Monday, June 17, 2024
डॉ. सुमीता
 
परवरिश व प्रारम्भिक शिक्षा: बोकारो इस्पात नगर में
उच्च शिक्षा: काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में 
कार्यक्षेत्र: शिक्षण, लेखन और पत्रकारिता के क्षेत्रों में कार्यरत। 
*प्रतिष्ठित सिने पत्रिका ‘स्टारडस्ट’ सह सम्पादक और अनियतकालीन दीवार पत्रिका ‘समाधान’ की पूर्व सम्पादक। 
*कविता, कहानी, जीवनी, नाटक, पटकथा आदि विभिन्न विधाओं में स्वतंत्र लेखन।
*प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में व ब्लॉगों पर रचनाएँ प्रकाशित।
सम्प्रति: स्वतन्त्र लेखन। काशी में निवास। 
ईमेल: [email protected]
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कविताएं

महापण्डित राहुल संकृत्यायन से लोला का अनुत्तरित प्रश्न

तुमसे हजारों मील दूर यहाँ
मैं तुम्हारी महानता और पांडित्य की कीमत चुका रही हूँ
तुम्हारे हवन कुण्ड में समिधा सी सुलगती
 
प्राणों की आँच में
घोंटकर अपनी विद्वता जब तुम
स्पंदित शब्दों से निर्जीव पन्नों पर
जीवन का महाकाव्य रच रहे हो: सूक्तियाँ, ऋचाएँ और दर्शन
मैं ब्रेड के एकमात्र बचे स्लाइस के आठ टुकड़े करती
तुम्हारी कलम से झरने वाले
अक्षरों सी झर-झर बिखर रही हूँ
मेरी गोद में भूख से बिलखते मेरे
दूधमुँहें बच्चे की
टुकड़े जितने दिनों की क्षुधा तृप्ति के उत्तर में
मेरे हिस्से आई टुकड़ों से झरे चूर्ण का
(इतने दिनों तक का)
आहार मेरे शरीर में
उसका आहार निर्मित कर नहीं पाता
और युद्ध की नींव पर क्रान्ति की लपट में
सिंक नहीं पाती हैं रोटियाँ
इसीलिए इतिहास में दर्ज
दुर्घटना मात्र हो जाती रही हैं क्रान्तियाँ
 
 महापण्डित?! – नहीं तुम
मानवीय संवेदन के क्रयी-विक्रयी
तुम्हारी व्यापार कुशल वाक् चातुरी के लुभावने
शब्दफूलों की रंगीन मायावनी सुगंधी से ठगी गयी
मैं अपनी नाबालिग कोख में तुम्हें धारे
धरती आकाश होती रही,
तुम मेरे प्राणों की पूरी ऊर्जा और उत्साह
अपने लहू में तरंगों-सा समेट
पवन-सा उड़ गए और किसी ठौर.
ये तरंगें एक और कालजयी कृति रचवाएँगी
प्रशंसा पुरस्कार बटोरते चल दोगे फिर तुम
अनुभूतियों की नई किसी देहरी पर
एक और मरुथल हो जायेगा हरियाली का कोई सागर
तुम्हारी महानता के अद्वितीय एहसान के बोझ सम्हालता.
 
धरती के सौन्दर्य में श्री, समृद्धि और
ज्ञान का आगार जोड़ने का
दंभ भरने वाले!
एक व्यक्ति का टूटना
एक पृथ्वी-आकाश का बिखरना होता है
उसे सर्जक तुम्हारा
क्या सिरज सकता है दुबारा? 
 
अब जबकि
तुम्हारे सभी गुंजलक
मेरी आँखों में पर्त-पर्त खुल गए हैं
मैं निर्द्वंद्व, निर्बंध अपने डैने तौल रही हूँ :
खोज लूँगी अपना खोया आकाश.
 
तुम ढूँढोगे मुझे
सीता की पीड़ा में, राधा की व्रीड़ा में
जेना(स्टीन) के आँगन में, मीरा के गायन में
मोना(लिसा) की मुस्कान, मारीना के संघर्षों में
लक्ष्मी के विद्रोह में, जॉन (ऑफ़ आर्क) की मृत्यु में
क्यूरी के विज्ञान और सीमोन के विश्लेषण में
टेरेसा की करुणा में, अरुंधती के इश्वर में
तस्लीमा को दिए फतवों और मेधा के घट्ठों में
पत्थर तोड़ती औरत की फूलती साँसों से
मिस यूनिवर्स के ताज तक लाखों आँखों में
तुम मुझे ढूँढोगे
न्योछावर करने कुछ शब्द
जो मुझतक पहुँचने से पहले ही बिला जायेंगे
जैसे तुम्हारी कृतियाँ पुस्तकों के ढेर में …
पर ढूँढ नहीं पाओगे…
 
महापण्डित !
तब तुम क्या करोगे
जब मै-मरियम
अपने बच्चे को
यीशु बना जाऊँगी
जिसमें तुम्हारा कोई अता-पता-ठिकाना नहीं होगा?
 
-o-
 
[अपने रूस प्रवास के दौरान महापंडित राहुल संकृत्यायन ने सत्रह वर्षीय लोला को पत्नी बनाया था. यह समय रूस में राजनीतिक उथल-पुथल का था. राजनीतिक व अन्य कई कारणों से गर्भवती लोला को अकेली छोड़कर महापंडित राहुल सांकृत्यायन वापस भारत आ गए और दुबारा कभी मिलने न जा सके. राजनीतिक क्रान्ति की वीभत्स ज्वार-भाटों की विषम परिस्थितियों में अपने अबोध शिशु के साथ भूख और आभाव के संत्रास सहती लोला की पीड़ा ही इस कविता की प्रेरणा है.]

तुम्हें पेड़ सा मन मिले

उफ़्फ़ ये औरतें!
पिता के दुश्मन के बेटे के आकर्षण में पड़ जाती रही अक्सरहाँ
शत्रु खेमे की स्त्री का स्त्रीत्व बचाने को 
खेल जाती रहीं जान से
जचकी की पीड़ा हरने धाय हो जाती रहीं 
किसी भी जीव-जानवर की
विश्वास किया तो आँख मूँदकर
प्रेम किया तो सर्वस्व निछावर
स्नेह दिया तो अपने हिस्से का दाना-पानी भी 
बाँट आती रहीं हँसी-खुशी
दुश्मन सैनिकों को अपनी देह गिरवी रख
बचा लाती रहीं तुम्हें
तुम्हारे हाथों पिटकर भी
तत्पर हो परोसकर देती रहीं अपने भी हिस्से का खाना
और उसी तत्परता से सौंपती रहीं
तुम्हारे क्रोध और नफरत के कोड़ों से 
छलनी हुई अपनी देह
केवल इस सम्भावना में कि शायद
इससे ठण्डा पड़ जाए तुम्हारा क्रोध
 
वे छली गईं
भावों के आखिरी तन्तु से ख़ाली हो जाने तक
पीड़ा ने माँजा उन्हें
श्रमसिक्ताओं ने सजाया
वे रोते-रोते गाने लगीं और
गाते-गाते रोईं भरपूर
 
 बेवकूफ ही तो थीं कि
साम्राज्य बढ़ाने को युद्ध लड़ने की बजाए
हथेली की ओट में बचाती-बढ़ाती रहीं
जीवन का दियना 
झरते पारिजात के लिए आँचल बिछाया
ओसकणों को पोरों पर सहेज लिया
फूलों से सँवारा
सुगन्धि में बिखर गईं
बौरायीं मंजरियों सी और कोंपलों में फूट पड़ी 
पेड़ों को बचाने आरी के दाँतदार धार के सामने तन गईं
सबसे नाक़ाबिल बच्चों, अपाहिजों, बीमारों को लुटा आईं 
जाने कहाँ का संचित नेह
दुःख-दर्द में भूल गईं भाई-भाई के बीच की रार
माफ़ कर दिया क़ातिलों को भी
और तुम्हें जीत जाने दिया बार-बार
 
तुमने ठीक कहा कि विवेकहीन होती हैं वे
परले दर्ज़े की
नहीं तो जिनसे ही इस दुनिया में आए 
कैसे कर पाते उनकी ऐसी दुर्गति?
 
 और ये हैं कि आसीसती ही रहती हैं:
तुम्हें पेड़ सा मन मिले
नदी सी तरलता
होता हो कोई अगला जन्म तो स्त्री होकर जनमना.

सूरज को नहीं होती आँखें

सहनशीलता बेहद टुच्ची शय है
जिसके सहन में
पीपल बीज सी पलती
उम्मीद है कि मरती नहीं.
 
उम्मीद है कि किसी दिन आ ही जाएगा वह दिन
जिसके लिए दुनिया भर के कवियों की
निर्दोष आँखें अपलक जागती हैं
रात-रात भर मंत्रविद्ध:
न स्वप्न, न सुसुप्ति
न जागृति, न मुक्ति
एक ऐंठन, एक मरोड़
एक चक्करदार बेचैनी
न आदि, न अन्त
न मात्रा, न सम
बेहिसाब प्रकाशवर्षों की परिधि पर
ऑटोमेटिकली चलते ही चले जाने की यान्त्रिक मजबूरी
खिंचे चले जाने से रुकते नहीं प्राण
किसी महाशक्तिशाली ब्लैकहोल की
असीम गुरुत्वीय शक्ति में.
 
दिन सबसे शक्तिशाली ब्लैकहोल:
सूरज जिसके काले छेद की सीवन की कोशिश में
औंधे मुँह गुड़प जाता है
हर शाम महासमुद्र के खारे अँधियारे में.
क्योंकि सूरज को नहीं होती आँखें
उसके तेज को रोशन करने
जागती हैं कवियों की आँखें
रात-रात भर. 
 
पैंतरेबाज अघोरी दिन की
मायाविनी भैरवी रात
जब दसों दिशाओं से उफनते हाहाकारी अंधकार के
मूसलों से कूटने लगती
सुकोमल क्षणों की छाती
उससे निर्भय छाती भिड़ा देने के लिए
कवियों की निःशंक, निराक्रांत, निष्पलक
जागती आँखें ही होती हैं मौजूद 
 
जब ज्ञान, सत्य और अभिव्यक्ति की
कसती जा रही हो घेराबंदी
सभी शोध, सारे आविष्कार
रंगीन काँच की दीवारों वाली
पता नहीं किस व्यापारिक दुनिया में
कैद किए जा रहे हों
महामनीषी वैज्ञानिक उचार रहे हों
पृथ्वी का भविष्य
उसकी उम्र के दिनों की गणना
कर रहे हों अँगुलियों पर
ऐसे कठिनतम समय में
कवियों के जागती आँखों के
अग्निशरों की नोक पर ही
घूमती हुई बची रहेगी पृथ्वी.

लीलावती*

तुम्हारी नथनी से मोती क्या गिरा
जलघड़ी में ठहर गए समय ने
अपनी दिशा ही बदल ली कि
टल गया मुहूर्त, टल गई शादी.
 
प्राची में उदीयमान भास्कर** के
तेजोमय रविरश्मियों से प्रदीप्त
प्रकाण्ड पण्डित पिता की
वाणी वृथा नहीं हुई
न ही वृथा हुआ प्रण
लीलावती अब गहेगी गणित.
 
दस बरस की बच्ची के हाथों में
बदल गए खेल-खिलौने
संख्याएँ हमजोली बनीं
मित्र बनें
कोटि-कोटि आकार-प्रकार, आचार-विचार
दृश्य से अदृश्य तक
जागृति से स्वप्न तक
शून्य से अनन्त तक  
गोते लगाती लीलावती ने आत्मस्थ कर लिया
पहला शाश्वत पाठ:
हर इकाई होती है स्वयम् सम्पूर्ण.
 
काव्यमयी प्रकृति के अमूर्त
बीजमन्त्र छन्दों से भूषित भाषा के
अक्षर-अक्षर बाँचती वह
खोलती गई
सूत्रों, प्रमेयों के सभी मर्म.
 
 ‘वेदांग ज्योतिष का उपांग गणित’ कौन-सी श्रेढ़ी बनेगी?
बताओ तो कन्ये लीलावती…
गणितज्ञ पिता ने प्रश्न उछाला
क्षणभर को सोचती प्रतिप्रश्न करती
उत्तर दिया तेजस्वी बालिका ने:
क्या इसे ज्यामितिक श्रेढ़ी कहना समुचित होगा?…
पृथ्वी जिसका केन्द्र
आकाश के नैरंतैर्य को समाहित करती
अबूझ-अदृष्ट झिलमिल कुण्डली झलकी
मन्द स्मिति थिरक गई पिता की आँखों में…
 
पिता और पुत्री के बीच
प्रश्न और उत्तर अपनी जगहें बदलते रहे
और यूँ रचित होते रहे कालजयी ग्रन्थ
बीजगणित, ज्यामिति, त्रिकोणमिति
और रचित होती गई स्वयम् ‘लीलावती’…
 
सहत्राब्दी बीती किन्तु
मेधा और तेज के भरेपूरेपन की साक्षात् अनुकृति
‘विज्ञान की रानी’^ का सिरमौर बनी
आज भी जगमगा रही है लीलावती.
-0-
 
* लीलावती: भास्कराचार्य (द्वितीय) की पुत्री और गणित की एक प्रसिद्ध पुस्तक का नाम।
**भास्कर: लीलावती के पिता, भास्कराचार्य (द्वितीय) जिन्होंने लीलावती नाम से अपने बृहद ग्रन्थ ‘सिद्धान्तशिरोमणि’ का पहला अध्याय लिखा। एक स्वतन्त्र पुस्तक के रूप में ‘लीलावती’ आज भी अंकगणित के पुस्तक के रूप में उपलब्ध है।  
^गणित को ‘विज्ञान की रानी’ माना जाता है।  
 ***

दिकू

इक्कीसवीं सदी के स्वागत में उल्लसित 
पहली बार मैंने
सुना था यह शब्द
‘दिकू’
माने क्या???
“दिकू माने ‘बाहरी’ जैसे कि तुम!”
हवा का एक तर्रार झोंका इठलाता गुज़रा था…
‘मैं दिकू? कैसे भला?’  
अविभाजित अविच्छिन्न आदिम जलधार बीच खड़ी मुझे
किस धार से अलगाया जा सकता है कहो तो?
अपने ही भीतर स्थित पत्थरों पर 
छपाके मार मेरे चेहरे पर छिटकती 
गर्गा* की एक और बेपरवाह लहर 
मेरा चिहाया स्वर सुने बिना 
खिलखिलाती आगे निकल चुकी थी 
मैं दिकू साबित थी 
 
आधुनिकतम शताब्दी में पाँव धरती सभ्यता में
विकास के इस अलगाववादी व्युत्क्रम पर 
मैं चिहायी थी 
 
आन ही आन में कुछ लकीरें खींच दी गई थीं
कुछ घेरे बने थे, कुछ नियम भी
उन लकीरों के इस या उस पार खड़ी मैं
तमाम घेरों से यूँ बाहर
कि भीतर नहीं हो सकती थी
कबड्डी वाली बुढ़िया का घेरा तो धरती बराबर होता था न!
 
धरती के घेरे पर
मुस्कान-सी लम्बी खिंचती धारियाँ 
केवल फसलों की क्यारियाँ हुआ करती थीं
इन क्यारियों को सींचने वाले 
रूखे हाथों और घठीले पैरों वाले 
खुरदरे धानी लोग 
अपनी ही ज़मीन से जैसे दिकू हो रहे
धरती पर दिकू हो रहे 
जंगल और पर्वत
जल और ज़मीन
नदियाँ और घाटियाँ 
जुगनू और अँधेरा
बेटियाँ और उजियारा
आत्मीय भरोसा
सहज सम्वेदना
छाती फाड़ रोना
दिल खोल हँसना…
ये सब कहाँ चले जा रहे?
क्या अब धरती को ज़रूरत नहीं इनकी??
या धरती ही दिकू हो जाएगी एक दिन???
 
घेरे!
अजनबीयत के भीड़ भरे अजीब क़ैदख़ाने!
क़ैद के भीतर कसी कसमसाहट
क़ैद के बाहर अनछुपी छटपटाहट
हर एक होता जाता
हर दूसरे के लिए दिकू…
 
धरती के घेरे से बाहर कहाँ चला जाता है 
जीवन से ही दिकू हुआ प्राणी???
 
मैं दिकू!
पीहर से
सासुर से 
जन्मभूमि से 
कर्मभूमि से
मैं बेदखल
मैं दिकू!
जिसे प्राण सौंपे 
उस हृदयदेश से दिकू!
जिसे मान सौंपे
उसकी आत्मा से दिकू!
जिसे आत्मा सौंपी
उसकी संवेदना से दिकू…
 
हर घेरा 
हर भीड़ से घबराई मैं!
किन्तु मेरे भीतर 
अनचाहे, अनजाने 
कौन ये?
भूत के प्रेतों की बस्ती?!
और मैं दिकू!?
क्या ख़ुद के भी भीतर नहीं हूँ मैं?
क्यों ख़ुद के भी भीतर नहीं हूँ मैं?
तो कहाँ हूँ मैं?
 
बेचैनियों की किरचें चुन-चुनकर 
बुहार-लीप कर
अगरु-धूम सुवासित प्राणांगन में 
ओ मेरे प्राणवंत मैं 
अपनी देहगेह में तुम्हें आसीन करती हूँ
आओ यहाँ बसो
यहाँ दिकू नहीं तुम
परम आत्मीय हो मेरे
आओ!
***
 
*गर्गा: झारखण्ड की एक नदी। 
नवम्बर 2000 में बिहार से अलग होकर अस्तित्व में आए नवीन राज्य झारखण्ड ने इस क्षेत्र में पीढ़ियों से बसे बिहारियों को ‘दिकू’ कहा।
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