Wednesday, May 29, 2024
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इला सिंह

पहला कहानी संग्रह “मुझे पंख दे दो” नोशन प्रेस ‘ प्रतिबिंब ‘से प्रकाशित,कथादेश ,परीकथा,अक्षरपर्व , कथाक्रम, विभोम स्वर, संस्पर्श, त्रिवेणी ,सेतु (पिट्सबर्ग से प्रकाशित), आर्य कल्प में कहानी , आलेख,किस्सा में कहानी और  आलेख प्रकाशित। लघुकथा.काम में लघुकथा। के.बी.एस.प्रकाशन से प्रकाशित साँझा संँग्रह में कहानी प्रकाशित।

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एम.ए.(इतिहास) ,बी.एड.

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कहानी

मुझे पंख दे दो।

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घड़ी की तरफ नजर गई तो चौंक उठी ,अरे साढ़े दस बज गए ;आशा नहीं आई अभी तक ,आसमान तो एकदम साफ है ,बारिश के  कोई आसार भी  नजर नहीं आ रहे ,हालांकि मौसम बारिश का ही है ,कभी भी बूँदाबादी शुरू हो जाती है मगर इस वक्त तो चटक धूप खिली है ।रोज तो छोटी सुई दस को छूती है और बड़ी सुई बारह के आसपास घूम रही होती है कभी आगे कभी पीछे ,वह आ पहुँचती है ।रविवार या छुट्टी के दिन के अलावा आशा ने कभी छुट्टी की है उसे याद नहीं आता  ।काँटा दस पर पहुँचता नहीं कि डोरबेल बज जाती है ।कांता बाई के हाथ भी एक पल को बरतन साफ करते रुक जाते हैं और एक दबी,खिसियाई नजर से मुझे देख बोल उठती है – “वही होएंगी अऊर कौन…आसा रानी ।” मैं भी मुस्करा पड़ती हूँ,शायद मेरी मुस्कराहट से उसका ,मेरा अहसान मानने का भाव कम हो जाए ।

 

              मगर  आज कांता बाई भी अभी तक नहीं आई तो विचार आने लगा ,कहीं कल गलती तो नहीं कर दी ।मुझे आशा को वहाँ ले जाने से पहले कांताबाई से पूछ तो लेना चाहिए था ।हालांकि बात उसके और मेरे बीच पहले कई बार हो चुकी थी मगर मेरे सामने हां-हां करने के अलावा कांताबाई ने कभी अमल नहीं किया और मैं …मैं अपने ही जंजालों में फंसी रह जाती थी ।

 

कांताबाई के मुँह से अक्सर उसकी दोनों बड़ी बेटियों का गुणगान सुनती थी ,पढ़ाई-लिखाई में अव्वल, घर के काम में अव्वल, सिलाई-बुनाई में अव्वल मतलब हर क्षेत्र में अव्वल, उसके अनुसार उसकी बेटियों जैसी हुनरमंद लड़कियां ऊपर से सुंदर भी ,कम ही होती हैं ।मैंने नोटिस किया कि वह अपनी तीसरी ,सबसे छोटी बेटी की कोई बात नहीं करती है ।एकदिन पूछ ही लिया ,- “और तुम्हारी तीसरी बेटी …वो क्या कर रही है ,कौन-सी क्लास में है वो ?”

 

“ अरे भाभी ,कुछ ना पूछिए उनका ,दिमाग ही नहीं है उनके ।”

 

“क्या मतलब ?पढ़ने नहीं जाती क्या?”

 

“जाती हैं ,छटी में पढ़त हैं ,पर कछु ना पढ़ पावत ।”

 

“बहनें तो पढ़ी-लिखी हैं,वो नहीं पढ़ाती ?”

 

“अरे का पढ़ावैं ,कछु दिमाग में  घुसत ही नहीं ,सब भूल जात हैं ।झल्ला जातीं हैं दोनों …नहीं पढ़ावत फिर ।”

 

“अच्छा …लेके आओ कभी उसे ।”मेरे अंदर का सुप्त शिक्षक जाग उठा ।

 

“लै आएंगे ।”थोड़ी लापरवाही और संदेह में ही कहा कांताबाई ने ।

 

‘लै आएंगे’ जिस अंदाज में कहा था कांताबाई ने ,मुझे यकीन हो गया था वह लाएगी नहीं ।वह वास्तव में ही नहीं लाई उसे ।बात आई-गई सी ही हो गई ।बीच-बीच में मुझे ध्यान आता तो टोक देती और वह यह कहकर टाल देती , “अरे कहते तो हैं भाभी ,पर मरी आती नहीं ।”

 

मैं भी  शांत हो गई ।उधर व्यस्त भी हो गई थी छोटे बेटे को कॉलेज भेजने की तैयारी में ।जब तक बेटा मेरे पास था तो मुझे एहसास नहीं था इस बात का और मैं बड़े हल्के में ले रही थी कि अब तो  मेरे पास समय ही समय होगा,अपने पढ़ने- लिखने का खूब शौक़ पूरा करूँगी।हम माँ बेटे में नोकझोंक भी होती ,वह मुझसे कहता रहता था अब मैं कॉलेज चला जाऊँगा ना तब आपको पता चलेगा फिर रोओगी छिप छिपकर जैसे भैया गए थे तो रोती थीं।

 

“अरे जाओ, मैं नहीं रोने वाली और तुमने कब देखा भैया गए थे तो मैं रोती थी …झूठा ।”

 

“ जाओ मम्मी ,मैंने सब देखा है” कह कर वह खिलखिला पड़ता और मैं खिसियाकर रह जाती और यही दिखाती कि मुझे दुख नहीं होगा ।इसी नोक झोक में जाने का दिन भी आ गया।मैं उसके साथ नहीं जा पाई क्योंकि बड़ा बेटा आया हुआ था ,वह भी दो साल के लिए अमेरिका जाने वाला था।छोटे बेटे के जाते ही मुझे ज़बरदस्त झटका लगा।मुझे लग रहा था कि मैं बहुत मज़बूत हूँ । जान पहचान वाले जब टोकते  कि अब दोनों ही बेटे जा रहे हैं बड़ा मुश्किल होगा तो मैं अपने को बड़ा मज़बूत दिखाती । सदा से किसी के सामने कमज़ोर पड़ने में बड़ा ख़राब लगता है।मैं हँस के टाल देती ,- “अरे नहीं ,अब तो मेरे पास वक़्त ही वक्त है।”लेकिन मेरी सारी मज़बूती न जाने कहाँ हवा हो गई थी, छोटे बेटे के घर से जाने के बाद मैं अंदर ही अंदर ताश के पत्तों की ढेरी जैसी डह गई। ऊपर से सामान्य दिखाने की कोशिश कर रही थी और अंदर से सब चकनाचूर था।बड़ा बेटा कहीं अंदर तक यह बात शिद्दत से महसूस कर रहा था लेकिन हमारे घर में थोड़ा भावों को छुपाने की आदत है।उसने बस यही कहा दोस्त बनते ही देखना वह मस्त हो जाएगा,माँ। 

 

हॉस्टल में बेटे को परेशानी भी शुरू में बहुत झेलनी पड़ी ,वहाँ वह परेशान था तो यहाँ मैं बिखरी पड़ी थी। लेकिन ना वही मुझे कुछ बता रहा था न मैं उसे अपना हाल बता पा रही थी। कभी कभी अंतर्मुखी होना बहुत दुखदाई हो जाता है।आप खुलकर रो लो तो बारिश के बाद खुले आसमान जैसे हो जाते हो,लेकिन घटा हमेशा घुमड़ती रहे,बरसे नहीं तो कितनी घुटन हो जाती है।

 

आख़िर एक दिन ये घटा उमड़ घुमड़ कर बरस ही गई ,अपनी एक दोस्त के सामने अचानक मैं फूट फूटकर रो पड़ी।वह भी आश्चर्य से भर गई । मेरा चित्र भी लोगों में मज़बूत वृत्ति वाली औरत के रूप में ही है ,इसी से वह चौंकी और मुझे इस हाल में देखकर उसकी आँखें भी भर आईं ।उसने मेरे हाथ पकड़ मुझे  गले से लगा लिया।मेरा कलेजा धीरे धीरे ठंडा होने लगा।बाद में बहुत शर्म भी आयी ,लेकिन हल्की हो गयी मैं ।

 

उधर बेटा भी थोड़ा सामान्य हुआ उसने बहुत तेज़ी से वहाँ दोस्त बनाए और जो फ़ोन पर पहले केवल ‘ हाँ -हूँ’या ‘पता नहीं’ में बात करता था अब तेज और खुली आवाज़ में बोलने लगा । ‘हाँ -हाँ ,रखो फ़ोन …मैं दोस्तों के साथ हूँ या क्लास जा रहा हूँ या कैंटीन में हूँ ।’उसकी खुली आवाज़ सुनकर मेरे दिल को चैन आने लगा था ।दोस्ती का स्थान मेरे दिल में और भी ऊँचा हो गया था ।

बड़ा बेटा भी 15 दिन बाद अमेरिका चला गया ।दोनों बेटों के जाने से मैं बहुत बिखरी …टूटी …पर फिर बनी ,फिर खड़ी हुई।बड़ा बेटा लैपटॉप दे गया था अपना और छोटे का स्मार्टफ़ोन भी मिल गया मुझे ।उसी के ज़रिए मैंने आभासी दुनिया में क़दम रखा,जिससे बच्चों के सम्पर्क में रह सकूँ।इस मामले में जानकारी बड़ी अल्प थी ।अपनी दोस्त के बेटे से रोज़ नई नई चीज़ें सीखने लगी …वॉट्सएप ,फ़ेसबुक एकाउंट बनाना,ईमेल करना…मैसेंजर पर ऑनलाइन बेटों से बात करना ।यहाँ तक कि अब तो मैं अपनी छोटी -मोटी कविताएँ भी फ़ेसबुक पर पोस्ट करने लगी थी।

बेटों के जाने के बाद ,एक दो महीने मैं अपने में ही इतनी गुम थी कि कांता बाई से कोई बात नहीं होती थी ,वो भी आती काम करके चली जाती ।कांताबाई में आत्मसम्मान का एक ज़बरदस्त भाव रहता है।वह अपने से कोई बात नहीं बताती।जुलाई बीत चुकी थी ,अगस्त भी निकला जा रहा था… अचानक एक दिन मेरा उसकी तरफ़ ध्यान गया और इसी के साथ उसकी बेटी की भी याद आयी -“अरे कांता ,तुम्हारी छोटी बेटी का क्या हाल है?”

 

“वइसै ही हैं,भाभी !”

 

“उसको लाई नहीं तुम?”

 

“अरे कहते हैं ,अाती ही नहीं।”फिर कुछ सोचकर बोली- “अच्छा ,…देखो कल लाते हैं।”

 

सच ही अगले दिन वो उसे ले आयी,वह मेरे कहने का ही इंतज़ार कर रही थी शायद ।एक साँवली -सलोनी सी बारह साल की लड़की मेरे सामने खड़ी थी ;जिसके चेहरे पर भोलापन था।

 

“अरे इस  समय इसे कैसे ले आयी ,स्कूल नहीं गई ?”

 

“इसकूल  छोड़ा दिया ।”कहकर कांताबाई रसोई की तरफ़ मुड़ गई। 

 

 मैं आश्चर्य से भर गई – “ स्कूल छुड़ा दिया !अरे स्कूल क्यों छुड़ा दिया?”

 

कांता बाई ने रसोई में घुसते घुसते कहा – “कोनो फ़ायदा नहीं, भाभी !इनके दिमाग में कछु नहीं आवत ।का करी हैं जाके इसकूल ।”

 

“अच्छा , बैठो तुम !क्या नाम है तुम्हारा?”मैं कांताबाई की तरफ  ध्यान न देकर उससे मुखातिब हुई । 

 

वह अपनी उंगलियों से ,नीचे हाथ किए कुर्ते को किनारे से  दबाए मसल रही थी ,चेहरा झुका,पैर का अंगूठा कार्पेट में धंसा जा रहा था। उसके होंठ तो हिलते नज़र आए मगर उसके मुँह से क्या निकला मुझे कुछ समझ न आया ।

 

रसोई से ही कान्ता चिल्लाकर कह रही थी -“आसा…आसा नाम रखे थे इनका।पर कोई आसा…”

 

आशा की आँखों में हल्की नमी तैर आई।

 

“ अरे तुम बैठो।अच्छा किताब लाई हो ?”मैं सीधे आशा से मुख़ातिब हो गई।वह चुप खड़ी थी ।

 

मैंने सोफे की तरफ़ इशारा किया -“आओ ना ;यहाँ बैठो आशा ।” वह एक झिझक के साथ बैठ गई।

 

“हम्म्म्,अच्छा अपनी किताब तो दिखाओ।”

 

 उसने बैग से निकालकर कक्षा छह की किताबें मेरे सामने रख दी।उसमें से हिन्दी की पुस्तक निकालकर मैंने एक पेज खोला और आशा के सामने कर दिया।

 

“अच्छा ,आशा पढ़ो तो इसे ।”

 

वह थोड़ा घबरायी फिर अटक -अटक कर पढ़ने लगी लेकिन वह ;जो लिखा था वह नहीं पढ़ रही थी पता नहीं क्या ,कुछ भी ,उल्टा -पुल्टा मिलाकर बोले जा रही थी।

 

“अरे रुको -रुको !अच्छा यह शब्द क्या है बोलो तो।”मैंने लड़का शब्द पर उंगली रखी ।वह घबरायी फिर बोली -“रतज”

 

मैं चौंकी  ,कहीं मेरा शक सही तो नहीं ।

 

“अच्छा ,यह तो पढ़ो ।” मैंने रास्ता शब्द पर ऊँगली रखी ,वह हकलाई फिर बोली -“लटा”

 

फिर तो मैं जिस शब्द पर उंगली रखती वह कुछ का कुछ बोलती ।अलग-अलग अक्षर पर उंगली रख रखकर पूछा मगर सब उलट-सुलट… स को म बताती ,म को प…व को क तो ज को च …बाक़ी का भी यही हाल …यहाँ तक कि उसे स्वरों का भी सही से ज्ञान न था ,अ,इ,उ उसे मालूम थे मगर आ,ई,ऊ को भी वह आ,ई,ऊ बोलती और अ, इ,उ को भी आ,ई,ऊ… धीरे धीरे समझ में आ रहा था जब अभी अक्षरज्ञान ही सही से नहीं था, मात्राएँ तो दूर की बात थी। कुछ अक्षर उसके दिमाग़ में थे , उन्हीं को उल्टा- पुल्टा करके वह कुछ भी बोल दे रही थी।मैं असमंजस में थी कक्षा छह तक वह पहुँची कैसे।गिनतियाँ पूछी तो एक से दस  के बाद सब गड्डमड्ड था ,बल्कि छह-सात के बाद ही वह गड़बड़ाने लगी । इससे आगे मैं उससे क्या पूछती । सरकारी स्कूलों का भयानक सच मेरे सामने था। हमारी शिक्षा व्यवस्था कितनी खोखली है यह इसका ज्वलंत उदाहरण था।। किस तरह उसे हर कक्षा में पास करके अगली कक्षा में चढ़ाते जा रहे थे स्कूल वाले।

 

घर में दो बहनें थी पढ़ी लिखी लेकिन वे भी उसकी समस्या पर ध्यान नहीं दे पाईं।दरअसल उसकी समस्या कोई समझ ही नहीं पाया था …बस घर -स्कूल में उसका मज़ाक बनता ,वह डांट फटकार खाती थी । मेरे सामने ‘तारे ज़मीन पर’फ़िल्म आ गयी ।आशा के रूप में ईशान मेरे सामने था ,वो तो एक फ़िल्म थी ,तीन घंटे में आमिर ने सारी समस्या हल कर दी थी ,लेकिन यह इतना आसान था क्या ?

 

आशा की और किताबें निकालकर देखी -अंग्रेज़ी ,संस्कृत ,गणित ,सामाजिक विज्ञान।अंदर तक हिल गई मैं , कक्षा छह का कोर्स उसके लिए ऐसे घने जंगल की तरह था जिसमें घुस तो गए हो लेकिन निकलने का रास्ता कभी न मिले । किसी कक्षा एक के बच्चे को अगर कक्षा छ: में ले जाकर बिठा दिया जाए और उसे ज़बरदस्ती सवाल हल करने,पढ़ने को बोला जाए ।और वह तो कक्षा एक के बच्चे जितना भी नहीं जानती ।कितनी उद्गिन ,परेशान ,खिन्न होती होगी वो अपनी कक्षा में। जब अध्यापक पढ़ाते होंगे और वह उस सब से अछूती रह जाती होगी …उसके तो सब सर के ऊपर से गुज़र जाता होगा ।

 

जब वह रोज मेरे पास आने लगी तो धीरे-धीरे मुझे अहसास होने लगा ,आशा का  अक्षरज्ञान और IQ कम या कहिए भले ही शून्य था परंतु उसकी व्यावहारिक बुद्धि और EQ (इमोशनल क्योशेंट ) ज़बरदस्त था ।वह अक्षर या गिनतियों को भले ही न पकड़ पाए लेकिन आपकी आँखों की भाषा को अच्छे से पकड़ती थी ।महसूस हो गया था प्यार के अलावा उस पर कोई चीज़ काम नहीं करेगी ।डाँटने -मारने या अवमानना से वह इस गर्त में और धँसती चली जाएगी ।सम्वेदनशील इतनी कि ज़रा सा ज़ोर से बोलते ही उसकी आँखों में मोती झिलमिलानें लगते। उसके साथ धैर्य की परीक्षा होती थी एक तरह से ।समझ आ रहा था उसकी माँ -बहनें क्यूँ  अपना धीरज खो देती होंगी । कुछ अक्षर और गिनती तो बहुत जो़र लगाने पर भी उल्टा ही बोलती थी जैसे ‘र’को ‘ल’ और ‘ल’को ‘र’, ‘थ’वह कभी बोल ही नहीं पाई हमेशा ‘त’ ही बोलती थी।गिनतियों में भी तीन को छह और  छह को तीन में उसे हमेशा भ्रम बना रहता।सबसे अच्छी तरहे उसे याद थी एक ,दो ,पाँच बाक़ी सब गड़बड़ा जाता । तेरह के बाद तो गिनतियों का सारा हिसाब ही गड़बड़ा जाता ।

 

समझ आ गया था कि इन किताबों के ढेर को उसके सामने से हटाना होगा और फिर से एक नई शुरुआत करनी होगी लेकिन मुश्किल यह थी कि उसमें भावनात्मक गुणक कुछ ज़्यादा ही था।वह आपके द्वारा दिए प्यार -भर्त्सना ,मान -अपमान को अच्छे से महसूसती थी ।उसे अपनी कमी का बुरी तरह एहसास इस रूप में था कि उसके दिमाग़ नहीं है, उसको पढ़ना नहीं आता है ,लेकिन इसे वह भरसक छुपाने की कोशिश करती।शायद अब तक उसने इतना ज़्यादा मज़ाक और अपमान सहा था कि वह अपने को एक खोल में रखने की आदी हो गई थी वह यह स्वीकार नहीं कर सकती थी कि उसे अब फिर अ,आ ,इ,ई पढ़ाया जाए ।वह अपने साथ कक्षा छह के विद्यार्थी जैसा ही व्यवहार चाहती थी ।किशोरावस्था का  आगमन हो ही चुका था सो वैसे भी इस आयु में बच्चे एक अलग दुनिया बना लेते हैं ।काफ़ी दिन लगे उसे ये समझाने में कि अभी तुम केवल कॉपी पेंसिल लेकर ही आओ, किताबें बाद में पढ़ेंगे ।काफ़ी दिन तक वह अपना पूरा बैग ही लाद कर लाती रही । पढ़ने बैठते ही अंग्रेज़ी, हिंदी ,विज्ञान ,गणित की किताबें निकाल कर बैठ जाती ।उसका मान  रखने के लिए थोड़ी देर मैं किताबों में उलझाती-उलझती, फिर हौले से ही नोटबुक निकलवानी पड़ती और ड्रॉइंग करके या  किसी चित्र के ज़रिए उसे पहले स्वरों पर लाना पड़ता ।एक डेढ़ महीना स्वरों की पहचान कराने में ही लगा ।उसकी प्रगति बहुत धीमी थी,उसे ‘अ’ ‘आ’ ,’इ’ ‘ई’, ‘उ’ ‘ऊ’, ‘ए’ ‘ऐ’ , ‘ओ’ ‘औ’में फ़र्क़ करना मुश्किल होता था ।स्वरों पर हल्का-ज़्यादा  ज़ोर दे देकर कुछ हद तक सफलता मिल रही थी लेकिन आशा भूलती भी जल्दी थी ।एक दिन मैं बच्चों की प्रथम अक्षर ज्ञान की चित्रों वाली पुस्तिका उठा लाई और उसको इस बहाने से कि यह मेरे बेटे की किताब है उसको दिखाया ।उसमें बने चित्रों से अब धीरे-धीरे वह अ ,आ ,इ ,ई पकड़ने लगी ।छह -सात साल हो गए होंगे उसे प्रथम कक्षा से निकले हुए ,जब कभी उसने अ ,आ,  इ, ई पढ़ें होंगे ।अधिकतर स्लो लर्नर बच्चे प्रारंभिक बेसिक शिक्षा में बहुत कमज़ोर रह जाते हैं ,अगर उनके माँ बाप भी अशिक्षित या कम जानकार हुए तो मुश्किल और बढ़ जाती है ।सरकारी स्कूलों में पाँचवी कक्षा तक तो वैसे भी पास करने का प्रावधान होता है ,ऐसे बच्चे कक्षा में जो रटवाया जाता है उसे ग़लत -सलत रट तो लेते हैं और नक़ल बना बनाकर लिख भी लेते हैं,यहाँ तक कि अधिकतर ऐसे बच्चों का राइटिंग बहुत सुंदर होता है ।आशा भी देख देख कर लिखती बहुत सुंदर थी लेकिन ‘ख़ुद लिखें खुदा बाँचे’ यह कहावत इस रूप में चरितार्थ होती थी उसके ऊपर कि वह सुंदर होने के बावजूद भी अपना लिखा ख़ुद ही नहीं  पढ़ पाती थी अगर पढ़ती भी तो ग़लत -सलत ही पढ़ती थी।वह अक्षरों की नक़ल चित्र जैसे बनाती थी जैसे ड्रॉइंग कर रही हो ।

 

किताब देखकर  वह पहले हँसी ।अब आशा मुझसे थोड़ा खुलने लगी थी ,“यह तो बच्चों की किताब है।”वह अपने को काफ़ी बड़ा समझती थी।

 

“हाँ तो क्या हुआ ? देखो कितने सुंदर बड़े -बड़े अक्षर लिखे हैं इसमें ,अपने बचपन में हम लोग ऐसे ही किताब से पढ़ते थे ।”

आशा को उस किताब के ज़रिए ,कभी चित्रों के सहारे , उन्हीं अक्षरों को उसकी किताब में ,कभी पत्रिकाओं में ,तो कभी समाचार पत्रों के हैडिंग्स के अक्षरों से मिलान करवाती ।वह आश्चर्यचकित -सी लगती मगर अपने आश्चर्य को  छुपा कर रखती ,कहीं उसकी अज्ञानता मैं जान न लूँ।धीरे धीरे वह अक्षरों को पकड़ रही थी ।उससे समाचार पत्रों ,पत्रिकाओं से अक्षरों की कटिंग करवाकर कॉपी में चिपकवाती या कोई चित्र बनाने को देती और फिर उस चित्र के सामने वही अक्षर चिपकवाती ।इस कार्य में उसको बड़ा मज़ा आता ।आशा आर्टिस्टिक तबीयत पाई थी। बहुत सुंदर चित्र बनाती थी ,यह अंदाज़ा मुझे तब हुआ जब वह तीज के त्योहार पर मेहंदी लगाकर आयी ,मेरे पूछने पर जब उसने बताया कि यह मेंहदी उसने ख़ुद लगायी है तो मैं आश्चर्य से भर उठी ।  फिर तो तुम चित्र भी बनाती होगी इस सवाल का उसने जवाब नहीं दिया लेकिन अगले दिन वह एक ड्रॉइंग कॉपी लेकर आयी जिसमें उसने बहुत सुन्दर चित्र बनाए हुए थे।

 

 कांता बाई से इस बारे में कहा तो उसने मुहँ बिचका दिया ,-“सारा दिन यही तो करती हैं।आरट बनवा लो बस ,पता नहीं का-का  बनाती रहती हैं ,या लिखवाऐ लेओ ।कितबिया  से देख -देख के नक़ल उतारा करती हैं  दिन भर ।बाक़ी कछउ जो आवत होए ।”

फिर अचानक बोली,-“लेकिन भाभी ,एक बात तौ है जब से तियारे ढ़िंग आना सुरु भईं हैं ख़ुस रहती हैं और रोज झोला लटकाऐ आने को तइयार रहती हैं आसारानी ।पहिरै तौ हर बात पै झींका -झाँकी, रोवन -राई ,बहनन संग झौंटा-झौंटी ।बस पढ़िबे कहौ अउर आसा रानी की नौटंकी सुरू ।”

 

मुझे मौक़ा मिल गया ,-“कांता ,दरअसल आशा में बुद्धि  कम नहीं है,वह पढ़ना चाहती है लेकिन उसे अक्षरों की …मतलब वर्णमाला …माने अ,आ,इ,ई की ही पहचान नहीं है ।इसी से उसे पढ़ने में परेशानी होती है ।अरे जब लिखा हुआ उसे समझ ही नहीं आता तो क्या पढ़े ,क्या याद करे ।उसकी बहनों से भी कहो उसका मज़ाक न उड़ाकर उसे प्यार से पढ़ाया करें ।बिल्कुल शुरुआती छोटी छोटी चीज़ें सिखाएं ।”

 

कांता मेरा चेहरा देख रही थी मुँह फाड़े ,-“जे का कह रई हो ,भाभी !आ ,ई ना समझत ,ऐसै कइसे हो सकत है ,भला?दुनिया भर की और बातें तौ खूब समझत हैं।”

 

“उसकी बुद्धि कम नहीं है, कांता !बस कुछ अक्षरों मतलब आखर की बनावट ही उसके दिमाग़ में उल्टी या मिलीजुली बनती है ,जिससे वह शब्दों को मिला और पकड़ नहीं पाती ।उसे समय लगता है किसी भी अक्षर को पकड़नें में ।और किसी में इतना धीरज नहीं होता सो सब उसका मज़ाक़ उड़ाने लगते हैं या डाँट फटकार करने लगते है ।आशा भी सबकी डाँट फटकार और मज़ाक़ से बचने के लिए या तो पढ़ाई से बचती है या बहनों से लड़ती है ।”

 

“सच ही कहत हौ  भाभी !तबई हम कहें जब यह लिखती एतना सुंदर हैं, तो पढ़ती काय ना । हाँ …जे तो आप सई कै रईं  है …मज़ाख  तौ दौनौं बहुते बनाती हैं ।”कहीं बेटी की असमर्थता उसे भी समझ आ रही थी इसी से वह आशा के प्रति मुलायम हो उठी।

 

“ और देखो कांता… इसमें उसका दोष नहीं है, बस कभी-कभी किसी के साथ हो जाता है ऐसा  कि दिमाग़ में कुछ अक्षरों की बनावट सही नहीं बैठती और वह पहचान नहीं पाते इसी से पढ़ने में दिक़्क़त आती है ।तुम लोगों की डांट और मज़ाक से बचने के लिए वह कुछ भी अपनी तरफ़ से मिलाकर पढ़ती है ।असल में तो वह ख़ुद भी अनजान है अपनी इस कमी से ।बड़ी भी हो रही है ,बाक़ी बातें तो समझती है न …।तो…?”

 

उसको थोड़ा झुका देखा तो डॉक्टर से सलाह लेने का सुझाव भी दे डाला। जिस पर वह विचलित हो गई “पागल थोड़ई हैं ,का दिखाएंगे डाग्धर को।”

 

मगर समझाने से शायद उसको भी कुछ एहसास हो रहा था और एक आशा से भर वह हामी भर उठी।

लेकिन जब भी बात हुई हमेशा आज कल कर देती थी ,फिर मुझ पर ही ज़िम्मेदारी डाल दी ,“तुमई दिखा लइओ ,भाभी !अब हमें तो कछु पता नहीं।”

 

कल वही मैं उसे चाइल्ड काउंसलर के पास ले गई वहाँ आशा मेरी साथ चली तो गई अनजानते में ,मगर काउंसलर के चैम्बर में बैठते ही उसके चेहरे पर घबराहट, बेबसी ,नागवारी ,झेंप,संकोच सब आकर जम गए ।काउंसलर के एक भी सवाल का उसने जवाब नहीं दिया।

 

उसका नीचे झुका चेहरा और झुकता चला गया और आँखों से मोती की लड़ियां टूट टूट गिरने लगी लगातार ,जैसे किसी बंद नाली में एक छोटा सूराख कर दिया गया हो और उससे पानी की पतली धार बहती जा रही हो। उसके आँसू बहते जा रहे थे और वह उन्हें पोंछने तक की कोशिश नहीं कर रही थी। मैं भी घबरा उठी ,सीने से लगा सांत्वना देने की कोशिश की पर वह सीने से लगी बहती धारा बनी रही। वहाँ से ला उसे मॉल घुमाने ले गई ,मॉल की जगमगाहट ,चमक -दमक रोशनियों में वह थोड़ा सामान्य हो आयी।

 

मगर आज उसके न आने से मैं चिंता से भर उठी ।मैंने उसे काउंसलर के पास ले जाने में जल्दी करके गलती कर दी शायद ।उसके किशोरमन पर कल काउंसलर की बातों का ,वहाँ के माहौल का या अपने को बीमार समझे जाने का शिकवा था ,तभी आज आशा पढ़ने नहीं आयी। वर्ना एक साल होने को आया वह रविवार और छुट्टी वाले दिन को छोड़ हमेशा समय से आती है। उसकी लगन और मेहनत से मुझमें भी उत्साह का संचार हो जाता है और नए- नए तरीक़ों को, जिससे उसकी ग्रोथ कैसे हो सकती है खोजती रहती हूँ ।डर लगा कि उसकी और मेरी मेहनत पर पानी फिर जाएगा अगर वह पढ़ने आना बंद कर देगी ।इधर उसमें बहुत सुधार हुआ था ,अक्षर सीख रही थी , थोड़ी थोड़ी मात्राओं की पहचान होने लगी थी ।बड़े उत्साह से वह अख़बार के हैडिंग्स अक्षर मिला मिलाकर पढ़ने लगी थी ।गिनतियों को याद ही नहीं ,पहचानने भी लगी थी ।उंगलियों पर गिनकर छोटे- छोटे जोड़ -घटाना छोड़ अब वह लाइन खींच-खींचकर जोड़ घटाव करने लगी थी ।ऐसे समय उसका रुकना सही नहीं था ।अगर इस वक़्त उसने पढ़ना छोड़ दिया तो सब अधूरा रह जाएगा। मैं उसको अपने स्थानान्तरण से पहले इतना कर देना चाह रही थी कि वह एक बार फिर से स्कूल जाने लगे।

 

मन परेशान हो उठा ।नज़र घड़ी की तरफ़ एक बार फिर उठ गई। ग्यारह से ऊपर बड़ा काँटा  रेंग चुका था ,छोटा काँटा  ग्यारह पर हल्का -सा  ठिठका था मानो आशा के इंतज़ार में ठिठका हो वरना क़दम उसके भी बढ़  ही चुके थे देहरी लांघकर। 

 

मुझे भी इतना आसक्ति नहीं पालनी चाहिए शायद ।भावुकता छोड़ थोड़ा व्यवहारिक होकर सोचने की ज़रूरत है ।शायद कुछ काम आ पड़ा हो ,तबियत ख़राब हो ,कही जाना पड़ गया हो। सोच को डोर बेल की तीखी आवाज ने तोड़ा।डोर बेल की आवाज़ से दिल उछल कर मुँह में आ गया जैसे बम गिरा हो सीने पर। उछल कर दरवाज़ा खोला। दरवाज़े पर खड़ी आशा को देखकर जितनी ख़ुशी हुई शायद बच्चों के आने पर भी नहीं होती ।मैं गम्भीर रहना चाहकर भी मुस्कुरा पड़ी , “अरे आज इतनी देर ?”

 

“ अम्मा को बुखार है। कह रहीं भाभी के यहाँ तुम आज काम कर देना।”

 

“अरे… इसीलिए तुम बैग  भी नहीं लाईं ।”

 

“ख़ैर छोड़ो …काम होता रहेगा ।आओ आज हम लोग मूवी देखते हैं।” कह मैंने ‘तारे ज़मीं पर’ डी वी डी प्लेयर पर लगा दी ।आज आशा नार्मल थी ।कल वाली बेबसी और दुख नहीं था चेहरे पर ।बच्ची ही तो है ,भूल भाल गई।

 

उसके चेहरे पर ख़ुशी नाच उठी, वह बड़े ग़ौर से फ़िल्म देख रही थी।फ़िल्म की शुरुआत में ईशान की शरारतें , शैतानियाँ  देख उसके चेहरे पर मुस्कराहट आ जा रही थी ।बड़े मज़े से बाउल से चिप्स ले खाती  जा रही थी। धीरे धीरे… ईशान की परेशानियां ,मुसीबतें बढ़ रही थी ।उसे कोई समझ नहीं पा रहा था ,ज़बरदस्ती हॉस्टल भेजने पर वह उदासी में घिरता जा रहा था ।ईशान की परेशानी से आशा भी परेशान हो उठी जैसे । ‘क्या इतना बुरा हूँ  माँ’ गाने पर वह चित्रलिखित -सी हो गयी मानो।चिप्स बाउल उसके हाथ में पड़ा था मगर अब वह खा नहीं रही थी। राम शंकर निकुम्भ टीचर बने आमिर के फिल्म में प्रवेश के बाद मैं देख रही थी उसका चेहरा थोड़ा शांत हो आया था।चित्र प्रतियोगिता के दृश्य में ईशान के चित्र  और उसकी जीत देख आशा के चेहरे पर चमक आ गई थी।फ़िल्म को कितना समझा -जाना ,पता नहीं मगर आशा ने पूरी फ़िल्म तन्मयता से देखी ।उसके चेहरे पर उतार चढ़ाव ,बेचैनी, भाव -विह्वलता ,हँसी- उदासी आते जाते रहे ।ईशान की शैतानियों -शरारतों पर वह हँस रही थी, मुस्करा रही थी तो हॉस्टल जाने पर ईशान का अकेलापन ,उदासी ,उपेक्षित होने के भाव जैसे साथ -साथ आशा के चेहरे पर भी उतर आ रहे थे ।

 

“अच्छी थी ना फ़िल्म!”डरते-डरते पूछा।

 

कहीं मन में डर था आशा को इस तरह की फ़िल्म दिखाने पर।उसके कोमल मन पर न जाने क्या असर होगा ?

 

हल्की सी ‘हम्म’ निकली उसके मुख से ।वह कहीं डूबी थी।

 

“ देखा आशा !कितने लोग ऐसे होते हैं ।ऐसी परेशानियाँ  कितने लोगों को होती है ।कितने नाम आमिर ने ही बताए…नहीं !

 

वह कुछ न बोल झाड़ू हाथ में उठा ली ।

 

“तुम रहने दो,आशा!अभी बबली भी आएगी ,वो कर देगी।”

 

“फिर मैं जाऊँ ?”

 

“हाँ ,ठीक है  जाओ …कल बैग ले आना ।…अच्छा आशा !मम्मी से बात हुई थी,तुमने आर्ट और मेंहदी क्लास जाना शुरू किया कि नहीं?”

 

“हाँ ,सोमवार से शाम को जाया करेंगे।”

 

“अरे वाह !बहुत बढ़िया …अब मेंहदी और आर्ट में तुम्हारा हाथ और साफ़ हो जाएगा।”मैं ख़ुश हो गई।

 

“ अभिषेक बच्चन भी नहीं लिख-पढ़  पाता था ?”वह दरवाज़े की तरफ़ जाते जाते अचानक मुड़कर बोली।

 

“हाँ सच में …देख लो कितने लोग बचपन में नहीं लिख पाते हैं ,लेकिन मेहनत करने और ध्यान देने पर सब आ जाता है। तुम भी तो कितना पढ़ने लगीं …अभी अच्छा लगता है न आशा !”मैंने एक उम्मीद से उसे देखा।

 

“जब चारों तरफ़ देखो तो कितना कुछ लिखा होता है ,बाज़ारों में ,रास्तों में, अस्पतालों में ,स्टेशनों पर हर जगह ही तो ।पढ़ना नहीं आता है तो हमें पता ही नहीं चलता कि दुकानों के साइनबोर्ड पर क्या लिखा है ?जगह जगह क्या लिखा है ?पढ़ना आता है तो… सब कुछ कितना अच्छा लगता है।ये दुनिया कितनी पहचानी ,कितनी अपनी लगती है। कितनी किताबें हैं दुनिया में… कितना कुछ लिखा हुआ है ,सबसे हम अनजान ही रह जाते हैं ।”मुस्कुराते हुए मैं कह उठी , “अब तो तुम भी ख़ूब कहानियाँ पढ़ना शुरू करने वाली हो ।”

 

आशा का चेहरा चमक उठा, “ हम भी रास्ते में दुकानों पर पढ़ते जाते हैं अब… पापा को अखबार भी सुनाते हैं थोड़ा थोड़ा।”

 

“ अरे वाह… देखा, अब तुम इतनी मेहनत कर रही हो तो असर आना ही है ।एक दिन पूरा अख़बार भी पढ़कर सुनाओगी पापा को।” 

 

आशा का चेहरा खिल गया ,“पापा कहते हैं ,तुम्हारी मैडम तो जादू कर दीस।एक पल ठिठकी .फिर थोड़ा रुककर झटके से बोल गई , “आप आमिर खान जैसी हो।”

 

उसने कह तो दिया लेकिन ख़ुद ही शर्मा गई और जल्दी से दरवाज़े से बाहर निकल गई ।अब मैं दरवाज़े पर स्तंभित खड़ी थी, मैंने उसे टार्गेट दिया तो वह भी मुझे टार्गेट  दे गई जैसे (चलो बनो आमिर ख़ान जैसी)…।

किताबें

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