Wednesday, April 24, 2024
डॉ. सुप्रिया पाठक,
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डॉ. सुप्रिया पाठक, संप्रति, सह आचार्य, स्त्री अध्ययन विभाग, महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वाविद्यालय… अकादमिक जगत में स्त्रीवादी चिंतन के क्षेत्र में प्रखर एवं संवेदनशील हस्ताक्षर हैं. विगत 20 वर्षों की अकादमिक यात्रा में सुप्रिया पाठक ने रंगमंच एवं स्त्री, भारत में अहिंसक स्त्री प्रतिरोध, प्रकृति एवं स्त्री, मीराबेन : गाँधी की सहयात्री, भारतीय स्त्रीवाद के आयाम तथा धर्म एवं जेंडर जैसी महत्वपूर्ण पुस्तकों का लेखन एवं संपादन किया है. वे अपने लेखन में लगातार भारतीय स्त्री विमर्श के अर्थ : सन्दर्भ पर शोध कर रही हैं एवं सैद्धांतिक स्तर पर वर्तमान सामाजिक- सांस्कृतिक सन्दर्भ में स्त्री प्रश्न को व्याख्यायित करने की संभावना एवं चुनौतियों को तलाश रही हैं.. एक संभवनाशील स्त्रीवादी चिंतक के रूप में डॉ सुप्रिया पाठक का कार्य उल्लेखनीय है.

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भारतीय स्त्री विमर्श की संकल्पना

भारत में स्त्रीवादी चिंतन प्रारंभ से ही पाश्चात्य स्त्रीवादी चिंतन परंपरा से प्रभावित रहा है, परंतु भारतीय स्त्रीवादी चिंतन परंपरा के बौद्धिक पहलुओं की जाने-अनजाने अनदेखी होती रही है। उसके मूल्यांकन की कोई सम्यक कसौटी हमारे पास उपलब्ध नहीं है। गंभीर अकादमिक चिंतन के रूप में भारतीय स्त्रीवाद का इतिहास तलाशने का प्रयास अपेक्षित रूप से नहीं हुआ है। वैश्विक स्तर पर स्त्री अधिकारों के लिए प्रारंभ हुए इन विमर्शों एवं आंदोलनों का इतिहास अनेक उतार-चढ़ावों एवं उपलब्धियों भरा रहा है। इससे कमोबेश हम सभी परिचित हैं। आमतौर पर यह माना जाता रहा है कि इस प्रकार के अस्मितामूलक विमर्शों की भारत में कोई आवश्यकता नहीं क्योंकि हमारी संस्कृति में स्त्रियों को सम्मानजनक स्थान दिया जाता है। वे पुरुषों के बराबर नहीं, बल्कि उनसे श्रेष्ठ हैं इसलिए वे हमारी आराध्या के रूप में पूजी जाती हैं। भारतीय संदर्भों में स्त्रियों के लिए अधिकार, समानता, समता, संघर्ष एवं शोषण जैसे शब्दों का प्रयोग प्रासंगिक नहीं माना जाता है। कई बार इसके प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण भी उभरता है जो मानता है कि स्त्रीवाद समग्र एवं समावेशी समाज की संकल्पना के विपरीत एकांगी विमर्श को स्थापित करने का विखंडनवादी प्रयास है।

भारतीय संस्कृति की इस व्याख्या से स्त्रियों की स्थिति को सर्वकालिक एवं सार्वभौमिक रूप से संतुष्टिप्रद मानने की भूल हमें उनकी वास्तविक स्थिति एवं उसे बेहतर बनाने हेतु हुए अनगिनत प्रयासों के इतिहास को जानने से वंचित करती है। प्राचीनकाल से ही भारत में स्त्री विमर्श की अत्यंत समृद्ध परंपरा रही है जिसने समय-समय पर सकारात्मक हस्तक्षेप करते हुए स्त्रियों के अधिकार एवं उनके लिए समान अवसरों की संभावना पैदा की है। इसने सह-अस्तित्व पर आधारित शांतिपूर्ण संशक्त समाज (Coherant Society) का निर्माण किया है। भारत में स्त्री विमर्श के विकास पर लेखन गंभीर शोधपरक दृष्टि की मांग करता है जो इतिहास के पन्नों से उन पात्रों एवं चिंतकों को जीवंत कर सके जिन्होंने भारतीय स्त्री को एक नई पहचान दिलाई। 

इस परिप्रेक्ष्य में उन्नीसवीं शताब्दी भारत के इतिहास में कई महत्वपूर्ण घटनाओं एवं वैचारिक मत-मतांतरों की सदी रही है। इस काल को नवजागरण काल के नाम से भी जाना जाता है। इस दौर में समाज सुधार आंदोलनों की लंबी प्रक्रिया चली इसलिए इसे  ‘स्त्रियों की शताब्दी’ के नाम से भी संबोधित किया जाता है। यही वह समय था, जब भारत  ही नहीं, अपितु पूरे विश्व में स्त्रियों के अधिकार को लेकर जागरुकता पैदा हो रही थी। यूरोप में फ्रांसीसी क्रांति के उपरांत इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी तथा रूस में ‘स्त्री प्रश्न’ केंद्रीय विषय के रूप में उभर रहे थे। उन्नीसवीं सदी के मध्य तक भारत के बंगाल तथा महाराष्ट्र में समाज सुधार आंदोलनों के माध्यम से स्त्रियों की स्थिति पर व्यापक विचार विमर्श प्रारंभ हो चुका था।

19वीं सदी में प्रारंभ हुए समाज सुधार आंदोलन की जड़ें उस औपनिवेशिक आलोचना में निहित थीं जो भारतीय समाज को पिछड़ा हुआ और असभ्य मानती थी, जिन्हें ‘सभ्य’ बनाने की आवश्यकता थी। दरअसल, इस प्राच्यवादी स्थापना के जरीए औपनिवेशिक सत्ता अपनी जड़ों को भारतीय समाज में मजबूत करना चाहती थी। वे एक श्रेष्ठ यूरोपीय नस्ल के रूप में असभ्य एवं बर्बर प्रजातियों को सभ्य एवं सुसंस्कृत बनाने के पौरुषपूर्ण दायित्व के निर्वहन का दावा पेश कर रहे थे। उनका यह श्रेष्ठता-बोध सिर्फ भारत के प्रति  नहीं अपितु उन समस्त एशियाई-अफ्रीकी देशों के प्रति था जिन्हें उन्होंने जबरन अपना उपनिवेश बनाया था। ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो यूरोपीय श्रेष्ठता का विचार पंद्रहवीं सदी में यूरोपीय साम्राज्यवाद के साथ-साथ सुदृढ़ हुआ। शुरुआती दौर में प्राच्यवाद पश्चिमी दुनिया के लेखकों, डिज़ाइनरों और कलाकारों द्वारा पूर्वी देशों की संस्कृतियों के वर्णन और अध्ययन के लिए प्रयुक्त पद था। कालांतर में भारत का अध्ययन करने वाले ज्ञान प्रकाश, निकोलस डिर्क और रोनाल्ड इण्डेन जैसे समाज वैज्ञानिकों और हामिद दुबोशी, होमी भाभा और गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाक जैसे साहित्यशास्त्रियों पर भी प्राच्यवाद की स्थापनाओं का प्रभाव पड़ा।

औपनिवेशिक साम्राज्यों के विस्तार ने आधुनिक युग के उदय के रूप में स्वयं को अभिव्यक्ति किया। इसे ‘यूरोपीयन चमत्कार’ का दौर माना जाता है जिससे पहले यूरोप आर्थिक और प्रौद्योगिक दृष्टि से तुर्की की ऑटोमन ख़िलाफ़त, भारत के मुग़ल साम्राज्य और चीन के मिंग साम्राज्य के मुकाबले नहीं ठहर सकता था। अट्ठारहवीं और उन्नीसवीं सदी की औद्योगिक क्रांति तथा यूरोपीय औपनिवेशीकरण की दूसरी लहर के साथ यह अवधारणा अपने चरम पर पहुँच गयी। यूरोपीय ताकतें दुनिया में व्यापार और राजनीति पर छा गयीं। 

प्रगतिवाद और उद्योगवाद के आधार पर तेज़ी से विकसित हुई युरोपीय सभ्यता को विश्व का सार्वभौम केंद्र मानने वालों ने आखेट, खेती और पशुपालन पर आधारित समाजों के प्रति तिरस्कारपूर्ण विमर्श रचे। 19 वीं सदी में भारत और इंग्लैण्ड के बीच सांस्कृतिक टकराव के संदर्भ में राष्ट्रवादी इतिहास लेखन की शुरुआत हुई। इस टकराव ने औपनिवेशिक भारत में स्त्रियों की स्थिति पर लेखन की दिशा निर्धारित की। जेम्स मिल की कृति ब्रिटिश भारत का इतिहास में हिंदू सभ्यता की बर्बरता को हिंदू स्त्री की दयनीय अवस्था में स्थापित किया गया। इसी तरह विसेंट स्मिथ की आम राय यह थी कि जो कुछ भी भारतीय है, वह खराब और निकृष्ट है। उन्होंने भारतीय स्त्रियों की स्थिति के संबंध में अत्यंत कई आपत्तिजनक टिप्पणियाँ की। अट्ठारहवीं सदी में युरोपीय लेखकों को यह कहते हुए पाया गया कि युरोप भौगोलिक क्षेत्रफल में दूसरों से छोटा ज़रूर है, पर विभिन्न कारणों से उसकी स्थिति ख़ास तरह की है। अर्थात वह विशिष्ट है।

चूंकि ब्रिटिश सत्ता का संबंध भारत के अन्य हिस्सों की अपेक्षा बंगाल एवं महाराष्ट्र के साथ सबसे पहले बना इसलिए औपनिवेशिक शासन व्यवस्था के प्रति मुखर अभिव्यक्ति भी सर्वप्रथम इन्हीं क्षेत्रों से अभिव्यक्त हुई। 1633 से 1663 के मध्य बंगाल में अंग्रेजों ने  बस्तियों और फैक्ट्रियों की स्थापना मुगल शासन के अधीन रहकर शांतिपूर्वक व्यापार के लक्ष्य से की थी। उस समय उनका कोई अन्य मंसूबा नहीं था। 1633 में अंग्रेजों का आगमन उस समय हुआ जब उड़ीसा के मुगल सूबेदार ने उन्हें हरिहरपुर (महानदी के मुहाने के समीप) और उत्तर में बालासोर में अपनी फैक्ट्रियाँ खोलने की अनुमति दी। अंग्रेजों ने 1641 में उड़ीसा में अपनी बस्तियाँ स्थापित कीं परंतु कालांतर में 17 जून 1756 को प्लासी के युद्ध में नवाब सिराजुदौला की पराजय के उपरांत धीरे-धीरे यह राजनीतिक-आर्थिक प्रभुत्व पर आधारित ब्रिटिश शासन व्यवस्था में तब्दील हो गई। आधुनिक भारत के इतिहास में प्लासी के युद्ध का ऐतिहासिक महत्व है। इस युद्ध के बाद ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की नींव डाली। इसके कुछ वर्ष उपरांत कोलकाता के सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि केवल कोलकाता के निवासी ही अंग्रेजी शासन के प्रजा जन हैं, अन्य ब्रिटिश क्षेत्रों के निवासी इस स्थिति का दावा नहीं कर सकते थे। 

आमतौर पर यह माना जाता है कि बंगाल में समाज सुधार आंदोलनों का प्रारंभ इसी मुठभेड़ का परिणाम थी। 19वीं सदी में बदली हुई औपनिवेशिक आर्थिक संरचना के कारण वहाँ के सामाजिक सम्बन्धों में भी व्यापक परिवर्तन हुआ। नए-नए सामाजिक वर्गों की उत्पत्ति हुई। पश्चिम के भारतविद एवं भारत में पश्चिम से प्रभावित भारतीय विद्वानों ने जाति विभेद, छुआछूत, धार्मिक रूढ़िवादिता, दहेज और सती प्रथा, विधवाओं की स्थिति, स्त्री शिक्षा जैसे विषयों पर गहन लेखन कार्य किया। भारतविदों के लिए ये सामाजिक कुप्रथाएँ भारत की विकृत छवि प्रस्तुत करने में केंद्र बिंदु बनीं। भारत की सामाजिक विषमताओं एवं स्त्री-पुरुष संबंधों की आलोचनापरक व्याख्या के पीछे दरअसल उनका उद्देश्य भारतीयों को मनोवैज्ञानिक तौर पर पराजित कर उन पर अपनी श्रेष्ठता स्थापित करना था। उनकी व्याख्या में भारत एक ऐसा भूभाग था जहाँ घिनौने सामाजिक रीति-रिवाज थे जिनसे प्रबुद्ध ब्रिटिश शासक ही उन्हें मुक्ति दिला सकते थे। भारत की सामाजिक बुराईयां घृणात्मक व्यंग के साथ प्रस्तुत की जाती थीं और भारतीयों में गहरे शर्म और निकृष्टता की भावना पैदा करती थीं।

हालांकि भारतीय जनमानस ने इस व्यंग्यपरक आलोचना पर अपनी कड़ी प्रतिक्रिया दी  एवं यह स्थापित किया कि भारतीय समाज में अपनी सभ्यता, संस्कृति तथा परंपरा को बचाए रखते हुए ‘आधुनिक’ मूल्यों को आत्मसात करने की असीम संभावनाएँ मौजूद थीं। भारत में स्त्री प्रश्नों की बहस राष्ट्रवाद की भावना के साथ जुड़ी हुई थी जो पश्चिमी विद्वानों द्वारा भारतीय स्त्रियों के संबंध में दी गईं प्राच्यवादी टिप्पणियों की प्रतिक्रिया थी। राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान भारत में स्त्रियों से जुड़े हुए प्रश्न एक राजनीतिक प्रश्न के रूप में ठीक उसी प्रकार उभरे जिस प्रकार सांप्रदायिकता और अस्पृश्यता से जुड़े हुए प्रश्नों का उद्भव हुआ। इन प्रश्नों ने स्वतंत्र भारतीय राष्ट्र के स्वप्न को आकार देने का कार्य किया। 

भारत में स्त्री प्रश्नों के इतिहास का आरंभ सामान्यतः उन्नीसवीं शताब्दी से माना जाता है। यद्यपि कुछ समकालीन शोध इस बहस को और प्राचीन करार देते हैं। उन्नीसवीं शताब्दी में भारतीय प्रेस के प्रारंभ होने के बाद स्त्री प्रश्नों को सामाजिक बहस के रूप में प्रमुखता मिलने लगी। पश्चिम के वर्चस्व के फलस्वरूप बंगाल में जो संभ्रांत वर्ग उभर रहा था, उसे समाज में सुधार की आवश्यकता महसूस हो रही थी। उन्होंने जाति प्रथा, बहु-विवाह, पर्दा प्रथा, सती प्रथा,बाल विवाह, जबरन वैधव्य को समाप्त करने एवं स्त्रियों की स्थिति में सुधार करने का प्रयास किया। यह ब्रिटिश हुकूमत के समक्ष स्वयं को बेहतर स्थिति में प्रस्तुत करने का भी प्रयास था। उस दौर में उच्च जाति की संभ्रांत हिन्दू स्त्रियों की स्थिति में सुधार हेतु कई वैधानिक प्रयास किए गए। सुधार आंदोलनों में भी विरोधाभास था। एक तबके में पश्चिमी विचारों का अनुकरण करने, उसे आत्मसात करने की विवशता थी; दूसरी तरफ पुनरुत्थानवाद के तत्व ब्रिटिश उपनिवेशवादियों से अलग अपनी  सांस्कृतिक पहचान को पुन:स्थापित करने और सुदृढ़ करने में जुटे हुए थे। वैधानिक हस्तक्षेप के माध्यम से सुधारों की मांग के साथ-साथ शिक्षा को भी महिलाओं की स्थिति में परिवर्तन के एक महत्वपूर्ण साधन के रूप में देखा गया।

इस प्रकार के अभियानों ने स्त्री एवं पुरुष, निजी एवं सार्वजनिक के बीच एक स्पष्ट विभाजक रेखा निर्मित की। इसके कारण इस दौर के आंदोलनों में भी स्त्री-पुरुष की लैंगीकृत भूमिकाओं का निर्माण हुआ। स्त्रियों की स्थिति में सुधार को आंतरिक मामलों के रूप में देखा गया जिसमें अंग्रेजी सरकार की दखल मंजूर नहीं थी। एक नई किस्म की ‘आर्य’ स्त्री तत्कालीन सुधारवादियों, राष्ट्रवादियों एवं पुनरुत्थानवादियों द्वारा गढ़ी एवं परिभाषित की जा रही थी जो आंगल्वाद और प्राच्यवाद का मिश्रण थी। पार्थ चटर्जी यह मानते हैं कि भारत में पुनरुत्थानवाद एवं राष्ट्रवाद की अवधारणा का जन्म स्त्री प्रश्नों के साथ हुआ। उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में बंगाल में तथाकथित ‘पुनर्जागरण’ तथा सामाज सुधार आंदोलनों के दौरान स्त्रियों का प्रश्न केंद्रीय मुद्दा था। राममोहन राय की ऐतिहासिक ख्याति भी काफी हद तक सती प्रथा निषेध के उनके प्रयासों के इर्द-गिर्द हुई। ईश्वरचंद विद्यासागर ने विधवा पुनर्विवाह को वैध बनाने के लिए अनवरत प्रयास किए। 1870 के दशक में ब्रह्म समाज विवाह कानूनों के प्रश्न और ‘सहमति की आयु’ के विवादास्पद बहसों के कारण दो भागों में विभाजित हो गया। ये सभी मुद्दे सीधे-सीधे राष्ट्रवाद की राजनीति से संबंधित थे।

औपनिवेशिक शासन व्यवस्था ने भारतीय धर्म ग्रन्थों को आधार बनाकर यहाँ के समाज में स्त्रियों की चिंतनीय स्थिति का ब्यौरा प्रस्तुत करते हुए इसको अनुचित बताया। राष्ट्रवादी सुधार परियोजना के लिए यह आवश्यक था कि आधुनिकता को आधार बनाते हुए भारतीय स्त्रियों की स्थिति में अपेक्षित सुधार किए जाएँ। इस प्रक्रिया में एक ऐसी आधुनिक भारतीय स्त्री की कल्पना की गईं जो पाश्चात्य स्त्री की अपेक्षा हर दृष्टि में श्रेष्ठ थी। एक नई किस्म की पितृसत्ता का जन्म हो रहा था जिसमें भारतीय स्त्री की छवि को आधुनिक राष्ट्र के प्रतीक के रूप में पेश किया जा रहा था जो औपनिवेशिक सत्ता द्वारा प्रस्तुत की जा रही दयनीय भारतीय स्त्री की तस्वीर से कहीं मेल नहीं खाती थी। इस नई स्त्री को राष्ट्र निर्माण में नई भूमिकाएँ प्रदान की गईं। उन्हें शिक्षा प्राप्त करने के अवसर प्रदान किए गए। 

स्त्रियाँ भारतीय परंपरा की प्रतीक थीं जो आध्यात्मिक, स्वाधीन एवं राष्ट्रवादी राजनीति का सम्यक निर्वहन करती थीं। राष्ट्रवादी परियोजना ने भारतीय संस्कृति की दो दुनिया निर्मित की आध्यात्मिक एवं भौतिक।भौ तिक (बाहर/सार्वजनिक) दुनिया में औपनिवेशिक सत्ता का हस्तक्षेप एवं उनकी अधीनता को स्वीकार करना विवशता थी परंतु आध्यात्मिक (घर/निजी) दुनिया में बाहरी हस्तक्षेप की अनुमति नहीं थी। इसे बाहरी अतिक्रमण एवं प्रदूषण से बचाए रखना था। अतः स्त्रियों से संबंधित मसलों को आधुनिकतावादियों, सुधारवादियों, पुनरुत्थानवादियों, राष्ट्रवादियों एवं अन्य समूहों द्वारा अपने दायरे में ही हल करने का प्रयास किया गया। हालांकि, वे स्त्री प्रश्नों पर भिन्न मत रखते थे एवं उसके समाधान की अभिव्यक्तियाँ भी कई बार विरोधाभासी होती थीं। इस अवधि का सुव्यव्यस्थित अध्ययन करने वाले इतिहासकार सुशोभन सरकार लिखते हैं: 

अंग्रेज़ी राज की पूँजीवादी अर्थव्यवस्था और आधुनिक पश्चिमी संस्कृति का सबसे पहला प्रभाव बंगाल पर पड़ा जिससे एक ऐसा नवजागरण हुआ जिसे आमतौर पर बंगाल के रेनेसाँ के नाम से जाना जाता है। करीब एक सदी तक बदलती हुई आधुनिक दुनिया के प्रति बंगाल की सचेत जागरूकता शेष भारत के मुकाबले आगे रही। इस लिहाज़ से कहा जा सकता है कि भारत के आधुनिक जागरण में बंगाल द्वारा निभायी गयी भूमिका की तुलना युरोपीय रेनेसाँ के संदर्भ में इटली की भूमिका से की जा सकती है।’

इतालवी रेनेसाँ की ही तरह बंगाल का नवजागरण कोई जनांदोलन नहीं था। इसकी प्रक्रिया और प्रसार भद्रलोक (उच्च वर्गों) तक सीमित था। भद्रलोक में भी नवजागरण का प्रभाव अधिकतर उसके हिंदू हिस्से पर ही पड़ा।18वीं शताब्दी के अंत में बंगाली सभ्यता में प्राचीन परंपराओं की गलत व्याख्याओं के कारण कई प्रकार की अहितकारी कुप्रथाएं विद्यमान थीं जिससे स्त्रियों को नुकसान पहुँच रहा था। सती इन परंपराओं में सबसे क्रूर प्रथा थी। ब्राह्मण और उच्च जाति के परिवारों की विधवाएँ परंपरा का पालन करते हुए आत्मदाह कर लेती थीं। कम उम्र की लड़कियों की शादी दहेज के कारण अधिक उम्र के पुरुषों से की जाती थी ताकि ये पुरुष अपने जीवनसाथी के सती बलिदान के कर्मफल को प्राप्त कर सकें। अधिकांशतःस्त्रियों को ऐसा करने के लिए मजबूर करने के प्रमाण मिलते हैं। 

उस दौर के लिखित दस्तावेजों में सती का प्रथम साक्ष्य 1789 ई. में प्राप्त होता है। जिसके ठीक चालीस वर्षों बाद इस प्रथा का उन्मूलन किया गया। 1815 से 1824 के मध्य 6,632 मामले बंगाल, मद्रास और बंबई प्रेसीडेंसी में दर्ज किए गए जिसमें 90 प्रतिशत मामले बंगाल के थे। 19वीं सदी में ब्रितानी सरकार के लिए सती प्रथा के उन्मूलन हेतु वैधानिक  प्रावधान लागू करना प्राथमिकता का मुद्दा था। साक्ष्यों से प्राप्त होता है कि यह प्रथा इतनी आम नहीं थी बल्कि कुछ विशेष समूहों में इसे महिमामंडित करते हुए इसे बनाए रखा था। सती प्रथा के उन्मूलन के पीछे यह तर्क था कि इसमें भारतीय स्त्रियों की इच्छा शामिल नहीं थी और न ही उनकी सहमति/असहमति का हमारे समाज में कोई महत्व था। ‘सती’ होना नैतिक तौर पर अच्छी और बुरी स्त्री होने का प्रमाण था। 

सती प्रथा के निषेध के कानून के लिए तीन परिपत्र जारी किए गए थे। फरवरी 1789 में पहली बार सती प्रथा पर आधिकारिक विमर्श प्रारंभ हुआ और दिसंबर 1829 में इसका निषेध अधिनियम पारित हुआ। शाहाबाद जिला के कलेक्टर एवं ब्रिटिश अधिकारी एम.एच. ब्रुक ने सती प्रथा पर सरकार को अपनी राय एवं स्थिति स्पष्ट का अनुरोध किया।   इस विषय पर बिना किसी आधिकारिक निर्देश के ब्रुक ने एक विधवा को जलाने पर रोक लगा दी और इस फैसले के लिए सरकार से मंजूरी मांगी। तत्कालीन गवर्नर जनरल ने उनकी इस कार्रवाई की सराहना की, लेकिन उनसे आधिकारिक निर्देश की बजाए निजी प्रभाव का उपयोग करने का आग्रह किया। उन्हें विश्वास था कि भविष्य में लोग स्वतः ही इस प्रकार की अमानवीय प्रथाओं का परित्याग करने लगेंगे। इस मसले में ब्रिटिश हस्तक्षेप से जन भावनाओं के आहत होने की आशंका थी। 1805 में इस मुद्दे पर पुनः विमर्श प्रारंभ हुआ जब बिहार के ज़िला मजिस्ट्रेट एलफिंस्टन ने एक मामले की सूचना दी जहाँ एक 12 साल की नशे में अचेत बच्ची को जबरन चिता पर लिटाया जा रहा था। ब्रुक ने इस मसले पर गवर्नर जनरल से पुनः निर्देश मांगा। सरकार के सचिव ने इस मामले को जिला मजिस्ट्रेट के सुपुर्द कर दिया एवं यह जानने का प्रयास किया गया कि भारतीय संस्कृति में सती प्रथा को स्वीकृति प्रदान की गई है या नहीं? 1813 तक इस मुद्दे पर कोई स्पष्ट राय नहीं बन पाई। 

1819 ई. में मृत्युंजय विद्यालंकार जो सुप्रीम कोर्ट के मुख्य पंडित थे, ने शास्त्रों के माध्यम से यह प्रमाणित करने का प्रयास किया कि भारतीय संस्कृति में सती प्रथा शास्त्र सम्मत नहीं है। समाज सुधारकों एवं ब्रिटिश सरकार के बीच यह आम सहमति थी कि इस समस्या का समाधान वैधानिक हस्तक्षेप से ही संभव है। उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में बंगाल में सती की लोकप्रियता के पीछे एक कारण यह भी महसूस किया गया कि बंगाल में विरासत के दायभाग रूप का प्रभुत्व था जिसके तहत विधवाएँ पति की मृत्यु हो जाने के उपरांत बिना पुत्र के भी अपने पति की संपत्ति का हिस्सा प्राप्त कर सकती थीं। ऐसे समय में जब बंगाल अकाल और महामारियों से तबाह हो रहा था, यह उन समूहों के लिए महत्वपूर्ण कारण हो सकता था।

बंगाल में आपराधिक न्याय प्रणाली के विभिन्न स्तर पर मजिस्ट्रेट, पुलिस अधिकारी, प्रांतीय अदालत, निज़ामत अदालत और ऊपरी अदालत-सद्र निज़ामत अदालत जिसमें प्रिवी काउंसिल शामिल थी। लंदन में ईस्ट इंडिया कंपनी, ब्रिटिश गवर्नर जनरल और परिषद के अधिकारियों के बीच औपनिवेशिक नीति के तहत आपराधिक कानून के अंतर्गत आने वाले विषयों में सती प्रथा को शामिल किया गया। 1772 में वारेन हेस्टिंग्स के आदेश पर दीवानी अदालतों में विवाह, तलाक, विरासत, उत्तराधिकार इत्यादि के संबंध में धार्मिक कानून की व्याख्या करने के लिए नियुक्त पंडितों को बुलाया गया जिन्हें सती प्रथा के सभी पहलुओं पर शास्त्र सम्मत पक्षों को प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया। कलकत्ता शहर के निवासी इस बहस के दायरे से बाहर थे जिसके कारण 1798 में ब्रिटिश कानून के तहत वहाँ सती को अवैध घोषित कर दिया गया।

मोटे तौर पर माना जाता है कि बंगाल के नवजागरण की शुरुआत राममोहन राय से हुई और रवींद्रनाथ ठाकुर के साथ उसका समापन हो गया। उन्होंने वैचारिक आन्दोलन के साथ-साथ व्यावहारिक स्तर पर भी कई प्रयास किए। उन्होंने बहुविवाह, कुलीनवाद तथा सती-प्रथा का विरोध करने के अतिरिक्त स्त्रियों को सम्पत्ति में उत्तराधिकारी बनाने की भी वकालत की। उनके लगातार प्रयास का यह परिणाम था कि लॉर्ड बैंटिक ने 4 दिसम्बर, 1829 ई. को अधिनियम पारित कर सती-प्रथा को गैर-वैधानिक घोषित कर दिया। राम मोहन राय धार्मिक, सामाजिक और शैक्षिक सुधारक थे, जिन्होंने पारंपरिक हिंदू संस्कृति को चुनौती दी। विभिन्न भाषाओं में पारंगत राममोहन राय ने अन्य शास्त्रों के अलावा वेदों और उपनिषदों का भी अध्ययन प्रारंभ किया। इसने उनकी नैतिक और धार्मिक संवेदनाओं के विकास को प्रभावित किया। राममोहन राय ने ईस्ट इंडिया कंपनी में एक क्लर्क के रूप में काम किया। श्री जॉन डिग्बी के अधीन, उन्हें रंगपुर कलेक्ट्रेट द्वारा नियुक्त किया गया था। बाद में, उन्हें दीवान के पद पर पदोन्नत किया गया, जो राजस्व संग्रह हेतु स्थानीय अधिकारियों के लिए आरक्षित था। 1814 में वे कलकत्ता में बस गए और 1815 में आत्मीय सभा की स्थापना की। 1828 में उन्होंने ब्रह्म समाज की स्थापना की। 1830 में, राजा राममोहन राय ने मुगल साम्राज्य के एक राजदूत के रूप में इंग्लैंड की यात्रा की ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि सती प्रथा पर प्रतिबंध लगाने वाले लॉर्ड विलियम बेंटिक के बंगाल सती नियमन, 1829 को पलटा नहीं जा सकता। राममोहन राय को दुनिया भर में लोग मानते थे। नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने अपनी पुस्तक ‘द इंडिया स्ट्रगल’ में उन्हें भारत में ‘धार्मिक पुनरुत्थान का अग्रदूत’ कहा। उन्होंने सामाजिक और राष्ट्रीय जीवन के सर्वांगीण उत्थान हेतु लाभकारी परम्पराओं की  स्वीकृति की वकालत की। राजा राममोहन राय ने फारसी में अनूदित अपनी प्रारम्भिक कृति ‘तुहाफ़त उल मुवाहिदीन’ में इस तथ्य को प्रमाणित करने का प्रयास किया कि भारतीय धर्मशास्त्रों में सती प्रथा का कोई उल्लेख नहीं मिलता। अर्थात हमारी धार्मिक परंपराओं में इसका निषेध है जिसके आधार पर 1830 में अपने आलेख ‘एब्स्ट्रैक्ट द आर्ग्युमेंट रिगर्डिंग द बरनिंग ऑफ विडोज़ एस रिलीजियस राइट’ में वे इस प्रश्न को उठाते हैं कि क्या हिन्दू धर्म में मृतक पति के साथ उसकी जीवित पत्नी को जलाया जाता देखकर आनंद महसूस होता है? उन्होंने मनु की रचना एवं याज्ञवल्क्य की रचनाओं को आधार बनाकर यह सिद्ध किया की प्राचीनकाल में विधवा स्त्रियाँ अपने माता-पिता के घर या अपने ससुराल में जीवन व्यतीत करती थीं, उनके ऊपर सती होने की बाध्यता नहीं थी। राय ने इस औपनिवेशिक स्थापना को चुनौती देने का प्रयास किया जो यह मानती थी कि विधवा स्त्रियों को जलाया जाना भारतीय संस्कृति का हिस्सा था। उन्होने 1830 में 300 व्यक्तियों के हस्ताक्षर के साथ लॉर्ड विलियम बैंटिक को एक ज्ञापन सौंपा जिसमें 1829 में प्रतिबंधित हुए सती प्रथा (1829 में विनियम XVII ‘सती की प्रथा की घोषणा हिंदुओं की विधवाओं को जिंदा जलाना या दफनाना अवैध और दंडनीय है) के संबंध में यह स्पष्ट किया कि प्रारंभ से ही विधवाओं को जलाए जाने की कोई लिखित स्वीकृति नहीं थी। शास्त्र के अनुसार, सती होना अनिवार्य नहीं था। एक विधवा स्त्री यदि चाहे तो स्वैच्छिक रूप से इस कार्य को कर सकती थी। इसके प्रत्युत्तर में एक सौ अट्ठाईस पंडितों ने एक ‘घोषणापत्र’ यह दावा करते हुए प्रकाशित किया कि राय के तर्क गलत हैं। उन्हें हिंदूओं का प्रतिनिधि नहीं कहा जा सकता। एक तरफ जहाँ पुरातनपंथी समूह धार्मिक ग्रन्थों को इस कुप्रथा को बचाए रखने के लिए संदर्भित कर रहे थे, वहीं सुधारवादी समूह शास्त्रों को सामाजिक व्यवस्था एवं स्त्रियों की स्थिति में परिवर्तन हेतु उल्लेखित कर रहे थे। अर्थात 19वीं सदी के उतरार्ध में प्रचलित व्याख्याओं को परिभाषित एवं पुनर्परिभाषित करने की प्रक्रिया सतत जारी थी। 

औपनिवेशिक भारत में सती प्रथा की तरह ही विधवा स्त्रियों की स्थिति भी अत्यंत चिंताजनक थी। हिंदू संस्कृति में परिवार के सम्मान और संपत्ति को बनाए रखने के लिए विधवाओं, विशेष रूप से बाल एवं किशोर विधवाओं के पुनर्विवाह को लंबे समय तक प्रतिबंधित रखा गया। उन्होंने सभी विधवाओं के लिए यह नैतिक दबाव निर्मित किया कि सभी विधवाओं को तपस्या और त्याग का जीवन जीना चाहिए। हिंदू विधवाओं के पुनर्विवाह अधिनियम ने उन्हें संपत्ति में उत्तराधिकार की वैधानिक सुरक्षा प्रदान की। इस कानून को संविधान में शामिल करने के लिए कलकत्ता के संस्कृत कॉलेज के प्रिंसिपल पंडित ईश्वरचंद्र विद्यासागर (1820-91) ने अथक प्रयास किया। उन्होंने देश में विधवा पुनर्विवाह संस्कृति की स्थापना के लिए कई विरोधों का सामना किया। भारतीय हिन्दू संस्कृति में कई विधवाएं नाबालिग थीं। उन्हें कोई संतान नहीं थी। फिर भी, उन्हें पुनर्विवाह की अनुमति नहीं थी। भारत के कुछ क्षेत्रों में विधवाओं से अपेक्षा की जाती थी कि वे मरते दम तक वैधव्य व्रत का पालन करेंगी। उन्हें सामान्य स्त्रियों की तरह जीने की इजाजत नहीं थी। उनके लिए समाज द्वारा निर्धारित मानदंडों का पालन करना आवश्यक था। वे तपस्या का जीवन जीती थीं। उनका जीवन भगवान को समर्पित था। उन्हें रंगीन वस्त्र, स्वादिष्ट भोजन, त्यौहारों में शामिल होने या पारिवारिक और सामाजिक गतिविधियों में सहभागी की अनुमति नहीं थी। विधवाओं के लिए मोटी सफेद साड़ी पहनना अनिवार्य था। वैधव्य स्त्री के जीवन की सबसे निकृष्ट अवस्था मानी जाती थी। विधवा स्त्रियाँ बंगाल के समाज में ‘हाशिये’ पर थीं। 

17 नवम्बर 1855 को भारत के लेजिस्लेटिव कांउन्सिल ने हिंदू विधवा स्त्रियों के लिए कुछ निर्देश जारी किए। उन्हें पुरुषों को देखने, बात करने एवं उनके साथ समय बिताने की इजाजत नहीं थी। वे जेवर नहीं पहन सकती थीं। उनके बाल कटे हुए होने चाहिए और वे स्वयं के लिए आईने का प्रयोग नहीं कर सकती थीं। न ही वे इत्र या फूलों का प्रयोग सौंदर्य प्रसाधनों के रूप में कर सकती थीं। उन्हें अपनी विवाह का प्रतीक चिह्न, कपड़े और आभूषण पहनने की अनुमति नहीं थी। उनके कपड़े मामूली और मैले होने चाहिए। उन्हें यातायात के साधन के प्रयोग की मनाही थी। उन्हें परिवार के सामूहिक भोजन में भाग लेने की अनुमति नहीं थी। वे दिन में केवल एक बार निरामिष भोजन कर सकती थीं। इसके अतिरिक्त उन्हें वर्ष भर में कई व्रत करने होते थे । वह केवल जमीन पर सो सकती थीं, बिस्तर के प्रयोग की उन्हें सख्त मनाही थी। अशुद्ध और प्रदूषणकारी के रूप में देखने के कारण उन्हें हर तरह के सामाजिक कार्य से अलग रखा गया। उनसे यह अपेक्षा की गई कि अपना शेष जीवन भक्ति और पूजा में समर्पित करेगी।

ईश्वरचंद्र विधासागर ने 1850 में विधवा पुनर्विवाह पर लगे प्रतिबंध को समाप्त करने के लिए अभियान चलाया। उन्होंने बांग्ला में एक पुस्तिका प्रकाशित की जिसमें कहा गया कि विधवा पुनर्विवाह शास्त्रसम्मत है। विद्यासागर ने अपनी पुस्तक का अंग्रेजी में अनुवाद किया और उसकी प्रतियां अंग्रेज अधिकारियों को वितरित कीं। अंग्रेज़ अधिकारियों की सलाह पर विद्यासागर ने 1855 में विधवा पुनर्विवाह के लिए कानून बनाने हेतु भारत के गवर्नर जनरल को एक याचिका प्रस्तुत की। याचिका में यह दलील दी गयी कि ऐसे अनेक हिन्दू थे जिन्होंने विधवा पुनर्विवाह पर अमल किया किन्तु अब वे ऐसा इसलिए नहीं कर सकते थे क्योंकि ईस्ट इंडिया कंपनी और ब्रिटिश सरकार के अधीन अदालतों ने इसे गैर-वैधानिक घोषित कर दिया है। इसके अतिरिक्त विधवा पुनर्विवाह पर लगाया गया प्रतिबंध समाज में इस प्रकार के प्रयासों के लिए नैतिक संकट भी उत्पन्न करता है।

तत्कालीन अंग्रेज अधिकारी ग्रांट ने विधवा पुनर्विवाह के पक्ष में जैविक आधार पर अपना  तर्क दिया। उनका कहना था कि हिन्दू विधवा पुनर्विवाह पर लगे प्रतिबंध ने कम उम्र की विधवाओं को वेश्यावृत्ति के लिए मजबूर कर दिया था। मेजर विलिंक्सन ने नागपुर में रहने वाले एक ब्राह्मण द्वारा विधवा पुनर्विवाह पर लगाए गए प्रतिबंध पर उनके विचारों को दुहराते हुए कहा कि यह प्रतिबंध अपरिहार्य रूप से विधवाओं को नैतिक पतन एवं पापाचार की ओर उन्मुख करता है और अवैध संतानोत्पत्ति एवं गर्भपात का कारण बनता है। इन औरतों ने स्वयं को भ्रष्ट गतिविधियों में लिप्त कर लिया है। इन स्त्रियों पर लागू किए जाने वाले कठोर एवं अप्राकृतिक कानूनों के कारण उन्हें भ्रष्ट एवं पतित होने से नहीं बचाया जा सकता। ऐसे कानूनों के कारण उन स्त्रियों की भी बदनामी होती है जिनके साथ ये विधवाएं रहती हैं। ईश्वरचंद विद्यासागर ने अंग्रेजी सरकार से विधवाओं के पुनर्विवाह के संबंध में वैधानिक हस्तक्षेप करने का आग्रह किया जिससे हिंदू विधवाओं को पुनर्विवाह करने की अनुमति प्राप्त हो सके। इस अनुरोध के समर्थन में ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने लगभग 1000 हस्ताक्षर एकत्र किए और भारतीय विधान परिषद को अपनी याचिका प्रेषित की। दूसरी तरफ परिषद को इस याचिका के खिलाफ हजारों हस्ताक्षरित पत्र प्राप्त हुए । अंततः परिषद के सदस्यों ने प्रबुद्ध अल्पसंख्यक समूह का समर्थन करने का फैसला किया। ईश्वरचंद्र विद्यासागर के असाधारण एवं साहसिक अभियान के कारण 16 जुलाई, 1856 को हिंदू विधवाओं का पुनर्विवाह अधिनियम पारित किया गया था, लेकिन लड़ाई खत्म नहीं हुई थी। 25 नवंबर, 1856 को अखबार द इंग्लिशमैन में प्रकाशित रिपोर्ट में कहा गया कि: हमें यह सुनकर खेद है कि मुर्शिदाबाद सर्कल में जज के पंडित पं. श्रीश चंदर जिन्होंने अपनी किशोरावस्था में एक युवा विधवा से शादी करने का इरादा खुलकर व्यक्त किया था, अपने प्रशंसनीय उद्देश्य से विचलित हो गए। उनकी माँ ने उन्हें स्पष्ट रूप से आगाह किया कि यदि वह अपनी पत्नी के रूप में एक विधवा को साथ लाते हैं तो इस घर में उनका रहना असंभव होगा और पत्नी प्राप्त करने के लिए उन्हें अपनी माँ को खोने के लिए तैयार रहना होगा। माँ की इस तरह की बातों के बाद अंततः उन्हें अपने इरादे को त्यागने के लिए मजबूर होना पड़ा।

यद्यपि अनगिनत प्रयासों के कारण 1856 में इस कानून को पारित कर दिया गया किन्तु इसके बावजूद भी बहुत कम पुनर्विवाह हुए। समाज सुधारकों ने इसे एक ‘मुर्दा पत्र’ की संज्ञा दी। तत्कालीन संभ्रांत समाज में कुलीन घरों के पुरुष अनगिनत शादियाँ करते थे। ईश्वर चंद्र विद्यासागर द्वारा इस प्रथा के आंकड़े एकत्र करना प्रारंभ करने के बाद वे इस समस्या की भयावहता से भयभीत हो गए। ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने हुगली जिले के 133 कुलीन ब्राह्मणों को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करते हुए बहुविवाह में निहित विसंगतियों पर प्रहार करना प्रारंभ किया। एक पचास वर्षीय व्यक्ति भोलानाथ बंदोपाध्याय ने 107 बार विवाह किया था। चौसठ वर्षीय भगवान चट्टोपाध्याय की बहत्तर पत्नियां थीं। ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने यह तर्क दिया कि कुलीनवाद की यह प्रथा अमानवीय थी। ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने बहुविवाह के विधायी निषेध का अनुरोध करते हुए 2,500 व्यक्तियों द्वारा हस्ताक्षरित याचिका सरकार को प्रस्तुत की । उस याचिका पर कोई कार्रवाई न होता देख पुनः दस साल बाद उन्होंने 21,000 व्यक्तियों द्वारा हस्ताक्षरित एक और याचिका प्रस्तुत की जिसमें बहुविवाह के विधायी निषेध का अनुरोध किया गया था। 1857 के विद्रोह के बाद सरकार ने सतर्कता बरतते हुए इस मामले में कार्रवाई करने से मना कर दिया।

ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने अपना यह अभियान जारी रखा। उन्होंने 1871 और 1873 में बहुविवाह विरोधी ट्रैक्ट का निर्माण किया। उनका तीसरा अभियान बालक एवं बालिकाओं की सामूहिक शिक्षा पर केंद्रित था। उन्हें हुगली, मिदनापुर, बर्दमान और नादिया जिलों के लिए स्कूलों का विशेष निरीक्षक नियुक्त किया गया था जहाँ उन्होंने लड़कियों के लिए चालीस स्कूलों सहित बंगाल में स्थानीय भाषा की शिक्षा की व्यवस्था स्थापित करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। इन सभी प्रयत्नों के बावजूद विधवा पुनर्विवाह को कभी भी समाज की स्वीकृति नहीं मिली, बहुपत्नी प्रथा समाप्त नहीं हुई और स्त्री शिक्षा के लिए संघर्ष अभी शुरू ही हुआ था। विद्यासागर ने उन्नीसवीं सदी के सर्वश्रेष्ठ समाज सुधारकों के रूप में अपनी जगह बनाई। उन्होंने सामाजिक परिवर्तन के लिए अदम्य साहस की आवश्यकता पर बल दिया। 

उस दौर में स्त्री शिक्षा के संबंध में विभिन्न संगठनों का योगदान भी उल्लेखनीय है। ब्रह्म समाज, प्रार्थना समाज, आर्य समाज, आर्य स्त्री समाज, थियोसोफिकल सोसायटी, रामकृष्ण मिशन सभी ने भारत के विभिन्न भागों में स्त्री शिक्षा का समर्थन किया एवं कई विद्यालयों की स्थापना की। समाज सुधारकों ने बालिकाओं में शिक्षा का प्रसार करने के लिए ने कड़ी मेहनत की। राममोहन राय, पंडिता रमाबाई, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, केशव चंद्र सेन, डी.डी.कर्वे, माताजी तपस्विनी, बेगम रुकैया, सखावत हुसैन, बहन सुब्बलक्ष्मी आदि को इसके लिए कृतज्ञतापूर्वक याद किया जाता है। हालाँकि, भारतीय संदर्भ में तमाम प्रयासों के बावजूद यथार्थ अत्यंत चिंताजनक था। स्त्री शिक्षा उच्च वर्ग की चंद स्त्रियों तक ही सीमित थी। सन् 1890 में पंजाब के जालंधर में लाला मुंशीराम की सहायता से लाला देवराज ने कन्या महाविद्यालय खोला। उस स्कूल की लड़कियां रोजाना कसरत करतीं और तरह-तरह के खेल खेलती थीं। उन्हें अध्यापिका बनने की भी ट्रेनिंग दी जाती थी । जो पत्र लेखन उन्हें सिखाया जाता था, उसमें नौकरी या रोजगार के लिए आवेदन करना शामिल  था। स्कूल ने पाठ्यक्रम और शिक्षा देने के तरीकों में नए प्रयोग किए। देवराज ने हंसी-खेल में शिक्षा की विधि निकाली जिसमें तरह-तरह के खेलों के माध्यम से शिक्षा दी जाने लगी। हिंदी नवजागरण के अग्रदूत भारतेंदु हरिश्चंद्र लड़कियों को घर पर ही नैतिक धार्मिक शिक्षा की पक्षधरता कर रहे थे। सन् 1882 ई. में हंटर आयोग के समक्ष उन्होंने स्त्री शिक्षा के संबंध में अपना पक्ष रखते हुए कहा कि : बड़ी लड़कियों को प्रेमसागर ग्रंथ (लल्लू लाल लिखित) पढ़ने के लिए नहीं देना चाहिए। ये पाठ्य पुस्तकें कई कारणों से आपत्तिजनक हैं। ‘विद्यांकुर’ और ‘इतिहास तिमिरनाशक’ उनके नैतिक चरित्र का विकास नहीं कर सकते। चरित्र निर्माण (मोरलिटी) और घरेलू प्रबंध वगैरह के बारे में बताने वाली अच्छी पाठ्यपुस्तकें उनके पाठ्यक्रम में लगनी चाहिए। 

भारतेंदु ने कहा कि इस देश (पश्चिमोत्तर प्रांत) के लोगों में अपनी लड़कियों को पब्लिक स्कूलों में भेजने में कम रुचि है। भारतेंदु एक ओर आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा को हिंदुस्तानियों के लिए बिल्कुल जरूरी ठहराते थे, वहीं दूसरी ओर लड़कियों को इसी ज्ञान विज्ञान से दूर रखना चाहते थे। ‘वामाशिक्षक’ के प्रकाशन से वर्षों पूर्व 1869 ई. में डिप्टी नजीर अहमद ने ‘मिरातुल-उरूस’ नामक किताब लिखी जिसमें दो बहनों की कहानी के जरिए भद्रवर्गीय मुस्लिम औरतों को मां, बहन, बेटी और पत्नी के रूप में अपने परंपरागत कर्तव्यों को कुशलता से पूरा करने की शिक्षा दी गई थी। इसी तरह की एक अन्य उर्दू पुस्तक की चर्चा वीरभारत तलवार अपनी पुस्तक रस्साकशी में करते हैं। 19वीं सदी के मुस्लिम नवजागरण की सबसे महत्वपूर्ण संस्था देवबंद दारूल उलूम से संबंधित मौलाना अशरफ अली थानवी ने ‘बहिश्ती जेवर’ किताब लिखी जो एक ऐसा वृहद कोश था जिसमें भद्रवर्गीय मुस्लिम स्त्री को धर्म, पारिवारिक कानूनों, घरेलू प्रबंध, इस्लामी दवा-दारू वगैरह की शिक्षा दी गई थी। उर्दू में लिखी गई ये दोनों किताबें मुस्लिम परिवारों में हर लड़की को उसके ब्याह के समय उपहार के रूप में दी जाती थी।

स्त्रियों को शिक्षित करने के महत्त्व पर सबसे पहली सार्वजनिक बहस राममोहन राय द्वारा 1815 में स्थापित आत्मीय सभा द्वारा छेड़ी गयी। 19वीं शताब्दी में समाज में यह भ्रांति व्याप्त थी कि हिन्दू शास्त्र स्त्री शिक्षा की अनुमति नहीं देते तथा शिक्षा ग्रहण करने पर देवता उसे वैधव्य का दंड देते हैं। इस दिशा में सबसे पहला प्रयास ईसाई मिशनरियों ने किया तथा 1819 में कलकत्ता तरुण स्त्री सभा की स्थापना की। 1849 में कलकत्ता एजुकेशन काउंसिल के अध्यक्ष जे.ई.डी. बेथून ने बेथून स्कूल की स्थापना की। उनके द्वारा यह स्त्री शिक्षा के क्षेत्र में पहली सशक्त पहल थी परंतु ईश्वरचंद विद्यासागर का योगदान अमूल्य है। वे बंगाल के 35 बालिका विद्यालयों से सम्बद्ध थे। स्त्री शिक्षा के क्षेत्र में उनके कार्यो को सदैव याद किया जाता है। बंबई के एलफिंस्टन इंस्टीट्यूट के भी विद्यार्थियों ने भी स्त्री शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया। 1854 के चार्ल्स वुड डिस्पैच में भी स्त्री शिक्षा को बढ़ावा देने पर बल दिया गया। 1914 में स्त्री चिकित्सा सेवा ने स्त्रियों को नसिंग एवं मिडवाइफरी के क्षेत्र में प्रशिक्षण देने का सराहनीय कार्य किया। 1916 में जब प्रो.कर्वे ने भारतीय महिला विश्वविद्यालय प्रारंभ किया जो स्त्री शिक्षा की दिशा में मील का पत्थर साबित हुआ। इसी वर्ष दिल्ली में लेडी हर्डिंग मेडिकल कालेज की स्थापना की गयी। 1880 में डफरिन हास्पिटल की स्थापना के पश्चात महिलाओं को स्वास्थ्य एवं चिकित्सकीय सहायता उपलब्ध करायी जाने लगी।

उन्नीसवीं सदी के उतरार्ध तथा बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में भारत के राजनीतिक पटल की जटिलताओं में सामाजिक आंदोलनों के साथ-साथ स्त्री प्रश्नों के समाधान साहित्य में भी तलाशने के प्रयास किए गए। समकालीन लेखकों ने स्त्री जीवन की जटिलताओं को अपने लेखन में प्रमुखता से उभारा परंतु वे सुधारोन्मुख दिखने के साथ-साथ औपनिवेशिक सत्ता के हित विरोधी भी नहीं दिखना चाहते थे। यह वह समय था जब गद्य साहित्य के जरीए नए किस्म का सामाजिक-राजनीतिक सुधार आगे बढ़ाया जा रहा था। राष्ट्रीय चेतना के निर्माण में सांस्कृतिक मूल्यों एवं राजनीतिक उद्देश्यों की महत्वपूर्ण भूमिका थी। हिंदी साहित्य के आरम्भिक दौर में सभी उपन्यासों के केंद्र में स्त्री प्रश्न थे। देवरानी-जेठानी की कहानी, वामा शिक्षक, भाग्यवती और परीक्षा गुरु में ऐसी स्त्रियां निकल कर आईं जो तत्कालीन समाज सुधार आंदोलनों का प्रतिनिधित्व करती प्रतीत होती थीं। बाल विवाह, बेमेल विवाह, वैधव्य, पर्दा प्रथा के समानांतर स्त्रियों के अधुनिकीकरण की परियोजना भी चल रही थी।

कन्नड के पहले उपन्यास ‘इंदिराबाई’ में नायिका अपनी भाषा का साहित्य पढ़ने की बजाए अंग्रेजी की आचरण पुस्तकें पढती है। साथ ही, वह यह भी दिखाती है कि पारिवारिक मूल्यों एवं विवाह संस्था के प्रति उसमें विशेष अनुराग है। प्रेमचंद की रचना ‘गोदान’ में मिस मालती आधुनिक होती भारतीय स्त्री का प्रतिनिधित्व करती है। इसके अतिरिक्त उनकी समस्त रचनओं में स्त्री प्रश्न प्रमुखता से उभरे। गबन, गोदान, निर्मला, सेवासदन जैसे कालजयी उपन्यासों तथा उनकी कहानियों में स्त्रियों के जीवन के जटिल प्रश्नों को उठाते हुए उन्होंने इसके समाधान की तरफ समाज का ध्यान आकृष्ट किया। ये प्रतिनिधि छवियां पुरुष मन की निर्मिति थीं अपने कल्पना लोक में ‘आदर्श भारतीय स्त्री’ की रचना कर रहे थे। बंगाल में धीरेंद्र पाल, ताराकांत विश्वास, नागेंद्रबाला दासी, नवीन काली दासी, जयकृष्ण मित्र, सत्यचरण मित्र तथा गिरिजा प्रसन्न चौधरी जैसे लेखकों की रचनाओं में स्त्रियों के आचरण की आदर्शमूलक रचनाएं शामिल थीं। इसी  समय ‘बामाबोधिनी’ तथा ‘अंतःपुर’ जैसी पत्रिकाएं भी निकल रही थीं। आदर्श स्त्रियों की रचना के संबंध में हिंदू एवं मुस्लिम लेखकों में आश्चर्यजनक वैचारिक एकता देखते बनती थी। दोनों यह मानते थे कि उनके पतन का कारण अशिक्षा है। इसीलिए स्त्री धर्म नीति, बहिश्ती जेवर एवं मिरातुल उरूस जैसी रचनाएं सामने आईं जिसमें स्त्रियों को परिवार एवं समाज हेतु अपेक्षित आचरण के लिए निर्देशित गया था। 

ब्रह्म समाज की स्थापना 20 अगस्त 1828 को राजा राममोहन राय ने की थी। समाज सुधार की दृष्टि से उन्होंने समान शिक्षा की वैदिक दृष्टि का समर्थन किया। साथ ही स्त्री-पुरुष को अपने वैवाहिक साथी को चुनने का अधिकार, बाल-विवाह का विरोध और सती प्रथा का पुरजोर विरोध किया। 1833 में इंग्लैंड में राजा राममोहन राय की मृत्यु के पश्चात ब्रह्म समाज की गतिविधियाँ कम हो गईं। 06 अक्टूबर 1839 को देवेंद्रनाथ टैगोर ने तत्वबोधिनी सभा की स्थापना की जिसे 1843 में ब्रह्म समाज में शामिल कर दिया गया। ईश्वरचंद्र विद्यासागर भी इसमें शामिल हुए। 1859 में कुछ वैचारिक मतभेदों के कारण उन्होंने इस्तीफा दे दिया परंतु केशबचंद्र सेन के साथ मिलकर शैक्षिक सुधारों के कार्यक्रम को जारी रखा। 1861 में नोबिन रॉय ने ब्रह्म समाज के आदर्शों के विस्तार के लिए लाहौर में ब्रह्म समाज की स्थापना की जिसके पीछे बंगाल के बाहर के लोगों को व्यापक पैमाने पर प्रभावित करने की दृष्टि थी। उन्होंने ब्रह्म आदर्शों को सीखने के अलावा आधुनिक वैज्ञानिक ज्ञान, तर्कसंगतता और प्रबुद्धता के पश्चिमी आदर्श पर जोर दिया। विद्वानों का मानना है कि वे पश्चिम की मिशनरी गतिविधियों के हिंदू संस्करण का प्रतिनिधित्व करते थे जिसके कारण उच्च वर्ग की बंगाली स्त्रियों के आधुनिकीकरण की परियोजना में उनका गहरा योगदान था। 

स्वामी दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज की स्थापना एक वैदिक आंदोलन के रूप में की थी। यह आधिकारिक तौर पर 07 अप्रैल 1875 को बॉम्बे में स्थापित किया गया था। इससे पहले उन्होंने 1869 और 1873 के बीच फर्रुखाबाद (1869), मिर्जापुर (1870), कासगंज (1870), अलीगढ़ (1870) और वाराणसी (1873) में वैदिक विद्यालयों की स्थापना की थी। ये स्कूल पारंपरिक प्राचीन वेदों के मूल्यों को सीखने और आत्मसात करने के लक्ष्य से गुरुकुलों के मॉडल पर चलते थे। उन्हें निरंतर वित्तीय सहायता, पर्याप्त शिक्षक और पाठ्यपुस्तकों की कमी रहती थी। दयानंद सरस्वती ने महसूस किया कि इस तरह के शैक्षिक प्रयास लंबे समय तक जारी रखने के लिए जनता का समर्थन आवश्यक था। वैदिक शिक्षा का प्रचार करने के लिए दयानंद सरस्वती ने पूरे भारत की यात्रा की। 1872-73 के दौरान वे अपने समय के अन्य समाज सुधारकों से मिले, विशेष रूप से बंगाल में चल रहे ब्रह्म समाज आंदोलन से। 1874 में उन्होंने ‘लाइट ऑफ ट्रूथ’ नाम से एक लंबा व्याख्यान दिया जो बाद में सत्यार्थ प्रकाश शीर्षक से प्रकाशित हुआ। दयानंद सरस्वती ने स्त्री शिक्षा का प्रचार किया एवं पारिवारिक निर्णय में स्थान दिलाने का प्रयास किया। स्वामी श्रद्धानंद सरस्वती और उनके सहयोगी पंडित लेखराम के नेतृत्व में 1893 में आर्य समाज के अनुयायियों का एक वर्ग इससे अलग हो गया। यह एक परंपरावादी समूह था और अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली और पश्चिमीकरण का विरोध करता था, वे केवल वैदिक शिक्षा तक सीमित रहना चाहते थे। उन्होंने अपने विंग को पंजाब आर्य समाज के नाम से संबोधित किया और 1901 में हरिद्वार के कांगड़ी में पहले गुरुकुल की स्थापना की। 

प्रार्थना समाज की स्थापना 1867 में आत्माराम पांडुरंग ने की थी जिसमें बाद में आर.जी भंडारकर तथा संस्कृत के विद्वान एवं न्यायमूर्ति रामदेव गोविंद रानाडे शामिल हुए। यह आन्दोलन ज्यादातर न्यायमूर्ति रानाडे के प्रयासों से प्रेरित था जो आधुनिक आदर्शों पर जोर देने के मामले में ब्रह्म समाज के समान था। इसने 13वीं शताब्दी के महाराष्ट्र के भक्त कवि-संतों तुकाराम, नामदेव और विट्ठल के आदर्शों एवं विचारों को प्रसारित किया। वे अपनी ऐतिहासिक एवं धार्मिक परंपरा को महत्वपूर्ण मानते थे। उनका मुद्दा राजनीतिक पहलुओं की तुलना में सामाजिक सुधार था। उन्होंने स्त्री शिक्षा एवं विधवा पुनर्विवाह की वकालत की। 

तमिलनाडु में आत्म-सम्मान आंदोलन की शुरुआत ईवी रामास्वामी ‘पेरियार’ ने 1925 में निचली जातियों में उत्पीड़न के प्रति जागरूकता पैदा करने की कोशिश की। उन्होंने दलित जातियों के मंदिरों में प्रवेश की मांग की जिसपर वर्षों से प्रतिबंध लगा हुआ था। हालांकि, बाद में तमिलनाडु के उत्तर भारतीय मंदिरों ने अनुसूचित जातियों के लिए अपने दरवाजे खोल दिए। उनके मार्गदर्शन में इस आंदोलन ने स्त्रियों की स्थिति में सुधार के लिए महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किए। उन्होंने विधवा पुनर्विवाह, दहेज का निषेध, तमिलनाडु में देवदासी प्रथा तथा स्त्रियों को पैतृक संपत्ति में अधिकार दिए जाने के प्रस्ताव को अपने आंदोलन का महत्वपूर्ण मुद्दा बनाया। 

19-20वीं शताब्दी के अधिकांश आंदोलनों के संदर्भ में लिखित दस्तावेजों में हम पाते हैं कि ज्यादातर पुरुष समाज सुधारक ही इन आंदोलनों का नेतृत्व कर रहे थे। स्त्रियों की उसमें कोई भूमिका नहीं थी, परंतु इस प्रकार का लेखन स्त्रियों के अमूल्य योगदान की अनदेखी करता है। उसी समय केरल में त्रावणकोर की महारानी ने अपने नाबालिग भतीजे के लिए स्टेट की रीजेंट-क्वीन के रूप में शासन किया। भारत में ऐसे कई क्षेत्र थे जहाँ पुरुषों द्वारा शासित प्रजा थी परंतु त्रावणकोर की महारानी बेहतरीन उदाहरण थीं। महारानी ने शासक के रूप में कई साहसिक निर्णय लिए। 1925 में महात्मा गांधी से मिलने के बाद उन्होंने त्रावणकोर में पहला गर्ल्स स्कूल खोला जो सभी जातियों और धर्मों की बालिकाओं के लिए सर्वसुलभ था। उन्होंने भारत में त्रावणकोर की विधान परिषद के प्रमुख के रूप में एक स्त्री की नियुक्ति की, जो तत्कालीन समय में विशिष्ट था। त्रावणकोर विश्वविद्यालय के कामकाज की देखरेख के लिए उन्होने एक विशेष समिति बनाई एवं त्रावणकोर में पंचायती राज व्यवस्था कायम की। कोचीन हार्बर परियोजना में राज्य का धन निवेश किया गया, जिसके कारण त्रावणकोर की संपत्ति में वृद्धि हुई। पहली बार त्रावणकोर में रेल, बिजली तथा टेलीफोन सुविधा कायम करने का श्रेय भी उन्हें ही दिया जाता है। 1927 में उन्होंने भूमिहीनों को 2995 एकड़ भूमि का पुनर्वितरण किया। त्रावणकोर की महारानी एक सशक्त स्त्री का उदाहरण थीं, जिन्होंने स्त्रियों को सशक्त बनाने के लिए काम किया। 

भारत में स्त्री आंदोलन के इतिहास को स्वाधीनता आंदोलन से अलग नहीं किया जा सकता। इसने महिलाओं को घर-गृहस्थी जैसी पारंपरिक भूमिकाओं से बाहर निकल कर अपनी एक भिन्न प्रकार की भूमिका सुनिश्चित करने के लिए प्रेरित किया। स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं ने सार्वजनिक सामाजिक और राजनीतिक जीवन जीने के लिए भागीदारी निभाई। महात्मा गांधी के आह्वान पर स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं की व्यापक भागीदारी हुई परिणामतः इसने एक लोकप्रिय जन आंदोलन का रूप ले लिया। 1917 में महात्मा गांधी के आगमन के बाद असहयोग, स्वदेशी, खिलाफत और खादी के आंदोलन में महिलाओं ने बढ-चढकर सहभागिता की। राष्ट्रीय आंदोलन में महिलाओं की बड़ी भागीदारी होने के बावजूद भी उन्होंने अपने अधिकारों के बढ़ाने के प्रयास पर ध्यान नहीं दिया और अपना सारा ध्यान स्वतंत्रता प्राप्ति पर केंद्रित रखा। इसका परिणाम यह हुआ कि अंग्रेज़ी राजसत्ता तथा महिला नेतृत्व के बीच हमेशा असमंजस की स्थिति बनी रहती कि वे महिला अधिकारों के लिए संघर्ष करें या स्वतंत्रता के लिए संघर्ष।

1912 में पटना में महिला सम्मेलन का आयोजन किया गया जिसकी अध्यक्षता श्रीमती मधोलकर ने की और बाल विवाह के खिलाफ समिति बनाने का सुझाव दिया। 1928 में महिलाओं ने साइमन कमीशन का जबरदस्त विरोध किया। बिहार में लेजिस्लेटिव कौंसिल में महिलाओं को वोट देने के अधिकार व लैंगिक भेदभाव को लेकर नवम्बर, 1921 को एक प्रस्ताव पेश किया गया। 1919 के एक्ट के अनुसार वे मतदान नहीं कर सकती थीं। कौंसिल में इस मसले पर जमकर बहस हुई और यह प्रस्ताव 10 वोटों से विफल रहा। कोलकाता में भी महिलाओं को मताधिकार देने संबंधित प्रस्ताव भारी मतों से विफल हो गया पर महिलाओं ने हिम्मत नहीं हारी। उनका संघर्ष जारी रहा। लंबी लड़ाई के बाद बिहार और उड़़ीसा में 1929 में महिलाओं को यह अधिकार प्राप्त हुआ।

बाल विवाह का निषेध पहला सामाज सुधार आंदोलन था जिसे महिलाओं के संगठित समूह द्वारा प्रारम्भ किया गया। उन्होंने अपने तर्क के लिए राजनीतिक याचिका दायर करने का निर्णय लिया। महिला समूहों ने इस विधेयक पर मोतीलाल नेहरू जैसे सुधारवादी नेताओं से समर्थन मांगा। अखिल भारतीय महिला संघ ने इस बिल के समर्थन के लिए राजनेताओं पर दबाव बनाया, उनके प्रतिनिधि मंडलों के बाहर खड़े होकर तख्तियां लहराईं और ‘अगर आप शारदा बिल का विरोध करते हैं, तो दुनिया आप पर हंसेगी’ जैसे नारे लगाए। महिलाओं के इस समूह ने गांधी को अपने भाषणों में बाल विवाह जैसे मुद्दे को शमिल करने के लिए प्रेरित किया। 

सहमति की उम्र के प्रश्नों को संबोधित करने वाले विभिन्न बिल भारतीय विधान सभाओं में पेश किए गए और परंतु उन पर अपेक्षित सफलता प्राप्त नहीं हुई। 1927  में राय साहिब हरबिलास शारदा ने केंद्रीय विधानसभा में अपना हिंदू बाल विवाह विधेयक पेश किया। भारत में सुधारवादियों, स्वतंत्रता सेनानियों तथा विश्व जनमत के दबाव में सरकार ने विधेयक को मध्य प्रांत के गृह सदस्य सर मोरोपंत विश्वनाथ जोशी की अध्यक्षता वाली सहमति की आयु समिति के पास भेजा। समिति के अन्य सदस्य अर्कोट रामासामी मुदलियार, खान बहादुर मथुक, मियां इमाम बक्श कडू, रामेश्वरी नेहरू, सत्येंद्र चंद्र मित्रा, ठाकुर दास भार्गव, मौलवी मुहम्मद याकूब, मियां सर मुहम्मद शाह नवाज़ और एमसागाने थे। अखिल भारतीय महिला सम्मेलन (AIWC), भारतीय महिला संघ (IWA) और भारतीय राष्ट्रीय महिला परिषद ने अपने सदस्यों के माध्यम से जोशी समिति के समक्ष विवाह और सहमति के लिए उम्र बढ़ाने के पक्ष में तर्क प्रस्तुत किया। यह जानते हुए भी कि उन्हें उलेमाओं का विरोध झेलना पड़ेगा मुस्लिम महिलाओं ने शादी की उम्र बढ़ाने के पक्ष में जोशी कमेटी के समक्ष अपने विचार प्रस्तुत किए। जोशी समिति ने 20 जून 1929 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की।

इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल ऑफ इंडिया ने 28 सितंबर 1929 को बाल विवाह निरोधक अधिनियम पास किया। जिसके अनुसार, लड़कियों की शादी की उम्र 14 साल और लड़कों का 18 साल तय हुआ। 1949 में, भारत की स्वतंत्रता के पश्चात इसे लड़कियों के लिए बढ़ाकर 18 और लड़कों के लिए 21 वर्ष संशोधित किया गया। समिति के अध्यक्ष हरबिलास शारदा के नाम पर इसे शारदा अधिनियम के नाम से जाना जाता है। यह 1 अप्रैल 1930 को प्रभाव में आया और पूरे ब्रिटिश भारत में लागू हुआ। हालांकि, इसके क्रियान्वयन में कुछ चुनौतियां थीं। खासकर ब्रिटिश अधिकारियों को अपने वफादार हिंदू और मुस्लिम समूहों से समर्थन खोने का डर था। इस बिल की सफलता का श्रेय महिला संगठनों को दिया जा सकता है। यह प्रथम अवसर था जब पुरुष प्रभाव से मुक्त होकर स्त्रियां स्वंय आगे आ रही थीं। हालांकि, यह भारत में महिला आंदोलन की प्रथम जीत थी लेकिन यह अधिनियम पूरी तरह से विफल रहा था। प्रारम्भिक दो साल और पांच महीनों में इस कानून के तहत 473 अभियोग दर्ज हुए जिनमें से सिर्फ 167  के संबंध में फैसला हुआ। 98 मामले अगस्त 1932 तक लंबित थे। 167 सफल अभियोगों में से केवल 17 को सजा मिली। इनमें अधिकांश मामले पंजाब और संयुक्त प्रांत के थे।

भारत में ब्रिटिश शासनकाल के दौरान यह अधिनियम मृतप्राय ही बना रहा। पंडित जवाहरलाल नेहरु के अनुसार ब्रिटिश सरकार ने भारत के छोटे शहरों और गांवों में इसके संबंध में जागरूकता फैलाने के लिए कुछ नहीं किया। अंग्रेज अधिकारी हिंदू और मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक आधार पर की नाराजगी मोल नहीं लेना चाहते थे। 1930 के दशक में, भारत में एकमात्र सांप्रदायिक समूह ब्रिटिश शासन का समर्थन कर रहा था। ब्रिटिश सरकार ने अपना समर्थन बचाने एवं स्वतंत्रता आंदोलन को रोकने पर अपना ध्यान केंद्रित रखा इसलिए इस तरह के सुधारात्मक कानूनों को लागू करने से पूरी तरह परहेज किया। 

औपनिवेशिक काल से लेकर स्वतंत्रता के पश्चात तक महिलाओं की स्थिति में सुधार लाने और समाज में विभिन्न बुराइयों को दूर करने के उद्देश्य से कई संगठनों की स्थापना की गई जिन्होंने स्त्री मुद्दों के लिए कार्य किया। पूना में पंडिता रमाबाई ने 1892 में शारदा सदन की स्थापना की। अहमदाबाद में श्री महिपत्रमरूपम रामनाथश्रम (1892), बंबई में श्री जोरास्ट्रियन मंडल (1903), बड़ौदा में मातृत्व और बाल कल्याण लीग (1914), पूना में भगिनी समाज (1916) की स्थापना की गई। इन क्षेत्रीय संगठनों के साथ भारतीय महिला संघ (1917), अखिल भारतीय राष्ट्रीय महिला परिषद (1920), अखिल भारतीय महिला सम्मेलन (1926) जैसे राष्ट्रीय संगठनों ने 1937 तक महिला सम्मेलनों का आयोजन किया। 1980 में भारतीय स्त्री अध्ययन संघ की स्थापना हुई जिसके मंच से स्त्री आंदोलन एवं स्त्री अध्ययन के अंतर्संबंधों को रेखांकित करने का प्रयास किया गया।

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