Monday, June 17, 2024

ममता शर्मा
पता
57,साउथ एंड
मानसरोवर रोड नंबर 2
एंसीलरी मोड़ के करीब
पोस्ट हटिया रांची 834003 झारखंड
ईमेल :[email protected]
संक्षिप्त परिचय :हंस, वागर्थ ,कथाक्रम,परिकथा ,साहित्यअमृत , शब्दयोग ,ककसाड़ ,जनपथ ,स्त्रीकाल ,मलयजब्लॉगस्पॉट, अक्षरपर्व, हिंदीसमयडॉटकॉम ,अभिनव मीमांसा , हिंदी प्रतिलिपि, अंतरंग पत्रिका ,किरण वार्ता, कलमकार वार्षिक पत्रिका ,कथा समवेत ,नया साहित्य पत्रिका,विभोम स्वर पत्रिका, लिटरेचरपॉइंट डॉट कॉम, काव्यांजलि ई पत्रिका, हस्ताक्षर वेब पत्रिका, पुरवाईडॉटकॉम,रचना उत्सव आदि में कहानियां प्रकाशित
कथासंग्रह मेफ्लाई सी ज़िन्दगी प्रकाशित
अनीता रश्मि के संपादन में डायमंड बुक्स से प्रकाशित संग्रह नारीमन की कहानियां में कहानी शामिल
सम्प्रति:एक राष्ट्रीय संस्थान में सेवारत

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अंधेरे से पहले

प्रेमबाबू को लगता है चलने के लिए अब स्टिक की जरूरत है और आंखों की रोशनी भी थोड़ी कम हो गई लगती है …. कानों में भी आवाजें थोड़ी कम आने लगी हैं … और ये टांगे … इन्‍हें क्‍या हो गया । पिछले 80 बरस से … नहीं नहीं 80 कहां … 85 तो पिछले महीने ही पूरे किये तो 2-3 और जोड़ लेते हैं … हां तो यही 83 बरस से लगातार बिना रूके किसी आह -ऊह के साथ दे रही है । अब ये टांगे भी कमबख्‍त …. ।
महीना भर हुआ प्रेम बाबू का 85वां जन्‍म दिन मनाया गया था । गुब्‍बारे खरीदे गये थे लाल, हरे, पीले, नीले और पोल्‍का डाट वाले भी …. कहां से ले आई थी गिन्‍नी इतने रंग …. कहती थी बाउजी जितने रंग आपकी जिंदगी के उतने ही रंग गुब्‍बारों के …. ।
‘मेरी जिंदगी के रंग …. अरे तुझे कैसे पता मेरी जिंदगी के रंग ….’
लो, आप ही तो कहते थे हमारी जिंदगी बड़ी रंग-बिरंगी थी … तरह-तरह के रंगों से भरी हुई ।
अच्‍छा ऐसा कहा था मैंने । प्रेम बाबू कुछ याद करते ।
अब भूल गए क्‍या … बाउजी, भुलक्‍कड़ हो गए क्‍या …. मेमोरी लॉस ….. ।
और प्रेम बाबू गिन्‍नी के कान पकड़ने को लपकते ।
गिन्‍नी जानती थी कि प्रेम बाबू को याददश्‍त खत्‍म होने की बात कहना माने उनके क्रोध का शिकार होना ।
‘अरे याददश्‍त कमजोर हो मेरे दुश्‍मनों की ….. जिसे जो जी में आता है कह कर चला जाता है ….. तकिया कलाम हो जैसे …. बाल क्‍या सफैद देख लिए बस एक जुमला हवा में फेंक दिया’ ।
‘उमर हो गई है न…. याददाश्‍त कमजोर हो गई है …..’
‘बस बाउजी …. बस’ … गिन्‍नी ऐसे समय में उन्‍हें ढ़ाढस बंधाती
‘अरे उनके कहने से क्‍या …. किसी के कहने से याददाश्‍त कमजोर थोड़े ही हो जाती है ….’ ऐसा लगता गिन्‍नी उनकी पोती नहीं कोई बड़ी बुजुर्ग हो और वे एक नन्‍हा सा बच्‍चा !
गिन्‍नी दद्दा कहो … दद्दा भी तो सुनने में कितना प्‍यारा शब्‍द लगता है …. ।
‘नहीं कहूंगी …. नहीं कहूंगी … नहीं कहूंगी …. गिन्‍नी लगातार सर हिलाती और प्रेम बाबू के गले में अपनी नन्‍हीं नन्‍हीं बाहें लपेट कर खड़ी हो जाती …’
‘जाने दो बेटा नाम में क्‍या रखा है जैसे चाहे ले लो जिसमें इसका दिल खुश हो …’
प्रेम बाबू बहू को समझाते । गिन्‍नी के लिए बाउजी कोई रिश्‍ता नहीं था वह जबान पर चढ़ गया एक शब्‍द था जिससे उसे प्‍यार हो गया था और इससे अलग किसी शब्‍द से मानों वह खुद को कनेक्‍ट नहीं कर पाती थी ।
‘नाम-वाम में कुछ नहीं है दद्दा कहो, बाउजी कहो बस प्‍यार मिलता रहे – प्‍यार जिन्‍दगी को आबाद कर देता है ….’ वे कहा करते ।
तो कहीं प्‍यार की कोई कमी तो नहीं रह गई गिन्‍नी की जिन्‍दगी में … उनकी तरफ से … या फिर माता-पिता की तरफ से …. ।
जी करता है एक बार बेटे बहू से पूछें कि उन दोनों ने तो गिन्‍नी को प्‍यार देने में कहीं कोई कंजूसी तो नहीं की ….
लेकिन अब इन बातों में रखा ही क्‍या है … उन्‍हें दु:ख ही तो होगा ।
प्रेम बाबू के लिए यह सब कुछ किसी पहेली की तरह है ।
जिन्‍दगी मुश्किल हो गई है … !!
जिंदगी मुश्किल हो गई है ?? कैसे मुश्किल हो जाती है जिंदगी ? कौन सा पैमाना है जो इन मुश्किलों को मापता है ? कैसी होती है 15 सालों की जिंदगी की मुश्किलें??
और वे यादों में गुम हो जाते हैं कैसी थी उनकी अपनी 15 साल की उमर वाली जिंदगी … कौन प्‍यार करता था और कौन डांटता था… किससे पिटते थे और कौन कान उमेठता था किसे देखकर रश्‍क होता था और किसे देखकर नफरत … प्रेम बाबू को याद आया कि मां तो बहुत प्‍यार करती थी और यह भी याद आया कि मां के उस प्‍यार को वे अपना अधिकार ही समझ लेते थे जैसे उसका कोई मोल ही न हो .. बस ऐसे ही पा लिया गया हो । बस यूं ही दे दिया गया हो । पिताजी के थप्‍पड़ कितने याद रहते थे, उन थप्‍पड़ो से रिसने वाले दर्द का अहसास तो आज बरसों बाद भी आह बनकर निकल आता है … लेकिन जिंदगी तो तब भी आसान ही थी …
ओह गिन्‍नू …. मेरी प्‍यारी बच्‍ची !
प्रेम बाबू ऊपर आकाश की तरफ ताकते हैं मानों सवालों के जवाब आकाश में कहीं टंगे हों।
प्रेम बाबू को याद आता है स्‍कूल के नतीजे आने के बाद नई क्‍लास में जाने की खुशी तो पता नहीं कितनी होती थी मगर नई किताबों की खुशी तो आज बरसों बाद भी दिलो दिमाग पर छाई हुई है और फिर जब पिताजी न जाने किस आर्थिक मजबूरी के अधीन पुरानी किताबों की दुकान से पुरानी किताबें ले आते थे तो आंख से आंसू निकल आते थे .. किताबें वैसी पुरानी भी न हुआ करती मगर दिल तो नई की आस बैठा होता था …. कितने नमकीन होते थे वे आंसू जो पता नहीं क्‍यों निकलते थे, नई किताबों के अभाव में या फिर दोस्‍तों के बीच पुरानी किताबें लेकर जाने की नाम से … मगर जिंदगी ? …. वह तो तब थी मुश्किल नहीं लगती थी मेरी प्‍यारी गिन्‍नू….
और फिर एक बार स्‍कूल से सब पिकनिक जानेवाले थे और सबको 20-20 रुपये लाने को कहा गया था मगर पिताजी ने साफ मना कर दिया था । मां ने तब शंकर जी की तिजोरी से 20 रुपये निकालकर चुपके से हाथ पर रख दिए थे । शंकर जी की तिजोरी कितनी बरकतों वाली थी और मां मुसीबत में उसकी शरण में जाया करती थी । घर के एक अंधेरे कोने में जहां ढेर सारी मूर्तियां रखी हुई थी और जहां शाम के वक्‍त मां जाकर दीये की रोशनी कर आती थी वहीं एक शंकर जी की तिजोरी हुआ करती थी जिसका पता और जिसकी चाबी सिर्फ मां के पास होती ।
‘मां भगवान अंधेरे में क्‍यों रहते हैं …. ?’
आंचल पकड़े प्रेम बाबू मां से पूछा करते … अंधेरे से डरे सहमे प्रेम बाबू …
‘बच्‍चा इसलिए कि हम पर नजर रख सकें कि हम क्‍या-क्‍या करते हैं … अंधेरे में रहकर रोशनी को देखना आसान होता है न ….’
कितना यकीन था उन उत्‍तरों पर … इतना कि उनके आगे कोई सवाल नहीं बन पाता था … शायद यही यकीन जिंदगी को आसान बना देता था … और कभी मुश्किल नहीं लगती थी जिंदगी गिन्‍नी मेरी प्‍यारी बच्‍ची ….
और …. और अगर लगती भी थी तो अपने इस बाउजी को ही बता दिया होता शायद ये आसान कर देते उन मुश्किलों को …. ।
प्रेमबाबू की आंखों से परनाले बहने लग जाते और क्‍या हुआ था 15 साल की जिंदगी में … गणित के बहुत से सवाल हल नहीं हो पाए थे 15 साल की उमर में …. पिताजी तो बड़े पक्‍के थे गणित में … सारा मुहल्‍ला ही … नहीं नहीं सारा शहर उनके गणित ज्ञान से वाकिफ था और लाभ भी उठाता था । सुबह शाम उनके इर्द-गिर्द पढ़ने वाले लड़कों की भीड़ रहा करती …. ।
‘मां ये सब कौन हैं ? ….’
‘ये सब गणित के सवाल लेकर आए हैं …. तुम्‍हारे पिताजी से हल करवाने के लिए ….’
लेकिन प्रेम बाबू को यकीन ही नहीं होता कि पिताजी गणित के सवाल हल किया करते हैं क्‍योंकि उनके लिए पिताजी ने गणित के सवाल कभी नहीं हल किए और हमेशा सवालों के एवज में प्रेमबाबू को कुछ थप्‍पड़ मिल जाया करते जो उस मासूम सी उमर में कितने डरावने और विषाद से भरे हुआ करते और जिनके ऊपर मां अपने छोटे-छोटे मगर थोड़े खुरदुरे से हाथों से प्‍यार की मलहम लगा दिया करती … जिंदगी की मुश्किलें ऐसे ही आसान हो जाया करती थी गिन्‍नू मेरी प्‍यारी बच्‍ची … प्रेम बाबू इन सब दिनों को कहां याद कर पाए, कभी भी तो ऐसे याद नहीं किया… गिन्‍नी जब आसपास थी तो कहां याद आए वे सारे दिन ….!
85 बरस की उमर में उनकी आंखें मां की याद में ऐसे भर आई जैसे सब कल ही की बात हो, जैसे कल ही पिताजी ने थप्‍पड़ मारा हो और बस कल ही मां ने अपने छोटे और खुरदुरे से हाथों से प्‍यार से सहलाया हो ….
प्रेम बाबू को महसूस होता है मां बड़ी जल्‍दी चली गई । उन्‍हें लगता है मां की आंखों में व्‍याप्‍त प्रेम के अथाह सागर को वे जी भर महसूस ही नहीं कर पाए और मां चली गई । प्रेम बाबू को लगता है कि गिन्‍नी अगर आसपास होती तो उसे वे यह बता पाते कि जो ‘है’ उसे महसूस न कर पाने का कष्‍ट भी कितना यंत्रणादायी होता है, प्रेमबाबू को लगता है कि गिन्‍नी अगर आसपास होती तो वे उसे बता सकते कि मां के छोटे और खुरदुरे हाथों का स्‍पर्श कैसे उनके गालों पर आज भी उतना ही ताजा है, और यह भी पूछते कि क्‍या जिंदगी हर शै से इतनी महरूम हो गई थी कि तुझे ….
‘बाउजी आपका समय कैसा था ?’
गिन्‍नी ने एक दिन अचानक ही सवाल किया था । अचानक जैसे सीधी समतल जमीन से कोई बुलबुला फूट पड़े । प्रेम बाबू अब परतें खोल रहे हैं तो उन्‍हें गिन्‍नी का एक-एक सवाल याद आता है और हर सवाल उनके अंदर दहशत पैदा करता है । क्‍या उत्‍तर दिया था उन्‍होंने गिन्‍नी के सवाल का ! प्रेम बाबू ऑखों को बार-बार झपकाते हैं मानो कोई ब्‍लैक बोर्ड हो सामने जिस पर सब कुछ लिखा हुआ है और …. और … उन्‍हें देखने में मुश्किल हो रही हो ।
कहीं कोई नकारात्‍मकता तो नहीं थी उनके उत्‍तर में जिसे गिन्‍नी ने सीने से लगा लिया और ….
‘हमारा समय…. हमारा समय तो गिन्‍नू बहुत अच्‍छा था इतनी भाग दौड़ कहां थी … सादगी थी …. इतने साधन नहीं थे और थे भी तो हमारी पहुंच से बाहर थे … गिन्‍नू तुम्‍हारा यह बाउजी पैदल स्‍कूल जाया करता था तभी तो ये टांगे अब तक ऐसी मजबूत हैं ऐसी मजबूत कि चाहूं तो दौड़ में तुम्‍हें भी पछाड़ दूं’ ।
‘और क्‍या था बाउजी … पैदल जाते थे … क्‍यों आपको छोड़ने वाला कोई नहीं था, आप अकेले चले जाते थे … और बाउजी आपका बस्‍ता … आपका बस्‍ता जरूर इतना भारी नहीं होता होगा … हमारे बस्‍तों जैसा … बाउजी आपने देखा है हमारा बस्‍ता … कभी उठाकर देखिए इसे लेकर तो आप 10 कदम भी न चल पाएं ….’ ।
प्रेम बाबू के कदम थम जाते हैं …. वे गिन्‍नी के सर पर हाथ फेरने लगते हैं ।
‘हां ये तो मानना पड़ेगा … बस्‍ते इतने भारी नहीं होते थे … लेकिन ….’
‘लेकिन क्‍या बाउजी … आपको मानना पड़ेगा …. ये तो मानना ही पड़ेगा …’
प्रेम बाबू उस दिन गिन्‍नी के सवाल पर हार मान गए थे … चुप हो गए थे । प्रेम बाबू ग्‍लानि से भर उठते हैं क्‍यों चुप हो गए थे वे, वे क्‍यों नहीं बता पाए गिन्‍नी को कि बस्‍ते भारी है तो क्‍या हुआ जिंदगी से भारी तो नहीं … जिंदगी तो बहुत बड़ी होती है । उन बस्‍तों से बहुत-बहुत बड़ी और उन बस्‍तों से बहुत-बहुत भारी गिन्‍नू मेरी प्‍यारी बच्‍ची वह इतनी जल्‍दी हाथ से कैसे छूट सकती है … । जिंदगी मानों कोई पज़ल हो जिसके टुकड़े इतने सालों में कहीं के कहीं रख दिए गए हों अलग-अलग शहरों में बिखरे हो, अलग-अलग दफ्तरों में, गांव की किसी पगड़डी पर किसी बड़े दरख्‍त के नीचे पड़े हों …. और रेल के किसी डब्‍बे में पड़े हो … कितने पजल हैं जिंदगी के यहां वहां बिखरे हुए … प्रेमबाबू उन पजल को समेट रहे हैं और शक्‍ल बनाना चाहते हैं जिंदगी की, हर टुकड़ा तो उन्‍हें मिल जाता है कोई गुम नहीं हुआ है; हर टुकड़ा कहीं न कहीं मौजूद है सिर्फ उसे तलाश करने की जरूरत होती है ।
प्रेमबाबू अफसोस से भर उठते हैं कि काश गिन्‍नी भी समझ पाती या फिर कि वे गिन्‍नी को समझा पाते कि माना जिंदगी एक पज़ल है लेकिन उसके टुकड़े सिर्फ बिखर जाते हैं गुम नहीं होते और थोड़ी कोशिश से उन टुकड़ों को तलाश किया जा सकता है फिर उन्‍हें जोड़कर जिंदगी को फिर तैयार किया जा सकता है गिन्‍नू मेरी प्‍यारी बच्‍ची ….। प्रेम बाबू शाम की लंबी सैर पर अब जाने से कतराते हैं शाम की लंबी सैर उनके रूटीन का कितना अहम हिस्‍सा था और शायद उनकी तंदरूस्‍ती का भी … लेकिन अब वे शाम की लंबी सैर से बचना चाहते हैं क्‍योंकि उन्‍हें लंबी सैर के दौरान वे बेंचे मिल जाया करती हैं जिन पर गिन्‍नी आगे-आगे दौड़कर अपने दद्दा … नहीं नहीं दद्दा नहीं …. बाउजी को हराने की कोशिश में जाकर बैठ जाया करती थी।
‘मान जाइए बाउजी आपकी टागें अब स्‍ट्रांग नहीं हैं 80 ईयर्स पुरानी हैं ।
‘हा हा हा …. 80 इयर्स पुरानी और उतनी ही मजबूत …. ये तो कछुए और खरगोश की कहानी है …. जीतेगा तो कछुआ ही हा हा हा …..’
प्रेम बाबू आवाजें बदलकर अपनी प्‍यारी पोती को बहलाते ।
प्रेम बाबू कभी रिग्रेट करते कि कुछ कहानियां छूट गईं जो उन्‍होंने गिन्‍नी को नहीं सुनाई … कितना कुछ बताया जा सकता था … कितने किस्‍से अनकहे रह गए । प्रेम बाबू आराम कुर्सी पर छत की तरफ ताकते हैं और एक-एक अनकहे किस्‍से को याद करते हैं । मसलन गिन्‍नी को उसकी दादी के जीवन का संघर्ष सुनाया जा सकता था । कितना लाजिमी होता गिन्‍नी को यह बताना कि छोटी बड़ी और मंझोली उमर के लोगों के एक बड़े परिवार के बीच रहते हुए दादी ने जुनून की तरह अपनी पढ़ाई को पूरा किया था और डिग्री हासिल की थी । हां वह जुनून ही तो था, वे भी कहां पत्‍नी का साथ दे पाए थे; किस तरह वे परीक्षाएं पास की गई थी जिनके लिए उन्‍हें कोई शबाशी नहीं दी गई थी और जिन्‍हें एक गैर जरूरी कसरत बताया जाता था । गिन्‍नी को यह जानना कितना जरूरी था कि अमला … मतलब उसकी दादी ने कभी यह नहीं बताया था कि देखो जिंदगी अब बड़ी मुश्किल हो रही है । सच मानो गिन्‍नू मेरी प्‍यारी बच्‍ची उन्‍होंने कभी ऐसा कुछ भी नहीं कहा था … ।
प्रेमबाबू को लगता है उनके लिए कितना कुछ छोड़ गई है गिन्‍नी सोचने के लिए रिग्रेट करने के लिए । ओह इतना सारा कुछ पहले क्‍यों नहीं याद आया । गिन्‍नू मेरी प्‍यारी बच्‍ची तुमने यह सब क्‍यों न सुना ….. तेरे दद्दा …. नहीं नहीं दद्दा नहीं बाउजी को पहले कभी याद भी तो नहीं आया मगर तू भी कहां सुन पाई गिन्‍नू मेरी प्‍यारी बच्‍ची ।
गिन्‍नी अब कहीं नहीं है तो जैसे कोई फिलम रिवाइंड हो रही है बार-बार हर बार कानों में चुभने वाली तीखी सी आवाज के साथ । प्रेम बाबू को लगता है इन 85 बरसों की जिंदगी में उन्‍होंने कभी सोचा ही नहीं कि उन्‍होंने क्‍या जिया और क्‍या नहीं जिया; क्‍या खोया और क्‍या पाया; नहीं नहीं असल में जिंदगी में ‘कुछ नहीं ’जैसा उन्‍होंने कभी महसूस ही नहीं किया । बस उन्‍होंने पाया और जिया ही याद रखा । प्रेम बाबू को महसूस होता है कि किसे कहते हैं खोना – यह उन्‍होंने कभी जानने की कोशिश ही नहीं की । गणित के उन अनसुलझे सवालों में भी वे कुछ खोते कहां थे, टीचरों की रूखी सूखी घुड़कियों में और पिताजी के बेरहम थप्‍पड़ों में उन्‍होंने कुछ खोने का अहसास नहीं पाया था । हर बार जब पिताजी किसी बात के लिए मना कर देते मसलन एक नई कमीज पाने की चाहत या फिर कहीं किसी के घर देखा हुआ कोई खिलौना पाने की चाहत हो या फिर ऐसी ही कोई मामूली सी दिखने वाली चीज हो (जो उस कच्‍ची सी उमर में इतनी मामूली नहीं लगा करती थी) तो वे कुछ खोते कहां थे वह तो जैसे पाने की ऊर्जा से भर जाया करते थे ।
‘मां जब मैं पैसे कमाकर लाऊंगा तो तेरी शंकर की तिजोरी को गले तक भर दूंगा …. तब तुम इससे निकाल-निकालकर खूब खर्च करना मां’ प्रेम बाबू को याद आता है ऐसी ही कुछ कहा था उन्‍होंने एक दफे अंधेरी कोठरी में मां के पास बैठकर । उस दिन भी मां अपनी या किसी और की जरूरत के लिए शंकर की तिजोरी से पैसे निकाल रही थी ।
मां ने उन्‍हें गले से लगा लिया था और रोने लग गई थी । मां को उन्‍होंने बहुत कम रोते हुए देखा था शायद ही कभी सिवाय एक या दो बार के । लेकिन मां रोती थी तो लगता मानो कोई दिल पर हाथ रखकर उसे धीरे-धीरे निचोड़ रहा हो और उससे होनेवाली पीड़ा समूचे वजूद पर और समूचे कालखंड में पसर जाती थी । मगर … मगर गिन्‍नू मेरी प्‍यारी बच्‍ची जिंदगी फिर भी थमी नहीं थी … जिंदगी फिर भी कहीं गुम न हुई थी …. चलती रही थी … जिंदगी फिर भी कभी मुश्किल नहीं लगी थी … !!
प्रेमबाबू को महसूस होता है कि ये सारी बातें …. जिंदगी के सारे प्रीवियस रेकार्ड जो उन्‍हें अब तक बेमानी लगते थे कितने जरूरी थे और प्रेम बाबू को लगता है कि गिन्‍नी को यह सब बताया जाना चाहिए था चाहे जिस भी तरीके से बताया जाता मगर कितना जरूरी था यह सब बताया जाना।
‘बाउजी आप कहां चले गए थे …. कितनी दफे कहा है अंधेरा होने से पहले घर आ जाया करो ….’
प्रेम बाबू शाम को सैर से लौटे थे और बेटा और बहू दोनों उन्‍हें उलाहना सा दे रहे थे
‘अंधेरे से पहले …. हां ठीक ही कहते हो बेटा …. अंधेरे से पहले रोशनी होती है …. अंधेरे के बाद ….. । अंधेरे के बाद भी तो रोशनी होती है न …. ’
लेकिन यह सब हम तुम्‍हें कहां बता पाए गिन्‍नू मेरी प्‍यारी बच्‍ची …. तुम अंधेरे में ही जीती रहीं और अंधेरे में ही गुम हो गई गिन्‍नू मेरी प्‍यारी मासूम बच्‍ची …. तुम कहां हो गिन्‍नी मैं तुम्‍हें देख नहीं पाता तो मेरी आंखें कमजोर हो जाती हैं … उनकी रोशनी चली जाती है …. तुम सुनती नहीं तो मेरी आवाज नहीं निकलती…. गिन्‍नू तुम बाते नहीं करती तो मैं सुन नहीं पाता तुम आसपास चलती नहीं तो मैं चल नहीं पाता… मैं बेजा ही कहता रहा कि ये 80 बरस तक साथ देनेवाली टांगें कितनी मजबूत हैं …. और ये भी कि मेरी मेमोरी भी कितनी मजबूत है …. गिन्‍नू मेरी मेमोरी तो खत्‍म हो रही है अब …. सब कुछ तुम्‍हारे मौजूद रहने पर ही था गिन्‍नू मेरी प्‍यारी बच्‍ची …. लौट आयो गिन्‍नू अंधेरे से पहले लौट आना होता है गिन्‍नू ….
‘बाउजी…. आपने कुछ कहा …’
‘नहीं बेटा कुछ नहीं कहा… एक बात कहूं बेटा बुरा तो नहीं मानोगे और तुम भी सुमन…. तुम दोनों मेरी एक बात मान लो …. कहो न मानोगे …’
‘क्‍या बात है बाउजी’
बेटे ने चिंतित भाव के साथ प्रेमबाबू के दोनों हाथों को मुट्ठी में बांध लिया था ।
सुमन ने कंधे से पकड़ कर बाउजी को कुर्सी पर बिठा दिया ‘बात क्‍या है बाउजी… वे दोनों उद्विग्‍न हो रहे थे जैसे एक बेशकीमती चीज के गुम हो जाने पर दूसरी के गुम होने के भय से त्रस्‍त हो गए हों ….
‘तुम दोनों मुझे अब से बाउजी कहकर न पुकारना …. कुछ और पुकार लेना…. बहुत से शब्‍द हैं …. पिताजी …. पापा …. या डैडी या फिर कोई तीसरा चौथा शब्‍द ढूंढ लेना … पर ये बाउजी …. समझ रहे हो न …. इसे अब रहने दो’ ।
बरामदे की दीवारें तंग हो रही थी । ऐसा लगता था वहां तीन लोगों के लायक ऑक्‍सीजन नहीं रह गया था लेकिन फिर भी वे सांसे ले रहे थे ।
मोबाइल सं. 9430734424
9973958722

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