Wednesday, April 24, 2024
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संक्षिप्त परिचय- डॉ नेहल शाह, भोपाल मेमोरियल हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर, भोपाल, केंद्र सरकार द्वारा संचालित अस्पताल में फ़िजिओथेरेपिस्ट के पद कार्यरत हैं। उन्होंने हिंदी में लेखन, प्रमुखतः कविताओं के रूप में प्रारंभ किया। उनकी कविताएँ एवं समीक्षाएँ देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। वे चित्रकारी में भी रुचि रखती हैं।
 
पता- डॉ नेहल शाह,
34 गायत्री विहार,
बागमुगालिया, भोपाल (मध्यप्रदेश)
462043
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तुम्हारी पीठ

कभी कभी एक
रम्य साध की तीव्र अभिलाषा 
कर देती है दिमाग को कुंद
जैसे अंधेरे से पटा सघन अरण्य
जहाँ रात की लंबाई अधिक है 
दिन के बनिस्बत 
खयालों की जमीं 
हो जाती है 
सुंदरबन का दल-दल
और धंसते जाते हैं विचार
गहराई तक
 
समूची देह पर 
हो जाता है शून्य
मस्तिष्क का नियंत्रण
तर्क, ज्ञान, बुद्धि, स्मरण,
विचार, व्यक्तित्व,
निर्णय का नियमन
छूट जाता है
केवल एक स्वप्न
तैरता हुआ
जैसे किसी डोर से छूटी
अनियंत्रित पतंग
 
क्या धर सकता है 
कोई स्वप्न पर संयम?
स्वप्न में तुम्हारा साथ
तंत्रिकासूत्रों के हर आवेग में
बस तुम
स्वप्न के बाहर तुम नहीं
जहाँ तुम नहीं
वहाँ मैं होकर क्या करूं?
 
क्या करूं इस बिन रौशनी की गुफा का?
यहाँ कोई खिड़की नहीं
रोशनदान नहीं
केवल घुटन 
अपारदर्शी सी 
एक दरवाजा 
जो भीतर से खुलता नहीं
एक गहरा गड्ढा 
गुफा के बीचों बीच
कूद कर दम तोड़ते स्वप्न
घायल सपनों पर पलते सर्प
रेंगते, फुफकारते
ढूंढते मुझे
और डसी जाती हूं मैं 
हजारों सांपों से एक साथ।
 
आह! कितनी पीड़ा
कितना विष भर चुका है मेरे भीतर
कि अब जिलता नहीं कोई और विचार
बस एक तुम्हारा खयाल
पुकारती तुम्हारा नाम
बची-खुची अपनी आवाज में 
देखती तुम्हारी ओर
दर्द से भरी नीली आंखों से
देखने तुम्हारा चेहरा
जो दृश्य नहीं
दिखती है तो केवल
तुम्हारी पीठ।
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