Monday, June 17, 2024

प्रगति सक्सेना
प्रगति सक्सेना , 30-35 वर्ष पत्रकारिता की. जनसत्ता से शुरू कर बीबीसी, देनिक भास्कर और बहुत सारी जगहों पर काम किया, फ्रीलान्स भी . करीब 9-10 वर्ष पत्रकारिता को पढाया भी, ढेर सारा अनुवाद किया. लेकिन हमेशा खुद को पहले कवि और लेखक समझा और तमाम उतार चढ़ाव के बीच/ बावजूद मनुष्यता के मूल भलेपन पर भरोसा बनाए रखा. फिलहाल नेशनल हेराल्ड की वेबसाइट में बतौर न्यूज़ एडिटर कार्यरत.

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कवितायें

फूल

फूल नहीं छूटते मुझसे 
हांथों से फिसल गयीं लकीरें धीरे धीरे
पसरती गयीं चेहरे पर बनीं नदियों में
पैरों से छूट गयी कहीं पहुचने की चाहत 
जूतों में बंधे दौड़ते भागते लम्बे घास के मैदान 
 कहीं डूब गए हांफती साँसों के समुद्र में  
 हमने सपने बुने कि दिखें वो फूलों की तरह 
फूलों की जगह फूलों से सपने रख दिए  
 शामिल कर लिया उन्हें भव्यता के कारोबार में 
फिर वो निकल भागे मौका देख अँधेरी सड़कों पर 
बिखरे पत्तों पर ढूंढने अपना नक्शा 
 
तुम्हारी ज़बान की लकीरों में खिंचा मेरा नाम
आवाज़ की रगों तक पहुँचते पहुँचते खो गया 
उस सुनसान में जहाँ कभी शब्दों का आना जाना था  
 
लेकिन फूल नहीं छूटे मुझसे 
चलते जाने की मजबूरी में छूटते हाथों के बीच 
खुश रहने की ज़रुरत में साथ चलते आर्तनाद के बीच 
फूल अकस्मात् चले आते हैं अँधेरे में,सूखे में या  
चट्टानों के तले अपने नन्हेपन से चिढ़ाते 
उनकी तरफ बढे मेरे लालची हाथों को 
फूल नहीं छूटते मुझसे !
 

दुष्चक्र

जन्म से मृत्यु तक 
दुष्चक्र घेरते हैं चारों ओर से 
 
गरीबी का दुष्चक्र, अकेलेपन और भटकन का दुष्चक्र 
कहीं पहुंचने और रास्ते में खो जाने का दुष्चक्र 
 
सृष्टि और विनाश के गोल घेरे से 
शुरू होता इच्छाओं का अंतहीन दुष्चक्र 
हमें चाहिए सब कुछ पूरा 
अपनी शर्तों पर 
स्वप्न,उम्मीद ,हताशा और प्यास 
के खुलते-बंद होते, बीच में झूलते दरवाज़े 
 
खींचते हैं प्रेम की निरंतरता की तरफ 
जहां आरम्भ होता है,पाने, न पाने
गिरने, आहत होने-करने का भंवर 
 
हम दौड़ते हैं ईश्वर की शरण में 
आस्था के दुष्चक्र में, संदेह और श्रद्धा की
अंतहीन खोहों से गुज़रते
बदहवास लौटते हैं आदम रिश्तों के झमेले में 
फिर आत्मीयता  के भ्रमजाल से थक कर 
मिटाना चाहते हैं तमाम बंधनों को 
 
अंततः लोग मरते हैं, रिश्तों के 
प्यास और लालसा के  खांचे  वहीँ
समय के दुष्चक्र में फंसी साँसें 
फिर-फिर  लौटती हैं  
लगातार जीवन का पीछा करती। 

विरोध के स्वर

मैं ज़रूरी नहीं कतई
हाशिये पर बने तमाम स्क्रिबल की तरह 
जिन्हे जब चाहें मिटाया जा सकता है 
और जो याद भी नहीं आएंगे कभी। 
 
पैरों तले की ज़मीन जो 
अपना रूप बदलती है 
हर मौसम में और उसके गड्ढे 
उतार-चढाव बदल जाते हैं हर बार 
 
वो गमछा जिससे पोंछते हो 
अपना पसीना और अपनी नाक 
उन खोयी हुयी चीज़ों की तरह
जिन्हे जब खरीदा गया था 
वो बेहद अहम थीं 
 
रेत के उन कणों की तरह 
जो धूल भरी आंधी में 
चिपक जाते हैं चेहरे से 
 ट्रैफिक लाइट में घुलते बिखरते 
तमाम अनाम चेहरों पे लिखी 
ख़ुशी या अफ़सोस की कहानियां 
 
ज़रूरी नहीं कतई
 
जब विरोध के स्वर 
सांस लेंगे भीतर गहरे कहीं 
और  एक हलके स्पर्श से
ढहाने का मन होगा 
इस दुनिया की ईमारत को  
अपने सपनों को बंद कर मुट्ठी में 
उड़ा देना चाहोगे आसमान की तरफ 
 
हाशिये पर, ज़मीन के गड्ढों में 
तुम्हारे गमछे, भीड़ के चेहरे 
और धूल के हलके भूरेपन
चमकूँगी मैं तुम्हारी ही छवि लिए। 

ये सब बेमतलब हो सकता था

मेरे जो भी भय हैं 
उनसे और बुरा कुछ हो सकता था 
जैसा हुआ ये जीवन उससे 
बदतर भी हो सकता था 
 
नींद ना होती 
सपने होते 
सपनों में जाग सी 
भाग दौड़ का अविरल 
दुःस्वप्न हो सकता था। 
 
बादलों  में धूप रहती 
बारिश बसती फूलों में 
ये साँसें जो चलती हैं 
किसी आवाज़ में उनका
 ठिकाना हो सकता था 
 
तुम ना मिलते प्रेम ना होता 
पाना-खोना कुछ ना होता 
आहत होना, गिर के उठना 
धूल पोंछना फिर चल पड़ना 
और इससे बदतर ये कि
 इसके बिना भी जीवन हो सकता था 
 
सुर होते हवा में बजते  
संगीत न बनता, गीत न होता 
शब्द सो जाते स्पर्शों में 
और हंसना शर्तों में कैद होता 
भगवान तो होता, उम्मीद न होती 
 अर्चन होता, दुआ न होती 
 
 
कैसे होता होना भी 
जब ये सब बेमतलब हो सकता था।

अमलतास

चिलचिलाती धूप का महोत्सव मनाते
जिन्हे  कभी पूरा नहीं होना था 
उन इच्छाओं को हमारे अंतरिक्ष से 
 हलके पीले कणों की बारिश में धरातल तक लाते  
 
तेज़ आंधी में पंखुड़ी दर पंखुड़ी 
बिखरते, खुद को बांटते ,
उनकी मौजूदगी से अनजान 
लोगों के बालों, दुपट्टे, बैग और कमीज पर टंगे
 
स्वप्न में सुनी गयी खिलखिलाहट 
महसूस किये गए स्पर्श की ऊष्मा 
को अपनी खुशबू में बांधते
जो कुछ नहीं होना चाहिए था
जिन ठोकरों से बचा जा सकता था 
जिन आंसुओं को भुलाया जा सकता था 
ऐसे  तमाम दुनियावी क्षोभ और गुस्से पर 
शीतल शांत लेप  की तरह 
 
 सड़क के दोनों ओर 
धूल भरी आंधी में चारों तरफ
या कहीं भी 
या सिर्फ बचपन की स्मृति में 
टहनियों से झूलते-बिखरते 
अमलतास

डरे हुए लोग

 डरे हुए लोग
एक दूसरे को देखते हैं शक से 
उनकी हंसी में होता है एक करुणा पूर्ण अकेलापन 
जिसे छिपाने के लिए
वो बेतहाशा कोशिश करते हैं अपने साथी की ख़ुशी को रौंदने क़ी
दड़बे में खचा खच भरे मुर्गे 
चोट करते हैं एक दूसरे पर
 
डरे हुए लोग सपने देखते हैं आज़ादी के, उड़ान के 
और हर रोज़ झुण्ड में खड़े हो 
दबा लेते हैं अपने विरोध के सुरों को  
यही उनकी ख़ुशी है, आज़ादी और उड़ान भी
 
डरे हुए लोग 
खुद को सफल मानते हैं 
पर हर पल उन्हें खाये जाता है एक डर 
दरवाज़े बंद कर बैठते हैं एक विशाल कमरेके छोटे से कोने में 
यही उनका साम्राज्य है.
जहाँ से देखते हैं बाहर के लोगों,हवाओं को 
और लम्बी सांस भर के बार बार कहते हैं खुद से 
वो सब आज़ादी और असफलताएं हमारे लिए नहीं 
इस तरह डरे हुए लोग 
समाज के सफल लोगों में शुमार हो जाते हैं.
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