Thursday, May 23, 2024
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नाम- हुस्न तबस्सुम निहाँ
जनम-08 जनवरी, 
शिक्षा-
 अंग्रेजी, हिंदी, समाजशास्त्र में स्नातकोत्तर , पी-एच.डी. 
प्रकाशन-
कविता संग्रह- मौसम भर याद, चाँद-ब-चाँद, वादियाँ
कहानी संग्रह-नीले पँखों वाली लड़कियाँ, नर्गिस फिर नहीं आएगी, सुनैना…सुनो ना., गुलमोहर गर तुम्हारा नाम होता,
उपन्यास- फिरोजी आँधियाँ, विष सुंदरी उर्फ सूरजबाई का तमाशा, कामनाओं के नशेमन,
शोध पुस्तक-धार्मिक सह-अस्तित्व और सुफीवाद,
संपादित पुस्तकें , आदिवासी विमर्श के विभिन्न आयाम, कविताओं में राष्ट्रपिता, अंबेडकरवाद : दिशा एवं दृष्टि
 
‘‘साहित्य में मुस्लिम महिलाओं के मुद्दे ( विशेष संदर्भ: हुस्न तबस्सुम निंहाँ )‘‘ लघु शोध प्रबंध सुश्री मंजू आर्या द्वारा प्रस्तुत।(स्त्री अध्ययन विभाग, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्व विद्यालय, वर्धा, महाराष्ट्र द्वारा)
      २-    हुस्न तबस्सुम निहाँ की रचनाओं में विद्रोह के स्वर – लेखक  रोशन ज़मीर
सम्प्रति- अध्यक्ष, रियल यूटोपिया गार्डन फाउंडेशन, उत्तर प्रदेश
 ई-मेल[email protected]
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कहानी

 जिंदगी तो यहाँ है मेरी जान….

जेबा अभी भी मुँह बिसूरती सी शीशम के नीचे बैठी आस पास के खरपतवारों से छेड़ छाड़ कर रही थी। उंगलियां एक-एक दूब नोचे डाल रही थीं। लगता जैसे वह अपने जिस्म से सारे मौसम नोच के फेंक देना चाहती हो। सांझ का वक्त। दोनों वक्त मिलने की सूरत। उसे अम्मा आवाज दिए जा रही थी- 

‘‘ जेबा हो…दोनौ बखत मिलत हय, अ तू बहरिया टहरत हिव…अरे हो जेबा….‘‘ वह झल्ल से उठी और घर की ओर बढ़ गई।

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‘संकल्प’ में दाखिल हो कर उसने पंख फटकारने तो सीख लिए थे मगर अभी असमानों को छूना ख़ाब ही रह गया था और वह बीच में ही धराशायी हो गई थी। करीब साल भर पहले किसी सहयोगिनी ने उसे संकल्प का पता दिया था और कहा था कि वह वहाँ अपने सपनों को साकार कर सकती है। असल में उसे एथलीट बनना था। क्योंकि उसमें ऐसी क्षमता थी। कहीं पड़ोस में किसी के घर पर उसने ओलंपिक खेलों में किसी धावक को देख लिया था। उसे आश्चर्य हुआ था कि ये भी एक गुण माना जाता है और इसका मूल्यांकन इतने ऊँचे स्तर पर होता है। गांव में तो इस गुन की कोई वक़त ही नहीं। उसे बड़ा पसंद आया था। उसको नहीं मालूम कि उसके इस गुन को कभी कहीं कोई आकार मिलेगा कि नहीं, कोई तवज्जो मिलेगी कि नहीं, बस अभ्यास करती रहती। एक धावक कौन-कौन से स्टेप अपनाता है उसे अच्छी तरह ध्यान में बसा लिया था हालांकि उसका एक रत्ती ही उसके जेहन में शेष रह गया था। फिर भी वह बगैर किसी उद्देश्य के ही धुंआंधार अभ्यास किये जा रही थी। अलबत्ता सखिंयां उसके मजे लिया करतीं-

‘’—मने पगलाए गयी है का रे?’’

 उसने आठवीं तक की शिक्षा भी हासिल की और आगे पढने की भी बहुत ख्वाहिश थी लेकिन एक तो वहाँ कोई कॉलेज नहीं था फिर घर वालों की मर्जी भी नहीं थी|  कुछ दिनों बाद उसे किसी पास के ही गांव में एक बढ़ही के नाकारा बेटे से ब्याह दिया गया था और सपनों की सत्या पिट गई। मगर सुसराल में मन रमा नहीं। सबसे कठिन था मुँह अंधेरे उठना और फज्र की नमाज। घर पर तो वह 8 बजे से पहले कभी उठी ही नहीं। लेकिन यहाँ तो सारी बिंदास रानाईयों पर पानी फिर गया था। मौलाना परिवार था। नमाज रोजा की घोर पाबंदियां। बच्चे भी अगर एक वक्त की नमाज न पढ़े तो उनका खाना बंद। आदत के अनुरूप वह आठ से पहले न उठती, मगर उसे ठेल-ठेल 4 ही बजे जगा दिया जाता। वह अलस्सुबह उठती, नमाज अदा करती फिर मुँह अंधेरे ही बकरियां चराने भेज दिया जाता। परिवार की और महिलाएं भी जातीं और सूर्य उगते-उगते वापस चली आतीं। वह जब गांव के किनारे खुली हवा में जाती तो उसे पंख लग जाते। वह साथ की लड़कियों या कभी बकरियों के साथ दौड़ मारने लग जाती। घर की औरतें मुँह पे दुबट्टा दबा के हँसतीं-

‘‘तनि ऊका देख लेव‘‘  सास ने सुना तो खूब फटकारा

‘‘बहू बिटियन का ई चऊकड़ी जेबा नाई देत हयनीकेस रहा करौ तनि‘‘

वह मुँह बिसूरती रह जाती। वहाँ से आने के बाद कुछ बासी कूसी खाती पीती और फिर सारी घर की औरतों समेत उपले पाथने बैठ जाती। ऐसे ही जाने कितने नपसंद काम उसे रोज करने होते। वह मन ही मन बड़बड़ाती-‘‘मुआ यहय होत हय सुसराल?‘‘ एक रोज ससुर समसुद्दीन कहीं से आ रहे थे कि किसी ने रोक के कहा-

‘‘के हो समसुद्दीन, तोहांर बहुरिया त बहुतय छबीली आय। मनै जऊन फिरकी कस उड़ान भरत है कि…‘‘ वह झेंप गए। घर आ कर पत्नी की कायदे से खबर ली-

‘‘काहे हो सरीफ कै अम्मा, ई क सुनीत हय? गंव्वा भरे कहत है कि तोहार बहुरिया फिरकी कस उड़ान भरत ही। छीः छीः बहू बेटिन कै खत्ती लोन अस बतियां निकालैं मुँहां से, मजा लय रहे हंय….कत्ती गलत बात…‘‘

और फिर जेबा का बकरी चराने जाना मना हो गया। अब उसे चैबीसों घंटे घर में कैद रहना था। बीच-बीच में घबरा के मायके हो आती। मगर उसे कहीं सुकून नहीं मिलता। इस बार जब मायके गई तो किसी से उड़ती-उड़ती ‘संकल्प‘ के बारे में सुना। फिर एक दिन वह किसी सहयोगिनी से पूछ बैठी-

‘‘मनै ‘संकल्प’ का?‘‘ सहयोगिनें प्रायाः गांव में आती जाती रहती थीं।

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महरौली गांव

यहाँ का परिवेश इस कदर पिछड़ा हुआ है कि बस्स…..। न शिक्षा है। न रोजगार है। न ही कोई जागरूकता जैसी कोई चीज। ग्रामवासी खेती मजदूरी करते हैं और खुश रहते हैं। अधिकतर आबादी दलित व पिछड़ा वर्ग। लेकिन देखा जाए तो पिछड़ों में भी पिछड़ी एलीट वर्ग की महिलाएं। जिन्हें बाहर की हवा छू तक नहीं जाती। जितना ऊँचा रूतबा है, उतनी ही ऊँची दीवारें, उतनी ही ऊँची-ऊँची वेदनाएं। बनिस्बत उनके दलित महिलाओं की स्थिति फिर उनसे ग़नीमत हैं। वे बाहर चार लोगों में बैठ कर हँस बोल कर मन हल्का तो कर लेती हैं। एलीट महिलाओं की हँसी भी सोने की जंजीरों में कसी हुई होती है। दलित महिलाओं की मानिंद वे आकाश के तारे तो नहीं गिन सकतीं। उन्हें इजाजत ही नहीं आकाश देखने की, और हाशिये की महिलाएं तो गली कूंचों तक छान आती हैं। अमरबेल सी घूम आती हैं वे सातों आसमां, और एलीट महिलाएं घूंघट की झिर्री से बस उन्हें देखती भर रह जाती हैं। एक आह भरती हैं और बुदबुदाती हैं-

‘‘जिंदगी तो यहाँ है मेरी जान‘‘

सदीप मेहता वहां के संभ्रांत वर्ग से ही आते हैं। वह एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं। संकल्पनाम से एक एनजीओ चलाते हैं। संकल्प एक छोटी सी संस्था है जहाँ महिला कल्याण हेतु कुछ छोटी मोटी योजनाए चलती रहती हैं, आँगनबाड़ी टाइप, जिसका सीधा सा मक़सद है अति पिछड़े ग्राम महरौली के बाशिदों को मुख्यधारा में लाना। संकल्पअपने इस मक़सद में पूरी तरह लगा हुवा है। इस संस्था के अंतर्गत ग्राम की महिलाओं के लिए तो अवसर ही अवसर हैं। शिक्षा के साथ-साथ कुछ छोटे-छोटे हाथ के काम भी सिखाये जाते हैंI कुछ अल्पशिक्षित और जागरूक महिलाओं को सहयोगिनी का कार्य दिया गया है। वे गांव में जा-जा कर महिलाओं को ‘संकल्प‘ में आनें के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित करती हैं। शुरू में तो घरों के पुरूषों ने इसके लिए न नुकुर की लेकिन जब स्वयं वहाँ जा के जायजा लिया तो अपनी महिलाओं को वहाँ जाने की अनुमति दे दी। नतीजा यह हुआ कि आज महिलाएं किसी की मोहताज नहीं रहीं वे घर से बाहर तक पुरूषों से कांधे से कांधा मिला के चलने लगीं हैं और अपने साथ-साथ अपने परिवार के जीवन स्तर को भी ऊँचा उठाने में मददगार साबित हो रही हैं। संदीप मेहता ने एक तरह से अपना पूरा जीवन ग्राम के बाशिदों को समर्पित कर दिया है। सारा गांव उन्हें संदीप दद्दा के नाम से जानता है और दद्दा के नाम से संबोंधित करता है। 

ज़ेबा को जब सहयोगिनी ने वहाँ की बाबत बताया तो उसे बरबस यकीन न हुआ। अगले दिन सहयोगिनी उसे अपने साथ संकल्पले कर गई। वह पूरे दिन वहाँ रही। कहीं महिलाएं कपड़े बुन रही थी, तो कहीं सिलाई कताई हो रही थी। विभिन्न तरह के खेल भी। स्कूल भी। उसकी आँखें फैली की फैली रह गईं। उसे पता ही न था कि उसके गांव में स्त्रियों के लिए स्वर्ग जैसी भी कोई जगह है। वह जैसे हवा में उड़ने लगी थी, वहाँ उसे लगा कि औरत का स्वावलंबी होना भी एक अलग ही सुख देता है, सहयोगिनी कह रही थी,  ‘‘ जिंदगी तो यहाँ है मेरी जान….‘‘

अगले दिन उसने घर वालों की इच्छा के विरूद्ध आ कर संकल्पज्वाईन कर लिया। मुख्य रूप से वह खेल की तरफ भागी। उसे अपना विस्मृत सपना बार-बार कोंच रहा था। वह जा के खेल ग्रुप से मिली। वहाँ संचालक अमित से अपनी इच्छा जाहिर की। वह तो उछल पड़े। लगा कोई हीरा हाथ लग गया हो। वह स्वयं भी कभी धावक बनना चाहते थे। बहुत प्रयास भी किए लेकिन संसाधनों की कमी के कारण वे पीछे लौट आए और चालू खेलों में अपने आप को खपा दिया। इस समय वह एक साथ कई खेलों के कोच थे। कबडडी, वौलीवोल, फुटबाॅल, क्रिकेट, इत्यादि। लेकिन जेबा की ख्वाहिश सुन कर लगा कि उनके सपनों को पंख मिल गए हैं। उन्होंने कितनी बार चाहा था कि कोई बच्चा इसमें भी रूचि दिखाए जो उनका पसंदीदह खेल था। उन्होंने अहद कर लिया कि अब वह जेबा को राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं से लेकर अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं तक लेकर जाएंगे। 

उधर जेबा ने जब संकल्पज्वाईन करने और सुसराल न जाने का फैसला घर में सुनाया तो घर में तो कोहराम सा मच गया। सहयोगिनी नीरजा कुमारी को बुलवा के खूब फटकार लगाई गई। अम्मा चिल्ला रही थी उस पर-

‘‘ मनै तू हय ईका जानै कऊन पट्टी पढ़ाय दिहेव हव कि वहय दिनस ई सुसराल कै नाव सनी भागत हय‘‘ सहयोगिनी उल्टे सीधे किसी तरह से जान छुड़ा के भागीं। बहरहाल जेबा को न जाना था न गई। बलकि उसने संकल्प जाना शुरू किया और कोच अमित जी से अच्छी और योग्य धाविका बनने की बारीकियां सीखने लगी। साथ-साथ वह कंप्यूटर और हल्की फुल्की सिलाई कटाई भी सीखने लगी थी। उसे देख उसकी छोटी भाभी का भी चाव बढ़ा और वह भी उसके साथ जाने लगी। प्रशिक्षक अमित जी, जी जान से जुट गए जेबा और अपना सपना पूरा करने के लिए। 

लेकिन गांव में एक अलग तरह का माहौल तैयार हुवा था उसको ले कर I एक तोह ये की सुसराल छोड़ क यहाँ आ के बैठी है, लोग अक्सर काना फूसी करते I सुसराल वालों ने लोगों से ये कह कर पल्ला झाड़ लिया था कि उसके चाल चलन सही ना थे तो मायके भिजवा दिया I घर के लोगों को उसकी चिंता के बजाय ये बात खाए जा रही थी कि ‘’बड़ी बदनामी हो रही थी’’ I माँ उसे समझातीं की उसका अंतिम पडाव सुसराल ही है और वो कह देती-

‘’ हुंवा न जईब, हम तिलाक दई दिहा’ माँ झिड़क देती-

‘’ तिलाक तुरे देस थोडे होई’’

‘’काहे न होई? क सब कुछ वहायक मर्जी सनी होई? हमार मर्जिक कोनव मतलब नाहीं? औऊरत इन्सान नाए होत है का? हम तो नाहिन जायिब’’ अम्मा चुप्पी मार जाती I 

बहरहाल, कालांतर में उसने कई छोटी बड़ी प्रतियोगिताएं जीतीं। स्थानीय प्रतियोगिताएं फिर जिला स्तर पर कई प्रतियोगिताएं। कुछ ही दिनों में जेबा का जलवा हो गया था। गांव के मनचले उसे छेड़ते-

‘‘…अरे हो उड़न परी…‘‘ उसे गुमान हो आता। ये तंज भी उसे कहीं न कहीं विमोहक स्पर्श दे जाते। शुरू में उसे इन छिछोरों से बड़ा भय लगता था I हालाँकि, उनमें का शकील तो उससे गहरे से जुड़ चुका था I जिस कारण बाकी के छिछोरों का मुँह अपने आप बंद हो गया था I वह मन ही मन उसे अपने घर लाने की योजना भी बना चुका था इसलिए अब वह सुधरने के क्रम में था I हालाँकि दोस्त यार कई बार उसे कह चुके थे की जेबा शादीशुदा है I लेकिन वह सबको झिड़क देता- ‘’ तो क हुवा, तिलाक लई लीं जाई, कोनौ पट्टा थोडे हुवा है कि न मन होय तोहू रहव उके साथे’’ तो दोस्त हथियार डाल देते I

 घर के लोग भले ही उससे कुपित रहते। बड़ा भाई हद भर जल्लाद उसे अपने सामने ठहरने तक न देता। वह घर जा के ऐसे तम कोने में दुबक जाती जैसे यहां उसकी कोई दुनिया ही नहीं है। सुघड़ गृहणियों की तरह घर देखती, बनाती खिलाती घर के सारे काम निबटा कर जाती जिससे घर के लोग उसे संकल्प न जाने देने का कोई बहाना न ढूंढ़ पाएं। घर में अम्मा, दो भाई, दो भाभियां और एक छोटी बहनं पिता नहीं रह गए थे। दोनों नंद भाभी ने साईक्लिग भी सीख ली थी और अब वे आराम से आ जा सकती थीं। इससे उनका काफी समय बच जाता। लेकिन घर की कलह वैसे ही बरकरार थी। एक दिन उसने उक्ताते हुए सहयोगिनी से कहा था कि-

‘‘बड़ी लड़ाई लड़ैक पड़त हय बहिन जी…‘‘

‘‘कोई बात नहीं हमारे तूफान जितने बड़े होगें, हमारी मंजिल उतनी ही मजबूत होगी।‘‘ जेबा का मनोबल लौट आता ऐसी बातों से। 

शकील उन्हें अक्सर रस्ते में महुवे के नीचे बैठा मिल जाता I प्रायः प्रतीत होता जैसे वो उनके लिए ही वहाँ आ के बैठता हो I शकील उसके बचपन का सहपाठी था I आठवीं तक उन्होंने साथ-साथ पढाई की I आठवीं से आगे गाँव में स्कूल ही नहीं था I सो पढाई छूट गयी I बाद में उसकी शादी हो गयी और शकील अपने रोजगार के लिए जद्दो जहद करने लगा I हालाँकि उन दिनों उनके दिल में एक दुसरे के लिए वो भाव कभी नही उठे थे I पर अचानक जाने क्या हो गया था कि आकाश झुकने लगा था दिन ब दिन I एक दिन संकल्प जाते वक्त रस्ते में ही ज़ेबा की साईकिल ख़राब हो गयी I अभी वे कुछ सोंच ही रही थीं, कि शकील नाजिल हो गया I उनसे मामला पुछा और फिर अपनी साईकिल देते हुए बोला था-‘’तु लोन जाओ हामार साईकिल सनीI हम इका मरम्मत कर्वायेक संकल्प मा पहुंचाए दयीब’’ उन दोनों ने बड़ी कृतज्ञता से शकील को देखा था और फिर चली गयी थीI फिर समीपता बढती गयी थीI

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उस दिन जब जेबा ‘संकल्प’ में अपनी क्लास में कोच के पास बैठी एक अच्छी धाविका के पेंचो ख़म सीख रही थी। तभी संदीप दद्दा के आने की खबर  आई। कोच अमित जी अभी बाहर निकल कर उनके स्वागत के लिए जाना ही चाहते थे कि संदीप दद्दा स्वयं ही चल कर हाॅल में आ पहुंचे उनके चेहरे पर एक नैसर्गिक छटा डोल रही थी। जैसे रेशम की ढेर सारी रंग बिरंगी डोरियां उनकी आँखों के सामने हिलने लगी हों। सभी बच्चों ने खड़े होकर उनका अभिवादन किया। वह सबको बैठने का संकेत कर खुद भी बैठ गए। फिर जेबा की तरफ एक स्नेहिल मुस्कान के साथ देखा और बोले-

‘‘भई अमित जी, जेबा सहित आप सभी को बहुत-बहुत बधाई।‘‘ और यह कहते हुए एक पत्र कोच अमित को पकड़ा दिया। यह पत्र उत्तर प्रदेश एथलेटिक्स एसोसिएशन के सचिव का था। इस पत्र में सूचित किया गया था कि जेबा को राज्य क्रासकंट्री चैंपियनशिप के लिए चुन लिया गया हैं। कोच अमित की आँखों भर आईं। उन्होंने लपक कर जेबा के सिर पे हाथ रख दिया-

‘‘बिटिया….तुम हमारा अभिमान हो ‘‘ 

‘‘आपका ही नहीं, हम सबका अभिमान, ‘संकल्प’ का अभिमान कहिए अमित जी‘‘

 मिठाई मंगवाई गई। सभी ने मिठाई खाई और जेबा की सफलता की कामना की। उस दिन सबकी छुट्टी जल्द कर दी गई। संदीप दद्दा ने बच्चों से कहा-

 ‘‘जाओ…यह खुशखबरी सभी लोग अपने-अपने घर बताना‘‘ साथ आने वाली जेबा की भाभी भी बहुत खुश थीं। मगर घर जाते हुए ज्रेबा और भाभी ने यह तय किया कि वे यह खबर घर में नहीं बताएंगी। घर में दाखिल होते ही अम्मा ने लताड़ा-

‘‘ तुका घरे आवैक मनै नाय करत रहा का? मनै घरेक बिल्लकुल्लै सरांय बनाय लिहे हव। अपनव मुला गायब रहत हौ औ भउजईयौक फुसलाए लई जात हौ।‘‘ 

भाई भी आँखें तरेरने लगे। दोनों सबकुछ भूल के घर के काम में जुट गईं। हाँ रात को जब सब काम से फारिग़ हो गई तो अपने कोठरे में देर तक बैठी वो कागज निहारती रही जिसमें उसके भाग्य की खूबसूरत लकीरें खिंची हुई थीं। यह कागज संदीप दद्दा को उत्तर प्रदेश एथलेटिक्स एसोशिशन की तरफ से भेजा गया था उसी की एक काॅपी उन्होंने जेबा को यह कह कर दी थी कि अपने घर में दिखाना सबको। लेकिन नहीं, किसको दिखाए वह, वो कागज कि उसे पूरा आकाश मिलने वाला है। वो खुशी तब ज्यादह मारक बन जाती है जब उसे बांटने वाला कोई आत्मीय न हो। वह मन मसोस कर सो गई। 

दूसरे दिन से गांव में हल्ला हो गया कि जेबा ने कुछ विचित्र कर डाला है। गांव के संघी-साथी यही सोंच समझ कर खुश हो रहे थे। शकील भी बिना कुछ समझे सोंचे आधा किलो जलेबी सुबह जाते वक्त रस्ते में उसे थमा आया था I भाभी ने चुटकी लई थी-

‘’कवुन खुसिम?’’ वोह झेंप गया था, बोला था –

‘’ऊ त नाही मालूम, मने सुना है कि तु लोन कछु बढ़िया किहे हव’’  वो दोनों एक साथ हँस दी थीं और जलेबी उसके हाथ से ले ली थी I

कोच अमित जी दोहरे-तेहरे उत्साह से भरे हुए थे। उन्होंने जेबा को पूरी तरह से परफेक्ट बनाने की कसम खा ली। जेबा से बोल दिया कि अब वह सुबह पाँच बजे ही संकल्प में पहुँच जाया करे। लग कर तैयारी करनी है।‘‘

वह कुछ कसमसाई तो भाभी ने संभाल लिया-

‘‘तू मन लगायक तैयारी करौ, घरा हम संभारि लेबै ‘‘ उसको बड़ा संबल मिला। लगा सिर पर एक बादलों का झुंड आ के टिक गया हो। अब बारी थी कोच अमित जी की। उन्होंने जेबा को सवोत्कृष्ठ बनाने के लिए अपने सारे तजुर्बे झोंक दिए। जंपिंग जैक, किकबाॅक्सिंग, साईड किक, फ्रंट किक और बैक किक के जरिए उसकी फिटनेस मेनटेन करवान, मसल्स मजबूत करने के लिए कार्डियो एक्सरसाईज, पुश अप्स, प्लांक आर्म, हाई नीज पर दौड़ इत्यादि विभिन्न टिप्स उसे सिखाते रहे। उनके समेत पूरा कैंपस ही इस उत्साह से गदगद रहता। संदीप दद्दा रोज आ-आ कर जायजा लेते कि कोई कमी न होने पाए तैयारी में। कई बार अमित जी कह भी चुके थे कि न हो तो जेबा को बाहर ट्रेनिंग के लिए भेज दिया जाए। लेकिन वह उन्हें आशवस्त करते और यह कह कर मना कर देते कि वह उसकी तैयारी बेहतर ढंग से करवा रहे हैं। हालांकि अंदर-अंदर डरते भी कि कहीं कुछ प्रतिकूल हुआ तो ठीकरा उनके सिर ही फूटेगा। असल में ये उनकी भी आजमाईश का समय था। वह भी एक कठिन इम्तहान से गुजर रहे थे। मगर उत्साह इस कदर था कि रात भर नींद नहीं आती और पूरी रात इस बात पर झुंझलाते रहते कि रात क्यों होती है। जेबा तो आ के घर सो जाती लेकिन वह रात-रात भर बैठ कर यू ट्यूब पर और गूगल पर जेबा को और बेहतर एथलीट बनाने के गुर सीखते रहते। यही नहीं दूर दराज बैठे मित्रों से भी इस पर विस्तृत चर्चा करते और मार्गदर्शन हासिल करते। जो भी कागजी कार्यवाही थी वो संदीप दद्दा अपने स्तर से करते रहते। जब दिन समीप आए तो एक दिन जेबा को उत्तर प्रदेश एथलेटिक्स एसोसिएशन के आॅफिस भी लेकर गए। उनकी वहाँ के सचिव से अच्छी बनती थी। चलते-चलते उसने संदीप दद्दा को अश्वासन दिया कि जेबा की तैयारी अच्छे से करवाएं। बहुत संभव है वो आगामी राष्ट्रीय क्रासकंट्री चैंपियनशिप में भी जेबा का चुनाव करवा लें। संदीप दद्दा जैसे हवा में उड़ने लगे। क्षितिज पे एक सुर्ख गोला उनकी आभा ले के चमक उठा। लेकिन शाम को जेबा घर पहुँची तो भरसक कुटम्मस हुई। बड़े भाई ने मन भर पीटा-

‘‘ यही खत्ती सुसराल छोड़े बईठ हय। ई अजादी हुंआं कहाँ ?‘‘

‘‘ कलिहय संदेसा कहिलाय देव आबिद सनी कि इका लई जाय।‘‘ अम्मा ने धमकाया। 

बड़े भाई ने भी धमकाया-

 ‘‘अम्मा अब घरेम ई रही या हम‘‘ अम्मा को लगा घर में बेटों का होना तो बहुत जरूरी है। वह जेबा से मुखातिब हुईं-

‘‘ रे जेबिया, काहे भईयन कै घर उजारत हय। अपन घरा त उजारै बईठ हय। मनै जा न अपन घरे। अत्ता दिन बहुत हुवा, घूम लिहेव नैईहरे।‘‘ 

अम्मा ने ऐसा बोला तो जेबा के अंदर कुछ टूट गया जैसे। उसे पिता की बड़ी याद आई जो हमेशा उसका पक्ष लेते रहते थे और भाईयों को दो टूक कह दिया करते थे- ‘‘ हमार बिटियक हाथ न लगाएव..‘‘ और उसे लगता कि वह एक खूबसूरत शहजादी है। जिसे उसके अब्बू ने फूलों गुम्मों से सजा के रखा हुआ है। जब बेटियो की पैदाईश का सोंच कर अम्मां मायूस हो जातीं तो अब्बू बड़े दर्प से बोलते थे- ‘‘ तुका नाय पता, बिटिए त आंगन की रहमत होत हंय। हमरे पैग़ंबर कहिन हंय कि जऊनै जनाजे प बिटियन कै आंसू न गिरैं ऊ जनाजा हराम,‘‘ सच है पिता बेटियों का गुरूर होता है। खैर सबकुछ याद करके उसकी आँखें बरसने लगीं। भाई की मार का दर्द इतना गहरा नहीं था जितना की अम्मा की बातों के प्रहार का। उसने मान लिया कि वह हार चुकी है। सुसराल जाने की सहमति दे दी और ‘संकल्प’ जाना बंद कर दिया। दो दिन तक नहीं गई तो कोच अमित जी खुद ही पता लगाते-लगाते उसके घर पहुंचे। छोटी भावज ने दूर से ही देख लिया था, तो बाहर ही जा कर थाम लिया और सारी सूरत-ए-हाल कह सुनाई। लेकिल उसके लाख मना करने के बाद भी वह जेबा के घर जा कर उसके भाई व अम्मा से मिले। मगर अम्मा ने दो टूक उन्हें कह दिया-

‘‘अब हमरी लईकियक फुसलाओ न। बड़ी मुस्किल सनी ऊ रस्तप आई हय। अगले हफ्ता ऊ अपन घरे जाई।‘‘ कोच अमित जी बड़ी बेचारगी से उन्हें देखते रहे फिर चले आए। संदीप दद्दा को जब ये खबर मिली तो उन्होंने सिर पकड़ लिया। दिन में तारे नजर आने लगे। लगा अचानक सारी दुनिया की रफ्तार ही रूक गई है। बहुत मना करने पर भी वह एक दो बार उसके घर के चक्कर लगा आए लेकिन जेबा के घर के लोग टस से मस नहीं हुए। अब करें क्या वह। लगा किसी तूफानी ताण्डव ने सारी उड़ानें बाधित कर दी हैं। चक्रवात अब नहीं रूकेंगे। वह वापस आए और अपने कमरे में परास्त से सोफे पर ढह गए। पूरा ‘संकल्प’ प्रांगण एक दग्ध खामोशी से भर गया। छोटे-छोटे बच्चों तक में एक खामोश वेदना रूल गई। शकील महुवे का मुरीद हो के रह गया था I घंटों बैठा रहता उसकी छाँव में I

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स्ंदीप दद्दा कितनी बार जेबा के घर जा कर मान-मनव्वल कर चुके थे। पैसों का प्रलोभन भी दे चुके थे। पर सब बेकार। जेबा की आँखों में रेगिस्तान उतर चुका था। एक गुलशन खिलते-खिलते उजड़ गया था। मौसमों की नम हवाएं मात्र त्रास बन के रह गई थीं। उसके अंदर एक अजब टीसन भर गई थी। जब ‘संकल्प’ के मेहराब याद आते उसका जी टूक-टूक हो जाता। महुवे के तले बैठा शकील याद आता, तो आँख भर आती I कई बार ख़ाब देखा कि वह पहाड़ों पे सरपट उड़ी जा रही है। या सहराओं में बादलों की झंडियां लिए दौड़ी जा रही है। कभी समंदरी लहरों को एक छलांग में पार कर जाती और हठात् जाग के बैठ जाती। भाभियों को अपने ख़ाब बतातीं तो वे भी अश-अश कर उठतीं। बड़ी भाभी उसके समीप जा के खुसर फुसर बोली थीं-

‘‘तू समझेव नाए नंदरानी। ई खुआब कै मतलब आए कि संकल्प कय पगडंडियां तुका बुलाय रही हंय, अ तू समझत नाई हव।‘‘  उसने असह्यता जाहिर की तो बड़ी भाभी ने हिम्मत बंधाई थी-

‘’तनी हिम्मत कई लेव, तुका बहुते कुछ मिले वाला है, ऊ दुनया भरेम नाम, अऊर ऊ सकील…’’ उन्होंने एक आँख दबा के कहा तो वह झेंप सी गयी I 

 फिर उसकी और भाभियों में देर तक मंत्रणा चली।

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सुरमई शाम धीमे-धीमें गांव के पांव तक उतर आई थी। लोहित सुर्य अपनी विच्छिन्न काया लिए गांव के किनारे से बहती गंगा में उतर गया था। परिंदे शाम के क़लमें पढ़ते-पढ़ते चुप हो गए थे। गांव एक भयावह गीले, सीलन भरे अंधेरे में घिरता जा रहा था। पूस के दिन……वल्लाह……

संदीब द्ददा खा-पी के अपने कमरे में लिहाफ में पड़े थे। चूंकि पढ़ने के शौकीन थे। बगैर बढ़े कभी सोए ही नहीं। हस्ब-ए-मामूल आज भी वो एक पुस्तक लिए अधलेटे से थे। लेकिन किताब की तहरीरें उनसे पढ़ी ही नहीं जा रही थीं। जेहन में तो और जाने क्या-क्या चल रहा था। उन्हें तो एथलेटिक्स एसोसिएशन का वो कैंपस और आॅफिस याद आ रहे थे। रनिंग ट्रैक पे दौड़ मारती जेबा नजर आ रही थी और उसके दोनों हाथ में जीत का झंडा। अचानक उनके अंतस से एक आह सी निकली। करवट बदल कर उन्होंने जरा सा उठ कर पानी पिया और किताब किनारे टेबिल पर रख दी। सोंचों की श्रंखला फिर से बनने बिगड़ने लगी। वह सोंच रहे थे कि गलती कहाँ हुई? हमने बेटियों का जुआ कांधे पे रखा हुआ है। उन्हें सहारा तो दे सकता हूँ, पर खड़ा कैसे करूं? सारी बेटियों की यही नियति। सबके लिए सारे समाज से कैसे लड़ूंगा। उसकी भी एक सीमा है। मैं कितना भी उनका हितैसी होऊँ, पर उनका पिता नहीं हूँ, भाई नहीं हूँ इसलिए एक दूरी तो है ही। उनके हमारे बीच एक दीवार तो है ही। जो फलांगी नहीं जा सकती। उसे गिराना पड़ेगा। लेकिन ये काम भी बेटियां ही कर सकती हैं। मगर उनमें इतनी हिम्मत आएगी कहाँ से कि वे अपने सपनों और हमारी महत्वाकांक्षाओं को उ़ड़ान दें पाएं? लेकिन हारना नहीं है। इसके लिए फिर से तैयारी करनी होगी और बुनियादी तैयारी करनी होगी। कुछ नई तरह से सोंचना पड़ेगा। इस बार लड़कियों के साथ-साथ उनके परिवार को भी प्रशिक्षित करना होगा।‘‘

तभी बाहर नौकर की पुकार गूंजी-

‘‘मालिक, कोई मिलने आया है। जरूरी है।‘‘

‘‘भेज दो अंदर‘‘ वह अनमने से, थोड़ा हैरान से बोले। अंदर काले कपड़ों में लिपटी जेबा दाखिल हुई। संदीप दद्दा को देखते ही उसकी आँखों भर आईं। लड़खड़ाती आवाज में बोली-

‘‘ दद्दा हम पीछे न हटिब। संकल्प हमरै खत्ती अत्ता किहीस हय त हमहूं उका पदक दिलाएक रहीब। हमरे रहैक इंतजाम अब आप कई देव।‘‘

‘‘अ…अरे…जेबा। तुम तो सुसराल जाने वाली थीं।‘‘

‘‘ हुंवस तलाक लई लेबै दद्दा, औ अईसै तमाम रिस्तेन का तलाक दई देब जउन हमार कमियाबी मां बाधक बनीं। ऊ मरै हुए लोगन कय साथे रहिब त हमहूं मुर्दा होई जाईब।‘‘

‘‘ यहाँ कैसे पहुँची?‘‘

‘‘भाभी के साथे‘‘

‘‘कहाँ हैं वह?‘‘

‘‘बाहेर बईठ हंय‘‘

‘‘बुलाओ उनको‘‘

उसने आवाज लगाई तो एक महिला चिकन की फिरोजी चद्दर लपेटे दाखिल हुई।

उन्होंने दोनों को बैठने का संकेत किया फिर भाभी से मुखातिब हुए-

‘‘आपका बहुत-बहुत धन्यवाद एक बेटी के मर्म को समझने के लिए। स्त्री को स्त्री ही न समझेगी तो कौन समझेगा। आप निश्चिन्त रहें। जेबा यहाँ बिल्कुल सुरक्षित है। मेरी बेटी की तरह है। दो महीने बाद जब जेबा यहाँ कामयाबी के झंडे गाड़ के लौटेगी तो आपके घर वाले खुद इसे लिवाने आएंगे, और आप नहीं जानतीं आपने इस पर और इस पुरे गांव पर कितना बड़ा उपकार किया है।‘‘  फिर उन्होंने नौकर को बुलाया-

‘‘ सम्भू, बिटिया आज से यहीं रहेगी। इसके रहने खाने का इंतजाम ऊपर वाले कमरे में कर दो। और दो चाय ले आओ‘‘

भाभी सकपकाई सी बैठी रहीं। कुछ देर बाद वापस लौट गई। 

उन्होंने मन ही मन अहद किया- ‘‘ अब मैं किसी भी बेटी को कभी हारने नहीं दूंगा। जेबा जैसी बेटियां ही ‘संकल्प’ को आकाश तक ले जाएंगी।‘‘

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दो महीने बाद-

मार्च की फिरोजी फजां। नीले पीले फूल। नारंगी धूप में नहाया हुआ गांव का बूट-बूटा। ‘संकल्प’ अजब कोलाहल से गमक रहा था। भीड़ चढ़ी आ रही थी। आखिर इंतजार खत्म हुआ। जेबा दोनों हाथों में आासमान लिए मंच पे नामुदार हुई। एक हाथ में ‘संकल्प’ का प्रतीक चिन्हं दूसरे में लशकारे मारता हुआ स्वर्ण पदक। फिजां तालियों और उच्चारों से गूंज गई। दूसरे गांव से आया हुआ ज़ेबा का पति सबको छेड़-छेड़ के बता रहा था-

 ‘‘नईहरे यही खत्ती त छः महीनस पठै दिहा रहय कि कछु बढ़िया कई कै आवै। अब ऊ जमाना नाय रहा कि अऊरतन का घरैम चूल्हा चक्की म झोंक-झोंक राखौं‘‘
आगे की पांत में शकील भी खड़ा था अपनी टोली के साथ । आज उसे भी रश्क हो रहा था ज़ेबा पर I उसी पर नजर जमाए हुए था। सहसा जेबा ने अपना स्वर्ण पदक चूमा तो शकील मन ही मन लोरियाया था-

‘‘ उका का चूम रही,….जिंनगी त हिंयां हय मोरी जान….‘‘ और दायाँ हाथ उठा के ज़ेबा की ओर लहराने लगा था I

 हुस्न तबस्सुम निहाँ

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विशव विद्यालय

गांधी हिल्स, वर्धा, महाराष्ट्र

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किताबें

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