Monday, June 17, 2024
विपिन चौधरी 
 
प्रकाशित कृतियाँ:-
कविता संग्रह:-  
अंधेरे के मध्य से (ममता प्रकाशन)-2008   
एक बार फिर (ममता प्रकाशन)-2008 
नीली आँखों में नक्षत्र (बोधि प्रकाशन)-2017 
 
कहानी संग्रह:- 
बटौड़ा ( अनुज्ञा प्रकाशन)- 2021  
 
जीवनी:-(रोज़ उदित होती हूँ) अश्वेत लेखिका माया एंजेलो की जीवनी (दखल प्रकाशन)-2013
 
लेख संग्रह :- 
म्हारी बात-(अनुज्ञा प्रकाशन)-2021  
 
अनुवाद:- अँग्रेजी राज़ में भूतों की कहानियाँ- रस्किन बॉन्ड-(सस्ता साहित्य मण्डल)-2012 
जिंदा दफ़न: सरदार अजित सिंह की जीवनी (संवाद प्रकाशन)- 2018 
 
संपादन:- रेतपथ पत्रिका- (युवा कविता विशेषांक)-2014 
युद्धरत आम आदमी-(स्त्री कविता विशेषांक)-2016 
रमणिका गुप्ता की आदिवासी कविताएं- (बोधि प्रकाशन)-2016
………

पाँच कविताएं

नदारद पानी

रेतीले टिब्बों में बसर करने वाली मैं,

पानी के विस्तार से घबरा जाती हूं 

 

पानी से अटखेलियां करती तस्वीरें 

मेरी पेशानी पर लकीरें बना देती हैं 

 

अँधेरों ने नहीं

ढेर सारे पानी ने मुझे डराया है 

 

मेरी नींद 

जल को खो देने के  

अटपटे सपनों से भरी हुई है 

 

किसी सपने में नन्हीं बूंदे 

धरती की तरफ आती हुई दिखती हैं

मगर  

ज़मीन को छूने से पहले ही

कहीं गायब  हो जाती हैं

 

कभी सपने  में  भालू जैसा कोई मोटा सा जानवर

अपने बड़े से पेट में 

गांव के  जोहड़  में बचा हुआ पानी

सुड़क कर लोप हो जाता है 

 

मेरी नींद अक्सर 

पानी की कमी के हाहाकार के शोर से 

टूटती है  

 

जागने पर दिखाई देते हैं 

पानी के लिए रंभाते 

आंगन में खड़े 

ढ़ोर-डंगर 

 

मेरे दिन गुज़र रहे हैं 

चंद बूंदों की चाह में 

मेरे सभी दिवास्वप्नों में 

रिमझिम के लिए पुकार है  

अन्यमनस्कता

शांत जीवन में उतरना

उसे 

भाता 

है

 

उतरी वह बहुत  हौले से

और मेरे यहां ही 

बनी रही 

 

किसी यात्रा का सामान बांधने की हड़बड़ी 

उसमें नहीं दिखती 

 

अब उससे बोलना-बतलाना  

बहुत आसान लगने लगा है 

हो सकता है 

कल को वह 

मेरी सबसे अच्छी सखी बने 

 

खुश हूं, 

पहले की तरह 

स्वप्न में नहीं 

इस बार वह उतरी है 

ठीक मेरे जीवन के मध्य 

 

लाख चाहने पर भी

उसे लौट जाने को 

नहीं कह सकती 

 

उदासी

ने  भी

कहां पूछा था?

 

उतरने से पहले

मेरे पार्श्व में

प्रविष्टि

पिछले जीवन की

किसी कामना का घड़ा भरने  के लिए

मैं इस जीवन में 

दाखिल  हुई थी 

 

कमाए दुःख के इतने किस्से

कि लगभग  भूल ही गई,

कि किस कामना के पीछे

इस जन्म तक का सफ़र तय किया था मैंने 

 

बगल  में बैठे वर्तमान के 

साथियों की मेहरबानियों को बिसरा कर

पुरखों की याद में

लहालोट होती रही  

 

फिर वह प्रेम भी तो घटा

किसी घटना की तरह ही

परोसने को अगले कई जन्मों का 

दुःख

 

अब यह दुःख ही बनेगा

अगले जन्म में  

प्रवेश का

एकलौता 

दरवाज़ा

विस्मय

सोचती थी मैं  

 

मृत्यु के बाद भी

किसी अचंभे के लिए 

थोड़ी संभावनाएं तो बची रहती होंगी 

 

किसी रोज़ 

प्रिय की दिवंगत आत्मा

दरवाज़े के पीछे छुपे 

बच्चे की तरह 

अचानक से सामने आकर 

धप्पा कहकर 

चौंका देगी 

 

मृत्यु के दुःख को 

भरपूर जज़्ब करने के कुछ समय बाद

कोई नेक रूह

मेरी हालत पर अफ़सोस करते हुए 

दिवंगत से मेरी मुलाक़ात की तारीख़ तय करेगी 

इसी इंतज़ार में 

दिन, अपनी गोलाईयों में 

गुम होते गए

 

डामर की सड़कों सी सपाट रातें 

और स्याह होती गई 

 

दिन, 

अपने स्थायी स्वभाव से ही 

उदास और बोझिल रहे 

 

कोई अचंभा नहीं घटा

हां,

खोई हुई खुशियां

बिना सूचना दिए, 

एक दिन 

लौट आई 

 

फिर मैं भी

भूल गई 

 

प्रतिक्षा थी  मुझे  कभी किसी अचंभे की

 

सफ़ेद से प्रेम

(मीना कुमारी के लिए)

सफ़ेद रंग से प्रेम करने वाले
करते हैं प्रेम दुखों से भी
आख़िर यह बात एक बार फिर से
सच साबित हुई

सफ़ेद में डूब कर वह बगुला थी
चुगती थी कई अनमोल रत्न
धरती के मटमैले जल में डूबते-उतरते हुए

पता नहीं सफ़ेदी को वह
कैसे रख पाती थी बेदाग़
उस वक़्त जब दुनिया उछाल दिया करती थी
उसकी ओर कई भद्दे रंग

उसकी आत्मा की सफ़ेदी और
गहरे कुएँ से आती आवाज़ की डोर पर
दुःख और दुःख के अनेक सहोदर
ऐसे ही विचरण करते हुए आते और बैठ जाते
टिके रहते हैं जैसे बिजली की तार पर तफ़रीह करते हुए पंछी

उसके गहरे मन की तलछट से निकले
कितने ही आँसू
चढ़ जाते सफ़ेदी की भेंट
दिखने को बची रहती बस एक दर्द भरी मुस्कान

जन्नत की उस संकरी राह की सफ़ेदी
आज भी बनी हुई है
जिस पर चली गई थी हड़बड़ी में वह
जैसे वहाँ पर छुटा हुआ अपना कोई समान वापिस लाने गई हो

बुदबुदाते हुए एक ही पंक्ति बार-बार
कि जीना है उसे अभी और भी!

………

काहे को ब्याहे बिदेस

लिंग संबंधों का विश्लेषण करने में पितृसत्ता की अवधारणा को एक आवश्यक उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है. सामाजिक संरचना में व्याप्त सदियों से चली आ रही पितृसत्तात्मक प्रणाली के अंतर्गत न जाने कितने ही तरीकों से आर्थिक सामाजिक, राजनैतिक, 

 सांस्कृतिक स्तर स्त्रियों का दमन और शोषण होता आया है. शोषण का एक तरीका कई दूसरे

नए तरीकों को जन्म देता है और इस तरह श्रृंखलाबद्ध इस व्यवस्था ने अपनी निरंतरता को कायम रखा हुआ है. पितृसत्ता की व्यवस्था के गंभीर अध्ययन से न जाने इसके कितने ही ढके छुपे पक्ष उजागर हुए हैं.

भारत ने 1994 में ही जन्मपूर्व सेक्स निर्धारण परीक्षणों पर प्रतिबंध लगा दिया था. तब लग रहा था कि अब कन्या भ्रूण-हत्या पर पूरी तरह रोक लग जाएगी. मगर ढके-छुपे तौर पर यह चलता रहा परिणामस्वरूप जिन प्रदेशों में लड़कों की चाह अधिक थी उन्हें अपनी करतूतों का परिणाम भुगतना पड़ा. लड़कियों की संख्या में बेहद कमी आई. स्थितियाँ के खराब होने का पता तब चला जब प्रदेश के खासकर गाँव के शादी की उम्र तक पहुंचे लड़कों के परिवार वालों को लाख ढूँढने पर भी कन्याएँ नहीं मिली. कुँवारे लड़कों की उम्र बढ़ने के साथ ही परिवार की पेशानी पर चिंता की नित नई लकीर जन्म लेने लगी. जाहिर है सम्पन्न परिवार के जमींदार लड़कों के लिए दिक्कत नहीं थी. परेशानी कम ज़मीन या बिना ज़मीन वाले परिवारों के लिए अधिक थी उन्हें आस पास के गांवों में और दूर दराज़ के गांवों से लड़कियां नहीं मिल रही थी. फिर बिरादरी से बाहर लड़कियां खोजना शुरू हुआ मगर इसमें भी उन्हें असफलता ही हाथ लगी. दूसरा कोई उपाय न देख कर दूसरे प्रदेशों से विवाह योग्य लड़कियों की खरीद फरोख्त की जाने लगी. आँख मूँद कर और कलेजे पर पत्थर रखकर मोल भाव तय कर दूसरे प्रदेशों से गरीब परिवारों की लड़कियों को ब्याह कर अपनी दहलीज़ पर लाया गया. 

फ़िलहाल हरियाणा के 6,000 गांवों में छह -सात बहुएं

हरियाणा से बाहर के प्रदेशों से लाई गई हैं. दूसरे प्रदेश की संस्कृति, रहन-सहन बोली से सर्वथा अपरिचित ये मोलकियाँ हरियाणा के अपने ससुराल में आटे में नमक की तरह घुलमिल कर किसी परिवार के सपनों को पूरा करने के लिए अपनी हसरतों की तिलांजलि दे देती हैं. 

 

हरियाणा का किशनपुरा गाँव का चेहरा-मोहरा भी हरियाणा प्रदेश के दूसरे गाँवों जैसा ही है. गाँव के भीतर प्रवेश करते ही सूखे पड़े हुए कुएं, छोटे-बड़े बटोड़ों की कई पंक्तियाँ, गली के मुहाने पर बने जोहड़ में नहाती भैंसें, दाई तरफ बनी एक बड़ी सी कुरडी जिस पर गाँव भर का कूड़ा जमा होकर एक छोटा सा पहाड़ बन गया है और अपनी दैनिक कामों को निपटाते ग्रामीण लोग.   

1700 की जनसंख्या वाले इस गाँव में यादव, नायक, नाई, पंडित, बैरागी, बाल्मीकि और ओड जाति के लोग रहते हैं. एक दो घर खातियों और झिमरों के भी हैं. गाँव में सबसे जायदा घर नायक यानी हेड़ी जातियों के हैं. गाँव के कुछ हिन्दू और कुछ मुस्लिम लुहारों के घर भी हैं. 

इस गाँव के कुम्हार बर्तन बनाने का अपना पुश्तैनी काम नहीं करते. इनके पास जमीनें तो हैं मगर दो-तीन एकड़ से ज़्यादा किसी के पास नहीं. यही कारण जीवन-यापन के लिए गाँव के अधिकतर लोग नज़दीक की गत्ता-फैक्ट्री और गैस प्लांट में काम करते हैं, साथ ही खेत में थोड़ी बहुत सब्जी उगा कर पास के शहरों में बेच आते हैं.

समृद्ध कहे जाने वाले हरियाणा प्रदेश का यह एक गरीब गाँव है. यहाँ के युवा लड़कों की शादी में दिक्कतें होने के कारण उनके परिवार के लोगों ने मन मार कर दूसरे प्रदेशों से लड़कियों को मोल-भाव करके अपने घर लाने का विचार किया.  त्रिपुरा, बिहार, मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश जैसे दूसरे राज्यों से लड़कियों को मोल से ब्याह कर लाया गया. लड़कियाँ, जिन्हें बचपन से ही ‘एडजस्ट’ करना सिखाया जाता है इस बार भी ‘एडजस्ट’ कर चुपचाप घर वालों की स्वीकृति पर मुहर लगाते हुए दूसरे घर चली आईं. दूसरे राज्यों से लाई गई इन बहुओं को चूँकि उसके परिवार वालों को पैसे देकर लाया जाता है इसी कारण इन्हें मोलकी नाम दिया जाने लगा. मोल माने पैसे देकर खरीदना. 

सुमन भी मोलकी है. 26 साल की सुमन ने जब अपने ससुराल की इस देहरी में कदम रखा था तब उसकी उम्र महज़ 18 साल की थी. इस उम्र तक उसे बस  इतना ही मालूम था कि इस धरती पर पैदा हुई हर लड़की की एक न एक दिन शादी होती है इसलिए उसकी भी शादी की गई है. बस उसकी शादी कुछ अलग तरह की है, जिसमें न तो बैंड-बाजा बजा, न घोड़ी पर सवार दूल्हा उसे लेने आया, न ही उसके मायके वालों ने उसे घर-गृहस्थी के साजों-समान के साथ विदा किया. बस पांच-छः पुरुष आए, मालाओं का आदान-प्रदान हुआ. उसके पिता को पैसे दिए गए, उसे कुछ मालूम नहीं. बस वह चली आई उस प्रदेश में जहाँ की बोली और खान-पान से उसका थोड़ा बहुत भी परिचय नहीं. लेकिन उसे किसी से कोई शिकवा है न शिकायत. जो बात उसे समझ में आती है वह यह है कि उसे मायके और ससुराल दोनों जगह घरेलू काम करने हैं बस वह चुपचाप यही सब करती आ रही है. 

सुमन के दो बच्चे हैं छः  साल का रोशन और चार साल का राम. दोनों आँगन में ही कंचे खेल रहे हैं. इन बच्चों की तरफ देखती हुई सुमन ने टूटी-फूटी हिंदी में कहा,       

“मेरी माँ अब इस दुनिया में नहीं है, वह होती तो शायद मैं इतनी दूर न ब्याही जाती”.

फिर एक बड़ी सी सांस ले कर चुप हो गई.

यह एक बेटी का अपनी माँ पर किया जाने वाला सहज विश्वास ही बोल रहा था जिसके बल पर संसार भर की लड़कियां अपने दुःख की घड़ियाँ काट लेती हैं.

मगर इस कड़वी सच्चाई से भी इंकार नहीं है कि यदि सुमन की माँ आज के दिन जीवित होती तो भी सुमन का भविष्य सुव्यवस्थित नहीं हो सकता था. होता भी कैसे? दिहाड़ी मजदूरी कर दिन-भर की रोटी का जुगाड़ करने वाला सुमन के बेहद गरीब परिवार के पास विकल्प के नाम पर केवल बेबसी ही थी. 

‘बिहार में मजदूरी भी बहुत कम मिलती है वहां जीवन काफी कठिन था.’ सुमन ने बताया. 

पास खड़ी सुमन की सास बोली,

 ‘माहरे छोरे का ब्याह कोनी हो था जिद्दे हम काली-गौरी किसी भी छोरी लान खातर राज़ी हो गए. ‘कोए रिश्ता कोणी आवे था न ही आण की आस थी. ब्याह म्ह 30-35 हज़ार का खर्चा आया, हामनै हंसी खुसी करा. ब्याह कर लाए सै ख्याल तो राखणा ही पड़ेगा’.

 

वहीं हमारी बातें सुनते हुए एक पढे लिखे पड़ोसी ने हमें बताया कि सुरेन्द्र के पिता रमेश जिस फैक्टरी में चौकीदार हैं, वहीं पर कुछ महीने सुमन के परिवार ने भी दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम किया था, वहीँ अविवाहित सुमन के बारे में पता चला, वह भी अपने पिता और दो भाईयों और दो छोटी बहनों के साथ मजदूरी करती थी. सुरेन्द्र के पिता ने उसे वहीं पर काम करते हुए देखा, पूछताछ की और फिर मन पक्का कर लिया कि इसे अपने बेटे के लिए लिवा लाते हैं. बेटे का घर बस जायेगा, रिश्ते नहीं आ रहे और उसकी उम्र बढती चली जा रही है.

 

हामनै सोचया कद्दे म्हारा छोरा रांडा न रह जा. ‘म्हारे पल्लै जमीन भी घाट सै’.

सुमन के ससुर ने बताया. 

सुमन तुम खुश हो? 

सुमन कुछ पल चुप रही फिर धीरे से बोली “यह कुछ काम नहीं करता सारा दिन शराब पीता है”. उसका इशारा अपने पति सुरेन्द्र की तरफ था.

जब कभी सुमन उसे अधिक शराब न पीने के लिए टोकती है तो सुरेंद्र उसे मारने लगता है. यदि सुमन के सास-ससुर अपनी बहू का साथ नहीं देते तो इस अजनबी प्रदेश में उसका जीवन मुश्किल हो जाता.

‘जीवन ठीक ही चल रहा है, दोनों बच्चे सरकारी स्कूल में जाते हैं. मैं अपनी छोटी बहनों को हरियाणा लाना चाहती हूँ ताकि वे भी मेरे आस-पड़ोस में ही अपना घर बसा लें. लेकिन मैं शादी की बात करते समय ठीक से परख लूँगी कि कहीं लड़का शराबी न हो’.  

सुमन का डर वाजिब भी है. यह ठीक है कि सुमन अब इस माहौल में रम गई है पर अपना मायका तो कभी भुलाया नहीं जा सकता. सुमन को अपने कच्चे घर की बहुत याद आती है खासकर अपनी बचपन की सहेलियों की जिनके साथ खेलते हुए कभी यह ख्याल करीब नहीं फटकता था कि कभी उसे अपने गाँव से बाहर भी कदम रखना होगा. 

 

गौरी की कहानी भी सुमन से अलग नहीं है. वह भी इसी गाँव के यादव परिवार में ब्याह कर लाई गई मोलकी है. त्रिपुरा की गौरी ने पांचवी तक पढाई की है, उसका पति सूरज नौवी पास है. अपनी बुआ की मार्फ़त उसकी शादी हरियाणा में हुई, बुआ ने सूरज की तस्वीर दिखा कर उसकी राय जाननी चाही. गौरी ने हाँ में सिर हिला दिया और इस घर में आ गई.

पिता त्रिपुरा में ईंट पाथने का काम करते हैं छः भाई-बहनों में गौरी सबसे बड़ी है.

‘मेरे पिता मुझसे सब बहन भाईयों में सबसे अधिक प्यार करते हैं गरीबी के कारण ही मेरी शादी यहाँ करनी पड़ी वरना नज़दीक के किसी गाँव में वे मेरी शादी करते’.

वैसे यहाँ कोई तकलीफ नहीं, घर भी पक्का है. हमारे यहाँ तो कच्चे घर और खपरैल ही हुआ करते हैं. तेज़ आंधी तूफ़ान आने पर छतें उड़ जाती हैं, हमारे वहां की औरतें अधिक काम नहीं करती पर यहाँ हरियाणा में तो औरते खेतों में भी जाती हैं और घर-बाहर और पशुओं का काम भी खुद ही करती हैं.

सूरज के बारे में पूछने पर गौरी कुछ शरमा कर कहती है मेरा पति देखने में बहुत सुंदर है टेम्पो चलता है, कभी-कभी शराब भी पी लेता है लेकिन किसी को कुछ नहीं कहता, कोई शोर-शराबा नहीं करता, चुपचाप आकर सो जाता है.

“हमारे लड़के के हिस्से में सिर्फ आधा किल्ला ही है वो भी ठेके पर दे रखा है, जब सूरज की उम्र हो गई और उसके लिए कहीं से कोई रिश्ता नहीं आया तो हमें बहुत फ़िक्र हुई. एक दिन गौरी की बुआ जो पास के गाँव में ही ब्याही है. वह और उनके पति सूरज के घर आए और रिश्ते की बात पक्की कर गए. सूरज तो दूसरे प्रदेश की लड़की से ब्याह की बात पक्की कर देने से इतना भड़क गया था कि नाराज़गी के कारण दस-बारह दिन घर नहीं आया. टेम्पो लेकर बाहर ही भटकता रहा. घर आने पर  उसके पिता और दादा ने उसे बहुत समझाया. अगले ही दिन उसकी शादी कर दी गई. शादी में कुल चालीस हज़ार का खर्चा हुआ. शादी को दो साल हो गए. 

गौरी की सास कहती हैं,“हम खुश है बहू सुंदर और सलीके वाली है. घर को साफ़ रखती है, सारे काम भाग-भाग कर करती है. अभी पेट से भी है, बड़सी वाले बाबा ने कहा है छोरा ही होगा.”

 

एक मूक गाय की तरह एक खूंटे से दूसरे खूंटे पर बाँध दी गई दोनों ही मोलकियाँ घर के लिए अपने दिन-रात एक किए रहती हैं, नियम से खेतों में जाती है, घर में नलके की व्यवस्था होते हुए भी बड़ा सा घूँघट निकाल कर पानी लाने जाती हैं, वे ढोंर डंगर के लिए भोजन की व्यवस्था करती हैं, गोबर पाथती हैं, बच्चों का लालन पालन करती हैं, सास ससुर की सेवा करती हैं. गाँव में उनके आसपास रहने वाले परिवार इन मोलकियों की चुस्ती फुर्ती देखकर ईर्ष्या भी करते हैं क्योंकि उनकी बहुएं घर के किसी काम काज में दिलचस्पी नही. जानवरों की देखभाल करना तो बहुत दूर की बात हैं. 

 

शुरुआत में अड़ोसी-पड़ोसी अजनबी नज़रों से इन परदेशी बहुओं को देखते हैं. मगर बीतता समय उन्हें सहज ही स्वीकृति प्रदान कर देता है. ये परदेशी बहु कानूनी रूप से रजिस्टर हैं और इन सबका आधार कार्ड भी बन चुका है. मोलकियों से उत्पन्न बच्चे कानूनी रूप से वारिस बनते हैं. माँ बनी चुकी मोलकियां अपने पति की असमय मृत्यु होने पर दूध बेच कर या दूसरों के खेतों में काम करके अपने बच्चों का पालन पोषण करने की कोशिश करती हैं. कुछ परिवारों में ससुराल वालों द्वारा पैसे ले कर उसकी शादी किसी दूसरी जगह करने की खबरें भी सुनने में आई हैं.

परदेसी बहुओं को मोल चुका कर लेकर आने की यह प्रक्रिया अब एक प्रथा बन गई है जिसने पितृसत्ता के एक नए पक्ष को उजागर किया है जिसकी स्थापना के पीछे पुरुषों के मंसूबे ही उजगर होते हैं. दूसरी और मोलकियाँ बनी ये स्त्रियाँ फिर से स्त्रियों की अदम्य जिजीविषा का पता देती हैं जिसके बल पर वे हजारों मील दूर आकर उस संसार को अपनाती है जहां कि बोली बानी परिवेश सब कुछ उसके लिए नितांत अजनबी है. 

. स्त्रियों की जिजीविषा और पुरुषों के अपने निजी स्वार्थों से बनी यह व्यवस्था अनजाने में भी जाति प्रथा के बंधनों को ढीला कर खरीदी गई इन दुल्हनों की वंश बेल बढ़ रही हैं यही एकमात्र संतोष का विषय है.

 

हमने अपने बड़े बुजुर्गों से यह सुना है कि लड़कियों की वजह से गांवों में अक्सर कई परिवारों में कोई न कोई लड़का अविवाहित रह जाता था. पहले कई परिवारों में गरीबी के कारण जमीन-जायदाद में बंटवारे से बचने के कारण घर के एक ही बेटे की शादी की जाती थी. पहले के समय में लड़कियों की कमी का लंबा इतिहास भले ही नेपथ्य का हिस्सा बना रहता था. समाज में इसे लेकर कोई हलचल भी नहीं होती थी मगर आज के समय में समाज और सरकार इस सच से आँख नहीं चुरा सकती और इस बात से भी इनकार नहीं कर सकती कि स्त्रियों के आर्थिक और शैक्षणिक पक्ष को सकारात्मक बनाने के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है. 

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