Wednesday, April 24, 2024
अपना परिचय : अपनी जुबानी
     
पैदाइश और पढाई दिल्ली में हुई। 29 नवंबर 1960 को जन्म हुआ। 33 साल बाद दिल्ली छूट गयी और कर्म-भूमि देवभूमि हिमाचल बना। 1993 में हिमाचल प्रदेश राज्य सेवा आयोग के माध्यम से कॉलेज में पढ़ाने बिलासपुर आ गई। प्रदेश के अनेक कॉलेजों में पढ़ाने के बाद 2018 में राजकीय महाविद्यालय सुन्नी से सेवा-निवृत्त हुई। 
पढ़ने-लिखने का शौक बचपन से था, शायद मां के संस्कारों की बदौलत, जिनके संदूकों में कपड़ों की जगह किताबें होती थीं। आज भी किताबें ही जिंदगी की संदूकची है।     
कॉलेज के दिनों में जितना कथा-साहित्य पढ़ा, उतना जिंदगी में कभी नहीं पढ़ा। अस्सी का दशक था और स्त्री-लेखन की बहार थी। शायद ही किसी हिंदी लेखिका की किताब पढ़ने से छूटी हो। स्त्री के रूप में अपने अस्तित्व की पहचान वहीं से हुई। 
फिर पत्रकारिता का शौक चढ़ा। कॉलेज की पत्रिका के लिए अटल बिहारी वाजपेयी, कमलापति त्रिपाठी, राजनारायण जैसे कई दिग्गज नेताओं के साक्षात्कार लिए। वे देश की सत्ता संभालने के लिए तैयारी कर रहे थे और मैं अठारह साल की उम्र में अपना मुकाम खोज रही थी। सराहना मिली तो लिखने का चस्का लग गया। बीस साल की उम्र में मित्र-प्रकाशन में सह-संपादक की नौकरी कर ली। लेकिन दो साल संपादन का काम सीखने के बाद लगा कि मुझे कुछ भी नहीं आता है और लिखने के लिए और पढ़ना होगा। पढे़ बिना मुक्ति नहीं, यह सोचकर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में दाखिला ले लिया और फिर एम. फिल और पी एच. डी करके ही निकली। अच्छे-अच्छे बंजर दिमाग वहां जाकर उर्वर बन जाते हैं। फिर रात बारह बजे तक खुलने वाली लायब्रेरी। कहानी, कविता, आलोचना, उपन्यास को पढ़ने के साथ इतिहास, समाजशास्त्र भी पढ़ा और राजनीति की कक्षा भी लगाई।
     मेरा शोध-कार्य पूश्किन और निराला पर था, तो पूश्किन की 200 कविताओं का रूसी से हिंदी में अनुवाद भी किया। छपवाने का काम अब कर रही हूं। इस बीच पत्रकारिता चलती रही। हंस, जनसत्ता आजतक, सूर्या, फिल्मी कलियां, मनोरमा — कई पत्र-पत्रिकाओं के लिए लिखा। सामान्य लेखों से लेकर पुस्तक-समीक्षा तक। देश और विदेश के कई साहित्यकारों के सृजन की समीक्षा की, जिनमें हिमाचल के जाने-माने अनेक लेखक शामिल हैं।
अनुवाद के क्षेत्र में ज़्यादा मन रमा। एमिल ज़ोला की ‘नाना’ का रूपांतर किया, पाल कारूस की ‘द गास्पल ऑफ बुद्धा’ का ‘बुद्धगाथा’ नाम से अनुवाद किया। कई अन्य किताबों, कहानियों और आलोचनात्मक लेखों के अनुवाद किए। बाल-साहित्य मौलिक भी लिखा और अनुवाद भी किया। कॉमिक्स भी लिखे।
पटकथा-लेखन भी किया। गिरिजा कुमार माथुर और केदारनाथ सिंह पर क्रमश: दूरदर्शन और एन.सी.ई.आर.टी के लिए दो वृत्त्-चित्रों की पटकथा लिखी। डाक्टरेट पूरी करने के बाद दो साल हंस में राजेंद्र यादव जी के साथ काम किया। उनके लिए ‘कांटे की बात’ के ग्यारह खंडों और दो अन्य किताबों का संपादन-समायोजन भी किया। 
थिएटर से भी जुड़ी। कई नाट्य-रूपांतर किए। कमलेश्वर, पूश्किन, भुवनेश्वर, विजयदान देथा, रेखा वशिष्ठ की कुछ रचनाओं की नाट्य पटकथाएं लिखीं। रंगकर्मियों के साथ मिलकर उन्हें खेला भी। 
जवाहरकल नेहरू विश्व विद्यालय से पोस्ट डॉक्टरेट शुरू की पर पूरी नही की।पढ़ाना ज़्यादा रास आया।
अब अध्यापन से तो सेवा निवृत हो गयी पर लिखना पढ़ना जारी है। पिछले कुछ सालों में शिखर, विपाशा, सोमसी, हिमप्रस्थ, सृजन-सरोकार आदि पत्रिकाओं में कुछ लेख और समीक्षाएं छपी हैं, कुछ छपने की प्रक्रिया में हैं।
हाल ही में गोर्की के एक रूसी उपन्यास ‘क्लिम समगीन की ज़िंदगी’ का अनुवाद प्रकाशित हुआ है। बालकथाओं की एक किताब छप कर आ गयी है। पुश्किन पर एक किताब इसी साल आने की उम्मीद है। हिमाचली लोकगाथाओं में स्त्री-बलि पर अभी शोध चल रहा है। फिलहाल इतना ही।
 
डा. विद्यानिधि छाबड़ा
5, गोयल अपार्टमेंट, संजौली, शिमला।
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किताबें

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