Wednesday, May 29, 2024
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नाम – वियोगिनी ठाकुर
जन्मस्थान- बदायूँ (उत्तर प्रदेश)
जन्म तिथि- 4 सितम्बर 1992
शिक्षा-स्नातक
प्रकाशित कृति- दूसरा प्यार (उपन्यास)
लड़की कैक्टस थी (कविता संग्रह)
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कविताएं

हमारे गम साझे हैं लड़की

तुम्हारी बेचैनियाँ मुझसे कहाँ छिपती हैं लड़की
कहाँ छिप पाता है तुम्हारे भीतर का आंदोलन
तुम्हारे यौवन के उत्कर्ष के दिन 
जो तुमने होम कर दिये किसी कुपात्र की खातिर
जिसमें तुम प्रेमिका या पत्नी के सिवा
 और क्या कुछ नहीं हो सकती थी !
 
कितना जल बहा है तुम्हारे रतनारे नयनों से
फिर भी कभी नहीं सूखी है तुम्हारे भीतर की बगावती
न ही सूखी है तुम्हारे भीतर
 कल-कल बहती निर्झरा
जो  डुबोये देती है तुम्हें तुम्हारे ही जल में
जिससे तुम्हारा पिछले कई जन्मों का झगड़ा रहा है सखी!
 
 तुम्हारी श्वास-श्वास सुन पाती हूँ मैं कोसों दूर से भी 
जिसे सुनना था तुम्हारे प्रेमी को  
तुम्हारे सीने पर सिर रखकर 
जीवन की सांध्यवेला तक, 
तुम्हारी कंपकपाती टांगे, तुम्हारा मुरछाया मुख,
 तुम्हारा आहत  हृदय
तुम्हारे भीतर का हाहाकार, 
तुम्हारे भीतर आलोड़न करता प्रेम,
 तुम्हारा साहस , तुम्हारे भीतर की जिजीविषा
 क्या-क्या मुझसे होकर नहीं गुजरा है 
 
हमारे दु:ख साझे हैं लड़की 
हम सब थोड़े बहुत अंतर से
 एक सी विपदाओं की मारी हुई हैं
हम एक से कंटको से घिरे मार्ग पर चली हैं
हमने एक से छाले पाए हैं
 
हमारे कलेजे में एक से भाले गढ़े हुए हैं
भेड़ियों को आँख मूँदकर नहीं दिखलाई पड़ता 
हममे कोई भी अंतर
हमें आँख खोलकर हम सब एक सी दिखलाई पड़ती हैं 
एक सी ही सुनाई पड़ती हैं हमें हमारी सिसकियाँ
एक से लिखे हैं हमने अक्षर 
और  लिख-लिख कर मिटाये है साथी!
 
एक सा ताँका है कमरे के बीच चलता हुआ पंखा
एक से मन पाए हैं
एक से ही गम में कलाइयाँ काटी है,
 एक ही तरह से फंदे बनाये हैं अपने लिए 
और बार-बार लौट आई हैं मृत्यु के द्वार से होकर
एक सा प्रेम किया है बारम्बार और एक सी ही प्रतीक्षा
एक सी चुप्पियाँ ओढ़ी हैं 
और एक से ढोए हैं पीड़ाओं के पहाड़़
सोई हैं हम उनकी नोक पर देह टिकाए शताब्दियों तक
 
हमने एक सी ही योनियाँ पाई है सखी!
 एक से ही स्तन
एक सा ही खून बहाया है बारहों मास
एक ही ढंग से बोये हैं अपने भीतर बीज, 
पोसे हैं भ्रूण, जने हैं  बच्चे और चिंघाड़े हैं
 हथिनियों से उन्हें इस संसार में लाते हुए
 
 एक सा ही सौंपा है खुद को
एक ही ढंग से दिल तुड़वाया है बारम्बार
कोई हिसाब है लड़की ! 
है कोई हिसाब!!
हमारे गम साझे हैं लड़की 
हमारे जैसी संसार भर की मादाओं के।

उनकी मृत्यु का स्वाद

मुझसे वे लड़कियाँ कभी नहीं भुलाई गईं 
जो बेमौत मारी गईं थीं
उनकी उम्र सोलह, पच्चीस या बत्तीस
 कितनी भी हो सकती है
उम्र का उन्हें मार देने से
 कोई विशेष लेना-देना नहीं था
 
कुछ को उनके माता-पिता ने मार दिया
कुछ को उनके प्रेमियों, पतियों और भाइयों ने
कुछ समाज के भाले की नोंक पर चढ़ गईं
कुछ विश्वास और ईमानदारी की भेंट चढ़ाईं गईं
 कुछ को उनके अपने आप ने ही चैन से ना जीने दिया
वे बरसों तक कितनी ही बातों पर
 खुद से होती रहीं शर्मिंदा 
और अंततः उन्होंने खुद को नष्ट कर लिया
 
किसी बड़े लेखक ने कहा था एक बार
आत्महत्या भी एक तरह की हत्या ही होती है
होती है ऐसे
 कि उनकी हत्या और खुदखुशी में
 विशेष अंतर नहीं रह जाता 
 
धीमी मृत्यु उनके गले का हार होती है
और संपूर्ण मृत्यु हारों का हार होती है
 
धू- धू कर जलती उस लड़की की चिता, 
उसकी अकाल मृत्यु ने
जिसे मार दिया गया था पिता की सहमति से
जिस मार दिए जाने पर
 पूरे गाँव की मौन सहमति भी शामिल रही थी
सबसे हिस्से उसका खून आया था
 
मुझे लगा था
 मेरी भी हथेलियाँ उसके खून से सन गई थीं
उस बात ने कई दिनों तक 
मेरे हलक में निवाला नहीं जाने दिया
मुझे लगा, उसकी मृत्यु मेरे भीतर भी भर गई है
 
लगा यह भी, कि किसी भी दिन, 
ठीक उसके जैसी दुर्दशा को 
मैं भी प्राप्त हो सकती हूँ, या कोई भी लड़की
क्योंकि पुरूषवादी इस समाज के मुँह को
ना जाने कबसे लगा हुआ है लड़कियों का खून
 
अक्सर सुनती आई हूँ अपने लिए
कुछ ही मिनटों में खत्म कर दिया जायेगा मुझे
तब-तब नहीं समझ आया है 
कि क्या इतना बड़ा गुनाह होता रहा है मुझसे
कि मैं हर बार सिर्फ हत्या की अधिकारी होती हूँ
मैं हर बार होते देखती हूँ अपनी शाब्दिक हत्या
और हर बार एक मौत मरकर फिर जी उठती हूँ अपने लिए
 
तब-तब याद आती रहीं हैं मुझे वे लड़कियाँ 
जिन्होंने जब-जब अपने लिए जीना चाहा
उन्हें मार दिया गया  उनके सबसे प्रिय पुरूषों द्वारा
वे कोई भी हो सकते थे, होते ही रहें हैं 
जन्मदाता से लेकर जीवनसाथी तक 
पर सबसे दुखद ये था कि वे उनके प्रिय पुरूष भी रहे थे
 वे ही जो, बार-बार चखते रहे हैं उनकी मृत्यु का स्वाद
उनके कपाल में भरकर पीते रहे हैं उनका लहू।

छदम वेश धर आई वासनाएँ

छदम वेश धर आई वासनाएँ उसके पास
तलाशती रही ठौर ठिकाना
 
बुदबुदाती रहीं ठहरेंगे कुछ रोज
पढ़ेंगे तुमको और जरूरत पड़ी 
तो फिर से गढ़ेंगे भी
 
और चीखती चिल्लाती रहीं
इस मकान को घर हम ही बनायेंगे
और घर को बना देंगे एक रोज मंदिर
 
वो लड़की जो तलाशती रही
उनमें प्रेम की संभावनाएँ
वो लड़की खूब हँसती है इन दिनों
 
 हाँ पागल नहीं हुई है अभी
किसी रोज हो भी जाएं क्या पता
लगाती है हिसाब-किताब
कुल जमा नफा नुकसान 
उँगलियों पर गिनती है
कि मकान को घर, घर को मंदिर
और मंदिर को खंडहर होते
बस उसी ने तो देखा
 
और सोचती है
कि फिर कभी अगर 
वो वासनाओं में डूबे लोग
इस तरफ लौटे
तो उनको उसी खंडहर में बंद कर 
बाहर से मार देगी ताला
 
या बाँध देगी किसी मंत्र वंत्र के धागे से
या उसके मुहाने पर रख देगी
अपने दिल से भी भारी कोई पत्थर
ताकि अनंत काल तक भटकती रहें 
उसमें उनकी आत्माएँ
 
ताकि धीरे-धीरे जब गलने लगें 
उनके जिस्म के सारे अंग
तब उसी खंडहर में छुपे हुए
चमकादड़ उनको नोंच खाएँ

बेपरवाही तलाशती लड़की

बेपरवाही तलाशती लड़की
जिसे वो भूल आयी थी सालों पीछे
या ये कहे तो ज्यादा ठीक होगा 
कि छोड़ आई थी एक रोज
किसी ऐसे इंसान के लिए
 जिसे वो कह सकती थी
जिसे कहना ही था उसे
 
कि जानते हो
मुझे बेपरवाह लोग पसंद है पर लापरवाह नहीं
दोनों का फर्क समझते हो मेरी जान!
 
तुमने महसूस किया है कभी 
देख पायें हो 
किसी के दिल में उमड़ते काले-काले बादल
जो बरसना चाह कर भी कभी बरसते नहीं
और आगे भी कब बढ़ पाते है
 
उसे सोख लेता है सूरज 
बादलों को दाग बनते देखा है
 देखा है उन्हें काले धब्बों में तब्दील होते?
 
तुम तो ये भी नहीं देख पाये हो ढंग से 
कि कितनी गहरी हो सकती है नाभि की गहराई 
कि तुम औंधे मुँह उस कुएँ में गिर भी सकते हो
 अगर वो स्त्री चाहे
 
जान ले भी सकती है वो तुम्हारी 
साँसे रोक सकती है
वो भी उन तरीकों से 
जो तुम्हारी सोच की जद में भी नहीं आते
जिस पर सदियों तक अचंभित हो सकते हो तुम
 
पर वो ऐसा कुछ नहीं करती
ऐसा नहीं कि उसके भीतर कभी नहीं उमड़ता विद्रोह  
या सिवा प्रेम के उसने कुछ सीखा ही कब है
कि उसे सही और गलत कब समझ आता है 
गलत को सही करना उसे आया ही कब था
 
कि उसने कब किए हैं जिंदगी में फैले हुए जाले साफ
कि वो ले ही कब सकती है कठोर निर्णय 
कि वो नाजुक औरत जानती ही कब है पाषाण होना
तुम लगा सकते हो एक औरत की निर्ममता का अंदाजा 
 
उस रोज जब टप-टप गिरते प्रेम से 
हथेली जल गई थी तुम्हारी
उसी ने डुबाया था तुम्हारा हाथ उस नदी के जल में
और उसके मन की कोमलता पर मुस्कुरा रहे थे तुम
उसकी आँखो में उतर आया नमक
 तुम्हारे मुँह का स्वाद बढ़ा गया था
 
रीछे नहीं थे तुम उसपर 
तुम्हें कब चाहिए था प्रेम 
तुम्हे तो चाहिए था 
उसके देह से रक्त की आखिरी बूँद निचोड़ कर 
उसे खूँटी पर टाँग देना
 
पर क्या तुम कभी सोच पाये हो 
कि रक्त विहीन औरत भी 
भावनाओं से रिक्त नहीं होती कभी राख होने तक
सोचो, अगर कभी वो भावनाओं के ज्वार समेत
 हिसाब- किताब करने तुम्हारे जीवन में फिर लौट आये तो ?

दुनिया को खौफ

दुनिया को खौफ उन स्त्रियों का कभी नहीं रहा
जो नख से शिख तक श्रंगार किए रिझाती रही
किसी ऐसे पुरुष का मन 
जो उनकी आत्मा तक पे अपना अधिकार समझता रहा
 
न ही उनसे 
जो दुनिया भर की तकलीफ चुपचाप सह
फूँकती रही चूल्हा
और दुनिया ने जब-जब मली 
उनके मुँह पर कालिख
और किया अट्टहास
 
तब तब वे रही चुप
कोसती रही खुद को,अपने भाग्य को 
और उस सृष्टि के कर्ता धर्ता को 
न ही रहा कभी उन स्त्रियों का भय
जिनकी तरफ जब-जब उठी उँगलियाँ
वो बन गई चुपचाप मुजरिम
और स्वीकार लिए 
बिना कुछ किए ही सारे अपराध
 
और उनकी तरफ उठने वाली हर उँगली तक के
उन्होने हाथ जोड़ लिए
दुनिया को भय रहा सिर्फ उन स्त्रियों से
जिनके लिए दुनिया के हर सम्मान से बढ़कर रहा
स्वयं का सम्मान
वे  ही स्त्रियाँ जो खुद को प्रति सबसे पहले जवाबदेह थी
 
वे जो अपने लिए खड़ी हुई, दूसरों के लिए भी
वे जो लड़ना जानती थी मरना भी, पर हारना नहीं
हाँ वे ही स्त्रियाँ इस दुनिया, इस समाज के लिए खतरा रही
और रही कौतूहल का विषय
वे जो अपने आप के लिए खुद को
जरा सा बचा लेना चाहती थी
 
वे ही स्त्रियाँ जो टुकड़ा-टुकड़ा होकर भी 
खुद को समेटे रही
वे ही स्त्रियाँ
इस समाज के लिए रही सबसे बड़ा खतरा
ये समाज कर देना चाहता है 
ऐसी हर स्त्री की हत्या
चखना चाहता है उनका लहू
और करना चाहता है 
उनकी मृत देह पर तांडव।

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