Wednesday, May 29, 2024
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नाम – काजल सूरी
जन्म- 20 जून (जम्मू कश्मीर)
शिक्षा –  
बी.एड,एम. एड,एम. एस. सी. होम साइंस, जम्मू विश्व विद्यालय
पी. जी. डिप्लोमा जर्नलिज्म
भारतीय विद्या भवन जम्मू,एम. ए.मास कम्युनिकेशन
गुरु जम्भेश्वर विश्व विद्यालय हिसार 
रंगमंच से बचपन से ही जुड़ाव
और भारत के  प्रमुख नाट्य महोत्सवो में भागीदारी,
सम्मान..
रंगमंच में योगदान के लिए दो बार  राष्ट्रीय महिला उत्कृष्टता पुरस्कार 
अभिनय क्षमता के लिए जम्मू और कश्मीर सरकार से 8 बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार
रंगमंच में योगदान के लिए  नाट्यश्री पुरुस्कार
रंगमंच के क्षेत्र में योगदान के लिए जम्मू कश्मीर महाराजा  हरी सिंह डोगरा सम्मान 2020,
 
रंगमंच में योगदान के लिए ज़ोहरा सेगल अवार्ड
पत्रकारिता के लिए  जम्मू में  जर्नलिस्ट अवॉर्ड  ,
 
राष्ट्रीय सदभावना पर प्रस्तुत रूपक “प्रेम का सुर आस्था का संगीत..लालेश्वरी” के लिए आकाशवाणी  पुरस्कार,
 राष्ट्रीय थिएटर उत्सवों का आयोजन , दूरदर्शन के कई धारावाहिक, नाटक और वृत्तचित्रों का निर्माण और निर्देशन ,
400 से अधिक टीवी सीरियल, टेलीफिल्म्स और टीवी नाटकों में अभिनय,
ऑनलाइन शो शख्सियत की परिकल्पना और होस्ट का वर्ल्ड रिकॉर्ड बनने पर सम्मानित
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2022 पर  विश्व की सबसे प्रेरक 1001 महिलाओं में शामिल
 
 
सम्प्रति :आकाशवाणी दिल्ली में कार्यक्रम अधिशासी( नाटक अनुभाग )
 
 प्रकाशन:रंगमंच , टेलीविज़न और आकाशवाणी के लिए कई  नाटक.  पत्रिकाओं में लेख – कविताएं
 कविता संग्रह :”ख्वाबों की चांदनी”
 नाटक:  “हब्बा खातून, बुलबुले कश्मीर”  
नाटक”हीर रांझा” 
Medow of Thoughts अंग्रेज़ी मे काव्य संग्रह 
किस्से तलाशती जिंदगी
(पांच रंग नाटक)
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कविताएं

सांस लेते लम्हें

मिलूंगी तुमसे
एक दिन ज़रूर
नहीं नहीं
यहां नहीं….
उफक से परे
कायनाती सितारों के पास कहीं..
वहां देना होगा
तुम्हें जवाब
मेरे हर दर्द का…
क्योंकि तुमसे मेरा
दर्द का रिश्ता था..
देना होगा जवाब
मेरी रूह की खराशों का..
क्योंकि खराशें रूह की
कभी कम नहीं होती..
रिश्ता तो था तुमसे
दर्द का ही सही
जो शुरू भी तुमने किया
और खत्म भी तुमने..
लेकिन अभी भी
सुलगते जख्म बदं हैं
चौखट के इस पार
कुछ लम्हों के साथ…
लेकिन उस आखिरी
लम्हे का जुडाव
अभी भी बाकी है
मुझमें कहीं…
कुछ बेआवाज़ से
ज़ख्मी लम्हें अब तक
दस्तक दे रहे हैं
मेरी रूह की दहलीज़ पर..
ज़िंदगी के उन लम्हों की तरह
जो बीत जाने के बाद भी
साँस लेगें मुझमे कहीं
ताउम्र..
( काजल )

मेरे खाब

मेरे खाब
कुछ पूरे
कुछ आधे
कुछ अधूरे
एक चाँद
जैसे
आकाश में
कभी आधा
कभी पूरा
कभी अधूरा
(काजल)

खयालों की चादर

आज हवाओं में ठंड
जैसे घुल सी गई है…
ठीक वैसे ही जैसे मेरी ज़िंदगी में तुम घुलमिल से गए थे ..
जानती हूँ मैं कि तुम एक फरेब थे..
लेकिन फिर भी तुम्हारा एहसास हमेशा मेरे साथ रहता है..
इस ठंडक के साथ..
तुम्हारे ख्यालों की
गर्म चादर लपेटे..
मैं कब कहां से कहां
पहुँच गई पता ही नहीं चला …..
ऐसा नहीं है कि
बहुत दिनों से तुम्हें सोचा नहीं ..
ऐसा भी नहीं है कि
बहुत दिनों से
तुम्हारे बारे में कुछ लिखा न हो ….
लेकिन जब भी तुम्हारा ख्याल
मेरे दिल और दिमाग से होकर
गुजरता है लफ्ज़
कागज पर उतरने लगते हैं
शायद मेरी क़लम को भी तुम्हारी आदत पड़ चुकी है .
तुम्हारे हर फरेब,
हर झूठ के बाद भी
(काजल)

खूबसूरत रिश्ता

ज़मीन पर आते ही किलकारी,
दुनिया का सबसे खूबसूरत रिश्ता माँ का
रिश्ते कभी खूबसूरत कभी मुश्किल
बस जिंदगी गुज़र जाती है
इन्हें सुलझाने में
लेकिन कुछ रिश्ते ताउम्र रह जाते हैं
सोचिए
आप किस चीज़ के बारे में
सबसे ज्यादा सोचते हैं
आपकी किताब
उस किताब में रखा
कोई सूखा फूल
या कोई पुराना ख़त
इनमें सबके साथ
आज भी वहीं है
वो लम्हें
वो पल
कहां भूलें हैं हम
क्या भूलें हैं आप
नहीं न
जानती हूँ मैं
अतीत के हर लम्हे को हम जीते हैं
एक अनोखे रिश्ते के साथ
चाहे वो किताब की शक्ल में हो
पुराने ख़त की
या फिर
सूखे फूलों की शक्ल में
(काजल)

अहसास

आँखों में सुलगता वक़्त खामोश है
एक अंजानी सी खामोशी है
जो फूलों की तरह मुरझाई है
या यूँ कहें कि
किनारों की रेत की तरह घुलती है
तुम छू के देखो न इस खामोशी को
तुम अनछुए नहीं लौट पाओगे
और अभी अभी तुम्हारे अहसास ने
मुझे आकर अचानक छू लिया
जो शायद एक साँस के
फासले पे खडा था
शायद इक नज़र के
अंधेरे पर बैठा था
शायद इश्क के इक
मोड पर चल रहा था
जिसकी महक
तुम्हारी साँसों में बह कर
खामोश हवाओं को मायने दे गई
इस खूबसूरत से अहसास में रंगी
मैं माटी की महक बनती चली गई
और तुम अंबर का इश्क बन गए
और रूह की दरगाह पर
मैने इश्क की चादर चढ़ा दी
(काजल)

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किताबें

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