Wednesday, May 29, 2024
प्रज्ञा
जन्म—दिल्ली
शिक्षा -दिल्ली विवि से हिंदी साहित्य में पीएच.डी.
 
प्रकाशित कहानी – संग्रह
• तक़सीम (2016)
•मन्नत टेलर्स (2019)
• रज्जो मिस्त्री (2021 )
•मालूशाही …मेरा छलिया        बुरांश(2022)
 
प्रकाशित उपन्यास 
•गूदड़ बस्ती ( 2017)
 •धर्मपुर लॉज (2020)
 
नाट्य आलोचना से सम्बंधित किताबें
1 नुक्कड़ नाटक: रचना और प्रस्तुति 
2 जनता के बीच : जनता की बात,(सम्पा) नुक्कड़ नाटक संग्रह 
3 नाटक से सम्वाद
4 नाटक : पाठ और मंचन 
5 कथा एक अंक की
 
सामाजिक सरोकारों पर आधारित किताब
–आईने के सामने,2013
 
बाल साहित्य -तारा की अलवर यात्रा,एन.सी.ई.आर.टी से 2008 में प्रकाशित.
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेख-कहानियां प्रकाशित।
 
पुरस्कार
भारतेंदु हरिश्चंद्र, प्रथम पुरस्कार, बाल साहित्य, तारा की अलवर यात्रा, 2008
मीरा स्मृति पुरस्कार-2016 , गूदड़ बस्ती पर.
महेंद्र प्रताप स्वर्ण सम्मान, प्रथम पुरस्कार संग्रह ‘तक़सीम’ को, 2019
शिवना अन्तर्राष्ट्रीय कथा सम्मान 2020 उपन्यास धर्मपुर लॉज को .
धर्मपुर लॉज उपन्यास को पृथ्वीनाथ भान साहित्य सम्मान, 2021 
प्रतिलिपि कथा सम्मान, प्रथम पुरस्कार कहानी ‘तक़सीम’ 2015, स्टोरी मिरर कथा सम्मान, प्रथम पुरस्कार कहानी ‘पाप,तर्क और प्रायश्चित’ 2017
 
आकाशवाणी-दूरदर्शन के लिए अनेक कार्यक्रमों में भागीदारी।
दो वर्ष तक दिल्ली से प्रकाशित ‘समय सरोकार’ पत्रिका में उपसम्पादक पद पर कार्य।
सम्प्रति : प्रोफ़ेसर , हिंदी विभाग, किरोड़ीमल कॉलेज, दिल्ली विवि.
स्थाई पता-ई 112, आस्था कुंज, सेक्टर 18, रोहिणी, दिल्ली-89
ईमेल–[email protected]
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कहानी

रज्जो मिस्त्री
प्रज्ञा 
 
 
रज्जो की हंसी आज दुहल्लर हुई जा रही थी। कमर पर हाथ रखे हंसी के बोझ के मारे वह धीरे-धीरे झुकने लगी। लगता था अभी पेट पकड़कर जमीन पर औंधी गिर पड़ेगी। सुरसा-सा  मुंह  फाड़े उसकी हंसी में पूरे बत्तीस दांत गिने जा सकते थे। मुंह से हंसी का शोर उठाता फव्वारा फूट रहा था और उसकी संगत में आंखों की कोर से पानी का सोता। जाने कितने दिन बाद दुहल्लर हंसी उसके चेहरे पर सजी थी। आज सजी तो जैसे बीते समय की हर कसर पूरी करने पर उतारु थी। पास खड़ी मैना को रज्जो तनिक नहीं सुहा रही थी। मैना गुस्से में लाल भभूका हो रही थी। उसकी आंखों में आग तैर रही थी और हाथ रज्जो की पीठ पर धौल जमाने को कसमसा रहे थे। एक कोने में खड़े जुल्मी मिस्त्री की नजरों के आगे जैसे दुनिया शीर्षासन में खड़ी हो गई। उससे न बोलते बन रहा था, न ही आंख मिलाते। उसका जुल्मी नाम आज दुनिया से मुंह फेरकर उससे गले मिलने को तड़पने लगा। अपनी दीन-हीन मुद्रा में वह कोने में जड़ होकर कोने का हिस्सा ही बन गया था। अकेली मैना की बेटी ही रज्जो की हंसी को सही संगत देकर घर में शोर उठाए थी। 
मैना और रज्जो एक ही गली के अगल-बगल वाले एक कमरे के कच्चे मकानों में रहती हैं। दिल्ली के शाहबाद इलाके के दिहाड़ी मजदूरों की ये कच्ची-सी बस्ती है जिसमें जगह कम और घर ज्यादा हैं। घिच्ची-पिच्ची जगह में सब अपने हिस्से का जीवन किसी तरह ढूंढ लेते हैं। गांव-देहात से कितने लोग शहर काम-धंधे की तलाश में आए और बरसों से यहीं बस गए। कुछ किसानी छोड़कर मजूर होकर आए तो कितने बेरोजगारी और फाके में घिरकर खानदानी हुनर लिए आ गए। रज्जो तो अभी किराएदार है पर मैना ने इस कच्ची बस्ती में बरसों जोड़े गए रुपयों से एक झुग्गी खरीदकर पक्का इंतजाम कर लिया। झुग्गियां इलाके के नक्शे से मिटाई भी गईं तो मैना का कुछ फायदा होना तय था। इस झुग्गी बस्ती में घरों में सफाई-बर्तन करने वाली औरतें, सवारी ढोने वाले रिक्शा मजूर, नजदीकी बे्रड और बोतल फैक्ट्री की दो पालियों में काम करने वाले बच्चे-बड़े, पेंट-पॉलिश वाले, बढ़ई, बिजली का काम करने वाले, ठेले ढोने वाले और एक बड़ा कुनबा राजमिस्त्रियों-बेलदारों का समाया है। बस्ती से दूर पक्के फ्लैट और कोठियां हैं। कितने नए फ्लैट भी लगातार बन रहे हैं। कुछ को काम  दूंढ़ लेता तो कुछ लोग अपने मुताबिक काम खोज लिया करते हैं।
 कच्चे घरों की आंखों में भी सपने बसते हैं। मैना अपनी छोटी-सी जगह को ठीक-ठाक कराने की धुन में दिन-रात लगी रहती। पहले सीमेंट का फर्श डलवाया फिर बाहर की दीवारों पर पक्का प्लस्तर करवाया। छह बाई आठ के कमरे के कोने में बरसों से पड़ी स्लैब को रसोई बनाने की धुन न जाने उसे कबसे सवार थी। पैसा आने भर की देर थी कि जुल्मी मिस्त्री हाजिर।
‘‘ बिस्तर के संग ही एक ईंट की दीवार खड़ी कर दे, मेरी रसोई अलग हो जाएगी।’’
मैना का आदेश और जुल्मी का पालन। यों भी जुल्मी को बड़े फ्लैटों में काम करने की फुर्सत कहां है। ये झुग्गी बस्ती ही उसका आसरा है। बड़े ठेकेदार उससे कन्नी काटते हैं। कोई बेलदार भी नहीं उसके संग। बेलदार-मिस्त्री का काम अकेला संभालता जुल्मी दुनिया के जुल्मों से बेपरवाह है। आज मैना की रसोई की दीवार उठाने में जुल्मी ने पूरा दिन लगा दिया। मैना के कबसे जोड़े गए ईंट के अद्धों और साबुत ईटें आज जुल्मी का परस पाकर दीवार की सूरत लेने लगे। जुल्मी ने जमीन की खुदाई करके, कायदे से नापकर, मसाला बनाकर दीवार उठाना शुरू किया। मैना ने सामान चार फुटिया गली में निकालकर जगह बना दी थी और दीवार से सटी स्लैब से बर्तन उतार कर कमरे में रख दिए ताकि जुल्मी को खड़े होने में दिक्कत न हो। दीवार उठाकर काम निबटाने के लिए जुल्मी ने शाम को ही प्लस्तर करना भी शुरू कर दिया। ठीक उसी समय रज्जो घर का सौदा लेकर मैना से बतियाने खड़ी हो गई। मैना और रज्जो को काम निहारते देख जुल्मी के हाथ जल्दी-जल्दी चलने लगे। बड़ी सफाई से उसने प्लस्तर पूरा किया।
‘‘देख लो! ठीक बन गई है दीवार?’’
फंटी को किनारे रखते और करनी को तसले के हवाले करता हुआ जुल्मी दीवार से सटी स्लैब पर खड़े-खड़े इतराकर बोला। मैना ने खुशी में सिर हिलाया। मैना की हामी में अपनी खुशी उडेलते-झूमते जुल्मी ने स्लैब से उतरने के चक्कर में एक भारी गलती कर डाली। स्लैब से अचक से नीचे उतरने की जगह खुशी में उसने उतरते वक्त कच्ची दीवार पर अपना हाथ धर दिया। हाथ उसके तगड़े शरीर के वजन को थामे था। सारा बोझ नयी दीवार पर पड़ गया। इस चक्कर में जुल्मी ने तो जमीन पर बाद में कदम रखा उसके वजन से सारे दिन में खड़ी की गई दीवार उससे पहले ही भरभराकर जमीन पर गिर पड़ी और दो मिनट को इठलाई दीवार एक पल में मलबे में बदल गई। जुल्मी उस मलबे पर गिर पड़ा। दीवार तो चाहकर भी उठ नहीं सकती थी पर अपराधी बना जुल्मी फौरन उठकर कोने में सिमट गया। मैना की आंत-पींत जल गई पर रज्जो की हंसी को रोकना आज भगवान के बूते के भी बाहर था।
‘‘ मेरे से ही कह देती तू दीवार उठाने को…अनाड़ी मिस्त्री को बेकार बुला बैठी।’’ 
दांत पीसती मैना को देखकर हंसते हुए रज्जो फुसफुसाई।
‘‘ अब तू तो रहने ही दे… जिसका काम उसी को साजे…’’ 
एक ही पल में मैना गुस्से और खीझ में बोल पड़ी।
रज्जो की हंसी के खिलखिलाते सूरज को ग्रहण लग गया। उसने मैना को एकटक देखा जैसे पूछ रही हो तुझे तो सब पता है मैना! फिर भी ऐसी कड़वी बात? उसे याद आया कितने अपनेपन से मैना ने एक दिन उससे कहा था-‘ तू जब भी काम पर जाए पीछे से बच्चों की चिंता न करना।’ चेहरे पर सोच और मन में दुख लिए फिर भी रज्जो ने गिरी हुई ईंटों को तसले में भरकर बाहर लगवाने में मैना और जुल्मी की मदद की। बाहर लगे नल पर रेत-सीमेंट सने पैरों को धोती हुई रज्जो को अचानक बहुत साल बाद बापू के पैर याद आए। पिंडलियों से गोरे उसके पैर के पंजे मिस्त्री का काम करते हुए हमेशा फटे और काले रहते। सीधी धूप-हवा लगने से भोगानंद के पैर दुरंगे हो चले थे। घुटने के नीचे पंजे और तलवे की एक मोटी रेखा ही सफेद दिखाई देती थी। हर रात रज्जो बड़े प्रेम से उसके पैरों पर कड़वा तेल लगाती और सुबह बापू के साथ काम पर चल देती। गांव पिसावा में बिताए वो दिन रज्जो को क्या नहीं भूल सकते हैं। भोगानंद के काम में हाथ बंटाते कभी मसाला बनाना, कभी ईंट ढोना, कभी दीवार की तुड़ाई तो कभी छत की ढलाई। बड़ी होते-होते रज्जो सब काम सीखती जा रही थी। चिनाई और प्लस्तर का बढ़िया मसाला तो उसके जैसा बनाने वाले कम ही थे। तीन-एक का मसाला ऐसा जबरदस्त बनाती कि सीमेंट और रेत का अनुपात एकदम सही बैठता। भोगानंद उसकी पीठ ठोक देता। बापू की याद ने रज्जो के चेहरे के मायूस रंग को धुंधला कर दिया।
‘‘ तू यहां खड़ी है अब तलक? घर नहीं गई? चलके घर देख। रोटी-पानी कर। बच्चे कबसे भूखे बैठे होंगे।’’ 
मुरारी की तेज आवाज ने पीछे से आकर रज्जो को यादों के झरोखे से बाहर निकाला। एक सपने से जागी रज्जो ने पीछे पलटकर मुरारी को देखा और फिर मशीनी चाल से सीधी घर पहुँच  गई। अज्जू और रिंकी खेल में मगन थे। घर के बिखरेपन को समेटने, रात का खाना बनाने और दो छोटे बच्चों की बातों और झगड़े-फरमाईश सुलझाने में शाम कब रात में ढल गई, रज्जो को पता न चला। बच्चों और रज्जो ने खाना खा लिया था। मुरारी घड़ी भर को घर आया। बच्चों को दुलराया फिर नहा-धोकर बाहर निकल गया। ये उसका रोज का नियम है। दिहाड़ी के बाद थकन उतारने के लिए दोस्तों के संग ठलुआगिरी और कभी-कभार दारुबाजी की लत उसे जाने कब पड़ गई। खाना खाकर दिन भर घर-बाहर खटती रज्जो जरा लेटी कि सामने के आले में रखे मुरारी के साहुल पर उसकी नज़र गई। लंबी डोरी से बंधा साहुल जिसे मुरारी आते ही आले के सामान में  रख देता था। सारे मिस्त्री अपने औजारों के संग साहुल छोड़ आते थे पर मुरारी हर रोज उसे संग ले आता। उसकी यह आदत रज्जो को निराली लगती रही थी। साहुल को एकटक निहारती रज्जो फिर अपने अतीत में खो गई।
‘‘ यह साहुल तेरे लिए नहीं बना है। तू मोटे काम संभाल। तू क्या जाने नाप-जोख? मलबा उठा और ईंटे ढो ये हिसाब का काम तेरे बस का न है।’’
  साल भर छोटे भाई नरेश ने जब रज्जो के हाथ में दीवार नापने का साहुल देख ऐसी जली-कटी बात सुनाई तो रज्जो ने ठान लिया या तो वो नहीं या साहुल नहीं। रज्जो जानती थी जैसे डाॅक्टर के लिए आला जरूरी है, वैसे ही राजमिस्त्री के लिए साहुल। ये कला नहीं सीख पाएगी तो जीवन भर बेलदारी ही करती रह जाएगी। उसे तो अपने बापू भोगानंद जैसा नम्बर एक का मिस्त्री बनना था। बड़ा मिस्त्री। बस नरेश के कहने से एक जिद्द उसके शरीर में ऐसी तन गई कि फिर उसे किसी करवट चैन न पड़ा जैसे साहुल का निचला नुकीला सिरा उसके मन पर गढ़ा चला जा रहा हो और उसके पूरे शरीर को लहुलुहान किए दे रहा हो। भोगानंद की मदद से उसने जल्दी ही साहुल को साध लिया। फिर क्या था दीवार कोई सी भी क्यों न हो साहुल की डोरी का सिरा रज्जो के आत्मविश्वासी हाथों में सुहाने लगा। डोरी के नीचे का नुकीला सिरा मानो अब रज्जो के लिए वही लट्टू हो गया जिसे बचपन में लड़कों के संग खेलती वह जमीन से बड़ी आसानी से उठाकर हथेली पर सजा लेती। लट्टू देर तक उसकी हथेली पर नाचता तो साथ के कई लड़के हैरानी से देखकर जल मरते। साहुल से नाप-जोख करके वह दीवार की सिधाई में माहिर हो चली। जब पहली बार उसने अकेले दीवार उठा दी तो भोगानंद ने अपने बेटे को झिड़कते हुए सुनाया-
‘‘ नरेस! सीख रज्जो से दीवार की सिधाई किसे कहते हैं। साहुल से नापकर भी तेरी दीवार टेढ़ी ही बनती है वो तो पलस्तर है जो तेरी कमी पर पर्दा डाल देता है।’’ 
भोगानंद की डांट और बहन से तुलना की बात सुनकर भी नरेश के कान पर जूं न रेंगती पर रज्जो दांत फाड़कर हंस पड़ती। भोगानंद को बेटी की हंसी अपने जीवन का उजाला लगती थी। रज्जो दीवार बनाने तक ही नहीं रुकी। पिता के साथ काम पर जाते हुए उसने दूसरी मंजिल उठाने के लिए कॉलम  डालना, छत के लिए बीम बनाना, लेंटर और शटरिंग का काम भी जिद करके सीख लिया। जब भोगानंद के साथ छत के सरिये बांधती तो लोग दांतों तले उंगलियां दबा लेते। कुछ तारीफ करते तो कुछ रज्जो की औकात बताते-
‘‘ है तो आखिर लड़की जात…सैटरिंग के काम सुहाते हैं भला? भोगा को चाहिए नरेस को सिखाए काम। आखिर तो लड़की को पराए घर ही जाना है।’’
औरतें रज्जो की मां को समझातीं-‘‘देख देवकी! कुछ ऊंच-नीच हो गई तो कल को इसका ब्याह-बाल-बच्चे…बाकी तू खुद समझदार है।’’ 
देवकी के भीतर के डर जाग कर बेचैन हो जाते और वह रज्जो के घर में घुसते ही उसके पीछे हाथ धोकर पड़ जाती। पिता का खुला दिल न होता तो रज्जो के पांव में कबकी बेडियां डल चुकी होतीं। रज्जो के बाहर निकलते कदमों ने घर की माली हालत को भी चमका दिया था। तीन लोगों की पक्की टीम थी भोगानंद के पास। इसलिए खाने-पीने के आराम से लेकर घर-आंगन भी निखरा-निखरा दीखता। अब कमाने वाले एक नहीं ढाई हाथ हो गए थे। घर को आज तलक नरेश की पूरी दिहाड़ी कभी नहीं मिली थी।
घर से सुख का छाजन भोगानंद की अचानक मौत से छिन गया। असहाय जीवन की जिम्मेदारियों  में देवकी को कुछ नहीं सूझ रहा था। एक तरफ भविष्य में रज्जो की शादी की चिंता तो दूसरी तरफ नरेश का बाप की लगाम से एकदम छूट जाना उसकी परेशानी बढ़ा रहा था। इधर गांव में भोगानंद को मिलने वाले बड़े काम अब नरेश और रज्जो को मिलने बंद हो गए। वैसे भी छोटे कारीगरों के लिए बहुत अधिक काम वहां था ही कहां फिर रज्जो की काबिलियत जानते हुए भी लोग उसे काम न देते। नरेश को छोटा-मोटा काम मिल भी जाता तो उससे घर चला पाना मुश्किल था। रज्जो दिन भर सोचती हाथ पर हाथ धरे यों बैठे रहने से कहीं सीखे हुए काम भी न भूल बैठे। साहुल उसकी हथेलियों के नीचे कसमसाता।
‘‘ अरी! सो गई क्या?’’ 
बाहर से लौटे मुरारी के शब्दों ने रज्जो की यादों का सिलसिला रोक दिया। इससे पहले कि रज्जो उठती मुरारी फिर बोला- ‘‘ रहने दे। उठ मत। खाना मैं खुद ले लूंगा।’’
शराब से तृप्त होकर कई बार मुरारी दुनिया का सबसे निराला इंसान बन जाता। शहद-सा मीठा। मुरारी की ऐसी बातों पर रज्जो के भीतर प्यार का सैलाब उमड़ आता। वह नहीं-नहीं करते मुरारी का हाथ रोककर खाना परोस ही देती। उसे बच्चों की तरह सहलाती और टूटकर मुरारी को गले लगा लेती। मन चाहता उस पर सब कुछ निछावर कर दे। उसकी इस अदा पर मुरारी भी अपने प्यार से रज्जो को निहाल कर देता। पर आज ऐसा कुछ नहीं हुआ। मुरारी की बात पर रज्जो ने हल्की-सी ‘हूं’ करके करवट बदल ली। मुरारी ने खाना खाया, झूठे बर्तन सकेरकर एक किनारे रखे और रज्जो की बगल में सो गया। रज्जो जाग रही थी। उसकी आंखों से नींद कोसों दूर थी। उसे बार-बार मैना की बात याद आ रही थी-‘जिसका काम उसी को साजे’। पर मैना अकेली थी क्या रज्जो से ऐसी बात कहने वाली? उसे याद आया बापू के मरने के बाद तंगी के दिनों में मनरेगा योजना उत्तर प्रदेश के उसके गांव के पास भोजाका में शुरू हो गई थी। तालाब की खुदाई, सड़क बनाना, ग्राम पंचायत, ब्लॉक ऑफिस की नयी इमारत उठाने और अनेक कामों के लिए दिहाड़ी पर मिस्त्री-बेलदार को काम मिलना शुरू हो गया था। रज्जो का मन खुशी से चहका कि इसका हिस्सा बनकर उसके हुनर का लोहा कुछ दिन में लगी जंग की परत को छील-उखाड़कर झाड़ देगा। नरेश के साथ रज्जो भी चार किलोमीटर दूर भोजाका के लिए रोज निकलती। बाद में पिसावा में भी योजना शुरू हो गई। काम की उमंग और मिलने वाले पैसों की खनक की बात सोचकर ही उसकी देह उमगी रहती। देवकी ने इस बार उसे निकलने से मना भी नहीं किया। सोचा इसीसे जोड़-जाड़कर रज्जो के ब्याह का पहाड़ किसी तरह कट जाएगा। 
  दिन भर ईंडुरी सिर पर टिकाए, उस पर तसला धरे रज्जो कभी रेत ढोती ,कभी मसाला तो कभी भारी ईंटों को ढोकर साइट पर पहुंचाती। अपने हिस्से का काम पूरी ईमानदारी से करती रज्जो नरेश के हिस्से का काम भी जैसे-तैसे संभाल देती।
‘‘ काम भूल गया क्या नरेश? सरिए के तार एक-सी दूरी पर नहीं बांधेगा तो बीम न ठहरेगी। छत कैसे टिकेगी? एक बार सरिए को छह इंच की दूरी पर बांधा है तो अगली बार भी छह ही ले न, बढ़ा-घटा नहीं। हट परे, मैं बांध देती हूं।’’
जल्दबाजी में काम को अंजाम देता नरेश, बहन को आंखें तरेरकर देखता पर खून का घूंट पीकर रह जाता। ना-नकुर करने के बाद रज्जो के इसरार और मदद से नरेश को पहले से बांधे सरियों के तार खोलने और दोबारा बांधने पड़ते। मिस्त्री के सबक रज्जो ने कायदे से पढ़े थे। शटरिंग के उस्ताद भोगानंद का हुनर रज्जो में पूरा उतरकर अब निखरने लगा था। उसे न सिर्फ सरिए बांधना आता था बल्कि छत का वजन टिकाने के लिए किस नाप की बीम डलेगी इसकी जानकारी भी उसे थी। दीवार उठाते हुए मसाले को ईंटों पर धरकर जब पक्का करते हुए करनी ईंट पर मारती तो ईंट उसकी गुलाम बनकर सही जगह ले लेती। रज्जो के हाथ में गजब की सफाई और फुर्ती थी लेकिन करनी की ठकठक नरेश के कलेजे में कील बनकर ठुकती।
कुछ दिनों तक उमगी रहने वाली रज्जो धीरे-धीरे मुरझाने लगी। मिस्त्री के काम की बारीकी जानकर भी रज्जो को बेलदारी के काम ही मिला करते और इधर निखट्टू नरेश को लगातार मिस्त्री के काम। नरेश जब रज्जो को ऐंठकर देखता तो रज्जो का कलेजा चाक हो जाता। कितने तूफान उसके कलेजे में उठते, भंवर उठाते और रज्जो उनमें घिरती चली जाती। हद तो उस दिन हो गई जिस दिन रज्जो, लंच टाईम में नरेश के हिस्से के शटरिंग के काम को पूरा कर रही थी कि अचानक ठेकेदार प्रकट हो गया।
‘‘ ये क्या कर रही है तू? जानती है सैटरिंग का काम है, ईंट ढोने और मसाला बनाने का काम नहीं। ये काम सीखना है तो चलकर पहले ट्रेनिंग ले। यहां ट्रेनिंग का काम नहीं होता। बैठे-ठाले हमारा सामान और टैम खराब कर रही है।’’ ठेकेदार चिल्लाया।
‘‘ ये काम मुझे अच्छी तरह आता है चाचा।’’ रज्जो ने आत्मविश्वास से बेहिचक कहा।‘
‘‘अच्छा? अभी बेलदार से मिस्त्री का काम आ गया कल को तो तू ठेकेदार बनकर मेरे ही सर पर सवार हो जाएगी।’’ ठेकेदार चीखा। 
रज्जो हैरानी से उसे देखती रह गई। काम पर बने रहने और पैसे की जरूरत के चलते ठेकेदार को धीमे स्वर में सफाई देने लगी -‘‘ मैं जानती हूं मिस्त्री का काम। मेरे बापू ने…’’
‘‘ चल-चल बड़ी आई कामवाली। यहां तुझे बेलदारी के लिए रखा गया है। जी चुराती है कामचोर कहीं की।’’ रज्जो के नरम स्वर से ठेकेदार की आवाज और तेज हो गई।
‘‘ चाचा! कामचोरी न कभी की है, न करूंगी।’’ रज्जो ने कांपते शब्दों में खुद को दी गई गाली का जवाब दिया।
‘‘ तो तू ठेकेदारिनी लग रही है यहां की? खबरदार जो फिर कभी सरिये-करनी को हाथ लगाया। सर पर तसला उठा और चुपचाप माल ढो। जिस काम की कही जाए वही कर बस। औरत है मर्द के पीछे रह। मर्द होने की कोशिश में न मर्द बन पाएगी और औरत होने से भी जाएगी।’’ 
कहते हुए ठेकेदार ने रज्जो के पास पड़ी करनी हाथ में ली और सरियों  को लात मारकर रज्जो से दूर धकेल दिया। रज्जो हैरान थी कि काम से जी चुराने वाले नरेश को ठेकेदार ने एक शब्द नहीं कहा। ठेकेदार की फटकार से आहत रज्जो को नरेश की नीचा दिखाने वाली हंसी और भी घायल कर गई।
आज भी कहां भूल पाई है रज्जो उस घटना को। हंसी-मजाक और जिंदगानी की तेज भागती चक्की में न जाने कितनी बार रज्जो ले बैठती है जीवन की बही। आज उस याद से फिर उसकी आंखें भींग र्गइं। अचक से उठकर रज्जो ने पानी पिया ताकि आंसुओं को गले में उतार सके फिर अपनी जगह आकर लेट गई। मुरारी ने करवट ली। रज्जो अंधेरे में भी उसका चेहरा साफ-साफ देख रही थी। उसकी बेसुध नींद पर रज्जो को जलन हुई। कहां मुरारी सपनों के मनचाहे लोक की सैर पर निकला हुआ है और कहां रज्जो अपने अतीत को धुन रही है। पिसावा की मनरेगा योजना में काम करते हुए मजदूरों को कभी समय से पैसा नहीं मिला। मजूर औरतों की हालत तो और भी खराब थी। आदमी के बराबर मजूरी के बाद भी कम मेहनताना तो दूसरी ओर रज्जो जैसे गुणी कारीगरों की बेकद्री। बार-बार ठेकेदार की जी-हजूरी। आर्थिक तंगी और घरों की बदहाली से तंग आकर मजदूर ब्लॉक ऑफिस के आगे धरना-प्रदर्शन करने पर मजबूर हुए। लंबे और अडिग आंदोलन से मजदूरों को जैसे-तैसे रुपये मिलते पर अगली बार फिर हाथ फैलाने की नौबत आ जाती। रज्जो ने जान लिया था कि मजदूर के जीवन में दुखों के छाले ही अधिक हैं। दो-एक साल ऐसे ही चला फिर रज्जो की शादी भोजाका के मुरारी से तय हो गई। आज सालों बाद भी शादी की याद भर से रज्जो के गाल दहक गए। दुख और अपमान से भरी यादें ठंडे बस्ते की शरण में चली गईं।
‘‘चौड़े –चौड़े  बिंदा लगावें
 बोंदोली-भोजाके की बहुएं…’’
विदा के बाद ससुराल पपहुँचते  ही भोजाका की औरतों ने नई बहू से छेड़ शुरू कर दी। पिसावा रज्जो का मायका, भोजाका ससुराल। अब तो रज्जो को ससुराल के रहन-सहन ही मानने पड़ेंगे। रज्जो गीत की लय थामे अपने माथे पर सजी छोटी बिंदी का ध्यान करके मुस्कुरा उठी। घर में गीतों और रिवाजों के बीच रज्जो कैसी सजी-धजी,छुईमुई-सी पोटली बनकर बैठी थी। नए घर में आकर वह खुश थी। उसकी खुशी का कारण साफ था। मुरारी कारीगर आदमी था। दिल्ली जैसे बड़े शहर में अकेला रहता था और शादी के लिए इसी शर्त पर राजी हुआ था कि औरत उसके संग दिल्ली जाएगी। उससे अकेले काम और घर अब नहीं संभलता। रज्जो खुद को बड़भागी मानकर फूली नहीं समा रही थी। एक ओर दिल्ली जाना और दूसरी तरफ मुरारी के संग मिस्त्री का काम करने की आजादी की कल्पना की दोहरी खुशी उसके चेहरे पर चमक रही थी जिसे घर की औरतें ब्याह की खुशी मान बैठी थीं। हालांकि रज्जो के मन के कोने में चिंता भी हलचल मचाए थी क्या जाने मुरारी उसे काम करने भी देगा या नहीं? 
मुरारी के छोटे से कमरे में जीने लायक सामान के साथ एक टी.वी. भी था। उसके किसी मालिक ने कबाड़ में पुराना टी.वी. बेचने से मुरारी को देना सही समझा था। रज्जो ने  आते ही कमरे को चमका दिया। मुरारी बढ़िया मिस्त्री था। रज्जो ने पाया वह अपने काम में उसके बापू जैसा ही काबिल है। दिल्ली आकर ही रज्जो ने जाना मुरारी पत्थर का अच्छा कारीगर है। बड़ी कोठियों  और फ्लैटों में मार्बल और टाइल्स के काम पर ठेकेदार उसे रखवा देता है। अपनी कोई टीम तो मुरारी की है नहीं  पर शाहबाद की इस पुरानी कच्ची बस्ती के इकलौते ठेकेदार पुरुषोत्तम की टीम का वह बढ़िया मिस्त्री है। आमदनी थोड़ी कम जरूर है पर बंधा-बंधाया काम है। मस्टर रोल पर चढ़ने और छंटनी का कोई डर-चिंता नहीं। ठेकेदार रोज शाम मजदूरों की दिहाड़ी गिनकर हाथ पर रख देता है। कभी देर-सवेर भले हो जाए पर दिहाड़ी मिल जाती है। मुसीबत में एडवांस के रूप में किसी-किसी की जरूरत मुताबिक मदद भी कर दिया करता है लेकिन पैसा देता है तो काम भी ठोक कर लेता है।
‘‘ बड़े ठेकेदार के मिस्त्री! मुझे भी सिखा दे टाइल-पत्थर की कटाई। ले चल अपने संग काम पर।’’
 रज्जो ने एक दिन संकोच की कुंडी खोलकर अपने मन की बात मुरारी से कह डाली। 
‘‘ रहने दे बावली। ये हाथ पत्थर हो जाएंगे, पत्थरों से सिर मारकर।’’ मुरारी हंसते हुए बोला।
रज्जो उसका मुंह देखती रह गई।
‘‘ आराम से कमरे में रह न। तू कहां फिरेगी मारी-मारी? तेरे लायक जगह नहीं। सारा रूप दो दिन में ढल जाएगा। धूल-मिट्टी फांकने से अच्छा है घर पर रह।’’ मुरारी बेपरवाही से बोला। 
रज्जो की खुशियों के फूल मुरझा गए। शादी के बाद उसने क्या-क्या सपने बुने थे सारे फंदे उधड़ से गए। कुछ दिन वह चुपचाप काम में लगी रही। मुरारी की बात का नपा-तुला जवाब देती पर अपनी तरफ से कुछ न बोलती। मुरारी को उसकी ये चुप्पा सूरत जरा न सुहाती फिर मुरारी जानता था रज्जो किस बाप की बेटी है। मुरारी को रज्जो के काम और लगन की भी भनक थी। घर में छाई चुप्पी को तोड़ते हुए कुछ दिन बाद मुरारी बोला-‘‘अच्छा रूस नहीं कल बात करता हूं ठेकेदार से फिर संग चलना। पर देख ले काम एक दिन में सीखा नहीं जा सकता। वक्त लगेगा और फिर आकर तुझे चूल्हा-चैका भी करना पड़ेगा। मैं बखत का पक्का हूं। बखत पर काम, बखत पर खाना।’’
 उस दिन छोटे से कमरे में रज्जो के लिए सारे रंग समेटे आकाश उतर आया था।
 दिल्ली जैसे शहर में न कोई परिचित, न रिश्तेदार जो नई ब्याहता रज्जो को रोके-टोके फिर जिस फ्लैट में मुरारी काम कर रहा था वहां बेलदार के साथ वह अकेला ही था। पुराना फर्श पहले ही तोड़ा जा चुका था। मुरारी अपने हिसाब से रोज का एक कमरा पकड़ता और शाम तक नया फर्श डाल देता। जितनी देर में वह रेत पर मार्बल की बड़ी स्लैब बिछाकर नाप और डिज़ायन का पीस काटता उतनी ही देर बेलदार मशीन की रवानगी और गोल-धारदार ब्लैड से पत्थर के काटते समय उठने वाली धूल को दबाने के लिए पतले-से पाइप से पानी की धार देता चलता। मशीन जीं-घीं-घीं-घिर्र-घिर्र की ध्वनि से पत्थर काटने लगती। जितनी देर मुरारी आराम करता बेलदार बदरपुर का मसाला कमरे में बिछा देता और सीमेंट की बोरी खोलकर एक तरफ उसका ढेर बना लेता। काम की जगह पर अपनी औरत को काम सिखाने की झेंप  से बचते हुए मुरारी ने पुरुषोत्तम से रज्जो की बेलदारी की बात तय कर ली। पुरुषोत्तम की टीम में अब तक कोई औरत नहीं थी इसलिए वह पहले तो झिझका पर अंत में मुरारी जैसे कारीगर पर उसने भरोसा करके काम दे दिया। इस तरह रज्जो का काम करने का सपना पूरा हुआ।
‘‘ संभालकर री! एक भी पीस टूटा तो तेरी खैर नहीं। पत्थर को मजबूत हाथों से उठा। फुट के हिसाब से नापकर पत्थर आया है। एक का भी नुकसान हुआ तो मालिक खामखां अकड़ेगा, ठेकेदार झगड़ेगा फिर टूटे पत्थर को तरीके से काटकर, रेशे से रेशा जोड़ने और धार मिलाकर लगाने में मेरे सारे दिन की बर्बादी अलग होगी।’’
मुरारी कभी प्यार से तो कभी गुस्से से रज्जो को काम सिखाता गया। मिस्त्री होने की ठसक बेलदार पर हावी रहती पर रज्जो धुन की पक्की थी। उन दिनों जैसे उसे थकन महसूस ही नहीं होती। रात देर से सोती फिर भी पौ फटते ही जाग जाती। रात भर कल्पना करती कि वह पत्थर काटकर फर्श बना रही है। उन दिनों सारे घर का काम करके खाना लेकर उमंग से चल देती मुरारी के संग। जिस दिन पहली बार रज्जो ने पत्थर काटा उसे लगा जैसे जीवन का सबसे बड़ा सवाल उसने हल कर दिया। उस दिन उसकी हंसी में वही पहले वाली खनक उतर आई।
‘‘ देखना, एक दिन हम दोनों अपने घर की दीवार साथ मिलकर उठाएंगे। याद रखना, मेरी बात।’’ 
रज्जो ने बड़े प्यार से मुरारी से कहा था। मुरारी ने भी प्यार के बदले प्यार से देखा और फिर इशारे से काम की तरफ ध्यान दिलाया। मार्बल का रेशा जोड़कर, पीस काटकर रज्जो ने फर्श पर बिछी बदरपुर के ऊपर कटे हुए सारे पीस रखे और करनी से ठोककर सबकी धार मिलाई तो मुरारी उसे देखता रह गया। काम की खुशी से दमकती रज्जो आज बहुत सुन्दर लग रही थी। कमरे में सारे पीस बिछाकर जब उसने मुरारी को दिखाया तो सारे पीस ऐसे लगे जैसे टुकड़े नहीं एक साबुत स्लैब फर्श से एकसमान ऊंचाई पर फिट कर दी गई हो। यही नहीं फर्श की ढाल भी सही बनी थी। मार्बल के सारे पीस फैलाने-मिलाने के बाद रज्जो एक-एक टुकड़े को सावधानी से उठाती और सीमेंट का घोला देकर करनी से दाब देती। मुरारी उसे देखकर हैरान रह गया।  
रज्जो के जीवन की ये नयी करवट कुछ महीने आराम से चली। रज्जो ने जैसे नया जन्म पा लिया था। जिंदगी में अब तक के मिले सारे दंश जैसे मिट चले थे। उन दिनों रज्जो की हंसी बात-बेबात फूटती। अपने घर में भी मुरारी की खूब तारीफ हो रही थी कि शादी के बाद भी पैसा भेजने में मुरारी ने कोई कंजूसी नहीं बरती। मुरारी पर अपने घर की बड़ी जिम्मेदारी थी। रज्जो के कमाने से उसे भी तसल्ली मिली। रज्जो का जीवन अभी अंगड़ाई लेकर खड़ा हुआ ही था कि रज्जो को मुरारी ने काम से साफ मना कर दिया।
 ‘‘पहले बच्चे का मामला है रज्जो और तेरी तबीयत लगातार बिगड़ रही है। अबसे काम नहीं। तू घर पर रह। कुछ ऊंच-नीच हो गई तो मैं अकेला क्या-क्या संभालूँगा। काम कहां भागा जा रहा है। पहले तू फारिग हो ले।’’
मजदूर औरतें नौ महीने कड़ी मेहनत करती हैं और पता ही नहीं चलता कब बच्चा जनकर काम पर लौट आती हैं। रज्जो इस सबके लिए तैयार थी पर दिनोंदिन गिरती तबीयत ने उसका जरा साथ नहीं दिया। उस समय रज्जो को काम छोड़ना बहुत बुरा लगा। जिस समय रुपये-पैसे की सबसे अधिक जरूरत थी उस समय काम का सहारा छूट गया। दो-दो घर चलाने की जिम्मेदारी में मुरारी ने ओवरटाइम करना शुरू कर दिया।
रज्जो ने एक गहरी सांस ली। रात तेजी से बीत रही थी। रज्जो ने पेट में दबाए पैरों को सीधा किया और करवट ली तो सामने सोए अज्जू-रिंकी दिखाई दिए। तला ऊपर के होने से दोनों के बड़ा-छोटा होने का अंतर ही न पता चलता। निश्चिंत सोते हुए दोनों को देखकर रज्जो के मन में प्यार की नदी उमड़ आयी। कैसे करके बड़़ी मुश्किल से दोनों को पाल रही थी। दोनों के जन्म और परवरिश में ही अब उसका समय गुजर रहा था। बच्चे बढ़े होंगे तो खर्चा और भी बढ़ेगा-यह चिंता रज्जो को खाए जाती। इस बीच ठेकेदार पुरुषोत्तम का काम भी दूर-दराज में फैलने लगा। पुरुषोत्तम, मुरारी को शाहबाद के आस-पास के इलाकों और दूर के मकानों में भी भेजने लगा था। मुरारी की दिहाड़ी पहले से बढ़ी थी तो मंहगाई उसकी तुलना में और अधिक बढ़ी थी। मकान का किराया, राशन,दवाई-गोली, कपड़े-लत्ते सबके दाम बढ़ रहे थे। रज्जो ने एक दिन मुरारी का मन टटोला-
‘‘ ऐसे कब तलक चलेगा? इन बच्चों के भविष्य के लिए और पैसा चाहिए होगा। पढ़ाने-लिखाने का इंतजाम भी देखना होगा। पीछे घर की जिम्मेदारियां भी अभी कहां पूरी हुई हैं।’’ रज्जो ने ठंडी सांस ली। कुछ देर के बाद बोली-‘‘ अब तो मेरी तबीयत ठीक है और ये बच्चे भी थोड़े संभल गए हैं। अब मैं काम पर जा सकती हूं न? न सही मिस्त्री, बेलदारी की दिहाड़ी भी ठीक रहेगी।’’ रज्जो ने मुरारी की चिरौरी की। पिता और पति जैसा मिस्त्री बनने का उसका सपना पछाड़ खाकर धूल में सना जीवन की राह में पड़ा था। इस सपने से रज्जो बड़ी मुश्किल से बच्चों का मुंह देखकर समझौता कर पाई थी।
‘‘ काम करना ही है तो घरों में बर्तन-सफाई के काम पकड़ ले। यहां की बहुत-सी औरतें यही तो करती हैं। मेरे संग अब पहले जैसी बात नहीं। मुझे दूर-दूर जाना पड़ता है…तुझे कहां लिए ढोलता फिरूंगा?’’ मुरारी के पास जैसे जवाब पहले से सोचा-समझा रखा था।
‘‘ न सही अपने साथ… शाहबाद के घरों में ही सही….बात करके देखो पुरुषोत्तम से।’’ 
रज्जो ने हार नहीं मानी।
‘‘ मेरे बिना अकेली तू कहां काम करेगी घरों में? कोई औरत नहीं है पुरुषोत्तम की टीम में, जानती है न। ये क्या अच्छा लगेगा? फिर वहां कितने आदमियों की नजर रहेगी तुझ पर। भीतर से कौन कैसा है किसे पता? कैसी-कैसी बातें बनेंगी, जानती है?’’
कहने को मुरारी सवाल पर सवाल खड़े कर रहा था पर सारे सवाल इंकार का ठोस जवाब ही रज्जो को दे रहे थे।
‘‘ पर मुझे तो…’’ हकलाती-सी रज्जो बोली पर मुरारी ने उसे बात भी पूरी नहीं करने दी।
‘‘ पर-वर कुछ नहीं। फ्लैटों का काम औरत बेलदार के लिए ठीक नहीं फिर ये सारे दिन का काम है। इससे तो तू बर्तन-सफाई ही करे तो अच्छा है। तू घर और बाहर दोनों संभाल लेगी। बीच के बखत में आराम भी मिलेगा। घर का काम भी कर पाएगी और बच्चे भी देख लेगी।’’
मन मारकर रह गई थी रज्जो। ढीठ बनकर उसने कुछ समय घरों में काम नहीं पकड़ा। यही सोचकर कि शायद किसी दिन मुरारी हामी भर ही दे। इधर मुरारी के छोटे भाई मेरठ-बुलंदशहर जाकर कमाने लगे थे तो घर की तरफ की जिम्मेदारी कुछ हल्की जरूर हुई थी पर रज्जो समझ ही नहीं पाती थी कि पैसे में कौन से पंख लगे हैं जो हथेली पर रुकता ही नहीं। यों भी दिल्ली जैसे शहर में चार लोगों का पेट पालना आसान बात नहीं थी। अज्जू-रिंकी में से कोई न कोई बीमार पड़ जाता या फिर ऐसी जरूरत निकल आती कि रुपये-पैसे की किल्लत पड़ ही जाती। 
यादों की गलियों में चक्कर खाते पूरी रात के जागरण के बाद आज सुबह रज्जो का जी किसी काम में नहीं लग रहा था। जैसे-तैसे उसने सुबह के काम निबटाए। मुरारी को आज सोनीपत निकलना था। पुरुषोत्तम के हाथ एक बड़ा ठेका लगा था जिसे वह किसी भी सूरत में हाथ से निकलने नहीं देना चाहता था। कई मंजिला मकानों वाली इमारत का काम था जो हर हाल में समय पर पूरा किया जाना था। बेलदारों और मिस्त्रियों के साथ फर्श डालने के लिए मुरारी जैसे कितने ही कारीगरों की जरूरत पुरुषोत्तम को थी। काम में समय भी लंबा लगने वाला था। रज्जो ने बेमन से ही सही खाना बना-बांधकर मुरारी को सौंप दिया। उसके जाने के बाद बच्चों की कूद-फांद के बीच भी वह अनमनी-सी पड़ी रही। गंदे कपड़ों-बिना मंजे बर्तनों और बिखरे कमरे ने उसे कई बार चेताया पर उसने सबकी अनदेखी कर दी। खाना बन ही गया था बाकी काम मुरारी के आने से पहले निबटाने का सोचकर वह लेटी ही रही। पास बैठे बच्चों ने एक टूटे खाली डिब्बे को लात मारकर एक-दूसरे की ओर ठेलने का खेल बना लिया। डिब्बा टनन-टनन सा ठोकर खाता यहां से वहां ढोलने लगा। रिंकी और अज्जू अपनी बारी आने पर तेज ठोकर मारकर हंसते पर खेल देखती रज्जो उस डिब्बे की शक्ल में खुद को पा रही थी।
शाम को मुरारी बहुत दिनों बाद मीट लेकर घर पहुंचा तो बच्चे चहककर नाचने लगे। बेमन से उठकर रज्जो पकाने की तैयारी में लगी ही थी कि मुरारी का फोन बज उठा। बातचीत पर कान देने से जल्दी ही रज्जो को पता चल गया कि मां का फोन है।
‘‘ पास में बैठी है रज्जो…ले, कर ले बात।’’ कहते हुए मुरारी ने उसे फोन थमाया।
‘‘ कैसी है मां?’’ मां से बात करते रज्जो की सांसें तेज हो गईं। थोड़ी ही देर में मुरारी ने देखा रज्जो फोन पर चुप-सी हो गई और बात करते हुए धीरे से कमरे से निकल गई। मुरारी जानता है जब भी रज्जो अपनी मां से कुछ जरूरी बात करती है तो ऐसे ही कमरे से निकल जाती है ताकि मुरारी सुन न सके। आज भी यही हुआ। कुछ देर बाद लौटी रज्जो से मुरारी ने कुछ नहीं पूछा। रज्जो भी परेशान-सी काम में लगी रही। रात खाना खाकर जब मुरारी साथ बैठा तो रज्जो ने झिझकते हुए बताया कि मां को पैसे की सख्त जरूरत आन पड़ी है। रज्जो से मुरारी की हालत छिपी नहीं थी पर ठेकेदार से कुछ पैसा एडवांस मांगा जा सकता था। मीट खाने से रंग में आया मुरारी रज्जो की बात पर उखड़ गया।
‘‘ मैं कहां से लाऊं पैसा? जो है तेरे सामने है। तेरी मां मांगे न अपने बेटे से। जरा कोई मुसीबत आई खट्ट से लड़की को फोन लगा दिया…यहां क्या पैसे का पेड़ खड़ा है?’’
रज्जो पति का मुंह देखती रह गई। उसके शरीर का सारा खून जैसे सूख चला। चेहरा झक्क सफेद हो गया। आंखें फट पड़ीं और आंसुओं का सैलाब फूट पड़ने को हुआ जिसे रज्जो ने बड़ी मुश्किल से काबू किया। उसने महसूस किया आज वह खुद कमा रही होती तो फौरन मां की मदद कर देती और यूं पति के आगे हाथ फैलाने पर शर्मिंदा न होना पड़ता। खुद अपने हिसाब से सब सोचती और पति भी उसके चार पैसे की कदर करता। टूटे मन से आज रज्जो ने मिस्त्री बनने का सपना छोड़ घरों में काम करने का मन पक्का कर लिया। बरसों से खुरंट पड़े ज़ख्म नयी चोट से टीसने-बहने लगे। 
इधर रज्जो एक घर में काम करने की हामी भरके आ गई। तीन दिन बाद उसे काम पर जाना था कि अचानक मुरारी की मां बीमार पड़ी और तुरत-फुरत मुरारी को भोजाका के लिए निकलना पड़ा। बच्चे और रज्जो पीछे रह गए। मुरारी को कुछ दिनों में वापिस काम पर लौटना था। मुरारी तो नहीं लौटा उसके एक्सीडेंट की खबर लौटी जिसने रज्जो के प्राण सुखा दिए। भोजाका से चलकर वापिसी के समय ट्रक-टैंपो टक्कर में मुरारी कई और लोगों सहित बुरी तरह घायल हो गया। ऐसे में उसका लौटना मुश्किल था। पूरी बस्ती में जैसे रज्जो अकेली हो गई। हर घड़ी मुरारी का ध्यान उसे परेशान करता। उसकी सूरत आंखों के आगे छाई रहती और ऐसी हालत में मुरारी की सेवा-टहल न कर पाने का अफसोस उसे खाए जा रहा था। मैना उसकी हिम्मत बढ़ाती पर रज्जो के सब्र का बांध टूटता चला जा रहा था। फोन पर मुरारी की कराहती आवाज उसकी कानों में पूरे दिन हाहाकार मचाए रही। 
कहते हैं कि गरीब की मुसीबतों को तो घर का पता भी नहीं पूछना पड़ता। शाम का समय हो चला था… बच्चों को खाना खिलाकर रज्जो खाना खाने बैठी तो टीवी पर खबर चल पड़ी कि शहर में फैली नई कोराना महामारी के चलते कल से सारे काम, बाज़ार, दफ्तर बंद किए जा रहे हैं। मुरारी की चिंता से अभी तक वह उबरी भी नहीं थी कि एक नई मुसीबत आ खड़ी हुई। कोई रोड पर न निकले। टीवी पर प्रधानमंत्री की घोषणा चल रही थी पर रज्जो की समझ में कुछ नहीं आ रहा था। उसने अज्जू और रिंकी की ओर देखा। एक कौर रोटी का उठाया, कुछ देर यह सब सोचती रही… अगर घर से बाहर नहीं निकलेगी तो मुरारी के पास कैसे जाएगी? अगर सारे काम बंद हो जाएंगे तो लोग क्या कमांएगे? क्या खाएंगे? हाथ में लिया रोटी का कौर उसने फिर से थाली में रख दिया। वह उठी और कमरे के कोने में रखे पुराने ट्रंक को टटोला, कपड़ों को हटाया, कपड़ों के नीचे बिछे अख़बार के नीचे कुछ रुपए उसे मिले। कितने जतन से जोड़े थे ये रुपए। उसने गिने दो हजार के करीब रुपए थे। उसने हिसाब लगाया कि इतने से यहां रहना मुश्किल होगा।
‘‘ मम्मी मम्मी! …  सुन ना…’’ अज्जू की आवाज़ ने जैसे उसका ध्यान भंग किया।
‘‘ मम्मी फिलम लगा दे न ये अंकल क्या कह रहा है……?’’
 वह उठ खड़ी हुई कुछ सोचते हुए गली में निकल आई। गली में तो जैसे भगदड़-सी मच रही थी। हर कोई बाज़ार भाग रहा था। उसे याद आया जब अज्जू हुआ था उस साल भी नोटबंदी के बाद ऐसी ही मुसीबत आई थी। उन दिनों को याद करती रज्जो अचानक घबराई-सी बोली-
‘‘ अज्जू! अज्जू! सुन ज़रा बहन का ध्यान रखियो, मैं अभी आई।’’
 थोड़ी देर में कुछ दिन का राशन लेकर रज्जो वापस लौटी। 
कई दिन दुविधा में पड़ी रज्जो ने एक दिन हिम्मत करके मुरारी के पास जाने की बात सोच ली। जरूरी सामान एक बड़े से थैले में बांधा। मैना ने बहुत समझाया पर रज्जो न मानी। रिंकी को गोद में उठाया और अज्जू के संग घर से निकली तो शहर में फैली महामारी ने तमाम रास्ते बंद कर दिए। कोई साधन नहीं मिला तो हिम्मत करके पैदल ही आगे बडे़ बस अड्डे की ओर बढ़ गई। उसका जुनून खतरे कहां देख पा रहा था। कुछ आगे बढ़ी तो पुलिस वालों ने उसका रास्ता रोक लिया। डांट-गलियाकर उसे वापिस घर भगा दिया। उसके जीवन की हर उम्मीद पाला पड़ने से मुरझा गयी। मुरारी की याद उसे अपनी ओर खींचती लेकिन मुसीबत उसके पैरों में बेड़िया डाले थी। रज्जो जानती थी कुछ लोग जिंदगी के डरों का डटकर सामना करते हुए महामारी से होने वाली मौत से घबराकर तुरंत गांव-देहात अपनी जड़़-जमीन-परिवारों की ओर लौट गए थे। ट्रेनें  बंद पड़ी थीं। कितने लोग चोरी-छिपे निकल रहे थे। एक बारगी रज्जो ने सोचा वो भी उनके संग निकल भागे पर किराया सुनकर रज्जो की आंखें फट गईं। प्राइवेट गाड़ी में एक आदमी का पांच हजार रुपया। कहां से लाती रज्जो इतना रुपया? पैसे की तंगी, पुलिस के बिठाए डर और बीमार पड़ गए अज्जू ने उसके कदम रोक दिए। शाहबाद की कच्ची बस्ती के कितने घर खाली हो गए थे। पुरुषोत्तम की टीम भी समय रहते जैसे-तैसे दिल्ली से निकल गई थी। बरसों से शहर को बसाने-सजाने, इसकी मरम्मत में रात-दिन एक करने वाले मजदूरों के लिए बदहाली के दिनों में आमदनी का कोई पक्का इंतजाम न था। सरकार भी चुप, उसके अफसर भी चुप। काम बंद, रास्ते बंद पर पेट की भूख चैबीस घंटे जाग रही थी। घर लौटने वाले कितने ही रास्ते घर की ओर न मुड़कर मौत से जा मिले और पीछे रह गए लोगों के हिस्से में आई भूख और तकलीफें। आड़े वक्त की बचत रज्जो के काम आई पर मामूली बचत ही थी कोई खजाना नहीं। 
रज्जो टीवी पर देख रही थी शहरों से पैदल निकले मजूर घर और बच्चों को ढोते मुसीबत के मारों की तरह बेदर्द जिंदगी से जूझ रहे थे। कितने काम-धंधों से निकाले गए। कितनों ने भूख,धूप और निराशा में रास्ते में ही दम तोड़ दिया। छोटे बच्चों की बेहाल सूरतें देख रज्जो रिंकी और अज्जू को सीने से सटा लेती। डर के साए लंबे होते जा रहे थे। जीवन में पहली बार रज्जो ने शहर मजदूरों से खाली होते देखा। बात दिल्ली की नहीं सभी शहरों की थी। उसे समझ नहीं आ रहा था सरकार किस मुंह  से मजदूरों के जत्थों से धीरज बनाए रखने की बात कर रही है।
 ‘‘पापा! कहां है? घर क्यों नहीं आता मम्मी?’’
 ‘‘काम पर गया है न। जल्दी ढेर सारी चिज्जी लेके आएगा।’’
 ‘‘और खिलौना भी?’’
‘‘हां…वो भी।’’
 अज्जू बार-बार मुरारी को याद करके रज्जो से पूछता तो रज्जो नए-नए बहाने गढ़ती। बीमारी से हो रही लगातार मौतों और थर्राई दिल्ली में कमरे से बाहर निकलने को मचलते रिंकू-अज्जू को रज्जो   कैसे-कैसे बहलाती इसे उसका दिल ही जानता था।
मुरारी के सर में टांके आए थे और पैर की हड्डी तीन जगह से टूट चुकी थी। ठीक होने में कम से कम छह महीने का समय लगना था। मुरारी के इलाज का खर्च तो किसी तरह उसके मां-बाप ने उठा लिया पर यहां रज्जो के कमरे का किराया,खाने-पीना, हारी-बीमारी का खर्च उसकी नींद का दुश्मन बन गया था। पैसा न मुरारी के पास था न रज्जो की मां के पास। बस्ती मजूरों से लगभग खाली हो गई थी। रज्जो की तरह मजबूरी के मारे कुछ परिवार ही यहां बचे थे। दिहाड़ी मजदूरों की आमदनी पूरी तरह बंद थी। घरों में काम करने वाली माइयों में से कुछ के मालिक ही उन्हें पैसा दे रहे थे। पर रज्जो के लिए तो ये रास्ता भी बंद था। महामारी के डर से लोगों ने घरों में किसी भी बाहर के आदमी से काम करवाना बंद कर दिया था। रज्जो की समझ काम नहीं कर रही थी। बच्चों को कलेजे से लगाए रज्जो ने दो महीने का समय जैसे-तैसे निकाला। मैना ने ही उधार देकर उसकी हिम्मत बांधे रखी। अक्सर मुरारी से रज्जो की बात भी मैना करवा देती।
‘‘ बच्चे कैसे हैं रज्जो? तू कैसी है? तू घबरा मत जल्दी ही आ जाऊंगा।” 
मुरारी ने दिलासा देते हुए कहा।
“मेरा जी बहुत घबरा रहा है। बच्चे रोज़ तुमको राज पूछते हैं। पैसे भी खत्म हो रहे हैं। बार-बार यही लगता है कि अस्पताल में तुम अकेले पड़े हो और मैं यहां।” यह कहते कहते रज्जो का गला भर आया। 
“तू फिक्र मत कर मैं कुछ इंतजाम करता हूं।” यह कह कर मुरारी ने फोन बंद कर दिया।
 मुरारी के शब्दों से रज्जो की रुलाई फूट पड़ी। बड़ी हिम्मत से उसने बात संभाली थी कि मुरारी को कोई और दुख न पहुंचे । दीवार से सटी रज्जो खाली आंखों छत निहार रही थी कि उसके दरवाजा किसी ने जोर से ठकठकाया। दरवाजा खोला तो सामने पुरुषोत्तम ठेकेदार को खड़ा पाया। मास्क लगाए पुरुषोत्तम को रज्जो उसके डील-डौल, आवाज़ और पहनावे से पहचान पाई। उसे लगा कि शायद मुरारी ने ही उसे भेजा है। 
‘‘ कहां है मुरारी? न फोन उठा रहा न बात कर रहा। साला! भग गया एडवांस लेकर।’’ 
रज्जो को देखते ही पुरुषोत्तम दहाड़ा।
‘‘ भागा नहीं है उसका एक्सीडेंट  हो गया है असपताल में पड़ा है। लौटेगा तो हिसाब पूरा कर देगा।’’ 
रज्जो को ठेकेदार की बात नहीं सुहाई।
‘‘यानी अब तो महीनों की छुट्टी काम से। कब लौटेगा? कब काम करेगा? कब चुकाएगा? कहना मुझे फोन करे। एक ढंग का कारीगर नहीं मिल रहा इन दिनों। शाहबाद में दीवार-लेंटर का काम है। इमरजेंसी में ज्यादा दिहाड़ी देने पर भी मिस्त्री नहीं मिल रहा। क्या दिन देखने पड़ रहे हैं।’’ 
कहते हुए पुरुषोत्तम ने पीठ फेरकर आगे का रुख किया।
‘‘मौका दो तो काम मैं कर दूं।’’ रज्जो ने हिम्मत करके कहा।
‘‘ तू करेगी?’’ पुरुषोत्तम पलटा और उसने रज्जो को गौर से देखा। काम आता है भी है तुझे?
‘‘ हां मौका तो दो।’’ रज्जो इस बार जोर देकर बोली। पुरुषोत्तम जरा चुप हुआ, फिर कुछ सोचकर बोला-
‘‘ चल ये भी करके देख लेते हैं पर ध्यान रखियो शिकायत का मौका मत दियो और मेरे माल का नुकसान न करियो। सिर्फ एक दिन दूंगा। एक दिन। वो तो मालिक मेरे सर पर खड़ा है। दिन-रात मेरी जान लिए हुए है तो तुझे काम दे रहा हूं।’’
दो घड़ी की चुप्पी के बाद रज्जो के भीतर जिंदा बची रह गई रज्जो बाहर आई-
‘‘कल से?’’ रज्जो ने पूछा तो उसकी बात पर ठेकेदार ने हामी भरी और पता देकर चला गया।
रज्जो के इस बोल से घर की दीवारें झनझना उठीं। रज्जो सीधी खड़ी होकर सामने देख रही थी जैसे कल की तैयारी में उसे अभी से जुटना था। अचानक उसे कुछ याद आया। उसने झटपट सामने का आला टटोला। अगले पल उसकी मुट्ठी बंधकर तनी हुई थी। साहुल उसकी मुट्ठी में था। सारी सावधानी बरतकर और बच्चों को मैना के हवाले करके रज्जो अगले दिन काम पर जा पहंुची। सत्रह-अठारह साल का एक लड़का फ्लैट पर उसकी राह देख रहा था। दो महीने पहले की टूटी दीवारों का मलबा मंजिल पर यों ही पड़ा था। सामने ही औजार और रेत-सीमेंट-बालू के संग ईंटें खड़ी थीं। फावड़े से मलबा सकेरकर,ईंटों पर पानी मारने और मसाला बनाने का काम रज्जो ने लड़के को दिया। रज्जो ने करनी और फंटी को ध्यान से देखा। दोनों  पर सूखे रेत और सीमेंट की परत चढ़ी थी जैसे रज्जो की तरह ये दोनों भी लंबे समय से बेकाम थे। रज्जो उकडू बैठकर उन्हें साफ और खुद को तैयार करती रही। बेलदार लड़के ने अपना काम निबटाया और मसाला बनाकर, तसला भरकर रज्जो के आगे रख दिया। रज्जो हौले से उठी अपने बापू की तरह ही करनी की पहली चोट पुरानी दीवार में दे मारी फिर एक हाथ से करनी में मसाला भरकर दूसरे हाथ से पहली ईंट फर्श पर रखी। एक के बाद एक ईंट धरती गई। मसाले से उन्हें जोड़ती गई। साहुल से सीध नापती गई। लाल और धूसर रंग की दीवार ज्यों-ज्यों उठ रही थी उसका एक-एक ज़ख्म भरता जा रहा था। नौ इंच मोटी दीवार उसके लिए अनगिनत सपनों के दरवाजे खोले दे रही थी। दीवार उठ रही थी और दुखों के पहाड़ ढह रहे थे। करनी की आवाज और साहुल की संगत रज्जो में जोश भर रही थी। पसीने में नहाई रज्जो आज रुकी नहीं। वो दीवार उठाती जा रही थी। उसे बस एक ही धुन सवार थी शाम को दिहाड़ी के बाद मुरारी से उसे यह जरूर कहना है-‘‘ जल्दी से ठीक हो जा, फिर अपने घर की दीवार दोनों साथ मिलकर उठायेंगे।’’
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किताबें

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