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Sunday, July 14, 2024
नाम -सिया सचदेव  (फुलविंदर कौर )
शिक्षा. स्नातक यूनिवर्सिटी कानपुर से 
 संगीत समिति इलाहाबाद से प्रभाकर
पति का नाम –महेंद्र सिंह बांगा 
माँ का नाम—नरेंद्र कौर सचदेवा
पिता का नाम –कँवर पाल सिंह सचदेवा 
भाषा ग्यान – हिन्दी,अँग्रेज़ी, पंजाबी, उर्दू 
विधा  ग़ज़ल, गीत, नज़्म, भजन, दोहे, कहानी, लेख आदि
 
प्रकाशित रचनाएँ – देश की कई प्रतिष्ठित
पत्रिकाओं में अखबार में प्रकाशित 
दिल्ली इंटेरनेशनल फिल्म फेस्टिवल( में लिखी हुई कहानी पर बनी लघु फिल्म नॉमनेट
 
बरेली, लखनऊ,दिल्ली, जालंधर,रामपुर   नजीमाबाद,आकाशवाणी से  काव्यपाठ  
कई दूरदर्शन केन्द्र और T.Vचैनल शो में intervew 
 
(लाज), निर्देशन- मनीष खंडेलवाल
 
प्रकाशित ग़ज़ल संग्रह ————–
1 उफ्फ ये ज़िंदगी
2 —अभी इक ख्वाब बाक़ी है 
3– फ़िक्र की धूप में
4 –ज़िंदगी मुझसे और क्या लेगी .पाकिस्तान में छपी
5 तसव्वुर टूट जाता है
6 तन्हाइयों का रक़्स
7.और  वक़्त थम गया 
8.मेरा पैगाम मोहब्बत है,
 शीघ्र  ही आने वाला  है 
 
 
स्वर बद्ध की गयी ग़ज़ल – गायक 
जसविंदर सिंह बंटी जी ,बरनाली चटोपद्याय ,ग़ज़ल मेस्ट्रो जसविंदर सिंह.
डा .बिमन सकिया , तेजपाल सिंह ,
रे सुमन ,गुरमीत मोक्ष, विनीत पंडित।   , भारती  विष्वनाथन ,सुनील राही  , रफीक़ शेख़. सिवा कृष्णन,

……………………

गज़लें

1

किसी से भी हमारे दिल की क़ुर्बत अब नहीं हो गयी।
 
जो तुमसे थी मुझे वैसी मुहब्बत अब नहीं हो गयी।
 
अधूरे ख़्वाब ही अब रह गये हैं साथ जीने के,
मिरे जज़्बात में शायद हरारत अब नहीं होगी।
 
लो हमने सी लिये लब दिल पे रक्खा ज़ब्त का पत्थर,
तुम्हें हमसे कभी कोई शिकायत अब नहीं हो गयी।
 
कहा उसने तुम्हें जीना था जितना जी लिया तुमने,
कि तुमको साँस लेने की इजाज़त अब नहीं हो गयी।
 
तुम्हारी दूरियों ने कर दिया मानूस कुछ इतना,
यक़ीं मानो तुम्हारी भी ज़रूरत अब नहीं हो गयी।
 
कभी मुस्कान भी आने नहीं देंगे लबों पर अब,
तिरे ग़म की अमानत में ख़यानत अब नहीं हो गयी।
 
अगर इस दुनियादारी से नहीं मिलता है छुटकारा,
तो ऐ मालिक तिरी हमसे इबादत अब नहीं हो गयी।
 
“सिया सचदेव”

2

जो दिलों में था मोहब्बत का असर टूट गया 
दरों दीवार सलामत रहें 
घर टूट गया
 
मैंने इक तरफ़ा निभाने की बहुत कोशिश की
सब्र का बाँध मेरा
आज मगर टूट गया
 
अहमियत मेरी समझ आएगी उस दिन तुमको 
राब्ता मुझसे किसी रोज़ अगर टूट गया
 
देख इसमें तेरे अश्कों की है तौहीन बहुत 
एक भी मोती अगर दीदा ए तर टूट गया 
 
फिर तो बेकार है मंज़िल का इरादा करना
बीच रस्ते में अगर अज़्मे सफ़र टूट गया
 
आसमाँ तक न पहुँच पाएगी परवाज़ उसकी
उस परिंदे का अगर एक भी पर टूट गया

3

पल दो पल की ख़ातिर किसका साथ करें
इससे बेहतर दीवारों से बात करें 
 
क्यूँ दिखलायें हम अपने ज़ख्मी एहसास
क्यूँ रुसवा अपने दिल के जज़्बात करें
 
अब लोगों की सोच से वहशत होती है
समझ नही आता हैं किससे बात करें
 
देख न पाये कब से उगता सूरज हम
आख़िर कब तक जागके ज़ाया  रात करें
 
दुनिया अब हालात से मुझको लड़ना है 
जो भी मेरे साथ है ऊँचा हाथ करें 
 
जब दिल पर एहसास के बादल छा जायें
बिन सावन के भी आँखें बरसात करें

4

कौन समझता हैं आखिर दिल का आलम
लोग तो देखा करते हैं चेहरे का ग़म
 
नही किसी को चाहा जिसने शिद्दत से
उसको क्या मालूम बिछड़ जाने का ग़म
 
चीख पडूँ मैं इतना मत मजबूर करो
इन यादों की आवाजों को कर लो कम
 
नींदों से भी आखिर क्या हासिल होगा
ख़्वाब ही जब आँखों से हो जाये बरहम 
 
किसको समझे आखिर किसको पहचाने
जिसको भी देखो हर चेहरा हैं मुबहम 
 
नही बदलती कभी हमारे दुख की रुत 
यूँ तो पूरे साल बदलते हैं मौसम 
 
एक न एक दिन देखो हमें बिछड़ना है 
अपने अपने रस्तों पर चल देंगे हम
 
अहदे माज़ी के ग़मगीन ख्यालों ने
खुशियों में भी ख़ूब करायें हैं मातम
 
ज़ख्म जो रिसते रिसते बन जायें नासूर 
उन ज़ख्मों पर काम न आएगा मरहम

5

तेरी ही याद की मोज ए रवां से ज़िंदा हूँ
वगरना तू ही बता दे कहाँ से जिंदा हूँ
 
मेरे वजूद में किरदार ढल गया तेरा
मैं तेरे ज़िक्र तेरी दास्ताँ से ज़िंदा हूँ
 
मैँ चुप रहूँ तो कोई बोलता है तुझ जैसा 
मैँ तेरे लहजे के तर्ज़ ए बयाँ से ज़िंदा हूँ
 
किया है मुझको अता जो तेरी मोहब्बत ने
मैँ ज़ख्म ए दिल के उसी इक निशाँ से ज़िंदा हूँ
 
ख्यालो ख़्वाब सी लगती हैं ज़िन्दगी मुझको
यक़ीन से नही वहमों गुमाँ से ज़िंदा  हूँ
 
शगुफ्ता लहजा ही पहचान बन गया मेरी 
अपने अंदाज़ से अपनी ज़ुबाँ से ज़िंदा हूँ
 
जगाए रहता हैं मुझको ये करब का एहसास
मैँ अपने दर्द की आहो फुगां से जिंदा हूँ

……………………

किताबें

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