Wednesday, May 29, 2024

सुलोचना वर्मा 

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जन्म : ३ अक्टूबर १९७८

जन्मस्थान : जलपाईगुड़ी, पश्चिम बंगाल, भारत

शिक्षा : कॅंप्यूटर अभियांत्रिकी में स्नातकोत्तर डिप्लोमा

सम्प्रति : दूरसंचार कम्पनी में कार्यरत

प्रकाशन      : अंधेरे में जगमग’ (कहानी संग्रह) नेशनल बुक ट्रस्ट, ‘बचे रहने का अभिनय’ (कविता संग्रह) सेतु प्रकाशन

रचनाएँ नया ज्ञानोदय, समकालीन भारतीय साहित्य, इन्द्रप्रस्थ भारती, कथादेश, शुक्रवार, सदानीरा, छपते-छपते, हिन्दुस्तान, प्रभात खबर, दैनिक जागरण, दुनिया इन दिनों, नया प्रतिमान, बहुमत, पाठ, स्त्रीलोक, हिंदी समय, रविवाणी, देशज समकालीन, सृजनलोक, जनादेश, पंजाब टुडे (पंजाबी), कोशी (नेपाली), बांग्ला (खनन, बांग्लादेश जर्नल, बांग्लाबाज़ार, देयांग, रुपाली आलो) आदि  में प्रकाशित |  नवभारत टाइम्स के “एकदा” स्तम्भ के लिए लेखन |

बांग्ला (रबीन्द्रनाथ टैगोर, क़ाज़ी नज़रूल इस्लाम, लालन फ़कीर, अल महमूद, तस्लीमा नसरीन, रूद्र मोहम्मद शहीदुल्लाह, शंख घोष, सुनील गंगोपाध्याय, पूर्णेंदु पत्री, मलय राय चौधुरी, बिप्लब चौधुरी आदि) और अंग्रेजी (अमिय चटर्जी) की कई कविताओं का हिन्दी में अनुवाद भी किया है| चित्रकार संजय भट्टाचार्य के बांग्ला कविता संग्रह “सोनामणि” का हिन्दी में अनुवाद किया है|  

पढ़ने लिखने के अतिरिक्त छायाचित्रण व चित्रकारी में रुचि है तथा संगीत को जीवन का अभिन्न अंग मानती हूँ।  

दूरभाष : ९८१८२०२८७६ / ९३५४६५९१५० 

ई मेल : [email protected]

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कविताएं

नहीं कहा पिता ने कभी

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एक दिन किसी साहसिक कथा ने पसारे अपने पंख 
और जिस उम्र में ब्याही जा रही थीं मेरी सखियाँ 
पिता ने मुझे पढ़ने, कुछ बनने के लिए दूर शहर भेजा 
 
एक दिन अंधकार सहसा गया सालाने अवकाश पर  
और जब लड़कियों का स्वप्न देखना भी होता था गुनाह 
पिता ने मुझे दिलाया मेरा पसंदीदा रंगीन धूप चश्मा
 
एक दिन कहानियों से रूपकथा उतर आई जीवन में
और जहाँ समाज में कन्याओं का दान किया जाता रहा 
पिता ने की मेरे प्रेमी से रो-रोकर मेरे लिए प्रेम की याचना    
 
दिन प्रतिदिन पितृसत्ता ढ़ोते पुरुष ने सहा प्रेम का चाबुक 
प्रेम है, ऐसा कुछ नहीं कहा पिता ने कभी 
प्रेम है, पिता ने हर बार निभाकर दिखाया  

बारिश

१.
आषाढ़ के दुलार से झरती हैं वृष्टि की बूँदें 
और प्रकृति की तृषित इच्छाओं से मनुष्य
हम मनुष्य भी बूँदें हैं इस भवसागर की
अभिसार को निकली मृत्यु जब हो उठेगी असभ्य 
और करेगी दुलार जीवन को आपादमस्तक 
झर जायेंगे हम बूँदें, जमा होंगे मेघ सरोवर में 
दीर्घतपा पृथ्वी करेगी प्रतीक्षा आषाढ़ की हर बरस 
सहस्र जन्मों बाद हम भी बरसेंगे मिलन-ऋतू में  
वृष्टि की पवित्र बूँदें बनकर किसी रोज़ कहीं धरा पर 
 
जीवन क्या है?
बारिश की नौका पर सवार एक जलीय यात्रा है|
 
२.
जब सृष्टि करती है वृष्टि 
सुविन्यस्त वर्षा के जल में 
बूँदें बनकर उतरते हैं हमारे पूर्वज
बरसते हैं सर पर बनकर आशीष 
लगते हैं तन को बनकर दिव्य औषधि    
ठहर जाते हैं कुछ देर धरा पर बन नदी 
कि जता सकें हम उनपर अपना अधिकार 
और चला सकें उन पर ख्वाहिशों की नाव 
डूब जाती है कागज़ की नौका कुछ देर चलकर 
जल में नहीं, प्रेम में !
 
बारिश क्या है?
पूर्वजों से हमारा साक्षात्कार है|

पंचतत्व

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बनकर स्रष्टा करना सृष्टि अहर्निश प्रेम की 
दफ़न करना अपनी जमीं पर सीने भर आशा 
कि अपने आप में पूरी पृथ्वी हो तुम 
जिसकी परिक्रमा करेंगे कई कई चाँद 
जो पोषित कर सकती है कई कई जीवन 
 
वृष्टि के जल को भर कलशी में 
पकाना दाल, धोना कपड़े 
बन मेघ भले पी जाना भवसागर  
आँखों का पानी बचा रहे 
बस इतना सा यत्न करना 
 
चूल्हे की आग में पकाना भंटा बैंगन
खाना पांता संग, मत करने देना शमन 
किसी को अपने भीतर की अग्नि का 
कि आत्मा में भर कर अंधेरा
नहीं लाया जा सकता उजाला जीवन में  
 
संसर्ग ही करना हो तो रहे ध्यान 
कि भले ही कर ले स्पर्श कोई शरीर का 
परन्तु तुम्हारे तुम को किंचित छू भी न सके 
न करना उत्सर्ग अपना असीम किसी को 
कि जमता रहे वहाँ संभावनाओं का मेघ 
 
बन चैत्र की आँधी घूमना माताल की तरह 
पर साधे रहना ताल जीवन का 
प्रेमशुन्य धरा पर लौटना बार-बार अनेक रूपों में 
बन कर प्रशांति की अविरल धारा 
क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा 

फ़िदा हुसेन का घोड़ा

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अपने ख्वाबों की बदलती ज्यामिति पर
जिसे बन जाना था पाइथोगोरस सा 
और गढ़ने थे जिसे नित्य नए प्रमेय 
मैंने देखा है खुली आँखों से उस शख्स को 
बदलते हुए अनगढ़े ख्वाबों को रंगों में,
फिर उन रंगों को बदलते कैनवास पर 
बिखरी हुई आड़ी-तिरछी लकीरों में,
बदलते देखा है उन लकीरों को फिर 
अलग-अलग ज्यामितीय आकारों में, 
देखा फिर ज्यामितीय आकारों को 
बदलते हुए एक मुकम्मल आकृति में 
देखा है इन आकृतियों को कई बार बनते घोड़ा
कभी रंगीन तो कभी श्वेत-श्याम रंगों में 
और इस प्रकार फ़िदा हुसेन की तूली से गुजरकर 
अनगढ़े ख्वाबों को घोड़ा बन दौड़ते कैनवास पर 
कई बार मैंने देखा है खुली आँखों से
 
यदि लगता है आपको कि मर गए हैं आपके ख्वाब 
यदि लगता है आपको कि ख्वाब अब बचे ही नहीं 
यदि लगता हो आपको कि ख्वाब जैसा कुछ था ही नहीं कभी 
तो जागकर शून्यता के ध्यान से देखिये फिदा हुसेन के घोड़े को 
जो देखता है मुड़-मुड़ कर पीछे अलग-अलग रंगों में 
आगे बढ़ते हुए क्या देखा है आपने कभी मुड़कर अपने छूटे हुए ख्वाबों को ?
 
आप देखेंगे कि हमारे अपने ही ख्वाबों का चित्रांतर है फिदा हुसेन का घोड़ा 
जिसे स्पर्श कर पाने के लिए दरकार है अंतर्दृष्टि की 
जिसके शरीर से एक ज्यामितीय आकार निकालकर रख लेना चाहता है मन 
फिदा हुसेन के घोड़े की नाल में दिखता है मस्तुल हमारे ख्वाबों की नौका का
 
फिदा हुसेन का घोड़ा जो दिखता है कैनवास पर पीछे मुड़कर देखता 
बना है ज्यामितीय आकारों से और हर आकार का है अपना एक कैनवास 
मंचन हो सकता है उस हर एक कैनवास पर हमारी ख्वाबों के पसंद के किसी नाटक का 
जिसे देखकर पता चलता है कि होता है कितना जरूरी ख्वाबों को आकार देना !
 
हम जब भी देखते हैं कोई ख्वाब, हमें देखना चाहिए फिदा हुसेन के घोड़े को 
जो देखता है मुड़-मुड़ कर पीछे बारबार, आगे दौड़ते हुए भी पूरे सामर्थ्य के साथ 
कि मन को चाहिए होती है अथाह हॉर्स पावर शक्ति आगे बढ़ते रहने के लिए 
और आकार देने के लिए पीछे मुड़ कर देखते हुए अपने छूटे हुए अनगढ़े ख़्वाबों को

तुम्हारे साथ

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तुम्हारे साथ स्वर्ग नहीं जाऊँगी प्रिय  
मुझे पुकारती है नीलगिरी की पहाड़ियाँ
दिन रात आमंत्रित करती है बंगाल की खाड़ी
पुकारता है महाबलीपुरम का मायावी बाज़ार
नंदमबाक्क्म के आम के बागान में दावत उड़ाते पंछी
पुकारता है संयोग, पुकारता है अभियोग
कि लौटने की समस्त तिथियाँ मिट गई हैं पञ्चांग से
पुकारता है प्रेम, पुकारता है ऋण
पुकारता है असमंजस, पुकारता है रुका हुआ समय
 
जहाँ पुकार रही हैं मुझे असंख्य कविताएँ
मैं हो विमुख उनसे चल पडूँ तुम्हारे साथ!
नहीं कर सकती ऐसा अधर्म, ऐसा पाप!
 
प्रिय, तुम निकल पड़ो किसी यात्रा पर 
लिखो अपने पसंद की कविताएँ होकर दुविधामुक्त
देखना मैं मिलूंगी तुम्हें उन कविताओं में अक्षरशः
मैं नष्ट स्त्री हूँ, मुझे स्वर्ग की नहीं तनिक भी चाह !

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किताबें

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