Wednesday, May 29, 2024
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नीला प्रसाद
राँची में साहित्यकार पिता के घर जन्म। किताबों भरे घर में साहित्यकारों, रंगकर्मियों, स्थानीय कलाकारों की लगातार उपस्थिति ने संस्कारित किया। फिजिक्स ऑनर्स के बाद ज़ेवियर इंस्टिट्यूट से पर्सनेल मैनेजमेंट और इंडस्ट्रियल रिलेशन में पी.जी. डिप्लोमा करके पहले जमशेदपुर, फिर राँची, दिल्ली, धनबाद, कोलकाता में नौकरी की। दिसंबर 2021 में कोल इण्डिया लिमिटेड से महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्त।

 

बारह साल की उम्र से लिखना शुरु किया पर पहली प्राथमिकता अपने पाँवों खड़े होना रही। इस कारण लेखन बार-बार दूसरे पायदान पर चला जाता रहा। 

 

चार कहानी संग्रह ‘सातवीं औरत का घर’ (शिल्पायन, दिल्ली),  ‘चालीस साल की कुँवारी लड़की’ (साहित्य भंडार, इलाहाबाद). ‘ईश्वर चुप है‘ (बोधि प्रकाशन, जयपुर) तथा ‘मात और मात’ (ज्ञानपीठ, दिल्ली) से प्रकाशित।

दो वैचारिक लेख अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के स्त्री विषयक पाठ्यक्रम के लिए।

कई कहानियाँ विषय-विशेष से सम्बन्धित संकलनों में चयनित-प्रकाशित तथा शोध में सम्मिलित।

 कहानी संग्रह ‘सातवीं औरत का घर’ पर आगरा विश्वविद्यालय से डिसर्टेशन थीसिस।

कुछ कहानियाँ मराठी, गुजराती और तेलुगू में अनूदित।

विभिन्न ऑनलाइन साइट्स और बुक्स इन वॉइस पर कहानियाँ।

लगभग सभी प्रमुख साहित्यिक पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित।

 

विधाएँ : कहानी, उपन्यास, लेख, कविता, डायरी। कुछ रेडियो नाटक भी लिखे, जो आकाशवाणी राँची से 1990 के दशक में नियमित प्रसारित होते रहे।

 

राष्ट्रीय स्तर के सम्मानः 

कहानी संग्रह ‘सातवीं औरत का घर’ के लिए 2011 का विजय वर्मा कथा सम्मान।

कथाक्रम में प्रकाशित कहानी ‘एक विधवा और एक चाँद’ के लिए कमलेश्वर स्मृति कथा पुरस्कार 2014.

प्रबंधन सम्बन्धी लेख ‘मैनेजमेंट ऑफ परफॉर्मेंस इम्प्रूवमेंट’ के लिए एन.आई.पी.एम. नेशनल यंग मैनेजर्स अवॉर्ड 1993.

 

संपर्कः 

[email protected]

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किताबें

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कहानियां

एक विधवा और एक चाँद

आज यहाँ आखिरी रात है। फैसले की ये रात मान्या के दिल पर बहुत भारी है- अपनी कह और अजित की सुन सकने वाली आखिरी रात! ‘आज का दिन मेरी उम्मीद का है आखिरी दिन’… नहीं; ‘आज की रात मेरी उम्मीद की है आखिरी रात’…कल सुबह तो इस ट्रेनिंग हॉस्टल में दूर- दूर से इकट्ठा हुए सारे पंछी अपने- अपने बसेरे उड़, बिछुड़ जाएँगे! इसीलिए तो कह रही है जिंदगी- ‘तुरंत फैसला लो या उमर भर पछताओ।’ 

वक्त की उफनती आई लहर जब ऐन आँखों के सामने एक चमकदार, कीमती मोती डाल गई है तो उसे मान देकर उठा लेना चाहिए, वरना नियति की दूसरी लहर उसे वापस भी तो ले जा सकती है! दिल के दरवाजे पर हौले-से दस्तक देते आकर खड़े हो गए को अबकी अंदर बुला ले या हमेशा की तरह दरवाजा मजबूती से बंद किए रहे? प्यार उसकी जिंदगी में हमेशा एक आहट की तरह आता और चला जाता रहा है। उस आहट को सुन आगे आने, उसे अपना लेने या उसमें डूब जाने की ख्वाहिश कभी पूरी नहीं हो पाई।

‘पर अब तो मैं विधवा हूँ- दिल से खाली!’ मान्या ने सोचा।

डिनर हो चुका। ट्रेनिंग हॉस्टल के विशाल दस मंजिले भवन के सामने बड़े से लॉन में रात के अँधेरे में एक कुर्सी पर अकेली बैठी थी, अब बेचैनी में उठकर टहलने लगी। हल्की रोशनी का सुंदर संयोजन और घास के अंदर फिट छोटे-छोटे माइक! आत्मा को शांति पहुँचाती कोई मीठी धुन बज रही है पर वह रोना चाहती है। चाहती है कि प्रेम-भंग के गीत बजें। सारी दुनिया जान जाए कि उसकी जिंदगी न कभी महकी, न सुगंध में सराबोर हुई।

नहीं, वह चाहती है कि कोई प्रेम गीत बजे। एज इज़ जस्ट अ नंबर (उम्र एक संख्या मात्र है)। जिंदगी अभी बाकी है। बाकी है सुगंध में सराबोर होकर, किसी में डूबना-इतराना! क्या अजित अभी आएगा, सीने से लगाएगा? जरूर अब भी कुछ है उसमें, तभी तो अजित उसे चाहता है। उसकी आँखों में उमड़ते दर्द के समंदर को पी जाना, उसे भरोसा दिलाना चाहता है कि वह अब भी जिंदा है- प्यार कर-करके लबालब भिगो दिए जाने के काबिल!

वह सीढ़ियाँ चढ़ तीसरी मंजिल पर अपने कमरे में चली गई। कतार में बने कमरे ट्रेनिंग के लिए आए ऑफिसरों को अलॉट कर दिए गए हैं। डेढ़ दशकों से नौकरी कर रहे शादीशुदा, व्यस्त जिंदगी जी रहे जिम्मेदार लोग हैं सब-के-सब, तो इस सावधानी की कोई जरूरत नहीं कि सुरक्षा के लिहाज से महिला अधिकारियों को दूसरे विंग में फैकल्टीज़ के बगल वाले कमरे दिए जाएँ। यह तब होता था, जब वह कुँवारी थी।

इसी कतार में पाँच कमरों के अंतराल पर दो प्राणियों के दिल कल बिछुड़ जाने के खयाल से कसक में डूबे हैं। वे धड़क रहे हैं किसी कई बार महसूसी, फिर भी अनसमझी अनुभूति से! 

सजे-धजे सुगंधित कमरे में, बिस्तर पर औंधे मुँह लेटी, सुबक- सुबक रोती मान्या यहाँ आने के बाद के दिनों को एक-एक कर खँगाल रही है।

 

ट्रेनिंग का पहला दिन

आसमान में चाँद दिखने का आभास

ट्रेनिंग का पहला दिन था। पूछे गए चार सवालों के दनादन जवाब क्या दे दिए, सबकी नजरों में चढ़ गई। वह पीछे ही बैठा था। टी ब्रेक में आया और गपशप करने लगा।

‘तुमने तो मुझे पहचाना नहीं होगा?’ से बात शुरू हुई। मान्या पहचानती थी। फिर तो आराम से बातें शुरू हो गईं- पिछले शहर में पोस्टिंग की, दफ्तर और कॉन्फरेंसों में कभी-कभार हुई चंद मिनटों की मुलाकातों की…उन बातों की बातें, जो कच्ची उमर में संकोचवश कह नहीं पाते थे। फिर आहिस्ता से दिल की बातें! 

 ‘बढ़ती उमर के साथ तुम ज्यादा आकर्षक लगने लगी हो। कैसी चल रही है जिंदगी?’ अजित ने पूछा तो मान्या अंदर से रो पड़ी। ‘मन के उजड़े चमन में आह का दिया जलता है’, पर प्रकट बोली

‘विधवा बनी जीती हूँ। घर से विद्रोह करके चली आई थी अपने एक घर की तलाश में, पर न घर बना, न बसा’।

उसका गला रूँध गया। 

‘ओह! आई ऐम सॉरी’। अजित ने कहा।

अजित सुंदर है। गठीला, साँवला बदन, तीखे नाक- नक्श, लंबा कद, मेधावी दिखता आकर्षक व्यक्तित्व। वह मान्या का घोर प्रशंसक है, उसे सातवें आसमान पर चढ़ा देता है, तो स्वाभाविक है, मान्या को बहुत अच्छा लगता है।

मान्या ने टुकड़े- टुकड़े हो चुके अपने दिल का एक टुकड़ा प्यार का झरना बरसा रहे अजित को दे दिया।

 

दूसरा दिन

दूसरे दिन खिला मन में दूज का चाँद

‘क्या तुम्हें पता है, मैं मन- ही- मन तुम्हें साल-दर-साल कितना चाहता रहा? ऑफिस के तुम्हारे कमरे में जाता, तुम्हें एक नज़र देख बगल की मेज पर बैठे तुम्हारे इमीडिएट बॉस से कोई फालतू की बात करके लौट जाता। जिस दिन तुमसे भी दो बातें हो जातीं, दिन-भर इतराता फिरता।’

‘क्या तुम्हें पता है कि मैं भी मन- ही- मन तुम्हें कितना चाहती और इंतजार करती रही कि तुम कमरे में आओ तो सिर्फ मुझसे बातें करो। अपनी उन नजरों को बखानो जो मुझे इतना परेशान करती और गुदगुदाती रहती हैं। प्यार है कि नहीं है, के ज्वार-भाटे में झुलाती रहती हैं।’

‘हर प्यार कह देने या पा लेने को नहीं किया जाता पगली! कभी-कभी प्यार को सारी तीव्रता समेत मन में रख लेना ही असली प्यार है। जता दिया जाकर अपनाया नहीं जाएगा, तो दिलों में धुआँता, जिंदगी में दूषण फैलाता रहेगा। तुम्हारा एक ऑरा था- इंटेलिजेंट, सिंसियर, सलीकेदार इंजीनियर का। ऑफिस के सबसे पॉपुलर ऑफिसरों में थी, सांस्कृतिक कार्यक्रमों में जमकर हिस्सेदारी करती थी, इतनी अच्छी ऐक्टिंग करती थी… मंच पर तुम्हें देखकर मेरी धड़कनें रुक जाती थीं। तुम्हें सराहता, साथ की इच्छा तो करता था पर लगता था कि भागदौड़ और तमाम जिम्मेदारियों भरी अपनी जिंदगी में अगर तुम्हें ले आऊँगा, अपनाऊँगा तो बर्बाद भले कर दूँ, आबाद नहीं कर पाऊँगा। तुम्हें लगातार विकसित होते रहने को जो वातावरण चाहिए, वह मैं दे नहीं पाऊँगा। इसीलिए यही ठीक है- प्यार करना पर मन में ही रखना.. और फिर जो कहा नहीं गया, वह प्यार, क्या प्यार नहीं होता?’ वह मुस्कराती आँखों के साथ कह रहा है।

‘बोल देते तो दो कुँवारे, जो तब तक किसी से कमिटेड नहीं थे, साथ- साथ घूमते- भटकते- लिखते-पढ़ते…पहाड़ पर बैठकर सूरज का उगना-डूबना देखते, गाने सुनते… क्या पता प्रेम- पत्र भी लिखते!’, मान्या हँस रही है। अजित भी हँस रहा है। 

 ‘मेरे पति को यही शिकायत रही कि मैंने कभी कहा ही नहीं कि मुझे उनसे प्यार है, तो वे जानते कैसे? इसीलिए वे किसी न किसी और से प्यार करते रहे- उनसे, जो दिन में कई-कई बार कहती, लिखकर जताती रहीं कि प्यार है, प्यार है, प्यार है…मैंने कभी जताया नहीं कि वे कितने अच्छे हैं तो उन्हें लगा, मैं मन में उन्हें बुरा समझती हूँ।’ वह आँखों में भर आए आँसुओं के बावजूद मुस्कराकर बोली, ‘अब सोचो कि शब्द ही सबकुछ हैं? क्या प्यार का बार- बार उचार ही अंदर से समृद्ध कर सकता है? खुद को पूरे- का- पूरा दे देना, भावों से, कर्मों से, बिन शब्दों के समझा देना- कुछ नहीं? क्या बिन-बोला इजहार अर्थहीन है?!’ 

अजित यह सुनकर हँसने लगा। मान्या रोने लगी ।

उसे रोती देख वह एकदम से सीरियस हो गया।

 

तीसरा दिन

अतीत के काले बादलों को पछाड़कर बाहर निकल आया चाँद!

‘हाँ, अजित, शादी तो की, पर जल्द ही विधवा हो गई। और वो भी ऐसे कि विधवा हुई तो साथ रोने तक को कोई नहीं था- न दोस्त, न परिवार, न समाज! किसी को पता जो न चला कि मैं विधवा हो चुकी हूँ। मेरा सबकुछ बे-आवाज़ टूटा और मैं आज तक अपने घर के बिखरे टुकड़े चुनती जीती हूँ… कि जैसे नियति ने कहा कि तुमने अपने चाहने वालों का दिल – मजबूरन ही सही – बार-बार तोड़ा है, उन्हें अपनाने से – भारी मन से, मजबूरी में सही – इनकार किया है, तो अब टूटे दिल से जीना तुम्हारी नियति होगी। तुम्हारी जिंदगी एक ऐसी जिंदगी होगी जिसमें प्यार की खोज होगी, तड़पन होगी और होगी प्यार के अहसास को पकड़ने की अनवरत कोशिश। इसी कोशिश में तुम बूढ़ी होकर मर जाओगी, पर उफनते-बरसते प्यार में कभी नहा न पाओगी। प्यार तुम्हें अंत तक छकाता रहेगा। क्य़ा तुम समझ सकते हो ऐसे जीना कितना मुश्किल है? कि आप अंदर से दुख में डूबे हों पर आपको सुख का अभिनय करते जीना पड़े, अंदर रेगिस्तान में अंधड़ चलता हो पर बाहर वासंती बयार दिखानी पड़े, दिमाग की नसें तनती हों पर मुस्कराना पड़े, कि आप…’

मान्या की आँखों में आँसू देख, अजित की आँखें भी भीग गईं। वह उठा और चला गया। 

मान्या को अपने आँसू दिखाना नहीं चाहता।

नि:शब्द समानुभूति भी प्यार है- मान्या ने सोचा।

 

 पाँचवाँ दिन

चाँद अंदर चमकता है !

पता नहीं किस दोस्त की कार उठा लाया था अजित! खूब घुमाया, तेज-तेज गाने सुनाए – गाकर, तो सी.डी. से भी। मसखरा बना हँसाता रहा। फिर अचानक से मान्या को छेड़ता-सा बोला-

‘मैं पिघला हुआ चाँद हूँ, मुझे पी लो’।

‘मैं फटा हुआ दिल हूँ, मुझे सी लो’, मान्या ने चुहल लौटाया।

‘मैं सुबह की ओर बढ़ती रात हूँ’, अजित ने कहा तो मान्या ने जड़ दिया-

’मैं खत्म हो चुकी बात हूँ’ 

‘नहीं, बात अभी बाकी है’, मान्या के कहे को अजित ने उलट दिया।

‘रात अभी बाकी है’ अजित की ओर मुड़कर हँसती हुई मान्या ने भी फिल्मी लाइन उचार दी।

दो जोड़ी होंठ एक-साथ मुस्कराते, एक दिल में बदल जाते है।

टी ब्रेक, लंच ब्रेक से शुरू करके अब शामें भी साथ गुजरने लगी हैं। बीच के पंद्रह सालों को सारे अनुभव बाँटकर पाट लिया गया। एक हल्केपन ने मान्या को घेर लिया – जैसे न किसी अतीत का बोझ हो, न भविष्य की चिंता! न विधवापन किसी लाश-सा कंधे पर लदा हो, जिसे उठाकर चलने की मजबूरी हो; न ही परंपरा का कोई अदृश्य परदा सिर पर डला हो।

 ‘मैं कोई भ्रम नहीं हूँ। मैं सचमुच सामने हूँ। तुम्हें प्यार करता हूँ, तुम्हें अपना सकता हूँ।’- 

अजित ने कहा, तो सीढ़ियाँ चढ़ती मान्या ठिठक गई, फिर मुस्करा दी।

 अजित ने धीमे से पूछा-

‘क्या मैं तुम्हें चूम सकता हूँ?’

‘नहीं’, दृढ़ता से बोल कर मान्या झटके से कमरे में घुस गई।

 बिस्तर पर लेटी तो उसके होठों पर अजित के होंठ चिपके हुए थे। वह मसल रहा था, चूस रहा था, निशान बना रहा था गालों पर। अभ्यास बहुत पुराना है, पर संकोच नया। नहीं, संकोच बहुत पुराना है, अभ्यास नया… बेशर्मी की आदत जो नहीं ठहरी! इस आलिंगन में बाहुपाश कुछ ज्यादा कसे हैं, ताकत के इस्तेमाल की तरह! इसमें वो कोमलता नहीं जिसकी वह आदी रही है, पर होंठ फिर भी थरथरा रहे हैं। शरीर में कोई लहर दौड़ती है जैसे, और बिजली होंठों से शुरू होकर पाँवों के तलवों में समा जाती है। वह होठों पर पिला हुआ है- मानो अभी, इसी क्षण, उसके सारे वजूद को होठों की मार्फत पी लेगा। वह प्रतिदान नहीं दे पाती। उसके लिए चुंबन लेने- देने की इच्छा, दुलार में सने नाजुक-नाजुक होठों की छुअन है, जैसे कोई संगीत बजाता हो आत्मा में! शरीर के तारों को इस उम्मीद के साथ हौले- हौले छेड़ा जाता हो कि उनमें से राग-रागिनियाँ निकलेंगी।

अगले दिन उसे देख अजित स्वाभाविक तरीके से मुस्कराया तो मान्या एकदम से शर्मा गई। फिर अचकचाकर महसूसा कि अजित ने असल में चूमा थोड़े था, वह तो इनकार सुनकर दरवाजे पर से ही चला गया था!

 

आठवाँ दिन

अंदर पूर्णिमा में बदलता जाता है चाँद!

वे टहल रहे हैं। पेड़ों की छाँह भरे घुमावदार, साफ-सुथरे रास्तों पर, जहाँ पेड़ों से झरे पीले पत्ते बिछे हैं। अतीत सूख-झरकर नीचे बिछ गया है? मान्या पूछना चाहती है। अगले सेशन का समय हो रहा है। अजित कह रहा है-

‘हम अलग रास्तों पर निकल गए थे, पर नियति ने हमें फिर से मिला दिया। एक तुम – लहूलुहान दिल की विधवा; एक मैं – बिना विवाह, लंबे रिश्ते से गुजर, प्रेमिका से अलग हो चुका कुँवारा। तो वीराना झेल रहे, आधे- अधूरे जी रहे दो दिल अब मिलकर एक हो सकते हैं। हमारे दिल में फिर से फूल खिल सकते हैं… अंदर उदास-उदास सोया, मर-सा गया है जो, वह जी उठ सकता है।’

मान्या की आँखों में सपने भरने लगे। उसे अपलक देखता अजित ठिठक कर रुक गया और पूछा- ‘क्या मैं तुम्हें बाँहों में ले सकता हूँ?’

‘नहीं,’ वह फिर से दृढ़ता से बोलकर क्लास रूम की ओर मुड़ने लगी। उसकी आँखों में आँसू देख अजित ने रूमाल बढ़ाया, तो मान्या ने उससे रुमाल लेकर आँसू पोंछ लिए।

उस रात मान्या को लगा जैसे किसी ने उसे बाँहों में कस रखा है। जोर आजमाइश करने पर भी वह निकल नहीं पाती। मर्दाने ताकत का यह इस्तेमाल बहुत लुभाता है। वह निकलने को जोर लगाती, अपेक्षा में हँसती है… वह ले लिए जाने के खेल में हार जाना चाहती है। उसने अचानक पाया कि वह तो ट्रेनिंग हॉस्टल के अपने कमरे में, बिस्तर पर अकेली आहें भरती रो रही है। फिर उसने आँसू पोंछकर घड़ी देखी। सिर्फ साढ़े नौ बजे थे। उसने घर फोन मिलाया।

बेटे ने छेड़ा, ‘ठीक से पढ़ रही हो न ममा?’ 

वह हँस दी। बेटे और बेटी से बातें करके कुछ क्षणों के लिए दिल हल्का हो गया। 

 

नवाँ दिन

चाँद पिघलकर वज़ूद में समाता जाता है!

अजित कुछ से कुछ होता जा रहा था मन में। 

वह उसका पिता था- उसके आँसुओं के प्रवाह को देखता, उसका दुख महसूसता, निदान खोजता।

वह उसका पति था- बाँहों में लेकर शब्दों, स्पर्शों और आश्वस्ति भरी थपकियों से दुख पर मलहम लगाता।

वह उसका पुत्र था- गुदगुदाकर हँसाने की भोली कोशिश करता, मानो हँसते ही दुख गल जाएगा।

‘मैं तुम्हारा पति नहीं हूँ’, वह फुसफुसाया, ‘इसीलिए चूमने तक नहीं देती- जैसे जूठी हो जाओगी!’ 

 ‘हाँ शायद।’ मान्या खोई- खोई-सी बोल रही है। ‘मैं स्त्री-पुरुष के रिश्ते को बहुत नाजुक, पवित्र समझती जीती रही हूँ। भावनाओं से जुड़ा कोई रेशमी अहसास, नाजुक डोर या पारदर्शी भंगुर-सा काँच, जिससे छेड़छाड़ उसे तोड़ सकता है। एक बार टूट गया तो फिर जोड़ने की कोशिश ही बेमानी है क्योंकि टूटी किरचों को जोड़ने की कोशिश बस हाथों को लहूलुहान करेगी, टूटा रिश्ता या टूटा दिल जोड़ न सकेगी।’

अजित सहमति में मुस्कराया है।

न पिता, न पति, न पुत्र – मान्या ने सोचा- अजित, तुम सिर्फ और सिर्फ एक पुरुष हो, जिसने मेरे अंदर सोई स्त्री को फिर से जगा दिया है। अपने जिंदा होने को भूल चुकी एक विधवा को याद दिला दिया है कि उसका भी एक दिल है- धड़कता, प्यार पाने को तड़पता, मचलता!! दिल पर पड़ी दुख की तमाम परतों को उघाड़कर रख देते पुरुष हो तुम, जो एक औरत के दिल की नंगी चाहतों का जश्न मना रहे हो!

 

दसवाँ दिन

अंदर बस चुकी चाँदनी में एकाकार है दिल!

मान्या के दिल के अंदर बसे घर के पाँव निकल आए और घर दीवारों समेत दूर चला जाकर, एकदम से खो-बिला गया कहीं! घर में पति पहले से अनुपस्थित थे, अब वहाँ उपस्थित बच्चों का लिहाज भी नहीं रहा।

घर की दीवारों के गल जाने और हवा हो जाने का जश्न मान्या मना रही थी। घर के हवा हो जाने से उसे बाहर की सुगंधित हवा सूँघने, उनमें साँसें लेने और दौड़ लगाने की पूरी आजादी मिल गई थी। अंदर- अंदर मन के बंधन टूट गए। लगा, वही हमेशा मन को बाँधे क्यों रहे, जब साथ रहते भी पति ने कभी नहीं बाँधा था!

जब निकल ही आए उन दीवारों के पाँव, जिन्हें घर कहती थी, तो बे-आवाज गायब हो चुके घर से खुद को बाहर निकाल ले जाने का इंतजार कब तक करूँ? दीवारों के फिर से वापस आने, घर बन जाने के इंतजार में क्या एक ही जगह खड़ी रहूँ?  कब तक एकाकी, नियति से लड़ती-जूझती विधवा बनी जीती रहूँ? क्यों न कह दूँ अजित से मन की बात? उसने मेरे दिल की मसली कली को जाने किस जादू से फिर से खिला दिया है। अब महकी-महकी जीती हूँ मैं! शादी से पहले जिंदगी में आए हर प्यार को, अपनाने की स्थिति नहीं बनती देख, अजित की तरह ही दिल पर पत्थर ऱख मैंने भी ठुकराया था। शादी के बाद मैंने अपना सारा प्यार पति पर लुटाया और बदले में उनसे धोखा ही धोखा पाया। वे प्यार के बदले सौंपते रहे सर पर अपनी नई-नई प्रेमिकाएँ! नए, अनूठे लगते हर सुगंधित फूल को सूँघा, फिर चल दिए आगे। किस्मत कि उन्हें नए- नए फूलों की कभी कमी नहीं रही। पत्नी थी तो घर की हर सुविधा-सुरक्षा थी, साथ ही बाहर नए फूलों की आसानी से आमद भी! फूल- जिनके बारे में वे जानते थे कि इनकी सुगंध स्थाई नहीं हो सकती, इतना घनीभूत भी नहीं हो सकती कि घर में बदल जाए!!

अजित, मैं तुम्हें बहुत- बहुत चाहने लगी हूँ।  

एक मेरे पति- जो कभी मेरे नहीं हो सके; और एक तुम- इतने मेरे कि सालों तक किसी और को चाहने, उसी का हो जाने की कोशिश करके हार चुके, मुझे अपना लेने को इतने व्यग्र-उत्सुक! 

मुझे प्यार करने का हक है क्योंकि मैं एक विधवा का अभिशप्त जीवन जीना नहीं चाहती।

सच्चा प्रेम लगातार प्रेम में बने रहने की एकरस अनुभूति है। उफान, इन्फैचुएशन(प्रेमोन्माद) और आकर्षण की लहर तो आती-जाती, लीलती, फिर पटक देती है। ऐसे भंगुर प्रेम की बजाय किसी शांत पानी की सतह पर आँखें मूँदे लेटे क्यों न गुजार दें जीवन!.. और वह शांत पानी, जिसमें भरोसे और विश्वास के कमल खिलते हैं, तुम हो सकते हो। 

 

ग्यारहवाँ दिन

चाँदनी से पूरा जगमगा गया अंतस्! 

अजित, तुमने मरे हुए को जिला दिया। होठों पर अमृत की बूँदें धर दीं- थैंक्यू।

सुबह सबों के साथ हॉस्टल से क्लास के लिए बाहर निकलते उसने कहना चाहा।

प्रेम कभी बर्बाद नहीं करता, आबाद करता है। वह विध्वंस नहीं, सृजन है।

लव इज कन्स्ट्रक्शन, नॉट डिस्ट्रक्शन।(प्रेम निर्माण है, विध्वंस नहीं।)

कहते हैं न कि प्यार किसी के साथ से खुद को पूरा महसूसने का नाम नहीं, अपना पूरापन किसी और के साथ बाँटने का नाम है।   

पति प्यार के नाम पर भावनाओं की उन लहरों में समाए रहे, जिनके बिखरने पर टूटे भरोसे का कीचड़, टूटे विश्वास की सीपियाँ बिखरी मिलीं। वे प्यार के नाम पर जहरीले रिश्तों में उलझे मुझे लगातार तोड़ते रहे, अजित तुम भरोसे-विश्वास की जड़ जमाकर उस टूटे हुए को फिर से जोड़ोगे।

 

बारहवाँ दिन

अंदर उगे सवालों के काले बादल चाँद को ढक रहे हैं।

शाम है। सब बाजार में भीड़ किए खड़े हैं। इस शहर आए हैं तो पत्नी-बच्चों के लिए कुछ लेकर ही वापस जाएँगे।

‘तुम कुछ लोगी?’ अजित पूछ रहा है।

 मान्या वहाँ है ही कहाँ! वह तो अजित से सटी-सटी किसी दूसरी दुनिया की सैर पर है।

अजित अब बच्चों की बात पूछ रहा है।

 मान्या बताकर खुश हो जा रही है।

पूरी तरह खुद पर निर्भर, नन्हीं-सी जानों को बढ़ते, विकसित होते, खिलते-हँसते देखने का सुख, सिर्फ निज के सुख में डूबा, पत्नी-बच्चों को भाड़ में झोंककर बाहर प्यार कर रहा कोई स्वार्थी पति क्या जाने? क्या जाने किसी से भरोसा और विश्वास नहीं तोड़ने का सुख! बच्चों ने उसे बचा लिया, वरना…

वह विस्तार से बता रही है बेटे और बेटी की बातें; उनके सपने, कारस्तानियाँ, माँ पर भरोसा.. माँ से दोस्ताना रिश्ता। कैसे वे माँ को जब-तब दुख से उबार हँसा देते हैं। वे झिलमिलाता भविष्य हैं, जो मान्या को बाँधे रखते हैं।

अजित बहुत दिलचस्पी से सुन रहा है। अजित की दिलचस्पी उसे अपना लेने की बात पर मुहर लगाने की बजाय मान्या के मन में दुविधा जगा रही है। क्यों? वह समझ नहीं पाती! क्या वह बच्चों को किसी से बाँटना नहीं चाहती? वह बच्चों और अपने बीच किसी को आने देना नहीं चाहती? इतना प्यार करने वाले अजित को भी नहीं?? 

मान्या की वह दुनिया जिसमें अजित पूरी तरह समाया हुआ था, अनचाहे दरकने लगी।

खोना, छोड़ देना ही कई बार असली प्यार है – क्या अजित सच कह रहा था?

उस रात बार- बार जागती रही।

आगा- पीछा सोचने को मजबूर करने, चेतावनियाँ देने वाला प्रेम क्या ओछा- छोटा प्रेम होता है?

 

तेरहवाँ दिन

चले मत जाना मेरे चाँद! 

साथ के बस दो दिन और।

एक आज और एक कल।

सपनों को जीने-पीने के बस दो दिन और… अड़तालीस घंटे। कितने सेकेंड?

अजित एक झिलमिल-झिलमिल जादू है!

दे दिया उसने खुद को पूरे का पूरा, साथ की कामना जता दी और करता जा रहा है मेरे जवाब का इंतजार।

हताश हाल विधवा बने जीते लगता है कि जब मैंने जी ही नहीं, तो जिंदगी के इतने साल खत्म कैसे हो गए! मानो धन था कोई, जिसे नहीं खर्चे जाने की स्थिति में, जस-का-तस बने रहना चाहिए था। बढ़ना नहीं, तो घटना भी नहीं चाहिए था; पर वह अनजाने में बिन खर्चे ही खत्म हो गया।

अजित, मुझे एक बार बाँहों में लेकर चूम लो – गहरे,गहरे!

एक बार बाँहों में लेकर पिघला दो।

बस एक बार, बस एक बार…पर अजित कहेगा – बस एक बार क्यों, बार-बार क्यों नहीं?  सिर्फ आज क्यों, हर रोज क्यों नहीं?

 

 चौदहवाँ दिन

दुविधा के जल में डूबता, गायब होता जाता है चाँद!

 मान्या के मन की दुविधा गहरी होती जा रही है। रिश्तों की कई डोरों से गोल- गोल, ऊपर से नीचे तक बँधी जीती रही है वह! डोरों के जाने कितने सिरे बाहर हैं, जिन्हें कई-कई हाथ पकड़े खड़े हैं- दो सिरे दोनों बच्चों के हाथों में, एक सिरा माँ, कई सिरे मित्रों-रिश्तेदारों-पड़ोसियों-पहचान के लोगों के हाथों में तो एक सिरा जैसे किसी जादू से अदृश्य पति के हाथों में भी! वे सब जो उसे प्यार करते हैं, उसे रिश्तों की डोर तोड़ डालने से रोक रहे हैं। प्यार नहीं करने वाले पति भी? मैं इतनी सारी मोटी- मोटी रस्सियाँ कैसे काटूँ?- मान्या सोचती है। क्या अजित मुझे लहूलुहान किए बिना, उन रस्सियों से अलग कर पाएगा जो अंदर- अंदर मेरे पूरे वजूद, मेरे मन को बाँधे हैं? क्या मैं अपने पूरे वजूद में रचे-बसे एक घर से अलग हो, कोई नया घर रच भी पाऊँगी?

 

पंद्रहवाँ दिन

गायब होते, अमावस्या में बदलते चाँद को पकड़कर रोक लो कोई!

सुबह से उलझी थी। अजित से बात करने तक से बचती रही। 

अब रात हो गई। 

अब कहना होगा।

कोई फैसला लेना होगा।

आज रात आखिरी बार मिलेंगे या कि अब हर रात मिलेंगे?

कल सुबह उड़ जाना है अपने बसेरे, इसीलिए तो अजित दरवाजा खटखटाकर उसे थोड़ी देर नीचे लॉन में पड़ी कुर्सियों पर चल बैठने का निमंत्रण दे रहा है। वह वहीं तो थी- कुछ देर पहले तक!

जागी हुई है, तो इनकार क्या करना!

 ट्रेनिंग हॉस्टल की ये आखिरी यादगार रात, साथ-साथ जीते हुए, कर लेते हैं दिल की अनकही बात!

सबकुछ छोड़, हर बंधन तोड़ इस चाँद को अपना लेने, अपना जीवन सजा लेने की चाहत की बात?!

प्रेम क्या हमेशा नियति के विरूद्ध एक हारी हुई लड़ाई है?

पा लिया, तो भी किसी अधूरेपन से जूझते, और-और माँगते रहे, नहीं पाया तो अधूरापन लिए, पूरेपन की चाह में भटकते रहे, भटकते रहे??

क्या पति का कहना सही था कि मैं उन रद्दी लोगों में से हूँ, जो प्रेम कर ही नहीं सकते? प्रेम-पत्र लिख ही नहीं सकते? सचमुच?? 

नहीं, मैं तो प्रेम करने और अपना कर आगे बढ़ जाने की हिम्मत जुटा सकती हूँ!

कुछ चमकीली चाहतें हैं, जो आगे खींचती हैं।

कोई डोर है, जो पीछे खींचती है।

कुछ सवाल उग रहे हैं मन में।

अजित से प्रेम सृजन के साथ विध्वंस भी ला सकता है- मान्या को सुख देकर, उसकी जिंदगी से जुड़े, उसे प्रिय कइयों को दुख दे सकता है, तब भी वह अपनाने लायक है क्या?

किसी ने उसे अपने अंदर ही थप्पड़ मार दिया। क्यों नहीं, क्यों नहीं आखिर? पति ने कभी सोचा था यह? हर बार बिना गिल्ट, पत्नी-बच्चों की भावनाओं, सुविधा-असुविधा, मान-अपमान का खयाल किए बिना चल पड़ता रहा न निज सुख की खोज में?

आखिर कब तक अपनी ही लाश उठाए जीते रहें अभिशप्त जीवन?? 

 

ये चाँद कोई भ्रम तो नहीं!

अजित और मान्या कुर्सियों पर बैठ गए- आमने-सामने।

ओह! अजित उसके ठीक बगल में उसका हाथ अपने हाथों में लेकर क्यों नहीं बैठता?

कुछ पलों की चुप्पी जब सीने पर रखा पहाड़ बन जाए तो बोलना पड़ता है।

मान्या की आवाज किसी दूसरी दुनिया से जबरन खींच लाई गई। वह अब भी खोई-सी थी।

‘कुछ कहना चाहती हूँ अजित!’

अजित की मुस्कराहट ने हामी का संकेत दिया, तो मान्या ने हिम्मत जुटाई-

‘दो आत्मनिर्भर लोगों के साथ में, मेरे जाने- सिर्फ और सिर्फ दिल का रिश्ता होता है, जो उन्हें बाँधे रख सकता है। अगर पति का दिल कहीं और उलझा हो, जानते- बूझते पत्नी का दिल तोड़ता, उसका मान नहीं रखता हो, तो विवाह का रिश्ता मर जाता है और पत्नी, पति के जीवित रहते भी अहसासों में विधवा हो जाती है- जैसे मैं हो गई हूँ।’

वह एक पल रुकी कि अजित कहीं चौंका तो नहीं! पर वह चौंके बिना, सिर्फ कानों से नहीं, आँखों-अहसासों-साँसों-रोमछिद्रों तक से सुन रहा था- एकाग्र! मान्या आश्वस्त होकर आगे बोली-

‘ऐसे घर में रहती हूँ जहाँ पति होते हुए भी नहीं है- मानो वह मर चुका है पत्नी के लिए… और पत्नी की नियति कि वह मरे हुए रिश्ते की लाश सर पर उठाए विधवा बनी जीती रहे! आदित्य से विवाह मेरा फैसला था, इसीलिए विवाह की कठिनाइयाँ, उलझनें, तमाम सुख- दुख, मुझ अकेली के ही हुए! अब ऐसे विधवापने की बात किससे-कैसे कहती, कौन समझता? और जब कहा ही नहीं, तो साथ रोता कौन? तुम मेरे सखा, तुम वह- जो सोच में मेरा ही आईना- इसीलिए कह पाई तुमसे… तुम समझ रहे हो न! आदित्य जाने शैतान है या देवता कि अपनी किसी भी करनी का उस पर कोई असर ही नहीं होता। वह मेरी भावनाओं का खून भी करता है तो बिना किसी पछतावा! उनका चेहरा हरदम मुस्कराता रहता है। उसे मेरा कुछ नहीं छूता – दुख-दर्द, मान-अपमान, शारीरिक-मानसिक-भावनात्मक तकलीफें… कुछ भी नहीं!! इसके उलट प्रेमिका के दुखों की आशंका तक उसकी आँखें नम कर देती है। प्रेमिका के आँसू उसे सोने नहीं देते…उसके प्यार की प्रतीक्षा मेरी, पर उसका प्यार किसी और का… मेरे हिस्से घर-गृहस्थी और उसके हिस्से प्रेमिकाओं के प्रेम-पत्र…रातों का इंतजार मेरा और उसकी रातें किसी और के खयालों को समर्पित! मैं उसके साथ रहती हूँ, पर न उससे प्यार कर पाती हूँ, न घृणा। झूलती रहती हूँ प्यार और घृणा के बीच। ये विधवापन मेरे व्यक्तित्व में ऐसे समा गया है कि मैं…

इसीलिए जब तुम मिले और तुमने उड़ेल दिया इतना सारा प्यार मुझ पर, तो मैं कुछ से कुछ हो गई। मैं पूरी तरह तुम्हारी ही हो जाना चाहती हूँ अजित! मैं बच्चों और तुम्हारे साथ फिर से जिंदगी जीना शुरू करना चाहती हूँ, पर अंदर कुछ है जो बाधा बन रहा है। पहले लगता था कि अपनाए जाने के इंतजार में खड़ा एक दिल हूँ, फिर से सधवा होने के इंतजार में खड़ी विधवा; पर अब जब तुम मिल चुके तो मन में ऐसे सवालों से घिर रही हूँ, जिनके जवाब मुझे मालूम नहीं।

क्या घर छोड़ दूँगी तो कल को बच्चे मुझसे ये पूछेंगे कि मैंने अपने, सिर्फ अपने सुख के लिए घर क्यों छोड़ दिया? या नहीं छोड़ूँगी तो ये कि क्यों सहती रही सबकुछ और तब भी घर छोड़ क्यों नहीं दिया?? 

अजित, मैं सारे बंधन तोड़कर तुम तक आना चाहती हूँ, मैं तुम्हें अपना लेना चाहती हूँ…’

लगातार बोल रही मान्या अचानक से चुप हो गई, तो अजित उठकर खड़ा हो गया। बेचैनी में टहलने लगा। नम आँखें लिए, बिना कुछ बोले सीढ़ियों की ओर बढ़ चला।

अजित अब सीढ़ियाँ चढ़ रहा है। जवाब दिए बिना लौटकर जा रहा है। मान्या की साँसे रुक गई हैं।

 

चाँद हकीकत था! 

अजित मुड़ा। वह सीढ़ियाँ उतरता वापस आ रहा है। वह आँसू पोंछकर ठंढी साँसें लेता मुस्कराया है। मान्या की साँसें वापस आ रही हैं।

अजित की मुस्कान पारदर्शी है। 

‘तुम संकोच में हो मानो तुमने कोई तथ्य छुपाया पर अब मजबूरी में उस रहस्य का खुलासा करना पड़ रहा है…पर नहीं मान्या, मैं तो पहले दिन से संदेह में था, और वह संदेह दिनों- दिन पुख्ता होता जा रहा था। बिना किसी विवाह चिह्न, सादी साज-सज्जा तो तुम्हारी पुरानी धज है  पर पिछले पंद्रह दिनों से तुम्हारा हर आचरण चीख-चीखकर कह रहा था कि तुम्हारा मन कहीं  बँधा है, तुम लड़ रही हो खुद से, उस बंधन से बाहर आ पाने को… अपनी सारी रूमानियत, मुझे  पाने-छूने की इतनी सारी अनकही कोशिशों के बावजूद सफल नहीं हो पा रही हो.. कोई है जो आड़ बनकर सामने आ खड़ा होता है और तुम अपनी चाहतों को परदे के पीछे कर लेने को मजबूर हो जाती हो। पर सोचो कि तुम्हारा मन अगर तुम्हें अपनी एकनिष्ठता बनाए रखने को उकसाता है तो इस नैसर्गिक गुण पर शर्मिंदा क्यों होना चाहिए तुम्हें? तुम तो किसी भी पुरुष के लिए प्राइज़ कैच हो मान्या… आश्चर्य कि तुम्हारे पति ने तुम्हें मान देने की बजाय तुमसे धोखा किया।

… और रही मेरी बात, तो मैं इस हारी हुई, परिस्थितियों के आगे समर्पण कर चुकी मान्या को नहीं अपना सकता। इस मान्या को मैं पहचानता तक नहीं! मैं तो उस मान्या को प्यार करता हूँ, जो परिस्थितियों के आगे घुटने टेक बैठ नहीं जाती, अपनी जिंदगी पर अपना अधिकार छोड़ती नहीं। आश्चर्य कि तुम सालों से चुपचाप सहती रही! तुमने आदित्य को उसकी जगह दिखा क्यों नहीं दी? कह क्यों नहीं दिया कि वह शादी में बना रहता यह नहीं कर सकता- उसे चुनना ही होगा, शादी में पत्नी का प्यार या शादी छोड़कर बाहर कहीं प्यार… या तो तुम्हारा सही अर्थों में साथ, या अलगाव!  जता क्यों नहीं दिया कि बेवफाई सहते, साथ रह जाने वालों में तुम नहीं!

… तुम अब भी मुझतक आ सकती हो। तुम्हारा मेरी जिंदगी में हमेशा स्वागत है, पर शादी के रिश्ते को सुलझाकर सही परिणति तक ले आने के बाद! अगर तुम आदित्य को उसकी सही जगह दिखा देती, उसे छोड़ने का फैसला मुँह पर सुना चुकी होती, तो बाँहें पसारकर बच्चों समेत तुम्हें अपना लेता!! पर एक उलझी स्थिति नहीं सुलझा पाने के कारण दुविधाग्रस्त मन से, जाने कितने उलझे तार मन-ही-मन आदित्य और अतीत से जोड़े-जोड़े तुम मुझ तक आओगी तो पूरे मन से नया रिश्ता कैसे बनाओगी? और ऐसी कोशिश तुम्हें करनी ही क्यों चाहिए?

प्यार छीनकर नहीं लिया जा सकता पर न्याय लिया जा सकता है।

आज रिश्तों के फैसले की रात नहीं, आज ताकत बटोरने, फैसला करने का निर्णय ले लेने की रात है। मैं तुम्हें ताकतवर देखना चाहता हूँ, जैसी कि तुम अतीत में रही हो। इस निर्णयदुर्बल, भावनात्मक रूप से कमजोर मान्या से मेरा कोई परिचय नहीं है। तुम फिर से वही मान्या बनकर मेरे सामने आओ, जो मुझे अपील करती रही है। वह मान्या कोई अन्याय नहीं सहती… वह अपने फैसले बिना दुविधा लेती है।

मान्या, अब बंद करो ये रोना-धोना..ये आत्मदया और प्रताड़ित जीवन वाली स्क्रिप्ट बदल डालो यार! एक बार मजबूत बनकर आदित्य को उसकी सही जगह दिखा दो। लिव टु योर ट्रू सेल्फ ( अपनी आंतरिक स्व को पहचानो) …तुम यह कर सकती हो।

उसे खींचकर सही राह पर वापस ले आओ या फिर धक्के देकर बाहर का रास्ता दिखाओ। भाड़ में जाने दो, अपनी जिंदगी अपने तरीके से जिओ, छोड़ो इस स्यापे को… और फिर पति के प्यार के सिवा भी तुम्हारी जिंदगी में इतना कुछ तो है जो तुम्हें खुशी दे सकता है! तुम बहुत सारे गुणों से भरपूर महिला हो। आश्चर्य, कि तुम्हें कुछ नजर ही नहीं आता? सुना नहीं है तुमने -‘और भी गम हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा..’ 

अजित ने कुछ क्षणों के मौन के बाद पास आकर मान्या का कंधा थपथपाते मुस्कराकर कहा। 

‘पगली, तुम्हारी दुविधा मैं समझता हूँ। जो किसी और का हो, उसे छल से छीनकर अपनाने या हड़पने की नीयत नहीं रखता। बँटे मन से पास आने वाले का स्वागत भी नहीं कर पाता..पर मैं इंतजार को तैयार हूँ। अगर आदित्य ने अलग होना ही उचित समझा तो रोकना मत, बिना किसी दुविधा मेरे पास चली आना; पर अगर उसने सबकुछ छोड़ तुम्हारे पास लौटने, तुम्हें फिर से सही अर्थों में अपना लेने का फैसला किया तो सिर्फ इस कारण मेरे पास मत चली आना कि मैं इंतजार में हूँ। उस स्थिति में तुम्हारी खुशी ही मुझे सुख में इतना सराबोर कर देगी कि मैं यह सोचूँगा तक नहीं कि तुम मेरी क्यों नहीं हो पाई! 

चलो, वादा करो कि जिस काबिलियत से ऑफिस के काम करती हो, उसी काबिलियत से अपनी जिंदगी भी मैनिज कर लोगी। फिर से लिखोगी अपनी जिंदगी की कहानी और अगली बार जब हम मिलेंगे तो आँसुओं की धार की जगह अपनी हँसी के फव्वारों से मुझे नहलाओगी। अभी घर जाओ और अच्छी तरह सोचो। ट्रीट योरसेल्फ वाइज़ली, यू डिजर्व इट।(खुद से अच्छा बर्ताव करो, यह तुम्हारा पावना है।) ये रोने-धोने, जिंदगी को स्यापे की तरह जीने की स्क्रिप्ट अगर खुद या बच्चों के लिए नहीं बदल सकती, तो मेरे लिए बदलो यार!! मैं तुम्हें तुम्हारी सारी दुनिया, सारे दुखों-सपनों समेत अपना सकता हूँ, पर तुम्हारे सुखों की खातिर तुम्हें अपनी ही दुनिया में छोड़ देने को तैयार भी हूँ- देअरफॉर आई डिजर्व दिस ऑनर (मैं इस इज्जत का हकदार हूँ) …’ वह गहरी आँखों से मुस्कराता उसे देख रहा है। 

 

चाँद लुभाता है!

‘चलो उठो, आँसू पोंछो और मेरे पास आओ’ अजित ने कहा और मान्या को उठाकर एक पेड़ की छाँह में बाँहों के घेरे में ले लिया। 

मान्या खुले दिल से उससे लिपट गई। फिर कुछ क्षणों के बाद मुस्कराकर बोली –

 ‘तुम्हारी परफ्यूम मुझे बहुत पसंद है। आदित्य को पता है कि मैं सुगंध की दीवानी हूँ, पर  कभी परफ्यूम नहीं लगाता। अब तो खैर कभी मुझसे बात करता या मुझे छूता तक नहीं। आदित्य के साथ रहती बूढ़ी हो जाना मेरी ख्वाहिश रही पर उसने…और एक तुम मिले, जो मुझे ले लेने की बजाय कहते हो कि…’ अजित भी मुस्करा रहा है। मान्या ने फुसफुसाकर कहा- ‘क्या तुम्हें पता है कि तुम कितने खूबसूरत हो? तुम्हारा साँवला-बलिष्ठ शरीर, साफ दिल, सोच, समझदारी.. सब कॉम्प्लिमेंट देने के काबिल हैं अजित!’

अजित ने अपने होंठ उसके होठों पर रख दिए तो मान्या ने मना नहीं किया। यह चुंबन, रिश्तों के किसी घालमेल के बिना लिया-दिया जा रहा था। इसका स्वाद, इसकी थरथराहट मान्या की जिंदगी में बस जाने वाली थी। अजित से यह मुलाकात, उसका प्यार, उसकी बातें मान्या का  विवाहित जीवन बदल पाएँ या नहीं,  भविष्य में कुछ  कर गुजरने, अलग ढंग से सोचने-जीने को उसे उकसा जरूर रहे थे। जिंदगी अपने हाथों में ले लेने की चाह मन में फिर से उगने लगी थी। क्या सचमुच अजित से अगली मुलाकात तक वह मन से विधवा नहीं होगी? आदित्य को बदल नहीं भी पाए, तो खुद को बदल डाल अलग ढंग से खुशी खोजती, सुखी जिंदगी जी रही होगी?? 

एक-दूसरे को स्पर्शों से सान्त्वना देते वे बहुत देर तक उस पेड़ की अँधेरी छाँह में एक-दूसरे से लिपटे खड़े रहे- दिल और जीवन सँभालने के नुस्खे पीठ पर हाथ फेरकर एक-दूसरे को थमाते, आँखों से मुस्कराते, चुप होठों से बोलते!!

आखिरकार अजित ने बहुत सावधानी से उसे खुद से अलग कर दिया – मानो वह इतनी नाजुक है कि ताकत का थोड़ा भी इस्तेमाल उसे तोड़ डालेगा।

खुद से कुछ इंचों की दूरी पर खड़ा करके उसकी आँखों में झाँकते अजित ने पूछा-

‘क्या तुम इस चुंबन की बात किसी को बताओगी?’

‘हाँ, अगर रिश्ते सुधर गए, तो आदित्य को शायद…’ वह दुविधा के गलियारों से बाहर निकल, फिर से वहीं घुस जाती बोली। 

अजित हँसा और बिना कुछ बोले मुड़ गया। 

चाँद चला जा रहा है? नहीं, चाँद तो अपने अंदर है!

  सीढ़ियाँ चढ़ते, नजरों से गायब होते जाते उस चाँद को मान्या ने दूर से देखा और एक नई कसक से घिर आई। पूर्णिमा में बदल चुके इस चाँद को फिर से दूज का चाँद हो जाना था, पर अचानक वह किसी आश्वस्ति से घिर आई। चाँद तो पूरे का पूरा अंदर समा चुका था। धीमे कदमों से अपने कमरे की सीढ़ियाँ चढ़ती मान्या को लगा, कल सुबह हॉस्टल छोड़ते समय अजित से मिलना अब उससे हो नहीं पाएगा।

***

(कथाबिंब: मई 2014)

बीच में नदी

शाम का समय। ऋषिकेश में सुबह से बरसता आसमान, उन दोनों को पूरी तरह भिंगोकर चुप हो चुका। हल्की धूप निकल आई है। ढलती शाम की हल्की धूप- छांह में वे दोनों गंगा घाट पर बैठने को चौड़ी लाल सीढ़ियां चढ़ रहे हैं। ठंढ उन्हें कंपकपाती है। बहुत सिहरन है.. शरीर को बेध- बेध जाती हवा से लड़ते, कैप और कोट में खुद को कसते, वे सीढियां चढ़, बेंच पर बैठ गए। राम झूला उनकी बाईं ओर, सामने गीता भवन, दाएं नदी तट का दूर तक दिखता  सर्पिल विस्तार… पर ठीक सामने तो बहती नदी है- वेगपूर्ण, बीच-बीच में पसरे बालू के,  चौड़े- गोलाकार, छोटे- बड़े द्वीपों को समेटती। तट पर उजले पत्थरों के ढेर- यहां से वहां तक। फोटो खींच चुके, विडियो बना चुके। अब दोनों चुप बैठे निहार रहे हैं।

पति गीता भवन को, पत्नी गीता भवन को।

पति गीता भवन को; पत्नी- नदी, बालू, राम झूले, सीढ़ियों, धूप को.. 

पति गीता भवन को; पत्नी पीछे फुटबॉल खेलते बच्चों, बस स्टैंड, बहते पानी, उस पार के सारे भवनों, आश्रमों, आते- जाते सैलानियों.. सारे दृश्य को..

पति अब भी गीता भवन को; पत्नी जमीन, आसमान, नदी, पेड़, धारा, कैलास आश्रम, इस्कॉन टेंपल, ओंकारेश्वर आश्रम को..

‘सामने ही तो है-नदी पार करके चले जाते! पतली-सी तो है बीच की धारा.. बेकार ही लक्ष्मण झूला होते, पैदल चल- चल, भींग- भींग, थक- थका के परेशान हुए पहुंचे गीता भवन!’ पत्नी ने कहा.

‘हां’, खोए-से बोले पति । पत्नी चुप हो गई। फिर दो क्षण बाद, याद आने पर कि पत्नी कुछ कह रही है, पति ने कहा-

‘सोचा थोड़े था कि जहां ठहरे हैं, वहां से ठीक सामने होगा! पर भींग जाते- अगर नदी पार करते।’

‘अरे, मैं तो मजाक कर रही थी। देखो, धारा कितनी तेज है। क्या पता नदी यहां कितनी गहरी है? जाना तो उस पार से ही था। पर राम झूला से सीधे पहुंच जाते। उतना चलने की क्या जरुरत थी!’

‘हूं’ पति ने कहा। दोनों फिर से चुप हो गए।

पत्नी को पता था कि पति गीता भवन के उसी कमरे में अब भी बैठे हैं, जहां कुछ देर पहले थे- अपने ‘पहले प्रेम’ से मिलते हुए! पत्नी भले साथ थी, पर पति के जाने वह वहां नहीं थी। उसकी उपस्थिति तो वह पुल मात्र थी, जिसपर चढ़कर वे अतीत में उतर सकते थे। पत्नी नहीं होती तो ‘वह’ ठीक से बात नहीं कर पाती। शर्माती। पत्नी नहीं होती तो पति रिश्तेदारों भरे उसके घर में जाते हिचकते। पर पत्नी थी, इसीलिए ‘वे दोनों’ मिल पा रहे थे- पुल पर चढ़, उस ओर के अतीत में उतर पा रहे थे। पत्नी चली गई क्योंकि उसे ‘उस लड़की’ से कोई शिकायत नहीं थी। उसने कोई छल-प्रपंच नहीं बरता, झूठा आश्वासन नहीं दिया, न प्रेम पत्र का जवाब दिया कभी, न ही शादी को ‘हां’ की। तब भी अगर कोई सालों-साल उसकी ‘हां’ का इंतजार करता रहा, तो वह क्या करती? खाना वहीं खाया- या कहें कि ‘उसने’ जिद करके खिला दिया। अब भक्ति- मार्ग पर बहुत दूर चली जा, मन से पूरी सन्यासिन हो गई है। बाहरी कमरे में मंदिर है गुरुजी का, जिसे बात-बेबात हाथ जोड़ती, ताकती रहती है। पर ‘उसे’ सब याद था- स्कूल में प्रेम पत्र पाने से लेकर, गाना, पढ़ाई.. सबकुछ!! स्कूल के जमाने से ही आध्यात्म की ओर मुड़ रही थी पर इनकी ओर से इंतजार चलता रहा- लगभग बीस सालों तक.. इस बीच औरों से प्रेम भी हुआ, पर शादी की बात नहीं बनने पर ‘अपने पहले प्रेम’ को ही बार-बार शादी का संदेसा भेजा गया.. पत्नी ने उससे बातें कीं। पूछा कि कैसे मुड़ीं आध्यात्म की ओर.. और वह बताती रही.. लौटते समय पत्नी ने कहा-

‘प्रेम तो इन्होंने बहुत सारे किए,शादी से पहले और बाद में – पर सबसे लंबा इंतजार आपका ही किया।’

‘वह’ संकुचित हुई, पति ने बरजते हुए आंखें दिखाईं। क्या वे चाहते थे कि जो फिल्मी–सा सच ‘उसके’ सामने परोसा है कि बस ‘उसका’ और ‘उसका ही’ इंतजार किया- वह चमकीले कांच-सा फिल्मी रोमांस पत्नी के मुंह से निकले किसी सच से, एक छन्न की आवाज करता, टूटकर, आम, दुनियावी प्रेम-सा न दिखने लगे?.. पर ’उसके घर’ से निकलकर आहत दीखते पति ने कहा कुछ नहीं… चुप तो चुप। 

पति पास बैठे थे। इतनी ठंढ और इकतीस दिसम्बर की इतनी रोमांटिक शाम, पर पत्नी ने कहीं और खोए पति का हाथ नहीं पकड़ा। इसी तारीख को वे पहली बार मिले थे.. यह आशा व्यक्त की थी कि अब जीवन भर साथ रहेंगे, साल-दर-साल इसी तारीख को मिलते, नए साल का सूरज साथ ही देखते, अपने साथ के लिए कभी पछताएंगे नहीं..उनकी चाहत का सूरज कभी डूबेगा नहीं, बल्कि  साल दर साल ज्यादा चमकीला होता जाएगा! पति ने तब यह भी कहा था कि वे पत्नी से कभी कुछ छुपाएंगे नहीं.. पर ऐसा होता तो शादी के बाद छुपकर प्रेम कैसे कर पाते!

पत्नी को अब पता है कि पति उसके नहीं हैं। उसके कभी हो ही नहीं पाए..पहले प्यार के इकतरफा आवेग को जाने कितने प्यार करके ढूंढते-असफल होते, बेचैन के बेचैन जीते रहे।

तो पति, इस वक्त तो साफ अपने ‘पहले प्यार’ की स्मृतियों में खोए थे और पत्नी, इस सत्य, इस कसक में कि उनके रिश्ते में तो कभी वो ‘स्पार्क’ आया ही नहीं, जो पति- पत्नी को एक दूसरे से बांध, ‘एक’ कर देता है। तब वे कभी धोखा देने, दिल दुखाने या झूठ बरतने की सोच तक नहीं सकते!

तो बेमानी-बेस्वाद हो गया है इकतीस दिसम्बर को शुरु हुआ यह साथ! पर साथ तब भी है, भले उसमें प्यार घोलने, उसे पारदर्शी बनाने की कोशिशें अब दोनों में से कोई नहीं करता।

पति वहां बैठे क्या सोच रहे थे, पत्नी को नहीं पता, पर वह तो उनकी प्रेमिका के बारे में सोच रही थी। पत्नी ‘उसे’ जानती नहीं थी, आज पहली बार मिली। लगा कि ‘वह’ स्थिर दिमाग की है- जो ठान लिया, सो ठान लिया. प्रेम नहीं करना, तो नहीं करना..शादी नहीं करनी, तो नहीं करनी। न बेकार में बहलाए रखना, न धोखा देना। तो पत्नी सोच रही थी कि इतनी स्थिर दिमाग, दृढ़ चरित्र प्रेमिका से शुरु करके, कैसी- कैसी, ढुलमुल, झूठी, चरित्रहीन, छल-प्रपंच से लदी प्रेमिकाओं को प्यार किया पति ने, जो पत्नी से छल करने तक को खुलेआम उकसाती रहीं!!.. और पति ने लंबा इंतजार किया, तड़पा- तो एक ‘इस दृढ़ चरित्र वाली’ और दूसरी इसके ठीक उलट चरित्र की ‘बेहया- बेवफा’ के लिए..

..और इन दो विपरीत ध्रुवों के प्रति आकर्षित पुरुष की नियति, बगल में बैठी यह अच्छी-सी, बुद्धिमान-सी, सीधी-सी कही जाने वाली पत्नी, जिससे सामाजिक जुड़ाव को वे कई मजबूरियों के कारण तोड़ नहीं पाते.. मजबूरी नंबर एक- बाप होने की, मजबूरी नंबर दो- शादी को तैयार कोई दूसरी न मिल पाने की, मजबूरी नंबर तीन… खैर, छोड़िए।

तो एक नदी है बीच में। उस पार ‘वह’ है, अपनी किसी और दुनिया में खो चुकी, दिल दुखा हो तो माफी मांग चुकी… इस पार पत्नी है, सच स्वीकार चुकी, साथ होती हुई भी पति से भावनात्मक दूरी साध चुकी.. और बीच में ‘वो एक और’, झूठ और छल की श्रृंखला की नवीनतम कड़ी, उसे बहला रही उसकी वर्तमान प्रेमिका…

नदी अकेली बह रही है। बाकी सब भी अकेले-अकेले हैं। पति प्रेम के अनुभवों से भरा, पर इस क्षण ‘पहले प्रेम’ से बिछुड़, भावनात्मक रुप से अकेला… पत्नी शुरुआती अपेक्षाओं से परे, विवाह की मजबूरियों की मारी, भावनात्मक रुप से घोर अकेली, और ‘वो गीता भवन वाली’, अपनी मर्जी से जीवन में अकेलापन ही चुनने वाली भी अकेली- अकेली… 

पर नदी-से समृद्ध हैं सब! पास बैठे पति, अतीतजीवी, विवाह में नहीं, विवाहेतर प्रेमों में जीते, पत्नी को बिना शर्म लगातार छलते, प्रेम के कई- कई अनुभवों से समृद्ध.. बगल में बैठी पत्नी, चाहना की लगातार विकसित होती अपेक्षाओं से, जिंदगी में किसी छल-प्रपंच में न उलझने की संतुष्टि से समृद्ध.. वहां गीता भवन में बैठी ‘वह’, चाहे जाने और आध्यात्मिक अनुभवों से समृद्ध..

तो एक नदी जो सामने बह रही थी, ‘उसके’ और ‘इसके’ बीच, ‘पति’ और उसके ‘पहले प्रेम’ के बीच, गीता भवन में बैठी ‘प्रेमिका’ और यहां बगल में बैठी ‘पत्नी’ के बीच, जो आर- पार करती बसी थी बीच में, इस नदी का सबको पता था। सब उसे देख पाते थे।

एक और नदी हुआ करती थी पत्नी के अंदर, जहां वह पति के साथ सारी भावनाओं, सारे संचित प्यार में भींगी-भींगी जीना चाहती थी। पति द्वारा भी भिंगो-नहला दी गई जाना चाहती थी। वहां पति के साथ नहाना चाहती थी, पर वह चिकना घड़ा, कभी वहां डूबता या भींगता नहीं था। उस छलिया के अंदर तो अपनी अलग नदी थी, जहां पत्नी नहीं, प्रेमिकाएं नहाती थीं।

लगातार छले जाने के उपक्रम से थकती पत्नी, अब पति को अपने अंदर की नदी में बुलाती, भिंगोती नहीं थी.. पत्नी की दुनिया से लगातार गायब होता जाता पति भी, पत्नी को अब अपने अंदर की नदी दिखाता तक नहीं था। पर अफसोस कि सब सोचते थे कि उन दोनों की नदी एक ही है, जिसमें दोनों मिलकर नहाते हैं! 

पत्नी ने पति को ध्यान से देखा। पति अब भी खोए थे। पति ने पत्नी को नहीं देखा कि वह आखिर कहां खोई थी! 

क्या पति को अंदाजा था कि एक नदी अब भी है पत्नी के अंदर? वह तो सिर्फ सामने बहती उस नदी को देख रहे थे, जिसके उस पार ‘वह’ थी.. पर पत्नी? वह तो बिन देखे भी, अपनी-अपनी गति से बहती, सामने बहती दिखती और अंदर बहती नहीं दिख पाती; दोनों नदियों के अस्तित्व से सराबोर, कल्पना में नहाती-तैरती-बहती बहुत दूर निकल गई थी।

‘चलो’, पति ने उठते हुए कहा।

‘हां, चलो’, कहती पत्नी भी उठ गई।

दोनों चल दिए… नदी बीच में बहती रही।

…………………

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