Wednesday, April 24, 2024
सविता सिंह
ख्यात  कवयित्री एवं स्त्री विमर्शकार सविता सिंह जी का जन्म फरवरी 1962 को आरा (बिहार) में हुआ। 
शिक्षा: राजनीति शास्त्र में एम . ए., एम. फिल., पी-एच.डी. (दिल्ली विश्वविद्यालय)। मांट्रियल कनाडा स्थित मैक्गिल विश्वविद्यालय में साढ़े चार वर्ष तक शोध का अध्यापन। शोध का विषय:’ भारत में आधुनिकता का विमर्श’। सेंट स्टीफंस कॉलेज से अध्यापन आरंभ करके डेढ़ दशक तक दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाया। सम्प्रति इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (इग्नू) में प्रोफेसर। स्कूल ऑफ़ जेंडर एंड डेवलपमेंट स्टडीज की संस्थापक निदेशक। 
 
इंटरनेशनल हर्बर्ट मारक्यूस सोसायटी, अमेरिका के निदेशक मंडल की सदस्य एवं को-चेयर। हिन्दी व अंग्रेजी में सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य, स्त्री विमर्श और अन्य वैचारिक मुद्दों पर निरंतर लेखन, अनेक शोध-पत्र और कविताएं अंतरराष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। 
पहला कविता संग्रह ‘अपने जैसा जीवन’ (2001), दूसरा कविता संग्रह – ‘नींद थी और रात थी’ (2005), तीसरा कविता संग्रह – ‘स्वप्न समय’ (2013), चौथा कविता संग्रह – ‘खोई चीजों का शोक (2021); दो द्विभाषिक काव्य-संग्रह ‘रोविंग टुगेदर’ (अंग्रेजी-हिन्दी) तथा ज़ स्वी ला मेजो़ दे जेत्वाल (फ्रेंच-हिन्दी) 2008 में प्रकाशित, उड़िया में जेयुर रास्ता मोरा निजारा शीर्षक से संकलन प्रकाशित। अभी तक हिन्दी में अप्रकाशित एक और नए कविता संग्रह ‘प्रेम भी एक यातना है’ का उड़िया अनुवाद प्रकाशित (2021)। अंग्रेजी में कवयित्रियों के अंतर्राष्ट्रीय चयन सेवन लीव्स, वन ऑटम (2011) का संपादन जिसमें प्रतिनिधि कविताएं शामिल, पचास कविताएं: ‘नई सदी के लिए’ चयन श्रृंखला के तहत प्रतिनिधि कविताएं प्रकाशित। ‘ ल फाउंडेशन मेजों देस साइंसेज ल दे’ होम, पेरिस की पोस्ट-डॉक्टरेल फैलोशिप के तहत कृष्णा सोबती के ‘ मित्रो मरजानी’ तथा ‘ए लड़की’ उपन्यासों पर काम एवं शोध पत्र प्रकाशित। राजनीतिक दर्शन के क्षेत्र में ‘रियलिटी एंड इट्स डेप्थ : ए कन्वर्सेशन बिटवीन सविता सिंह एंड भास्कर रॉय’, प्रकाशित। आधुनिकता, भारतीय राजनीतिक सिद्धांत और भारत में नारीवाद आदि विषयों पर तीन बड़ी परियोजनाओं पर काम जारी। ‘ पोयट्री एट संगम’ के अप्रैल 2021 अंक का अतिथि संपादन। उड़िया बांग्ला मराठी कन्नड़ आदि भारतीय भाषाओं के अलावा फ्रेंच जर्मन स्पेनिश, पुर्तगाली,  डच आदि विदेशी भाषाओं में  कविताएं अनूदित-प्रकाशित। कई विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में कविताएं शामिल और उन पर शोध कार्य। 
हिन्दी अकादमी और रजा फाऊंडेशन के अलावा महादेवी वर्मा पुरस्कार (2016) तथा युनिस डि सूजा अवार्ड (2020) से सम्मानित।

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सविता सिंह: दस कविताएं

शाम में एक कामना

किसी राह को कहूं अपनी राह
किसी विस्मित सुख को एक सुख
किसी की नींद में जा लेटू
जागूं किसी मीठे स्वप्न की बांह में
ऐसी है कामना इस शाम
 
ढल जाने पर इसके लेकिन
क्या बची रहेगी वह राह सुलगती सी
याद में घुली मिली सुख की आकांक्षा
नींद एक मोह दी व्याप्त रोम_रोम में
स्वप्न में तैरती दो आंखें हंसों सी

स्त्री सच है

चारों तरफ नींद है
प्यास है हर तरफ
जागरण में भी
उधर भी जिधर समुद्र लहरा रहा है
 
दूर तक देख सकते हैं
समतल मैदान हैं
प्राचीनतम सा लगता विश्व का एक हिस्सा
और एक स्त्री लांघती हुई प्यास।

रात नींद सपने और स्त्री

नींद में ही छिपा है
स्त्री होने का स्पर्श
जिसे महसूस करती है रात
और जो छायी रहती है इस पृथ्वी पर
वह इसी स्पर्श की छाया है
जिसके नीचे नींबू के फूल खिलते हैं
चंपा की कलियाँ जन्म लेती हैं
 
नींद में है कहीं सौंदर्य
जिससे जुड़ी है स्त्री
पनपाती मृत्यु
ग्रसती हिंसक पुरुषार्थ को
गिराती साहसी और बलवान को 
राज्य करती फिर एकाग्र भाव सें सब पर
 
रात में नींद है स्त्री
दिन में सौंदर्य
नींद में जागती है रात
इस रात में देखती है स्त्री
आदिम अनुभूतियों  पर थिरकते
अपने होने के कामुक स्वप्न

अपनी यातना में

वह सो चुकी थी कई नींदें
कई दिन और रातें  बीत चुकी थीं
कई जिंदगियां बन और बिखर चुकीं थीं इस बीच
लेकिन एक सपना था जो अब भी झिलमिला रहा था
जिसकी झालर को पकड़ वह उठी थी
और उन फूलों को ढूंढने लगी थी 
जिन्हे सीने से लगा वह सोने गई थी
 
जागने पर यह संसार उसे अब भी
बहुत जाना पहचाना ही लगा था
फूल भले अनुपस्थित थे
लेकिन उसके प्रेमी वहां खड़े थे बाहें फैलाए
 
हर हाल में प्रेम बचा रहता है उसने सोचा था
फिर आह्लादित हो कहा था
आसमान को छत और धरती को बिस्तर बना
समुद्र की तरह कोई गीत गाना चाहिए
 
तभी उसका एक प्रेमी उसे बालों से पकड़ 
खींचता हुआ ले गया नींद और सपनों के बाहर
समेटे हुए अपने सीने में चुराए उसके सारे फूल
जहां सब कुछ नया था अपनी यातना में।

प्रेम के बारे में

सिल्विया प्लाथ आओ
मेरी आत्मा में बसो
निश्चिंतता महसूस करो
यहां अकेलापन कोई यातना नहीं
जो ले जाए तुम्हे गैस स्टोव तक
नहीं प्रेम के बदले नहीं मिला प्रेम कोई महादुख
यहां जीवन जीवन की हल्की रोशनी में फूलों की तरह खिली हुई 
मिलेंगी जीवन जीने की  अमूल्य सलाहें अब
एक फूल जिसमे से तुम्हे भी जीवित करेगा
अपनी अद्भुत सुगंध से
 
आओ, सिल्विया प्लाथ
मुझमें बसो 
निश्चिंतता महसूस करो
यहां दूर दूर तक कोई पुरुष तुम्हे
इतना बेबस नहीं कर सकेगा अपनी क्रूरता से
कि तुम नष्ट हो जाओ
अपने प्रेम से नहीं मार सकेगा  वह तुम्हे दोबारा
आओ और अपनी बाकी कविताएं लिखो
बताओ वह कैसी उदासी थी जिसे तुम झेल नहीं पाईं
डूब गई जिसमे अंततः
और यह भी की अंत तक लगाते हुए आखिरी गोता
क्या सोचा था तुमने प्रेम के बारे में।

मैं कथा कहूंगी

स्त्रियों!
बार-बार मैं तुम्हारी कथा कहूंगी
उतरूंगी जीवन की अंधेरी खोह में
दूर तक बढूंगी
पहुंचूंगी वहां जहां तक थोड़ी भी रोशनी बाकी होगी
देखूंगी तुम्हारे प्राचीन चेहरे
जो अबतक दस्तावेजों की तरह सुरक्षित होंगे वहां
उनसे ही जान लूंगी तुम्हारा हाल
और यह भी समझ लूंगी कि बहुत फ़र्क नहीं है
एक दूसरे के हाल-चाल में  अब भी
अब भी दुख में स्थिर ललाट है
मोमबत्तियों-सी जलती हैं अब। ही वैसे ही आंखें
जिन्होंने देखे न जाने कितने षडयंत्र
झूठ और अनाचार तमाम सभ्यताओं  में
जिम्मेदारियों और बेतहाशा श्रम से झुकी वैसी ही पीठ
और शर्म में गाड़ी वही गर्दन
अस्त-व्यस्त वैसे ही केश जिन्हें बांधने का स्वांग
हर सदी में हमने किया
होठ पर मृत पड़े जीवन के वही पुराने गीत
जिन्हे एक समय हम सबने झूम-झूम  कर गया था
विश्व में जब बहुत कुछ हमारा था
 
स्त्रियों तुम जहां कहीं भी हो
जिस सदी और जिस देश में
तुम्हे अपने पूर्वजन्म सा मैं कविता में पा लूंगी
क्योंकि बार-बार मैं ही थी जन्म लेती बन कर
कभी मीरा, राब्या, एमिली, सिमोन, अख्मतोवा कभी
 
पूर्वजन्म की इससे अच्छी व्याख्या और क्या हो सकती है
की हम बार-बार अपने को पा लें खो जाने के बावजूद 
एक सदी से दूसरी में
एक देश से दूसरे देश में
और अपने होने की इस लंबी त्रासद कथा को कह कर
 बार_बार किसी सुंदर मोड़ तक पहुंचाएं।

नमन करूं छोटी बेटियों को

नमन करूं इस देश को 
जहां मार दी जाती हैं हर रोज़
ढेर सारी औरतें
जहां एक औरत का जीवित रहना 
एक चमत्कार की तरह है
 
नमन करूं! उस मां को जानती हुई अपनी बेटियों को जो
रोती है ” अब क्या होगा ईश्वर इनका इस संसार में”
 
नमन करूं! उस पिता को
जो देता है जीवन बेटियों को
अपनी हड्डियों रक्त मज्जा से 
बनाता है उनका शरीर
फिर कागज़ की नावों की तरह
बहा आता है उन्हे  जीवन के अथाह जल में
 
नाम करू! उन छोटी  बेटियों को
जो जी लेती है  जैसे – तैसे मिला यह जीवन
हो लेती हैं पार कागज़ की नौकाएं होते हुए भी 
डूबती हैं कई
कई गल भी जाती हैं बीच में ही
कुछ लगती हैं पार
खतरनाक इन गहरे जलाशयों के

स्वप्न के फूल

इन दिनों वह जाती है जिधर कुछ गुनती हुई 
जिधर का रुख वह करती है 
उन बिस्तरों में खालीपन के सिवाय कुछ भी नहीं
सच्ची वासना पथराई हुई वहां
जगा नहीं सकती देह के सौंदर्य को जो
 
कमरे के किनारे की गोल मेज़ पर 
सजे प्लास्टिक के फूलों की तरह
वह यथार्थ है जिसे वह कुछ और् समझ बैठी है
कोई भरमाए हुए है उसको
जबकि वह जाए अगर अपनी प्रिय कविताओं की तरफ़
वे दिखा सकती हैं किस तरह चीज़ें रहती हैं
अपनी उदास कृतृमताओं में
कैसे एक ठंडे बध की तरह संभोग है वहां
हमारी लिप्साओं से कैसे 
जन्म लेती हैं पुरुषार्थ की शक्तियां
महत्वाकांक्षाएं किस तरह वेश्याएं बनाती हैं
 
हमें जो चाहिए ऊष्मा जो ताप चाहिए हमें
वह मिलेगी हमें भाषा में ही
सदियों से जिसे बोलते आए हैं समझते भी
अपने बिस्तरों में हम आरामदेह नींद की फ़िक्र करें
खोजें अपनी वासना के सच्चे आनंदलोक को
कविता काफ़ी है हमें वहां ले जाने के लिए अभी
 
जीवन के हैं कितने ही  दूसरे स्वप्न अब
रात के रंग में लिपटे हुए नीले-नीले फूल
चांदनी रात में खेत लेवेंडर के ज्यों
 
और लो! यह चली स्वर्ग से कैसी ठंडी हवा
हिलने लगे हैं कितने फूल स्वप्न के देखो ।

सच्ची कविता के लिए

वह जो अपने मांस की टोकरी 
सिर पर उठाए जा रही है
और वह जो पीटने के बाद ही 
खुल पाती है अंधकार की तरफ़
एक दरवाज़े सी
जैसे वह जो ले जाती है मेरी रातों से चुराकर
मेरे ही बिंब गिरती रात की तरह
सब अपनी राहों पर चलती हुई
कहां पहुंचती हैं
किन हदों तक
कविता की किन गलियों में गुम होने
या निकलने वैसे मैदानों की तरफ़
जिधर हवा बहती है जैसी और कहीं नहीं
 
देखना है आज के बाद
ख़ुद मैं भी कहां ठहरती हूं 
एक वेग सी
छोड़ती हुई सारे पड़ाव यातना और प्रेम के
किस जगह टिकती हूं 
एक पताके सी
इतिहास कहता है
स्त्री ने नहीं लिखे 
अपनी आत्मा की यात्रा के वृतांत
उन्हे सिर्फ जिया महादुख की तरह
जी कर ही अब तक घटित किया
दिन और रात का होना
तारों का सपनों में बदलना
सभ्यताओं का टिके रहना
उत्सर्ग की चट्टानें बनकर
 
देखूंगी उन्हे जिन्होंने
उठाए अपने दुख जैसे वे हो दूसरों के
जी पिटी  ताकि खुल सके अंधकार का रहस्य
और वे जो ले  गईं  मेरी रातों से उठा कर थोड़ी रात
ताकि कविता संभव कर सकें
कब और कैसे लौटती हैं अपनी देहों में
एक ईमानदार सामना के लिए
अपनी आत्मा को कैसे शांत करती हैं वे 
तड़पती रही जो पवित्र स्वीकार के लिए अब तक
कि सच्ची कविता के सिवा कोई दूसरी लिप्सा 
विचलित न कर सके उन्हे ।

मृत्यु की याद

यह तो हमारी जीने की बोदी
 ज़िद्द है
की हम मृत्यु को प्रेम में बदल देते हैं
और यह सब हम जी सादगी से करते हैं
खामोशी भी सिर नवाती है
तकलीफ़ उठाने की सचमुच
कैसी तमीज होती है औरतों में
 
हम कैसे सौंदर्य को बचाए रखते हैं
मुक्ति के स्वप्न को
क्या बताएं
हमारे पास जो अनुभव हैं पराजय के
उनका किसी को ठीक-ठीक अंदाज़ा नही
तो लेते हैं रात के किस पहर हम
दिन के उजाले में कब उसको भी नकार देते हैं
सिर्फ़ हम जानते हैं
 
अनुभवों के लिए जाना पड़ता है किस झूठ की तरफ हमें
किस सच से आंखें चूरानी पड़ती है क्या बताएं
सख़्त फैसलों को ठुकराकर
मनचाही दिशा में जाना
आंधियों को न्योता देने की तरह है
फिर भी हम कैसे
तूफ़ानों में भी चलते रहते हैं
जैसे यह हमारी सहज चाल हो
 
हमारी गर्दन पर लटकी रहती है जो तलवार हरदम
जाने हम कैसे बदल देते हैं उसे ऐसे अनुभव में
जिससे गायब रहती है मृत्यु की याद
गंध हत्या की ।

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किताबें

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विडियो

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