महान नर्तक और लखनऊ घराने का रोशन चिराग पं. बिरजू महाराज.बनना था. ) लखनऊ भले ही बिरजू महाराज बहुत कम रहे हों, लेकिन लखनऊ उनके अंदर बसता है, वे लखनऊ को बहुत याद करते हैं. ““ मैं पूरे भारत और संसार में नाचा हूँ, लेकिन लखनऊ में नाचने की बात ही कुछ और है. मैं यहाँ सड़क पार गोलागंज में जन्मा, मेरे पिता, चाचा लोग, और मेरे दादा, उनके भाई और उससे पहले भी दो पीढ़ियाँ..सब यहाँ रहे, कथक किया. फिर 100 सालों में नियति और यश अनको रायगढ़, रायपुर, बॉम्बे और दिल्ली ले गया. अब मैं सच मॆं लखनऊ लौटना चाहता हूँ. “ ( हाल ही में 21 फरवरी 2014 को बिरजू महाराज ने लखनऊ में प्रस्तुति दी, उसमें वे बोले इंडिया टुडे मार्च 2014 अंक ) रामपुर के दिन बिरजू महाराज की बाल - लीलाओं के दिन थे. किंतु रामपुर नवाब की हाजिरी में रात को नाचना पड़ता था. “रामपुर नवाब के यहाँ जब बाबू जी थे, तब मुश्ताक हुसैन खाँ, हाफिज़ अली ख़ाँ जैसे कलाकार हुआ करते थे. छ: साल की उम्र में मेरा नाच नवाब साहब को बहुत पसंद था, आधी रात के बाद नाचना होता था. मैं बैठता था, पैर मोड़ कर चूड़ीदार पजामा, साफ़ा और अचकन पहन कर. वहाँ से निर्मला जी के स्कूल में यहाँ दिल्ली में हिन्दुस्तानी डांस एंड म्यूजिक अकादमी में चले आए. ये शायद 43 (1943) की बात रही होगी, उस उम्र में जुबली टॉकीज दिल्ली में एक बड़ी भारी कॉंफ्रेंस में मेरा नाच रखा गया. यह हॉल अब भी है. सात साल की उम्र में मैं एक कलाकार के नाते आमंत्रित था. जाने क्या नाचा रहा होउँगा. तबला खुद बाबूजी ( अच्छन महाराज) ने बजाया. उन्होंने मेरी आदत डाल दी थी, अकसर जहाँ वे खुद नाचते, पहले मुझे नचाते थे, मैं खूब जोरों से जमकर नाचता. यों मुझे याद नहीं पर वे जो बोल देते थे तो टुकड़े का मेजरमेंट मैं फट से पैरों से कर लेता. जैसे दिगदिग थई ता थेई आ थेई. मेरा अंदाज़ - नाप ईश्वर की कृपा से शुरु से अच्छा रहा. वही समय था जब कपिला जी, लीला कृपलानी आदि हिंदुस्तानी डांस अकादमी में थीं, मैं बाबूजी के साथ जाता था. हालांकि लौटते में तांगे में मुझे नींद आ जाती थी. कपिला जी, लीला जी की हायर ट्रेनिंग होती थी, अच्छे कठिन टुकड़े - परन, मैं याद कर लेता था और अगले दिन बाबुजी से कहूँ कि मुझे याद हो गया तो मानते नहीं थे. जब अम्मा जी मस्का लगा कर कहें कि सुन लो तो सुनते थे. तो ऎसे परन - किड़ तक धुन - धुन नातिट ता धाधिनता उस सात साल की उमर में खूब सुनाता उनको. मोहनराव जी ने उस दिन जो बताया ‘गणेश परन’ भी उसी समय सुनाई थी. “ ( जित - जित मैं निरखत हूँ : बिरजू महाराज की अपनी रश्मि वाजपेयी से बातचीत कलावार्ता नवंबर - दिसंबर 1984 ) पिता के अवसान के बाद निशेष हो चुके ऐश्वर्य के अवसरों के बावजूद नियति के पाले मे सही जगह आ गिरे महाराज, जब संघर्षरत किशोर बृजमोहन को 1953 में कपिला वात्यायन, जो स्वयं अच्छन महाराज की शिष्या रह चुकीं थीं, लखनऊ से दिल्ली ले आईं, और किशोर बिरजू कपिला जी द्वारा स्थापित 'हिंदुस्तानी स्कूल ऑफ़ म्यूज़िक एंड डांस' में नृत्य शिक्षक बन गए। बाद में यह संस्थान संगीत भारती कहलाया। लीला वैंकट रमन लिखती हैं - तब तक तो पुलों के नीचे से कितना पानी बह चुका था, युवा बिरजू दिल्ली में अजनबी नहीं थे। वे सात साल के रहे होंगे जब अपने पिता अच्छन महाराज के साथ दिल्ली आए थे, जब निर्मला जोशी ने उन्हें इसी संस्थान में शिक्षण के लिए आमंत्रित किया था - कपिला मलिक, लीला कृपलानी, जी.आर गुप्ता और ऊषा भाटिया तब वहां प्रशिक्षु थे। 1947 के दंगों से भयभीत हो अच्छन महाराज लखनऊ लौट गए, और उसी वर्ष की गर्मियों के मौसम में वे अचानक चल बसे, नौ साल के पुत्र और विधवा महादेई जी को गहरे निज और आर्थिक आघात में छोड़ कर।“ ( पृ. 24 श्रुति जनवरी 2014) किंतु क्या यह यात्रा इतनी आसान है कि एक चौदह साला किशोर कथक नर्तक लखनऊ से दिल्ली लाया गया और वह परंपरा बन गया! ऎसे ब्रजमोहन में यहाँ एक संगमरमरी विनम्रता थी, कि आओ गढ़ो मुझे ! जो भी बन सकूँ !! यही विनम्रता आज भी बिरजू महाराज का स्थायी गुण है. वे ब्रिटिश टीवी पर नाहिद सिद्दीकी को दिए गए एक साक्षात्कार में कहते हैं. “हमें तो आज भी हम से बेहतर कोई कथक का जानकार मिले तो उसे उस्ताद बना लें.” कथक के प्रति यह आस्था बिरजू महाराज के भीतर छिपे अनहद का सिमटाव है. मनुष्य में अहं जहाँ अपने चरम पर पहुँच चुका है. भौतिकता के अंध विवर से निकास का रास्ता है नृत्य. इस बात को हम आउटडेटेड कह कर नकार भी सकते हैं, मगर जो नाचते हैं वे जानते हैं कि भीतर और बाहर के बिखराव को अपने नम हाथों से थाप देता है नृत्य. स्वयं बिरजू महाराज कहते ही हैं कि उनके पूर्वज राजदरबारों तो नाचे ही, लेकिन धार्मिक आयोजनों में नृत्य मंडलियों में भी कथक होता था, तब साजिन्दे वाद्यों को देह से बाँधे कथक के साथ साथ सभा में चलते जाते थे. कथक नाच के माध्यम से कथानक प्रस्तुत करते थे. कालीय दमन, रास, राम और कृष्ण की बाल लीलाएँ, रावण वध, और भी अनंत कथाएँ उस अनंत हरि की. हमेशा यूँ ही ग्राफ़ चलता है, होता यूँ है कि कोई छोटी सी कलात्मक अभिव्यक्ति एक उठान लेते हुए एक लंबे कालांतर में कलाकारों, रसिकों द्वारा अपनाई सराही जाती है, कला के विशुद्ध स्तर पर आकर वह शास्त्रीय शिल्प ओढ़ती है, व्याकरणबद्ध होती है पहले श्रुति और स्मृति और फिर ग्रंथों के स्वरूप में. वह कला का विशुद्ध रूप बन कर सामने आती है...स्वर्णकाल पाती है. फिर जनरुचियों में उतरती है, कला जनमानस के समूह तक आती है, उसमें फरमाईशें और आम जन तक संप्रेषणीयता का तत्व आने लगता है और कला के क्याकरण में समय का बदलाव और जनता की माँग मिलावट लाते हैं, भाषा, अंदाज़ और कविता तीनों प्रभावित होते हैं. और कला तट बदलने लगती है. ऎसे ही कथक मंदिरों से दरबारों और दरबारों से और आगे जनता में आया. फैला...अपनाया गया इसे. अपनी परिशुद्ध ताल और लयकारी तथा भावपूर्ण गतों के लिये प्रसिद्ध बिरजूमहाराज ने एक ऐसी शैली विकसित की है, वह पदचालन की सूक्ष्मता और मुख वगर्दन के चालन और विशिष्ट चालों (चाल) और चाल के प्रवाह का श्रेय वे अपने प्रख्यात परिवार से मिली विरासत को देते हैं। वैसे तोबिरजू महारा़ज अपने आप में एक परंपरा का नाम है, एक तकनीक का नाम है और नाचके विशुद्ध शास्त्रीय प्रारूप में एक प्रयोगात्मक श्रृंखला का नाम हैं। हर महान कलाकार की तरह स्वयं महाराज जी विनम्रता के साथ हर निपुण कलाकार को अपने आप में घराना मानते हैं। कला की हर पारंपरिक विधा पर समय का प्रभाव पड़ता है। उसकी अभिव्यंजना मेंसमाज और तत्कालीन समय की अवधारणाएं अनजाने ही आ जाती हैं। अपनी रचनाप्रक्रिया में बिरजू महाराज कथक को जनमानस के निकट ला पाए। उनकी परंपरा में कथक की शास्त्रीयता केवलक्लिष्ट तालों और अंकगणितीय नृत्त शास्त्र से उपर उठी है, मात्राओं के चमत्कार, सहज अभिव्यक्ति बन गए हैं, और आज भी मायने रखते हैं। कहा जा रहा है आज 17 जनवरी 2022 को बिरजू महाराज का अवसान हो गया है, उनके हज़ारों शिष्य और लाखों मुझ जैसे एकलव्य शिष्य, करोड़ों प्रशंसक घने दुख में हैं। मुझे याद है मैं उनसे गुरूपूर्णिमा के दिन मिली थी, वे नक्षत्रों के बीच सूर्य समान चमक रहे थे, ताम्बूल रचित उनकी मुस्कान और बड़ी आंखों में मीठा संतोष था। मेरा मानना है कलाकार दिवंगत नहीं होते, अपनी कला में बने रहते हैं। बिरजू महाराज अपने आप में एक घराना हैं, किसी भी घराने से परे। विनम्र श्रद्धांजलि - मनीषा कुलश्रेष्ठ

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स्त्री दर्पण आज जया जादवानी का जन्मदिन मना रहा है। यहाँ पेश है उनकी एक कविता और कहानी ।
जया जादवानी की कविता –
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बहुत दूर से
बहुत दूर जाकर याद आता है
जब पास थे
कितने दूर थे हम
बहुत दूर जाकर ही दिखाई देती हैं
ह्रदय की गुच्छा-मुच्छा गलियां
बहुत दूर से एक आवाज़
साफ़-साफ़ पूछती है
क्यों खटखटाए दर इतने
एक सही दर की तलाश में
जबकि दर वही सही था
खड़े थे जिसके सामने
बहुत दूर जाकर महसूस होता है
कि कितने पास थे हम उनके
जिन्हें समझते थे पैबंद
रिश्तों के पैरहन पर
बहुत दूर से दिखाई देती हैं
बेचैन वे आँखें
जो टटोलती हर आहट को और
पास आते ही चमक उठतीं
बहुत दूर से दिखाई देता है
समंदर का दूसरा किनारा
सितारों की रौशनी में चमक उठता है
झील का झिलमिल पानी
बहुत साफ़ सुनाई देती हैं दूसरे की धडकनें
बहुत दूर से
दिखाई देते हैं मन के घने जंगलों में
पेड़ों से लिपट चमकते ढेरों जुगनू
बहुत साफ़ देखना हो तो
चले जाना बहुत दूर
बहुत दूर से बहुत दूर
बहुत पास दिखाई देता है.
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“क्या आपने मुझे देखा है”
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क्या आपने उस भूरे –लम्बे बालों वाले लड़के को देखा है? जिसे मैं कई दिनों से देख रही हूँ. जिसने हिप्पी स्टाइल में ढीले –ढाले कपड़े पहन रखे हैं…घिसी हुई जीन्स…सलवटों वाली टी शर्ट और खूब सारे जेबों वाली जैकेट. जेबें जो खाली झूलती रहती हैं तुम्हारी चाहनाओं की तरह. उसके चलने में एक लापरवाह किस्म की लापरवाही है जैसे वह कहीं नहीं पहुंचना चाहता. मुझे ऐसे लोग अच्छे लगते हैं जो कहीं नहीं पहुंचना चाहते. क्या आपने किसी को कहीं पहुँचते देखा है? इअरफोन अपने कानों से लगाये वह शायद म्युज़िक के साथ ही इस शहर को देखता है, म्युज़िक बैकग्राउंड का काम करता होगा जैसे हम फिल्मों में देखते हैं बहुत सारी चीजें एक साथ पर जुड़ते उसी से हैं जिससे हमारी भीतर की तान मिल जाये. आप समझ रहे हैं न मैं क्या कह रही हूँ. जनाब ये शब्द अक्सर गलत समझे जाते हैं जब लिखे जा रहे हों तब भी, जब कहे जा रहे हों तब भी. सबसे बेहतर है मौन…. रास्ता मुश्किल जरूर है पर आपको सही जगह पहुंचाता है. अगर आप दूर से इन न जाने किन-किन देशों –प्रदेशों से आये जवान लड़के –लड़कियों को देखें तो आप इनकी बाबत बहुत कुछ जान सकते हैं. जिस्म का ट्रांसमीटर बहुत पावरफुल होता है. गाता हुआ जिस्म तो बहुत साफ़ सुनाई देता ही है रोता हुआ भी. इन सबकी अलग –अलग कहानी और घर हैं .जिनसे ये उब और भागकर यहाँ आये होंगे. अगर मैं कोई लेखक होती तो जरूर इनके बारे में न जाने कितने किस्से आपको सुना देती और सब सच होते हालांकि मैं इनमें से किसी को नहीं जानती. हर लेखक एक चलता –फिरता कब्रिस्तान होता है, जिस भी मुर्दे को आवाज़ देंगे वही उठकर आपको एक कहानी सुनाने लगेगा. देखिये जनाब जब मैं बहका करूँ आप मुझे टोक दिया कीजिये.
हां तो मैं कह रही थी एक ही दिन अलग –अलग चार जगहों पर मुझे वह लड़का दिखा…माउन्टरिंग इंस्टीट्यूट के घने इलाके में जब मैं सुबह की सैर से वापस आ रही थी, एक पत्थर पर बैठा अपनी मोबाईल पर झुका न जाने क्या कर रहा था….आहट पाकर उसने क्षण भर को अपना सिर उठाया…एक सरसरी सी निगाह मुझ पर डाल वापस उसी मुद्रा में. नहीं –नहीं मुझे जरा भी बुरा नहीं लगा. जनाब, अब मेरी उम्र कोई इस तरह की बातों से बुरा मानने की तो है नहीं. हालाँकि न देखे जाने पर हर उम्र की औरत बुरा मानती है और बड़ी उम्र की औरतें तो थक जाती होंगी अपनी तरफ किसी चाहना से भरी निगाह की प्रतीक्षा में और उसी थकन में फिर वे गिर पड़ती होगीं अपनी पति की उतनी ही व्यस्त और त्रस्त गोद में. आपने सूखी पत्त्तियाँ चबाते जानवरों को देखा होगा. जब हमारे जीवन में रस नहीं रहता हम एक –दूसरे को बिल्कुल इसी तरह चबाने लगते हैं. ये आनंद है जनाब …एक वीभत्स आनंद, अपनी जरुरत भर पूरी कर लेने का …जानवरों से ऊपर उठने के पश्चात् भी जब –जब मनुष्य उनके लेवल पर आया है इसी वीभत्स आनंद को जीने .पर इस बात का यह अर्थ बिलकुल न निकालियेगा कि अब मुझमें देखने को कुछ नहीं बचा. जनाब, ये तो मेरी मुरव्वत है. आप एक बार मिलकर तो देखिये, सोचने लगेंगे काश! मैं इसके साथ जरा सा चल पाता….जरा सा इसे छू पाता. खुद को तराशने का हुनर अगर बचपन में आपको किसी ने सिखाया न हो तो बड़ी यातना सहने के बाद आता है. इसके बाद तो इससे बड़ी ख़ुशी कोई नहीं. आप बड़े मजे से अपने साथ रह लेते हैं जैसे मैं रह रही हूँ पिछले पैतीस सालों से यह जानते और देखते हुये भी कि अभी भी न जाने कितनी आँखें और पैर मेरा पीछा कर रहे हैं. खैर, दूसरी बार उस छोटी सी बेकरी में बैठी जब मैं अपनी गर्म पिज़्ज़ा का इंतज़ार कर रही थी, वह भी दूसरी मेज पर बैठा कांच के शोकेस में सजी ठंडी पेस्ट्रीयों और केक को देख रहा था. जैसे कोई बच्चा देखता है ….उसने एक मैंगो पेस्ट्री मंगवाई और खाने लगा. इस बार मैं उसे देर तक देखती रही थी. गेहुंये रंगत वाला वह दुबला –पतला हिप्पी सा दिखता लड़का मुझे रूठे हुए बच्चे सा ही तो लगा था. जिसका खिलौना किसी ने छिपा दिया हो. हो सकता है… जिसके साथ आया हो या आना चाहता हो वह किसी दूसरे के साथ चली गयी हो. आजकल के लड़के –लड़कियां एक –दूसरे से बहुत जल्दी ऊब जाते हैं. उन्हें एक –दूसरे के भीतर उतरने की जितनी जल्दी रहती है, बाहर आने की उससे ज्यादा. एक –दूसरे को समझने की लम्बी –काली- अंधेरी सुरंग…कितना भी धीरे चलो हर बार पैर फिसलता है? यह संसार का सबसे मुश्किल रास्ता है जनाब ….बहुत कम लोग बहुत दूर तक जा पाते हैं. खैर, उसके लम्बे बाल इस वक्त पोनी की शक्ल में पीछे बंधे हैं. बड़ा सा माथा चिकना ऐसा जान पड़ता है, जैसे ….मैं कुछ सोच ही रही थी कि …उसकी नज़र घूमी, मुझ पर पड़ी और मुड़ गयी. इस बार मुझे सचमुच अच्छा नहीं लगा. मुझे इतना साधारण किसी ने महसूस नहीं कराया था. मैं मन ही मन हंस पड़ी और उठी एक निर्णय के साथ अपनी पिज़्ज़ा ख़त्म किये बगैर. तीसरी बार वह उसी बस में बैठा था, जिसमें ‘कोठी’ जाने के लिए मैं बैठी थी. मुझे उम्मीद थी वह ऊपर ‘कोठी’ में भी जरूर दिखेगा अपनी मोबाईल से पहाड़ों और झरनों का कोई वीडियो बनाते हुये या अकेले में सिगरेट या बियर पीते हुए तो मैं उससे खुद बात करने की कोशिश करुँगी. पर वह वहां सचमुच नहीं दिखा. वापसी की आखिरी बस में सबसे आगे की सीट पर वह बैठा था. उस दिन ऊपर कोठी में मैंने उसे ढूँढने के सिवा कुछ और नहीं किया था. सारे नजारों ….सारी हरियाली को उस एक चेहरे ने ढँक लिया था. गनीमत है कि बादल अब तक अछूते थे. उन नीले बादलों पर किसी की परछाई नहीं थी. न उसके चेहरे की न मेरे विचारों की. इत्तफ़ाकों के ये कैसे सिलसिले थे, जो इतना तरतीबवार घट रहे थे. मनाली बस स्टैंड पर जब हम उतरे तो समूचा बाज़ार गुलज़ार था. लोग घूम –फिर कर वापस आ गए थे. सारी होटल्स और रेस्टारेंट ठसाठस भरे पड़े थे. मैंने उसे एक बार में घुसते देखा तो न जाने कब से दबी बियर पीने की तलब जोर मारने लगी. मैंने माल से बियर की दो बोतलें खरीदीं और अपने कमरे में वापस आ गयी.
उस रात मुझे नींद नहीं आ रही थी. मैं सीधी लेटी सफ़ेद छत को निहार रही थी…बाहर अँधेरा था …और ठंडी हवा और निस्तब्ध ख़ामोशी…रात के नीम अँधेरे में अपने साथ जागना एक विषादकारी अनुभव साबित होता है .कहते हैं अपने भीतर झाँकने का सबसे महत्वपूर्ण क्षण यही रात की घड़ी है, जब आपको अपनी नंगी –ठण्ड और अकेलेपन में कांपती आत्मा का तीव्र साक्षात्कार होता है. बहुत कठिन क्षणों में मैंने यह साक्षात्कार किया है. जब मेरा पति मेरे जिस्म के खिलौनों से खेल कर उन्हें तोड़कर थक कर सो जाता था….तब. कभी आपने टूटे हुये खिलौनों के रोने की आवाज़ सुनी है ? कुछ औरतें ऐसे ही रोती हैं अपने उन टुकड़ों के लिये जो फिर उनसे कभी नहीं जुड़ पाते. आपमें से अधिकतर जानते होंगे औरतों के टूटने का सिलसिला अक्सर उनके बचपन से ही शुरू हो जाता है जब उन्हें साधारणता की बेड़ियों में जकड़ दिया जाता है जैसे मुझे जकड़ा गया था वर्जनाओं की बेड़ियों से. मेरे भाई को जितनी स्वतंत्रता थी उससे आधी भी नहीं थी मेरे पास .और मेरा बाप …..मुझे नफरत है उससे ….बारह साल तक उसने मुझे ……और मेरी मां चुप रहती थी ….ऐसी कौन सी विवशता होती है जनाब कि औरतें मुंह नहीं खोलतीं .बारह सालों के बाद मैंने मुंह खोला और मैं हास्टल भेज दी गयी. छुट्टियों में मैं अपने घर जाने की बजाय अपने किसी फ्रेंड के घर जाना ज्यादा पसंद करती थी .कालेज के बाद मेरी शादी कर दी गयी और फिर मेरा पति ……क्या सारे पुरुष एक जैसे होते हैं ? नहीं जनाब मैं यह बात मानने को तैयार नहीं हूँ ….पर पुरुष अकेलेपन को उस तरह नहीं जान सकता जिस तरह एक औरत जान सकती है. पुरुष औरत के पास जाता तो है ताकत बटोरने पर उसकी ताकत छीन लेना चाहता है. उससे उसका वज़ूद तक. वह नहीं चाहता कोई उसको चैलेन्ज करे. मैंने पहली राहत की सांस ली अपने डाइवोर्स के बाद. मैंने उन सबको अपनी ज़िन्दगी से निकाल बाहर फेंका जिन्हें मैं नहीं चाहती थी और मैं अकेली हो गयी. अकेलापन जो कभी वरदान की तरह लगता है ….कभी अभिशाप की तरह .इस वक्त मैंने देखा मेरे भीतर का अकेलापन न जाने कब बाहर चला आया था और चुपचाप मुझे घूर रहा था. आज यह आक्रामक नहीं है मैंने इस बात का फायदा उठाया और अपना कम्बल सिर तक खींच लिया.
दूसरे दिन न वह सुबह की सैर पर मिला, न बेकरी में, न बस स्टॉप पर मैं दिन भर माल पर भटकती रही, शाम को वन विहार में. और सात दिन यह लुका छिपी चलती रही. कभी नीला आसमान बादलों से ढँक जाता….कभी बादल पहाड़ों के उस पार चले जाते. मैं कभी अगस्त की बारीक बारिश में भीगती कभी भीतर के सूखे से लडती. फिर मैंने एक रात उसे ढूंढ लेने का निश्चय किया. जी हां ….आप बिल्कुल ठीक समझते हैं, मैं रात नौ बजे उस बार में जा पहुंची जहाँ मैंने उसे जाते देखा था. वह वहीं था.
इस वक्त जहाँ मैं हूँ, बहुत शोर है और इस शोर में भी मैं अपनी चेतावनी देती आंसुओं में डूबी आवाज़ सुन सकती हूँ……उठ भाग ..निकल यहाँ से ..ये तेरी जगह नहीं है. यहाँ कुछ नहीं मिलेगा ….. मैं उठती नहीं …मेरा अपने साथ युद्ध है और मुझे जीतना ही है बिना अपना मष्तिष्क काटे. आप पूछ सकते हैं मैंने क्या किया….कुछ नहीं जनाब …जबकि जी चाह रहा है इस समस्त बार को तोड़ –फोड़ दूं ….ये ग्लास ..प्लेट्स …बाटलस …सब …सब कुछ …नसों को तोड़ता –फोड़ता कोई तूफान है जो बाहर आना चाहता है….मैं कस के दबाये बैठी हूँ. मैंने खुद को कभी इस बात की इजाज़त नहीं दी कि अपने मन का कर सकूँ. जब छाती से रुदन फूटकर बाहर आना चाहता है मैं हंस रही होती हूँ. जब मेरी प्यास समंदर पी जाना चाहती है …मैं तपती रेत पर चल रही होती हूँ……. खुदाया ! क्या मैं किसी को अपना वास्तविक रूप दिखा पाउंगी ?
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आपको क्या लगता है मैं नहीं जान पाया था. आप बहुत भोले हैं श्रीमान. औरतों के मामले में हम पुरुष बहुत दूर से सूंघ लेते हैं. और इस औरत में तो मुझे कायल करने के समस्त गुण हैं. कुछ खास है इसमें. इसके जिस्म में एक पुकार है …..आँखों में एक अनछुही सी रह –रह कर कांपती चाह ……भीतर की चाह कैसे जिस्म की त्वचा पर चमक जाती है यह तो खुद चाहने वाले को नहीं पता. यह जब दूर तक पसरे पहाड़ों पर बिछी बर्फ़ की तस्वीरें ले रही थी अपनी मोबाईल से ….मैं इसकी नाज़ुक उँगलियों और जीन्स और टॉप में फंसे तराशे जिस्म को देख रहा था…पहली नज़र में ही पूरी की पूरी छाप मेरे भीतर उतर गयी थी हालाँकि मैं न देखने का दिखावा करता रहा. औरतों का किस्सा बड़ा जानलेवा होता है श्रीमान. इनकी भीतर की भूलभुलैया में अगर आप उतर गए तो ये जहाँ ले जाकर आपको छोड़ेगी आपको वापसी का रास्ता भी न मिलेगा और अपनी चाहत की बात तो इन्हें भूल कर भी न बताइयेगा. औरतें उन्हीं को ज्यादा पसंद करती हैं जो उन्हें पसंद नहीं करता. तभी तो सभी खलनायकों की ढेर सारी प्रेमिकाएं होती हैं. मैं भी यही चाहता हूँ श्रीमान मेरी ढेर सारी प्रेमिकाएं हों. सब की सब मुझे पसंद करें …मेरी बात मानती रहें. आप जानते हैं न श्रीमान, औरतें शासित होना पसंद करती हैं कहें चाहे कुछ भी….बस आपमें ये हुनर होना चाहिये. आप इन्हें अपने पीछे दौड़ाना चाहते हैं तो इनसे दूर रहिये. अपनी अकड़ में रहिये. जैसे मैं रहा और देखिये कैसे आई है सात दिनों के बाद आखिरकार. इन्हें ‘मैन’ चाहिये ‘बच्चा’ नहीं. हालाँकि मैं कोशिश करके भी उस तरह से खुरदुरा नहीं बन पाया तभी तो श्रीमान लड़कियां मुझे छोड़कर चली जाती हैं. इस बार मैं बेहद सावधान रहा. मैं उस दिन कोठी में भी उससे छुपता फिर रहा था और फिर वापस आने पर इस बार में घुस आया था. वैसे भी मुझे कुछ दिनों के लिए एक अंग्रेज लड़की मिल गयी थी और मेरी रातें बड़े मज़े से गुज़र रही थी. क्या कहा ?मैं झूठ बोल रहा हूँ. नहीं श्रीमान. दरअसल मुझे इन जल्द हासिल होने वाली औरतों से नफरत है पर यह भी सच है ये आपको वहां तक ले जाती हैं जहाँ आप इनके बिना नहीं पहुँच सकते. वर्जनाओं और डरों से दूर…इनके सामने आपको वे कपड़े पहनने की कोई जरूरत नहीं है जो आप हर वक्त पहने रहते हैं. आप नंग –धड़ंग इनके सामने विचर सकते हैं. कपड़े गिराते ही आपमें से बहुत कुछ गिर जाता है….और आप फूल से हलके हो जाते हैं. और श्रीमान सच तो यह है कोई औरत बाजारू नहीं होती .हम ही साले उसे बाज़ार में खड़ा कर देते हैं अपने लिए ….एक घर में …एक बाज़ार में …..पर श्रीमान ये मामले इतने दोटूक नहीं होते कि आप कह कर समझा सकें…..मैंने अपने पापा को देखा है….जब वे छिप –छिप कर नंगी औरतों की तस्वीरें देखते हैं. मुझे दया आती है उन पर. जब उन्हें दस रोटियों की भूख होती है, दो रोटियां मिलती हैं उन्हें…..और सालों बाद इस तरह के लोग एक लम्बी भूख बन कर रह जाते हैं. हालाँकि शादी नाम की कैद बनाई ही इसलिये गई है कि कोई भूखा न रहे पर अधिकतर लोग भूखे रहते हैं और सड़क किनारे बनी दुकानों पर टूट पड़ते हैं. देखिये श्रीमान, मैं आपको भटका नहीं रहा. मैं चाहता हूँ आपको उस पाइंट पर खड़ा कर दूं जहाँ से आप सब देख सकें. फिर भी ऐसा बहुत कुछ छूट जायेगा जिसे आप पकड़ नहीं सकेंगे. और अगर ऐसा हो तो यही समझियेगा मैं ठीक से अपनी बात समझा नहीं सका आपको .अब वह अन्दर आ गई है …आप चुपचाप यहीं बैठे रहिये अपने गिलास के सामने और मुझे अपना काम करने दीजिये.
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न देह, न रूह, किसी को देखकर आप यह अनुमान नहीं लगा सकते कि वह कितनी उजली या मैली है. हम देखते हैं त्वचा या बालों का रंग, आँखों की चमक, चेहरे की ताब और वह खामोश भाषा जो कहने –सुनने से परे अपना मायाजाल खुद रचती है.
मैं जानती हूँ आप क्या सोच रहे हैं मेरे बारे में ?क्या मुझे इससे कोई फ़र्क पड़ता है? जिसके संबंधों का इतिहास आपको नहीं मालूम उसके बारे में किया गया कोई भी फैसला एक गलत फ़ैसला होगा.
जैसे ही मैं उसके सामने बैठी उसने मुस्कुरा कर मुझे देखा ….
‘प्लीज़ कम …वेटिंग फॉर यू …’
मेरी आँखें चौड़ी हो गयी …’तुम मुझे देखते रहे हो ….’
‘आफकोर्स यस .यू आर वेरी ब्यूटीफुल. एक जलती हुई लपट हैं आप, कोई भी भस्म होना चाहेगा.’
‘तो वह नाटक था कि तुम मुझे नहीं देख रहे.’
‘ऑफकोर्स …आपको निकट लाने का……’
‘पुराना फार्मूला ?’ मुझे हंसी आ गई.
‘कुछ फार्मूले कभी पुराने नहीं पड़ते. कुछ रिश्ते भी कभी पुराने नहीं पड़ते…. औरत –मर्द का रिश्ता. अगर आप उस दूसरे के बारे में सोच रहे हैं तो यकीन मानिये वह भी आपके बारे में सोच रहा है. आप तो मुझसे ज्यादा एक्सपीरियंसड हैं.’
‘ क्या तुम्हें नहीं लगता दुनिया इस पैग की तरह होनी चाहिये ….आओ …पियो और जाओ….एक्सपीरियंस हमारे पाँव की बेडी बन जाता है. एक्सपीरियंस के हिसाब से तो मुझे पुरुषों से नफ़रत होनी चाहिये……’ मैं आहिस्ता हंस पड़ती हूँ.
‘मुझसे मिलने के बाद आपको पुरुषों से प्यार हो जाएगा.’ उसने बेहद कोमल स्वर में कहा.
‘हा …..हा …..हा…. अगर मैं सिर्फ़ तुम्हीं से प्यार कर सकूँ ?’
‘अगर ऐसा हो जाये मुझे बता ज़रूर दीजियेगा …’ वह उसी तरह मुस्कराता रहा.
‘तुमसे मिलने वाली सारी लड़कियों की यही गति होती है क्या ?’
नहीं ….पर मैं चाहता हूँ आपकी हो …’
और हम दोनों हंस पड़ते हैं .उसने वेटर को बुलाया और मेरे लिए वोदका ऑर्डर कर दी.
‘आपने सोचा नहीं यह अजनबी आवारा लड़का और मैं एक संभ्रांत महिला……’ उसने कहा .
‘मैं अपनी सोच से आगे जाना चाहती हूँ….और जिसे तुम सम्भ्रांत होना कहते हो वह बड़ी यातना सहने के बाद आता है….’ पता नहीं वह समझा या नहीं. पर मुझे उसका उत्साह से दमकता चेहरा अच्छा लगता है…..मैंने शिद्दत से महसूस किया…जिस चीज़ की गुज़र जाने के बाद बेतहाशा तलब होती है वह है जवानी. जब सारी दुनिया तुम पर टूट पड़ना चाहती है तब तुम भागे –भागे फिरते हो. और जब तुम उन पर टूट पड़ना चाहते हो वे भागी –भागी फिरती हैं. मैं उससे बहुत सी चीजें कभी नहीं कहूँगी ….वह नहीं समझेगा…वह समझे मैं चाहती भी नहीं हूँ.
‘ आप क्या करती हैं ?’
‘ मेरा एक बुटीक है जिसे मैंने पिछले पंद्रह सालों की अनथक मेहनत से खड़ा किया है. अपने डायवोर्स के बाद ……वे बड़े कठिन दिन थे. सच तो यह है अपने काम को अपना जीवन सौंपने के बाद आपके पास बहुत कुछ बचा नहीं रह जाता या अगर बचता भी होगा तो आपको पता नहीं चल पाता…और आप चाहते भी नहीं हैं आपको पता चले .तुम्हें पता है हम सबसे ज्यादा किससे डरते है ….खुद से …’
‘इंट्रसटिंग …’ उसने कहा.
‘मैं भी खुद से डरती थी. अपनी मांगों से ….अपनी चाहनाओं से …’
‘और अब आपने खुद से डरना छोड़ दिया है ?’
‘मैं खुद को दिखा देना चाहती हूँ कि मैं तुमसे नहीं डरती .’ मैंने मुस्करा कर कहा तो वह बहुत ज़ोर से हंस पड़ा .मैं उसकी हंसी देखती रही.
वह मुझे गौर से देखता अपनी वोदका पी रहा है. बहुत आहिस्ता –आहिस्ता हम एक –दूसरे की तरफ बढ़ रहे थे. शुरू में तो वह मुझसे ‘मैम….मैम…’ कहकर बात करता रहा. आखिर मैं कमजकम उससे दस साल बड़ी थी…फिर धीरे –धीरे हम खुलते चले गए. उसने बताया कि अपनी पढाई पूरी करने के बाद वह एक ऐसे जॉब की तलाश में है जो उसके पांव की बेडी न बने. उसके पहले वह यूँ ही एक आवारा किस्म की ज़िन्दगी जीना चाहता है. ‘आवारा किस्म की ज़िन्दगी’…. इन शब्दों को मैं एक –एक घूँट की तरह पीती रही. क्या यह सिर्फ़ पुरुषों के भाग्य में है ?
‘ इसके पहले कि तुम्हें शादी के खूंटे से बाँध दिया जाये ….?’
‘इस खूंटे से तो मैं बंधने से रहा. आपको बताने में कोई हर्ज़ नहीं है मैं दो साल लिव इन रिलेशन में रहा हूँ.’
‘फिर ?’
‘फिर क्या ?सब ख़त्म……वह चली गयी.’
‘उसका अहसान मानो कि वक्त रहते उसने तुम्हें छोड़ दिया और अब तुम दोनों स्वतंत्र हो ….’
‘आप मुझे मेरे गिल्ट से निकाल रही हैं ….’
‘एक बात अच्छी तरह समझ लो. ऐसा कोई नहीं जो अनंतकाल तक आपके साथ चलने को राजी हो सके. ऐसी मांग, ऐसी चाह ही पागलपन है. लोग आते हैं अपना रोल प्ले कर चले जाते हैं. हम क्यों उन्हें रोककर रखना चाहते हैं ? उनका और अपना जीवन नरक बनाने के लिए ? और फिर हर दोस्त हमारे अन्दर एक नया संसार पैदा करता है, यह संसार हममें ही छुपा रहता है जब तक वह आकर इसे अनावृत नहीं कर देता .’
‘इस तरह तो आपके भीतर बहुत से संसार अनावृत हो गए होंगे ?’
‘और बहुत से अभी नहीं हुए हैं ……’ मैं मुस्कराती रही. जिस क्षण गलत समझे जाने का भय आपके भीतर से निकल जाता है उस क्षण के बाद अपना सच जीने का हुनर आपको आ जाता है.
वह ध्यान से सुन रहा है….उसकी आँखें सिकुड़ गयी हैं.पता नहीं कितना समझा.
‘तो आपने किसी को रोकने की कोशिश नहीं की?’
‘नहीं ….सब चले गए क्योंकि सब चले जाते हैं .’
दो पैग के बाद मैं खुलती चली गयी. शराब कुछ देर के लिए ज़िन्दगी के मामूली मसलों से तुम्हें ऊपर उठा देती है…खुद से ऊपर उठा देती है. पिछले कुछ सालों से वक्त का गुजरते जाना मैं बिलकुल साफ़ –साफ़ महसूस कर पा रही हूँ …क्यों चाहती हूँ मैं इसका साथ? अपने अकेलेपन से मुक्ति पाने के लिए? मुझे उस नशे में एक तीव्र अहसास हुआ….. पिछले न जाने कितने सालों से मैं अपनी स्वतंत्रता में भी अकेलेपन की पीड़ा भोग रही हूँ. हम स्त्रियों का जीवन एक अजीब सी दुश्चिंता और डर में बीतता है. डर ….असुरक्षा का, लोगों का, भूत –भविष्य का, पुरुषों का और इस बात का कि ये डर कोई देख न ले. हम अपने मन का नहीं जी पाते तो सोचते हैं क्यों नहीं? जी लेते हैं तो सोचते हैं क्यों ?
आप कहेंगे, बेवकूफ औरत !जरूर कहिये जनाब….ये हमें बहुत बाद में पता चलता है एक लम्बी उम्र गुज़ारने के बाद कि दरअसल हम खुद पर बोझ हैं. हम खुद को किसी को दे देना चाहते हैं. क्या आपको लगता है अकेलेपन की पीड़ा से छुटकारा पाने का कोई दूसरा रास्ता भी है ?
हम दोनों के हाथ में तीसरा पैग है ….मैं उसकी आँखों में अचानक पैदा हुई लपट साफ़ देख पा रही हूँ ….वह कभी आगे बढ़ता कभी पीछे हटता जान पड़ता है….मुझे हंसी आ रही है …देह और मन का यह द्वंद मेरे लिए कितना जाना –पहचाना और यातनादायी है. ये दोनों कभी एक –दूसरे से हाथ नहीं मिलाते. देह नैसर्गिक होना चाहती है, मन उसे बाँध कर रखना चाहता है. मैंने उसे कुछ नहीं कहा. उसने चौथा पैग बना दिया और इसके बाद मुझे सिर्फ इतना याद है कि उसके कंधे का सहारा लेकर मैं बाहर आई थी. ऑटो में बेसुध बैठी थी और उसके बाद अपने कमरे में….
वह मेरे पास बैठा है …धीरे –धीरे मुझे खोलता और खुलता….परत दर परत……
‘ तुम सोचते होगे ये औरत मेरी मां की उम्र की है और ….’
‘शटअप….मैं इस तरह नहीं सोचता ….’
‘डज़ इट मेक एनी डिफरेन्स ?’
‘ इट डज़….लिसन …आय वांट यू …आय नीड यू …’
‘बट यू डोंट लव मी.’
‘ हा ….हा…….हा……यू नो …औरतें कभी बड़ी नहीं हो पातीं …न कभी प्रेक्टिकल हो पाती हैं …तुम अभी भी इस शब्द के पीछे भाग रही हो? मेरी गर्लफ्रेंड भी मुझसे हमेशा यही पूछती थी ….डू यू लव मी ? मैं हमेशा कहता था ..यस . क्योंकि इसके अलावा कोई कुछ सुनना ही नहीं चाहता. कुछ शब्द बनाये ही गए हैं दूसरों को बेवकूफ बनाने के लिए …..लव …गॉड …आस्था …विश्वास …. ये शब्द सुनने में अच्छे लगते हैं पर हकीक़त से इनका कोई वास्ता नहीं होता.’
‘तुम इस उम्र में इतने प्रेक्टिकल कैसे हो ?’
‘ लड़कियां बना देती हैं पर अफ़सोस वे खुद नहीं बन पातीं .’ वह फिर हंसा…..
‘मुझमें आओ….हम एक सांस लेंगे और एक हो जायेंगे….आपको इतना और इस तरह का प्यार किसी ने नहीं किया होगा. यू आर थर्स्टी….वाटर इन मी….तूफान हूँ मैं…नष्ट हो जाऊंगा. नष्ट कर दूंगा.’
और वह मुझ पर टूट पड़ा …..
वह एक आदिम जिप्सी नृत्य था ….वह जितनी बार मुझे पकड़ता मैं छूट –छूट जाती थी ……मुझे वहां मत ढूंढो जहाँ मैं नहीं हूँ….नाभि के नीचे नहीं….. नाभि के ऊपर है रहस्य …पर्वतों के बीच उदित होता है वहीँ सूर्य ..आओ ..उसे देखें …उसके आने से आती है हरीतिमा. समस्त कायनात खिल उठती है. आओ …आकाश से इसे झपक लें. पी लें इसे …रुको –रुको सुनो ..उडो ऊपर ….और ऊपर ..और ऊपर .. तुम्हारे पंख कितने बेचैन हैं ?और ये बादल हमें कहाँ उडाये लिये जा रहे हैं ? ये उडान ….ओह ….. और ऊपर ….और ऊपर ….इन बादलों के पार ….यह भूरा कोमल अहसास …..ये हरे रंग ……आओ ….प्रकृति ने एक गीत गाया है ? हम इस धुन पर नृत्य करें ….ये फूल से हलके पैर ….मुझे उठा लो…..ओह ……ओह……एक आवारा चीख कमरे में बिखर गयी.
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आज आपके मैं एक कन्फेशन करना चाहता हूँ…. मैंने आपको बताया था न मुझे इस तरह की जल्द हासिल होने वाली औरतों से सख्त नफ़रत है…..हालाँकि जब मैं इससे मिला यह मुझे बिल्कुल अलग लगी. आप जानते हैं न यह मेरे लिए पहली बार नहीं है पर आज मैं भूल गया कि मैं कौन हूँ और क्या कर रहा हूँ ?यह मुझे बहा ले गयी. मैं समंदर में तैरने का अभ्यास कर रहा था….मुझे उस पार पहुंचना था जो न जाने कहाँ था ? मुझे लगा मेरी नाव पलट गयी है और मैं डूब रहा हूँ…..वह डूबने का अद्भुत सुख और फिर उस नाव के एक पट्टे को पकड़ कर तैरते हुए ऊपर आना….निढाल जिस्म को किनारे पर ढहा देना…..लहरों ने जब हमें किनारे पर फेंका ….हम उसी तरह पड़े रहे ….एक –दूसरे में गुंथे …..
इस रात के बाद हम अपनी अपनी दुनियाओं में वापस चले जायेंगे …… पर मैं इसे कभी नहीं भूल पाउँगा……
मैं इससे वह सब नहीं कह पाया जो मैं कहना चाहता था….पर जो भी मैंने कहा, वह चुपचाप सुनती रही फिर सो गयी. मैं उसे सोते हुये देख रहा हूँ….मैं उसकी नींद नहीं तोडना चाहता .
कुछ देर बाद उसने आँखें खोली और मुझे देखा ….उसकी आँखों में हैरानी उतर आई ..मैं अब तक वहीँ था ?
‘सुनो …..’ मैंने उसे पुकारा …. ‘आय लव यू ….रियली…..’
‘सुनो ……क्या तुम थोड़ा सा मुझे देख सके ?’ उसकी वह आवाज़ मेरे आर –पार निकल गयी .
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दूसरे दिन मैंने आईने में खुद को देखा और हैरान रह गयी. न जाने कितने बरस मेरे जिस्म से झर गए थे….शायद दस …शायद बीस…मुझे सचमुच नहीं पता…पर मैं नई सी हो गयी थी. नई सी नहीं, नई. मानो मैं अपनी बेटी हूँ..और मैं पीड़ा और प्रसन्नता से पुलकित हो उठी. जानती हूँ आप दुनियादार लोगों को लगता है वक्त और परिस्थितियों के साथ औरत को खुद को मार देना चाहिये और हम मार देते हैं क्योंकि आप लोग ऐसा चाहते हैं. एक बात बताइये आप लोगों को औरत की स्वतंत्रता से इतना डर क्यों लगता है? हमें बाँध नहीं पाते इसलिये ?औरत को खुद को मारने की तरकीबें आप उन्हें उनके बचपन में ही सिखा देते हो. मैंने भी मार दिया था खुद को अपने जाहिल पति से डाइवोर्स के बाद. फेंक दिया था खुद को खुद के अन्दर पर क्या करें ?सालों बाद जब ढक्कन उठाकर भीतर झांकते हैं तो अपनी साँसें चलती हुई पाते हैं, अपने अनजाने मैं जिन्दा थी और ये जो आईने के सामने खुद को निहार रही है …वही है. यकीन नहीं आता आपको ? तो इसकी आँखों में देखिये …इन्हीं आँखों के अन्दर नीचे उतरने वाली सीढियां हैं…क्या कहा…आपका इससे कोई परिचय नहीं है …जानती हूँ जनाब, ऐसी औरतों को आप घरों में रहने कहाँ देते हैं ? घरों में तो वो क्या कहते हैं पालतू मुर्दा औरतें रहती हैं ….जो किसी रोबोट की तरह आपके बताये काम करती हैं ….घरों में ‘ये जिंदा औरतें’ नहीं रहतीं ‘ये’ अपने अन्दर छिप कर बैठी रहती हैं और आप उनसे कभी मिल नहीं पाते…..कभी इनसे मिलने की ख्वाहिश हो तो जरा संभल कर ये सीढियां उतरियेगा …अपना हाथ छूटा तो खुद को कभी ढूंढ न पाएंगे.
– जया जादवानी (रायपुर)

स्त्री दर्पण की ओर से हमारे समय की दो महत्वपूर्ण लेखिकाओं जया जादवानी और निर्मला भुराड़िया को उनके जन्मदिन पर शुभकामनाएं।आज उनके जन्मदिन पर हम कार्यक्रम भी कर रहे हैं।आप इन लोगों की रचनाएं पढ़िये ।उन पर लेख दिए जा रहे हैं उनपर वीडियो भी बनाये गए है और उनका रचना पाठ भी कियाजा रहा है। आपको पता ही है हम 60 वर्ष से अधिक उम्र की महत्वपूर्ण लेखिकाओं पर जन्मदिन समारोह आयोजित कर रहे है।अब तक 60 से अधिक लेखिकाओं पर हम कार्यक्रम कर चुके हैं।तो आज इन दोनों लेखिकाओं की जन्मदिन समारोह में आप भी हिस्सा लें और उन्हें बधाई दें।

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हिंदी की विदुषी लेखिका चंद्रकला त्रिपाठी के67 वें जन्मदिन पर उनकी कुछ कविताएं

राजा को अभिनेता पसंद आता गया
उसका प्रजा पर असर ज़ोरदार दिखा
प्रजा वैसे तो कोई मुश्किल न थी
मगर ऐसे तो थी कभी और बहुत ज्यादा थी
राजा ने शिक्षा ली अभिनेता से मगर कहा इसे
गुप्त रखना
अभिनेता को भी दुनिया से यह रिश्ता छिपाना था
उसे प्रजा के हिए में अपनी जगह नहीं घटाना था
राजा ने कहा उसे प्रजा पर प्रभाव के मौके पर आंसू चाहिए
अभिनेता अचकचाया और अपना भेद बता गया
आंसू के मौके पर वह असली आंसू रोता है
अभिनय उसका इतना भी छल नहीं है कि वह रोने का
दिखावा करे
इन दिनों तो उससे हंसना हो ही नहीं पाता है
दिल में उसके मां के शव से चिपका एक बच्चा बिलखता है
इन दिनों कारोबार मंद है सबका
कोई भी कैसे भी प्रदर्शन में नहीं हिलगता
सुन रहा था सुकवि
उसने अपने भीतर बसे मुसाहिब को संभाला
राजा से कहा प्रभु
रोना बहुत आसान है
और प्रजा भी
आंसू कौन देखता है
मुद्राएं संभाल लें
देखिए ऐसे
नहीं तो ऐसे
सुकवि का चेहरा सिकुड़ता फैलता रहा
राजा अचरज से
चेहरे का बिगड़ना
लटकना देखता रहा
आंसू पर चली बात तमाशा हुई जा रही थी
अभिनेता शर्मिंदा था
वह एक्ज़िट के बारे में सोच रहा था
ख़ैर!
*****
: धीमें बहुत धीमें चलती दिखती हैं चींटियां
बेसब्री दिखाने भर काया नहीं उनके पास
बहुत झुक कर नहीं उड़ते पक्षी
हवा छितराने के लिए भी नहीं
बहुत दिनों से सन्नाटा है इधर
उन्हे तो इधर का ही पता है
सूख चुका है बगल की बस्ती का हैंडपंप
अगल की कॉलोनी में पानी अभी बाक़ी है
बांध कर ले जाया जा रहा है भगेलू
उसका असली नाम भी अब यही हो गया है
पांच बजे बंद कर देनी थी अंडे की दुकान
वह आठ बजे अपने ठेले के साथ पकड़ा गया
पीछे पीछे दौड़ती जा रही है नसीमा
चिल्ला नहीं रही है
सिर्फ़ बिलख रही है
उसके पीछे कोई खोल ले जाएगा उसकी बकरी
आसपास बहुत दिनों से उपवास चल रहा है
नीरज को अब से आधी तनख्वाह भी नहीं मिलेगी
सुधा को नहीं मिल रहा है साड़ियों में फाल टांकने का काम भी
पढ़े-लिखे दोनों भीख मांगने में हिचकते हैं
छ: महीने के छोटे बच्चे के लिए भी जीना नहीं चाहते
किसी की कुंडी खटकी तो पृथ्वी तक कांप गई
क्या है ? कोई कुरस हो कर चिल्लाया
स्त्री ने फोंफर से देखा उस दूसरी स्त्री को
उसकी उम्र कम थी और वह कांप रही थी
उसके हाथ में गीली हुई पर्ची कांपती इस हांथ में चली आई और वह स्त्री अदृश्य हो गई
फोन नंबर था उस पर एक
पानी से पसर गए थे नंबर मगर बाक़ी थे
क्या है क्या है ?
वाली आवाज़ सख़्त थी
दूसरों के झमेले में कोई नहीं पड़ता आजकल
बहुत दिनों से उस घर में स्त्री के नहीं होने की आवाज़ है
बाक़ी आवाज़ें अब ज़्यादा हैं , जैसे घिसटती हुई रुकतीं है बड़ी गाड़ियां और
सन्नाटे में किसी के नहीं होने को बार बार सुना जाता है
स्त्री ने हिम्मत करके उस नंबर पर फोन कर दिया मगर तब नहीं किया जब
ख़त्म होने से पहले कुछ बचा लिया जाता है
बचा तो वह भी नहीं
वह छ: महीने का बच्चा भी
*****
सड़कें चाहने लगीं हैं कि वे इन दिनों मखमल हो जाएं
मौसम नम होना चाहते हैं
आग भस्म कर देना चाहती है प्रेम के सारे प्रदर्शन
पृथ्वी हिल रही है कि सही करवट जीना चाहती है
पत्थर शोक में हैं कि वे इतने पत्थर तो नहीं थे
मसखरे क़समें उठा रहे हैं कि उनके जुमले झूठे नहीं होते
बस नकाब खींचते रहे हैं
जानवर चाहते हैं कि वे भी कोई किताब लिखें इंसानों के बारे में
लिखें कि उनके लिए बेरहम होने का अर्थ इंसान होना हुआ जा रहा है
चीलें गिद्ध सियार सभी मरघटों पर इतनी बरक़त नहीं चाहते थे
इतना बड़ा नहीं है उनका पेट
माएं अब बांझ होना चाहती हैं
बद्दुआएं हैं कि हैरान हैं
वे सही जगह लगती ही नहीं
******
राजा ने कहा , मेरी प्रशंसा में लिखो
कवि को बहुत कम शब्दों की जरुरत पड़ी
चिकने चपटे शब्दों से काम चल गया
व्यंग्य की
वैदग्ध्य की
करुणा की
गुंजाइश ही नहीं थी
जो ललित कलित चाहिए था उसे
यहां वहां
इसके उसके गद्य पद्य से उठा लिया
फिर भी निचुड़ उठा कवि
असली मुश्किल पेश आई व्यंग्य का गला घोटने में
आंखों में कील जड़ने में
करुणा को दरबदर करने में
निचुड़ उठा
राजाओं को कवियों की कहां कमी पड़ी कभी
कवि था कि गुम हो गया
कलेजे में गड्ढा लिए कवियों के पीछे
अर्थियां घूमती हैं
कुछ हैं जो राजाओं से ज्यादा
राजकवियों से डरते हैं
ख़ैर …..
चंद्रकला त्रिपाठी
******
बहुत दिन बीत जाने पर
वह परछाइयों में घुल जाता है
हंसने के ढंग में
चुप्पी होकर धड़कता है
संगसाथ में दोस्त की तरह बरतता है
ऐसा तो कोई नहीं होता इतना टिक कर रहने वाला
दुःख की तरह का
इस दुनिया में कौन है ऐसा जिसे
कहीं जाने की कोई हड़बड़ी नहीं
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लोक गीतों में पक्षी प्रसंग : चंद्रकला त्रिपाठी
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एक विवाह गीत में राम की सजी हुई बारात बस जनकपुर को प्रस्थान करने ही वाली है , रुनझुन वाद्य बज रहे हैं कि सुआ ऊपर मंडराने लगता है।कहता है कि ‘ मैं भी ब्याहने चलूंगा
राम जे चले हैं बियाहन रुने झुने बाजन
ऊपरां सुगन मडराला हमहुं चलबै बियहन
ऐसे ही कितने जीवन प्रसंग हैं , लोकगीतों में ही नहीं समूची क्लासिक परंपरा में और दर्शन में भी जब ये पक्षी कई कई रुप धर कर उस चिंतन और कला में अन्यतम प्रतीति भर देते हैं। दार्शनिकों ने इनमें गहरी तटस्थता से संसार को परखना लक्ष्य किया है तो कवियों ने अपनी निर्मितियों में मानवीय लास्य और संपूर्णता रचने के लिए इन्हें चुना है। दुनिया के समस्त लोकगीतों में इनकी मौजूदगी यह सब कुछ हो कर है। ये तटस्थ द्रष्टा हैं तो शामिल किरदार भी हैं।रुपक हैं तो आलंबन उद्दीपन भी हैं।संगी हैं ,टोही हैं और शिक्षक भी हैं। जहां कहीं रचने में परंपरा का सुंदरतम शामिल है वहां पक्षी जगत के इस वैभव का ललित शामिल है । अभी एक युवा लेखिका अनुकृति उपाध्याय की बेजोड़ कहानी पढ़ी -‘ जानकी और चमगादड़ ‘। वाह , क्या कहानी है। मधुर मानवीय जीवन के संसर्ग की कथा।अकृतिम और प्रकृत। कहना यह चाहती हूं कि संसार इस तरह के विविध जीव जीवन से संलिप्त भाव में होकर घुल कर अधिक सुंदर है।इस अनुभव के कुछ रुपों की खोज में फिलहाल अवधी भोजपुरी में व्यक्त पक्षियों के संदर्भों को देखना तय किया है।
चकवा और चकवी महाकाव्यों से लेकर लोकगीतों तक घोर अनुरक्त प्रणयी रुप में चित्रित हैं। अभिज्ञान शाकुन्तल , जिसका बहुत ही ललित अनुवाद किया है आदरणीय राधावल्लभ त्रिपाठी जी ने , में इस पक्षी युगल का एक संदर्भ आया है जिसमें उनकी आकुल प्रेम केलि की संकल्पना है।प्रसंग यह है कि शकुंतला दुष्यंत के पास जा रही है।कण्व ऋषि पिता की तरह कन्या को पति गृह भेज रहे हैं।
[6/5, 9:45 AM] चन्द्रकला जी: लोक गीतों में पक्षी प्रसंग : चंद्रकला त्रिपाठी
एक विवाह गीत में राम की सजी हुई बारात बस जनकपुर को प्रस्थान करने ही वाली है , रुनझुन वाद्य बज रहे हैं कि सुआ ऊपर मंडराने लगता है।कहता है कि ‘ मैं भी ब्याहने चलूंगा
राम जे चले हैं बियाहन रुने झुने बाजन
ऊपरां सुगन मडराला हमहुं चलबै बियहन
ऐसे ही कितने जीवन प्रसंग हैं , लोकगीतों में ही नहीं समूची क्लासिक परंपरा में और दर्शन में भी जब ये पक्षी कई कई रुप धर कर उस चिंतन और कला में अन्यतम प्रतीति भर देते हैं। दार्शनिकों ने इनमें गहरी तटस्थता से संसार को परखना लक्ष्य किया है तो कवियों ने अपनी निर्मितियों में मानवीय लास्य और संपूर्णता रचने के लिए इन्हें चुना है। दुनिया के समस्त लोकगीतों में इनकी मौजूदगी यह सब कुछ हो कर है। ये तटस्थ द्रष्टा हैं तो शामिल किरदार भी हैं।रुपक हैं तो आलंबन उद्दीपन भी हैं।संगी हैं ,टोही हैं और शिक्षक भी हैं। जहां कहीं रचने में परंपरा का सुंदरतम शामिल है वहां पक्षी जगत के इस वैभव का ललित शामिल है । अभी एक युवा लेखिका अनुकृति उपाध्याय की बेजोड़ कहानी पढ़ी -‘ जानकी और चमगादड़ ‘। वाह , क्या कहानी है। मधुर मानवीय जीवन के संसर्ग की कथा।अकृतिम और प्रकृत। कहना यह चाहती हूं कि संसार इस तरह के विविध जीव जीवन से संलिप्त भाव में होकर घुल कर अधिक सुंदर है।इस अनुभव के कुछ रुपों की खोज में फिलहाल अवधी भोजपुरी में व्यक्त पक्षियों के संदर्भों को देखना तय किया है।
चकवा और चकवी महाकाव्यों से लेकर लोकगीतों तक घोर अनुरक्त प्रणयी रुप में चित्रित हैं। अभिज्ञान शाकुन्तल , जिसका बहुत ही ललित अनुवाद किया है आदरणीय राधावल्लभ त्रिपाठी जी ने , में इस पक्षी युगल का एक संदर्भ आया है जिसमें उनकी आकुल प्रेम केलि की संकल्पना है।प्रसंग यह है कि शकुंतला दुष्यंत के पास जा रही है।कण्व ऋषि पिता की तरह कन्या को पति गृह भेज रहे हैं।प्रिय के पास चल पड़ी शकुंतला अनसूया से कहती है – सखि ! देख तो । चकवा कमल के पत्ते से छिप गया उसी में यह चकई कैसे आतुर हो कर चिल्ला उठी है। फिर मेरे लिए कितना कठिन है यह सब झेलना –
अनसूया कहती है – वह भी प्रियतम के बिन लंबी काली रात बिताती है।
दारुण विरह का दुस्सह दुख भी आशा सह्य बनाती है ‘
यह विरह कवि कल्पित ही है। रामकथा पर आधारित एक सोहर में चकवा चकवी के रात्रि अलगाव को एक शाप का नतीजा कहा गया है । गीत में राम के वन गमन के बाद व्याकुल हुई कौशल्या उन्हें वापस अयोध्या लौटा लाने के लिए निकल पड़ी हैं ।वे कठिन दुख में तो हैं ही साथ ही कैकेई ने ताना भी मार दिया है कि जिसके राम वन चले गए उसे भला नींद कैसे आ रही है।
कौशल्या राह में सबसे पूछती जा रही हैं कि मेरे राम क्या इधर से ही गुजरे हैं।
वे चकवी से भी पूछती हैं
हे तुम डार के चकवी अरे अपने चकइया संग हो
एहि बाटे राम मोर गइलें कतहुं तुहूं देखेऊ हो
चकवी कहती है – हां हम बाट के चकवी अरे अपने चकइया संग हो
एहि बाटे राम तोर गइनै त हम नाहीं देखेंऊं हो
कौशल्या कुपित होती हैं।समझ जाती हैं कि आपस में डूबे हुए ये दोनों दीन दुनिया से बेखबर हैं।शोक से भरी वे शाप दे देती हैं। कहती हैं
हे तुम डाल के चकवा अरे अपने चकइया संग हो
दिन भर रहू एक साथ त रात अलग होऊ हो
एक गीत में रुक्मिणी के विरह की आंच चकवी के कलेजे तक पहुंचती है। यह अनोखा तादात्म्य है वाक़ई –
चकई पुकारै सुनु चकवा भोर कब होइही सुरुज कब निकसइ
रुकुमिनि हरि परदेस लउटि कब अइहइं हो
यही चकवी एक अन्य गीत में रुक्मिणी को ही क्या सीधा जवाब देती है।वह विरह प्रतीति में तो रुक्मिणी के दुख के साथ है मगर केलि क्रीड़ा में लगी रुक्मिणी के गुहार का बड़ा बेलाग उत्तर देती है।
प्रसंग यह है कि , गहरे पानी वाली यमुना के जल पर छाई कदंब डाल पर हिंडोला पड़ा है और रुक्मिणी उस पर झूल रहीं हैं। शाम गहरा आई है। झूलते झूलते औचक उनका मोतियों का हार टूट कर यमुना में गिर जाता है। मोती नदी के पानी में डूब जाते हैं। रुक्मिणी तब चकई को पुकार कर कहती हैं कि-
धावहु बहिनी चकइया तू हाली बेग धावहु हो
चकई चुनि लेहु मोतियन हार जमुन जल भीतर हो
चकई के लिए सांझ का अर्थ है वियोग का घहराया समय। गुस्से में आ जाती है वह और कहती है-
आगिया लगाऊं तोर हरवा बज्जर परै मोतियाहु हो
संझवै से चकवा हेरान ढ़ूढ़त नाहीं पावहुं हो
इस तरह पक्षियों के इस संसार में मनुष्य के लिए अविरल नेह छोह और चिंता और नालिश भी
बसी हुई दिखाई देती है।लोकाख्यानों में इस रुढ़ि के उपयोग से बड़ी सुंदरता आई है। तुलसी जायसी जैसे बड़े कवियों ने इतना सम्मोहक समावेश किया है कि क्या कहा जाए।मानस में तो पक्षियों का अपना किरदार ही अवतरित है। पद्मावत में भी।
कैसे एक कवि रुढ़ि लोकविधाओं तक यात्रा करती है। नागार्जुन ने भी बादल को घिरते देखा है ‘ शीर्षक कविता में इस पक्षी के विरह मिलन की बेचैनियों को लिखा है।
अनेक ऐसे प्रसंग होंगे।समझ में तो यह भी आता है कि कलाओं ने प्रकृति को कैसी मानवीय निकटता में रचा है जिसमें मनुष्य का जीवन व्यापार संगी होकर शामिल है। एक विस्तृत बहुरंगी संसार अपनी गतियों समेत व्यक्त हो उठता है। निसर्ग के अछूते संदर्भ हमारे जीवन को सुंदरतम बना जाते हैं। कल्पना उर्वर होकर पत्तों का डोलना भर नहीं सुनती बल्कि ध्वनियों को भी सुनती है। एक लय है यह।सबकी अपनी लय जिसमें कायनात की महालय का स्फुरण है। तमाम वन प्रांतर की सघनता उससे गुजरती कोई राह और उस पर चलता हुआ बटोही कभी अकेला नहीं है।उस प्रकृति के अनेक संगी अपनी ध्वनि से हलचल से और स्पर्श से उसके साथ चलते हैं।
लोकगीतों में आई असीस भी सुनिए उसमें वनस्पतियों फूलों फलों की तरह विलसने का वर मिलता है।हालरि दूब की तरह जीने की दुआ मिलती है।कृषि अनुभवों वाले मनुष्य को साठी के चावल का बचे रहने का गुर पता है। यह सब लोकस्मृति है जो लोकसाहित्य में भरी हुई है। यहां जीने का इकहरा ढ़ंग नहीं है बल्कि ऐसे कुरसजीवन की आलोचना है।
ससुराल के अमानुषिक व्यवहार से दुखी बेटी कहती है – पिता जिस वन में दूब नहीं उगती थी , कोयल भी नहीं बोलती थी उस घर वन में मेरे लिए क्यों ठिकाना खोजा।
स्त्री जीवन के रंगों के समूचे आख्यान में पक्षी अधिकतर मुक्ति की आकांक्षा हैं। एक गीत है गवने का , सुनिए –
सुतली कोयलर देइ के सुअना जगावे ल
चलि चल हमरहिं देस हो
बाबा क कोरवां छोड़ि दा
मयरिया गोदिया छोड़ि दा
इसका जवाब देती है कोयल।पूछती है कि-
का हो खियइबा सुगना का हो पिअइबा हो
कहवां सोअइबा सारी रैना …..
सुगना कहता है – दूधवा पिअइबै कोइलरि भतवा खिअइबै हो
कोरवां सोअइबै सारी रैन…..
कोयल कहती है कि उसके पिता के आंगन में आम का पेड़ है।उससे उड़ कर वह आकाश छू लेती है। जवाब देखिएगा तो पूरी पितृसत्ता की चौकस संरचना बोलती मिलेगी।
सुगना भी कहता है कि उसके आंगन में तो इमली और अनार भी है।कहता है-
अमवा कुपुटिहा कोइलर इमिली कुपुटिहा हो ,झोपसन चीखीहा अनार हो
और उड़ कर आकाश छूने का प्रसंग यहां अनुपस्थित मिलता है।
कोयल की मौजूदगी के अनेक प्रसंग हैं।अनेक बार यह विरह की आग बढ़ा देने वाली है।कागा जहां शुभ संदेश ले कर आता है वहीं बैरिन कोयलिया जैसे बदला लेने के लिए बोलती है।वह विरहिणी को खोज खोज कर बोलती है।
एक गीत में आए संदर्भ में कोयल है। पत्नी दोपहर भोजन के लिए प्रिय का इंतज़ार कर रही है।वह आता है तो विलंब का कारण पूछती है।पति कहता है कि बाबा की लगाई अमराई में कोयल इतना सुंदर बोल रही थी कि उसे सुनते हुए सब भूल गया। स्त्री अपना मान कोयल पर निकालती है। उलाहना देती है कि क्या तुम थोड़ी देर के लिए अपनी कूक रोक नहीं सकती थी। स्त्री उसे यह ख़त में लिख कर भेजती है।कोयल भी जवाबी चिट्ठी में लिखती है कि
ऐसेहि बोलिया तू बोल मोरी तिरिया पियवा के लेहु बेलमाय
देखिए ,कोयल का तपाक तो देखिए।
चिट्ठियों के मोहक आदान प्रदान के कई कई प्रकरण लोकगीतों में मिलते हैं। उससे जुड़ी भावनाएं बड़ी तीव्रतम हैं। ज़्यादातर ये विरह संबंधी ही हैं। एक गीत है जिसमें परदेस गए व्यापारी पति के पास स्त्री चिड़िया से संदेश पठाना चाहती ।याद कीजिए जायसी को सूर को। जायसी ने नागमती के विरह में जैसे अपने कलेजे का रक्त मिला दिया था।पूरी प्रकृति में वह विरह धम धम बज रहा था जैसे और नागमती भी अपनी व्यथा कहने के लिए काग को और भंवरे को चुनती है –
पिउ सो कहेहु संदेसड़ा , हे भंवरा ! हे काग !।
सो धनि बिरहै जरि मुई , तेहिक धुआं हम्ह लाग।।
इसी तरह वह स्त्री भी अपने बनिज पति के पास विरह पाती चिड़िया से भेजना चाहती है।
चिड़िया की बुद्धिमत्ता देखिए कि वह पूछती है कि मैं तुम्हारे पति को पहचानूंगी कैसे भला।तो वह अपने पति की कद काठी रुप रंग ही नहीं वर्दी का रंग भी बताती है और चिड़िया चिट्ठी लेकर वहां पहुंच जाती है।चिट्ठी को कलेजे से लगा कर आंसुओं में डूबा हुआ पति इस मोही चिड़िया को अपना दुःख बता जाता है कि मेरी प्रिया ने आम और इमली ले कर आने के लिए कहा है। वर्दी बेंच भी दूं तो इस भांदो में आम इमली कहां पाऊं मैं।उधर सास खिन्न है कि बेटा अपनी तिरिया का दास हो गया है। भला कैसे पाएगा आम और इमली।
ख़ैर पति लौट आता है। एक बड़ी ही सुंदर कथा है इस गीत में। एक कुटुम्ब का चित्रण तो है ही स्त्री की उन्मुक्त स्थिति भी है वहां। पारिवारिकता का रंग भी है।
इस तरह तमाम लोकगीत हंस मयूर गौरैया जैसी पक्षियों की अनेक प्रजातियों के उल्लेख से भरे हुए हैं।सुआ सुगना तो एक बड़ी प्रिय उपस्थिति ही है।कागा का भी क्या कहना। भंवरा तो कालिदास के यहां ही रसमाते रुप में आ गया है।कुंज निकुंज अमराई ही नहीं छान छप्पर पर इनकी सरस मौजूदगी ने जीवन की संपूर्णता को रचा है।इस पर वे ही रीझेगें जिनके ह्रदय में जीवन राग भरा होगा।
चंद्रकला त्रिपाठी

……………………………..

स्वतंत्र किरदारों का आत्मीय अंतरंग

(संदर्भ: मृदुला गर्ग का उपन्यास ‘मिलजुल मन’)
– राकेश बिहारी
मृदुला गर्ग का उपन्यास ‘मिलजुल मन’ जीवनी के रूप में उपन्यास और उपन्यास के रूप में जीवनी का एक जीवंत कथा संसार रचता है. उल्लेखनीय है कि ‘अनित्य’ के कथा विन्यास में जहां स्वतन्त्रता आंदोलन के समय के राजनैतिक द्वन्द्वों को प्रमुखता हासिल थी वहीं मिलजुल मन पारिवारिक सरगर्मियों या यूं कहें कि परिवार की पृष्ठभूमि में संबंधों के विकास की कहानी है. आज़ादी के तुरन्त बाद का समय यहां भी है लेकिन उसकी भूमिका अनुषांगिक है बहुत हद तक किसी गायक के साथ हौले हौले बजते तानपुरे की सी जिसकी उपस्थिति भर से पूरी प्रस्तुति को एक नई अर्थवत्ता मिल जाती है. उपन्यास के केन्द्र में खुद मृदुला गर्ग और उनकी बड़ी बहन व सुपरिचित लेखिका मंजुल भगत के साझे जीवन की सोंधी और आत्मीय दास्तान है, अपने समय और समाज के बारीक तंतुओं से बना और बुना हुआ. खुद के जीवन को औपन्यासिक जामा पहनाने में लेखिका ने जिस तन्मय तटस्थता का परिचय दिया है वह उलेखनीय है. एक ऐसी तटस्थता जो जीवन को कहानी में बदल दे और एक ऐसी तन्मयता जो कहानी को जीवन में रूपायित कर दे. यानी पाठक पात्रों को पहचान पाये या नहीं इससे उपन्यास के पाठ की सहजता कहीं से प्रभावित नहीं होती.
पाठकों को सहज ही समझ आने वाली किसी कहानी के पीछे की कहानी जिसे हम उसकी रचना यात्रा भी कह सकते हैं कितनी बारीक, दिलचस्प और कठिन होती है उसे भला लेखक से बेहतर कौन बता सकता है. इस उपन्यास की रचना प्रक्रिया पर टिप्पणी करते हुये ‘अन्यथा’ के उपन्यास विशेषांक में खुद लेखिका कहती हैं – ” दर असल उपन्यास लिखना निजी ज़िंदगी को हलाक करके नई ज़िंदगी शुरु करने जैसा है. वह भी पुनर्जन्म जैसी नई ज़िंदगी नहीं, जो दुबारा मिलने पर हो पूरी तरह अपनी. यह नई ज़िंदगी औरों से उधार ली हुइ होती है. बतौर पेश्बीनी उइदाहरण खुद को बनाओ चाहे अन्य-अन्यों को खास फर्क नहीं पड़ता. हर हाल परकाया प्रवेश करना होता है. आत्मकथ्य होते हुये भी उपन्यास आपबीती नहीं होता; उससे कहीं जटिल काया निषेध की मांग करता है. बार-बार काया में जिओ; उसे पहचानने-समझने की कोशिश करो. हर बार तब तलक जिये, समझे, पहचाने से ऊपर उठो. यानी अपने जिये, देखे-सुने, पढ़े-गुने की बिना पर ही खुद को नकारो और अन्यों की ज़िंदगी में दाखिल हो. फिर उसे ऐसा लिखो, जैसे खुद ही जी रहे हो. जो तुम लिखो, हो वह किस्सा, पर पाठक को लगे यह उसकी आपबीती है.”
सिवाय अपने अन्तर्मन के जिसे कि शुद्ध सात्विक भाषा में अन्तरात्मा कह सकते हैं आखिर इतना करीब कौन हो सकता है जो ज़िंदगी जीते व्यक्तित्वों के बिल्कुल समानान्तर चलता-देखता ही नहीं उसे लगातार समझता भी चले. इस उपन्यास की दोनों मुख्य चरित्र गुल और मोगरा तो भोगती देखती और जीती ही हैं समय और जीवन को, वह तीसरा जिसके हाथ ने कथा सूत्र पकड़ रखा है, भी देखता चलता है सब कुछ अपनी निरपेक्ष दृष्टि से. तीनों तीन भिन्न दृष्टियां जो दूसरे के देखे-सुने-समझे में न सिर्फ हस्तक्षेप करती हैं बल्कि अपना दृष्टिकोण या कि मत भी साथ-साथ पैबस्त करती चलती हैं. उपन्यास का तीसरा चरित्र ‘मैं’ यानी सूत्रधार या फिर लेखिका के शब्द उधार लें तो प्रवक्ता दोहरी भूमिका में है खुद को पात्र के साथ जीना और फिर जरूरत पड़ने पर खुद को उससे बिल्कुल अलग कर लेना… कथा कहने का एक बिल्कुल अलग तरीका चुना है लेखिका ने यहां. मैं और मोगरा आपस में इतने जुड़े हैं कि कई बार पाठक उन्हें पहचानने और अलगाने के खेल का भी लुत्फ़ उठाने लगें लेकिन इस शिल्प ने लेखिका के लिये संबंधों का अंतरंग खोलना आसान सा कर दिया है.
सूत्रधार के रूप में लेखक का उपस्थित होना यहां इसलिये भी जरूरी हो जाता है क्योंकि कहानी जिसकी है वह बहुत अपना है, बहुत करीबी. यदि उपन्यासकार के शब्दों को ही उधार लें तो बहुत ही नाजुक और नजदीकी रिश्ता. उस रिश्ते के साथ कोई अन्याय हो जाये या कि उसके साथ न्याय करते-करते कहीं अपने साथ ही अन्याय न हो जाये. यह द्वन्द्व किसी भी लेखक के साथ होता है. अपनी या अपनों की कहने में सबसे बड़ी परेशानी यही होती है. होशोहबास दुरुस्त रखने के चक्कर में इतने बदहबास कि किसी न किसी से बेइंसाफी हो ही जाती है. अपनी कहने चले तो खुद को जरूरत से ज्यादा नकारा साबित कर दिया या कि जरूरत से ज्यादा आला. बेइंसाफी तो हर हाल में हुई पर मिलजुल मन अपने शिल्पगत वैशिष्ट्य के कारण इस ऊहापोह से ऊपर है. जहां मुंहचोर मोगरा चुप हो जाये वहां मुंहजोर गुल बोले बिना न रह सके और जिस मुद्दे पर गुल चुप्पी ठान ले वहां मोगरा की चुप्पी बिना बोले भी कहानी में एक नया रंग जोड़ जाये. और इन सबसे इतर लेकिन दोनों के साथ-साथ चलता एक लेखक.
“मासूमियत बड़ी खुशगवार चीज होती है. जाती है तो हज़ार खूबसूरत खुशफहमियों का कत्ल करके… मासूमियत का जाना चाहे जितना दुखदायी हो जेहनियत की मांग है… यूं इस में शक नहीं कि जेहनी होना भी खासा दुखदायी है.” उपन्यास की ये पंक्तियां अपने समय, पात्रों , परिस्थितियों और सम्पूर्ण कथानक की खूबसूरत उदासियों और उदास खूबसूरती को एक ही साथ रूपायित करती है.
मृदुला गर्ग खुद को स्त्रीवादी लेखिका नहीं मानतीं लेकिन अपनी अन्य रचनाओं की तरह यहां भी उन्होंने गुल और मोगरा दो बहनों के प्रगाढ़ अन्तर्संबंधों के बहाने स्त्री की दुनिया को स्त्री की आंखों से देखने की कोशिश की है. अब हम इसे किसी वाद के खांचे में रखे न रखे उससे क्या फर्क पड़ता है. हमेशा की तरह अपने समकालीन पुरुष लेखकों की तुलना में मृदुला गर्ग इस उपन्यास में भी स्त्री पक्ष को अधिक संवेदनशीलता से उठाते हुये पितृसत्ता की बारीक चालों पर टिप्पणी करती चलती हैं…” हर खुद्दार कद्दावर मर्द को. अपनी खुदी से बेइंतहा लगाव होता है. तभी वारिस पैदा करके, अपना नाम कायम रखना चाहता है. औरत ज्यादातर बिचौलिया होती है. पितृत्व को मातृत्व में समा, उसे जनाना बनाना, मेरे खयाल से पितृसत्ता की सबसे अचूक चाल रही है.” पितृसत्ता पर ऐसी कई और अचूक टिप्पणियां पूरे उपन्यास में मौजूद हैं. उल्लेखनीय है कि मृदुला गर्ग के यहां पितृसता की यह समीक्षा किसी वाद या आंदोलन के रास्ते नहीं एक स्त्री के तजुर्बे के सहारे उतरती है. स्त्री तजुर्बे का एक ऐसा निष्कर्ष जो कई आंदोलनों के लिये दिशा सूचक का काम कर स्कता है. स्त्री संवेदना के साथ सहज जुड़ाव हो कर भी लेखिका की दृष्टि पूर्वाग्रही या एकांगी नहीं है. वे मर्दाना चालों और जनाना कमजोरियों दोनों पर समानान्तर नजर रखती हैं और यही मृदुला गर्ग के लेखन की खासियत है…” हां पुरानी रिवायतों से छुटकारा मुश्किल से मिलता है. हम ज़िंदगी में जो पा लें, कुछ हसरते बची रहती हैं; मन के कोने में. काश हम सुघड़ गृहस्थन होतीं; आदर्श मां की तरह जानी जातीं; बलाकी खूबसूरत होतीं, फिल्म तारिकाओं-सी सेक्सी. औरत के जो रूप, अदब और फन में मानक रहे हैं, उनसे निजात पाना, मर्द के लिये हीनहीं, औरत के लिये भी मुश्किल है.” लेकिन प्रश्न यहां यह उठता है कि औरतों की इस ग्रंथि के पीछे भी पितृसत्ता का हाथ ही तो नहीं है… कंडीशनिंग का प्रभाव…?
मिलजुल मन भले मुख्य रूप से गुल और मोगरा की कहानी हो, लेकिन समय और समाज से अलग कोई कहानी क्या कहानी होगी. कहानी के साथ समय, समाज, परिवेश और उसके लिये जिम्मेवार परिस्थितियों पर मारक और अचूक टिप्पणियां उपन्यास में भरी पड़ी हैं. सुखद है कि ये टिप्पणियां मखमल में टाट के पैबन्द सी नहीं आतीं बल्कि कथा रस में नमक डली सा घुलमिल कर मिलजुल का एक बेहतर और अर्थपूर्ण संसार रचती है जिसमें सिर्फ हरियालियां हीं नहीं अपने समय की बीहड़ और रेतीली उदासियां भी शामिल हैं. उपन्यास के अन्य पात्र चाहे वो पिता बैजनाथ जैन हों या डॉ. कर्ण सिंह, मामाजी हों या जुग्गी चाचा या फिर बाबा, दादी या कनकलता सब के सब उपन्यास के कथानक को समय और समाज से जोड़ने वाले संयोजक ही तो है जिनकी उपस्थिति ने मिल कर इस कथानक की समाजिकता का ईंट-ईंट जोड़ा है. उपन्यास के आखिर में औद्योगिक कस्बा डालमियानगर, जहां गुल अपने पति पवन के साथ एक लम्बे समय तक रहती है, भी एक चरित्र के रूप में ही आता है जिसका समकालीन विस्तार हम रणेन्द्र के उपन्यास ‘ग्लोबल गांव के देवता’ में देख सकते हैं.
अपनी ज़िंदगी से चुने किरदारों का औपन्यासीकरण करते हुये पात्रों की पहचान को ले कर लेखक के मन में हमेशा एक ऊहापोह रहता है. प्रस्तुत उपन्यास में भी यह लेखकीय चौकन्नापन देखा जा सकता है. शायद यही कारण है कि गुल और मोगरा के वास्तविक चरित्रों के नाम या उसके परिचय के जगजाहिर अंशों पर लेखिका गल्प का एक झीना सा परदा डालती चलती हैं. पर उपन्यास के उत्तरार्ध में चरित्रों को ले कर की जाने वाली यह पर्देदारी जाती रहती है. इसे आप चाहें तो अपनी पहचान खुद प्रकट करते चरित्रों का स्वाभाविक विकास भी कह सकते हैं या फिर लेखकीय तटस्थता का अतिक्रमण भी. हां, एक बात और, गो कि उपन्यास की भाषा सहज और सरस है लेकिन कहीं-कहीं प्रयुक्त हुये उर्दू के कुछ शब्द, जिसका प्रयोग लेखिका ने शायद भाषा में समय की छाया दिखाने के लिये की है, उन पाठकों को खटक सकते हैं जिन्हें उर्दू नहीं या कम आती है.
यूं तो गुल, मोगरा और मैं तीन अलग-अलग किरदार हैं लेकिन एक दूसरे से इस तरह आबद्ध कि कब कौन किसकी कहानी सुनाने लग जाये आपको पता ही नहीं चले. कुल मिला कर मिलजुल मन स्वतंत्र किरदारों और उनके आत्मीय अंतरंग का एक ऐसा मेलजोल है जिसमें लगातार विकसित होते बहनापे की साझी खूशबू के साथ दो लेखकों की निर्मितियों की कहानियां भी शामिल हैं.

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स्मृति में अटकी लेखिका

ऐलते विश्वविद्यालय, बुदापैश्त, हंगरी में हिन्दी पढ़ने वाले दूसरे वर्ष के विद्यार्थियों के लिए स्त्री लेखन पर एक छोटी पुस्तिका तैयार करनी थी. प्रमुख हिन्दी लेखिकाओं में मीरा से आरम्भ कर मैं सुभद्रा कुमारी चौहान, महादेवी वर्मा, उषा प्रियंवदा, मन्नू भंडारी, कृष्णा सोबती, मृदुला गर्ग, ममता कालिया से होते हुए गीतांजलि श्री तक पहुँची.
 
जब पहुँची तो उन्हें पढ़ने लगी. संयोग से उनका कहानी संग्रह वहां लाइब्रेरी में था, बेलपत्र कहानी का मन के कई कोनों को झकझोरना याद है.
 
विभागाध्यक्ष मारिया जी का लेखिका से आत्मीय लगाव भी ज्ञात हुआ.
 
बहुत प्रिय लेखिका की सूची में तब न रखने के बावजूद वे स्मृति में रहती रहीं… मैं जानकारी पूरी संजोती रही कि1957 में उत्तर प्रदेश में जन्मी, दिल्ली में इतिहास विषय की अध्येता गीतांजलि श्री शोध क्रम में वड़ोदरा पहुची. यहाँ उन्होंने प्रेमचंद पर महत्वपूर्ण आलोचनात्मक कार्य संपन्न किया – Between Two Worlds: An Intellectual Biography of Prem Chand.
 
कालान्तर में वे फ्रांस के इन्स्टीट्यूट में फेलो रही, संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार की फेलो रही, हिन्दी अकादमी ने उन्हें साहित्यकार सम्मान दिया, उन्हें द्विजदेव सम्मान, इंदु शर्मा पुरस्कार और जापान फाउंडेशन का पुरस्कार भी प्रदान किया गया.
 
जानकारी पाई कि वे स्कॉटलैंड, स्विट्ज़रलैंड और फ़्रांस में राइटर इन रैज़िडेंस भी रही हैं.
     
यह गुपचुप लेखिका अपने विस्मयकारी लेखन के साथ हिन्दी साहित्य जगत में प्रविष्ट होती हैं. उनके पांच उपन्यास ‘माई’,  ‘हमारा शहर उस बरस’, ‘तिरोहित’, ‘खाली जगह’ और ‘रेत समाधि’ – सभी राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुए. 
कहानी संग्रह – ‘अनुगूँज’, ‘वैराग्य’, ‘मार्च माँ और साकुरा’, ‘प्रतिनिधि कहानियां’ और ‘यहाँ हाथी रहते थे’ भी सामने हैं.
 
उनका पहला उपन्यास ‘माई’ अंग्रेज़ी, फ्रेंच, जर्मन, उर्दू और सर्बियन भाषाओं में अनूदित हुआ. वे कहती हैं कि अंग्रेज़ी में अनूदित होने के बाद ही उपन्यास की चर्चा अधिक हुई ! 
यह उत्तर भारत के एक मध्यम वर्ग के परिवार में तीन पीढ़ी की स्त्रियों की कहानी है जिसके सन्दर्भ में वे कहती हैं – ‘मां की पीढ़ी की स्त्रियों को मान देने की एक आकांक्षा थी.’ 
माई तीन भूमिकाओं में है – पत्नी, पुत्रवधू और मां. जब उन्होंने विदेश में इस उपन्यास के अंशों का सार्वजनिक वाचन किया तो प्राय: माई के जैसी स्त्रियों की कहानियां सुनने को मिली. भारतीय परिवार की कहानी को विश्व में पाठक मिले – यह गर्व की बात है ! किन्तु यह उपन्यास आत्मकथात्मक भी नहीं हैं.
 
‘हमारा शहर उस बरस’ उनका दूसरा उपन्यास बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बाद की घटनाओं का स्पर्श करता.
 
‘तिरोहित’ का प्रकाशन वर्ष 2007 है और ‘खाली जगह’ उपन्यास जर्मन, फ्रेंच और उर्दू में तथा हार्पर कालिंस से अंग्रेज़ी में अनूदित होकर आया. उपन्यास में जनजीवन पर पड़ी आतंक की छाया के चित्र हैं.
 
नवीनतम उपन्यास ‘रेत समाधि’ फिर मां, बेटी और बुआ जैसे स्त्री चरित्रों से विनिर्मित कथा है. उपन्यास का फ्रेंच अनुवाद पेरिस पुस्तक मेले में लोकार्पित होना प्रस्तावित था किन्तु महामारी की वजह से स्थगित रहा, प्रकाशन हुआ जिस पर अनुवादिका का कहना है – ‘विदेशी पाठकों को इसमें आधुनिक भारत का एक तरह का सांस्कृतिक एनसाइक्लोपेडिआ मिलेगा.’
 
गीतांजलि श्री की कथा-यात्रा हंस पत्रिका से आरम्भ होती है, जहां पहली कहानी ‘बेलपत्र’ 1987 में प्रकाशित हुई. इसके बाद उनकी दो और कहानियाँ ‘हंस` में छपीं.
 
बचपन से ही लेखिका होने का भाव मन में लेकर बड़ी होने वाली गीतांजलि श्री अपने विशद लेखन के वैचारिक उन्मेष और अभिव्यिक्ति की समर्थता के माध्यम से हिन्दी कथा जगत में अपनी अलग पहचान बना चुकी हैं. उनके साहित्य में विरोध, विद्रोह और प्रतिरोध का सघन स्वर है. अपने समय और समाज की दुर्बलता को भी उन्होंने खूब पहचाना है. पढ़े-लिखे समाज की तथाकथित आधुनिकता को बेनकाब करने के लिए उनके पास एक सशक्त सांकेतिक भाषा है. विवाह में स्त्री, विवाहेतर सम्बन्ध, हिन्दू-मुस्लिम जीवन की कठोर वास्तविकताएं, समाज की रूढ़ मान्यताएं, शिक्षित वर्ग की मानसिकता, शिक्षित मध्यवर्गीय नारी और नगर का जीवन उनके सृजन का अनिवार्य हिस्सा है.
 
उनकी अभिरुचि थियेटर में भी रही है. थियेटर की दुनिया में उन्होंने बहुत सक्रिय समय व्यतीत किया, देश और विदेश में उनकी नाट्य प्रस्तुतियों को सराहना मिली. वे स्क्रिप्ट भी लिखती हैं – हिन्दी और अंग्रेज़ी में समान अधिकार से. उन्होंने उर्दू, बँगला और चीनी कहानियों के नाट्य रूपांतर किए. जब उन्होंने उन्नीसवीं सदी के उर्दू क्लासिक ‘उमराव जान अदा’ का रूपांतर किया तो इस सत्य के स्वीकार के साथ कि उमराव केवल एक नर्तकी ही नहीं, वह भी हमारी तरह एक स्त्री है, समय और परिस्थिति ने उसे विवश किया कि वह घर से बाहर निकले और अपनी कला को पेश करे. घर की चारदीवारी की सुरक्षा के बिना, उसे भी हम आधुनिक स्त्रियों की तरह पुरुषों के संसार का सामना करना था.
 
गीतांजलि मानती हैं कि उनका बचपन पिता के साथ पारिवारिक स्थान-परिवर्तनों में बहुत कुछ देखते-सीखते हुए बीता, अंग्रेज़ी में बाल पुस्तकों के अभाव ने ही हिन्दी से जोड़ा. घर में मां प्राय: हमेशा हिन्दी ही बोलती थी. मां के साथ अपने ख़ास सम्बन्ध को वे इस तरह परिभाषित करती हैं कि मां के नाम का आरंभिक श्री उन्होंने अपने नाम के बाद जोड़ लिया है.  
 
साहित्य के प्रति रुझान के बावजूद इतिहास विषय की अध्येता गीतांजलि श्री का कहना है कि अतीत हमेशा उपस्थित रहता है, हमें उसका अनुभव जरूर टुकड़ों में होता है. लेखक अपने लिए लिखता है, लेखन अपने आपसे संवाद है. पाठक उसके बाद इस संवाद क्षेत्र में आते हैं. एक छोटे जगत में रह कर भी लेखन की बड़ी उड़ान बड़ी संभव है. हम सब सत्य के संधान में लगे हैं ..विभिन्न माध्यमों से.
 
अपने एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा –‘मुंशी प्रेमचंद की पोती से गहरी मित्रता और उनके पूरे परिवार से नजदीकी ने मुझे संस्कृति के प्रति संवेदनशील बनाया. उनका पूरा परिवार ही भारतीय संगीत और साहित्य के क्षेत्र से जुड़ा था.’
 
अपने बचपन से ही कुछ कथा-कहानी रच देने वाली गीतांजलि श्री भाषा को लेकर असमंजस में रही. वे इस द्वंद्व में फंसी रही कि उनका सृजनात्मक माध्यम क्या हो, हिन्दी या अंग्रेज़ी? पढ़ाकू लेखिका ने पाश्चात्य लेखकों, बंगला, मराठी, कन्नड़, मलयालम लेखन के साथ अपने समय के हिन्दी लेखकों – कृष्णा सोबती, निर्मल वर्मा, श्रीलाल शुक्ल, विनोद चन्द्र  शुक्ल – इनको पढ़ते हुए विविध लेखन शैलियों का परिचय पा लिया.
 
विविध देशी-विदेशी यात्राओं से समृद्ध होने वाली लेखिका कहती हैं – ‘वास्तविक परिवर्तन घर में ही उपलब्ध किया जाना है’.
उनकी कहानी ‘प्राइवेट लाइफ’ से एक अंश उद्धृत करना चाहती हूं…..
‘उसे लगा, उसने इज्जत से जीना चाहा था। अपनी दुनिया बनाने की कोशिश की थी।
उसे लगा, अभी इसी वक्त, एक बलात्कार हुआ है उसकी इंसानियत पर, उसकी बालिग अहमियत पर।
बचपन में उसका अस्तित्व उसके जिस्म के एक हिस्से में सारी जान, सारा जुनून लेकर बस गया था। वहीं उसकी इज्जत समा गई थी।
उसे लगा, उसका अस्तित्व उसके जिस्म से फिसलकर जमीन पर पड़ा तड़पड़ा रहा है।’
 
लेखिका को जन्मदिन की हार्दिक बधाई और लेखकीय सक्रियता के अनेक वर्षों के लिए शुभकामनाओं का अम्बार !
 
डॉ विजया सती
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स्त्री दर्पण जन्मदिन गीतांजलि श्री

उषा प्रियम्वदा

ममता कालिया

मृदुला गर्ग

मेहरुन्निसा परवेज

सुधा अरोड़ा

मैत्रेयी पुष्पा

मृणाल पांडेय

रोहिणी अग्रवाल

गीतांजलि श्री

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