Tuesday, December 5, 2023
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चन्द्रकिरण राठी

चन्द्रकिरण का जन्म तिवारीपुर, हुसेनगंज (ज़िला फ़तेहपुर, उत्तर प्रदेश) में 29 फ़रवरी 1944 को हुआ था। पिता वैजनाथ शुक्ल कलकत्ता (कोलकाता) में पुस्तकों आदि का व्यापार करने के बाद गाँव, फिर इलाहाबाद (प्रयागराज) लौट आये थे। माता बिन्दुमती जी की दस संतानों में चन्द्रकिरण के बाद एक भाई देवनारायण हुए। विख्यात लेखक स्व. रामनारायण शुक्ल और प्रयाग शुक्ल उनके बड़े भाई, तथा चंद्रप्रभा पांडे बड़ी बहन हैं। प्रमाण—पत्र में जन्मतिथि 1 अगस्त 1944 है। गाँव में प्राथमिक, कोलकाता में माध्यमिक एवं इलाहाबाद विश्वविद्यालय में एम.ए. (अंग्रेज़ी साहित्य) की शिक्षा के बाद प्रतापगढ़ महिला महाविद्यालय में कुछ समय अध्यापन किया। गिरधर राठी से विवाह के बाद 1968—69 से दिल्ली, फिर दसेक वर्ष से ग्रेटर नोएडा में निवास। एक पुत्र विशाख, एक पुत्री मंजरी। दिल्ली में पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस में कुछ समय सम्पादन—कार्य के बाद विदेशी छात्रों को अंग्रेज़ी पढ़ाती रहीं। केन्द्रीय अनुवाद ब्यूरो में लगभग बारह साल वरिष्ठ अनुवादक के रूप में काम के बाद स्वेच्छा अवकाश ले लिया। बाद में तीनेक बरस दिल्ली के बी.बी.सी. कार्यालय में श्रोता विभाग की अधिकारी रहीं। बोनसाई, गुलाब, कैक्टस, फ़्लोरीकल्चर आदि की विभिन्न राष्ट्रीय संस्थाओं में अपने जैविक बाग़वानी के प्रेम के साथ आजीवन सक्रिय रहीं। पुस्तक प्रसार के लिए देश के अनेक राज्यों में भ्रमण किया, जगह—जगह स्टॉल आदि लगाती रहीं। दिल्ली, पटना, भटिंडा आदि पुस्तक मेलों में भागीदार रहीं। इंग्लैंड, हॉलैंड, फ़्रांस आदि की भी यात्रा की। साहित्य, और ख़ास तौर पर कविता में गहरी रुचि—बांगला, हिन्दी, अंग्रेज़ी। ग़रीब बच्चों के शिक्षण की कोशिश। गाँवों से शहर में आयी ग़रीब, कामकाजी स्त्रियों का सर्वेक्षण सी.एस.डी.एस. के लिए करके एक रपट तैयार की। 'जनसत्ता', 'इतवारी पत्रिका', 'वामा', 'कादंबिनी' आदि अनेक पत्र—पत्रिकाओं में कहानी, लेख, समीक्षाएँ लिखने के अलावा कुछ रचनाएँ अप्रकाशित—अप्रसारित रह गयीं। जैसे, टेलिविज़न के लिए बालकथाओं की स्क्रिप्ट, अवनीन्द्रनाथ और लीला मजूमदार की कुछ कृतियाँ, छत्तीसगढ़ के कृषक गीत—श्यामचरण दुबे। 'शतरंज के बत्तीस मोहरों का सफ़र' नाम से बालोपयोगी पुस्तक भारत ज्ञान विज्ञान समिति ने 1996 में प्रकाशनार्थ ली थी, पर फिर राजस्थान प्रौढ़ शिक्षण समिति ने उसे छापा था, संभवतः 1996 में। अब अप्राप्य। प्रकाशित पुस्तकें यह हैं : बांग्ला से अनुवाद : 'जहाँगीर की स्वर्ण मुद्रा' (सत्यजित राय की कहानियाँ, राजकमल प्रकाशन, 1990); 'रवीन्द्रनाथ के निबंध', भाग : तीन (साहित्य अकादेमी, 1996); 'गुड़िया की दावत' (सुकुमार राय की सात बाल-कथाओं का नाट्य—रूपांतर, राजस्थान प्रौढ़ शिक्षण समिति, 1994); 'पलाशपुर में पिकनिक' 'विषहरि प्रसाद तथा समुद्र की संन्यासिनी' (नवनीता देवसेन की प्रवास, बालकथा, किशोरकथा की तीन पुस्तकें, वत्सल / वाग्देवी प्रकाशन, 2003...) 'जतिन का जूता' (सुकुमार राय की बालकथाएँ, ईशान / राजकमल प्रकाशन, 1990...2011) अंग्रेज़ी से अनुवाद : 'उड़न—छू गाँव' : हंगारी कहानियाँ (राधाकृष्ण प्रकाशन 1986, वाग्देवी प्रकाशन 1998); 'तीन सवाल' (लिओ तोलस्तोय की कहानी, नेशनल बुक ट्रस्ट 1994, कई भारतीय भाषाओँ में अनूदित); 'ताराशंकर बंधोपाध्याय (महाश्वेता देवी द्वारा लिखित, साहित्य अकादमी, 1978) इनके अलावा 'हिन्दू दर्शन : एक समकालीन दृष्टि' (डॉ. कर्ण सिंह, भारतीय ज्ञान पीठ, 1996) का गुमनाम अनुवाद। नेशनल बुक ट्रस्ट के लिए 'जल ओ तार व्यापार' तथा 'मायेदार आईन' आदि का अनुवाद (शायद अप्राप्य ?) निधन : 17 दिसंबर 2020, ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

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चन्द्रकिरण राठी : आत्मकथा या एक कथा की अंतिम शुरूआत

वो कहती है उसका विवाह नहीं हुआ हालाँकि उसका विवाह हुए पचास बरस हो चुके हैं। उसके साथ फेरे नहीं हुए। हालाँकि उसके पति ने उसका हाथ पकड़कर कहा कि मैं तुमसे कभी कुछ नहीं छिपाऊँगा। फिर उसने पाया कि जीवन के सभी अहम् मुद्दे उससे छुपाए गये हैं। किसी भी महत्वपूर्ण मुद्दे पर उससे सलाह नहीं ली गई सलाह लेने का नाटक किया गया। पुश्तैनी जमीन बेचने की बात आई तो सास ने अपने अकेले लड़के की दुहाई देते हुए कहा जो कुछ है तुम्हारा है उसने इसे मान लिया वह इतराती रही फिर उसे पता चला कि उसका तो कुछ नहीं था उसका इतराना खत्म हुआ। एक मकान था जहाँ वो छुट्टियाँ बिताने जाते थे सास—ससुर थे वो अपने लड़के का इंतजार करते थे पहुँचने पर वो खुश होते और अपनी बीमारी और गरीबी की चर्चा करते हुए कहते तुम चिंता मत करना हमारा कौन बैठा है तुम्हारे सिवाय पड़ोसी और मित्र बताते बापू दैय्या की माला जपते रहते हैं। वो सब सुनकर दुखी और उदास हो जाती। कभी—कभी खींझकर कहती —"हमारी भी मुश्किलें हैं।" पर सास—ससुर और परम मित्र को उसकी मुश्किलें दिखाई नहीं देती—घर में बच्चों को छोड़ दफ़्तर जाना, दिन में स्कूल से बच्चों का घर लौटना, अकेले खाने का दुख उन्हें कभी समझ नहीं आता क्योंकि वो उनकी तरह दुखभरी आवाज़ में अपनी मुश्किल बयान नहीं कर पाती। वो अपनी दो बड़ी लड़कियों की मुश्किलें बयान करते कभी नहीं थकती। बच्चे भी उनकी मुश्किलें समझ जाते और हमसे उन्हें मदद देने की बात करते। दिन इसी तरह बीत रहे थे एक दिन ससुर की मौत के बाद घर बेचने का प्रस्ताव आया तो उसने कहा सिर्फ एक कमरा रख लेना ताकि कभी मन हो तो आया—जाया जा सके। उसके पति सुनते रहे कहा कुछ नहीं फिर घर बेचकर वो लौट आये लेकिन एक कमरे की चाह पूरी नहीं होने दी। उसका एक सपना था जमीन पर फलों के पेड़ लगाकर शेष जीवन प्रकृति के प्रांगण में रहेंगे। यह कोई मुश्किल काम नहीं था। हमारे देश में स्त्री की कोई जगह नहीं है यह सब जानते हैं। लेकिन भरे पूरे परिवार में बिना दहेज़ के ब्याही गई सभी की क्या वकत। समाज से प्रशंसा तो लड़के वालों को ही मिलती है और गाहे—बगाहे प्रताड़ना प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से स्त्री को। वो जिन्दगी भर कमाती रही चुपचाप—अब जब उसके पति ने अपने यश रक्षा के लिए सबकुछ दान कर दिया है। परिवार से उसका कोई सम्बन्ध नहीं। पिछले बीस वर्षों से उससे न कोई मिलने आया और न ही उसकी कोई ख़बर ली गई। उसके बच्चों का हिस्सा हड़प कर उसकी ननदें और बेटे मस्त हैं। पति अपना यशगान सुनकर मस्त है। उससे कभी घर की चर्चा नहीं करते। कभी गलती से वो चर्चा कर बैठती है तो निरुत्तर हो जाते हैं। वह भी कोशिश करती है कि कभी कुछ न कहे इतिहास के पन्नों में यादें दबी रहने दें और दुनिया जहान के इतिहास के पन्नों को कुरेदने वाले पति पर उसे खीझ होती है खीझ हुई औरत कर भी क्या सकती है। हाँ उसके विवाह को पचास बरस हो गये हैं पर वो कहती है उसका विवाह नहीं हुआ—उससे प्रेम नहीं किया गया। प्रेम का अर्थ है दूसरे की इच्छा का सम्मान। — उसकी किसी भी इच्छा का सम्मान नहीं किया गया फिर भी दुनिया उसे भाग्यवान मानती है। उसे नहीं मालूम एक दिन न जाने क्यों उसके अपनों के साथ मिलकर पति ने उसे बिजली के झटके दिये और वह सब कुछ भूल गई। लेकिन बिजली के झटके तो कुछ ही समय के लिए भुलाते हैं अब शेष जीवन उसे सब याद रहेगा और वह तड़पती रहेगी — सबकी नज़रों में खुश —

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