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Sunday, July 14, 2024
प्रतीक्षा रम्य
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प्रतीक्षा रम्य 

*वर्तमान में कोलकाता रहती हूं। 
 *मूल निवासी…..सिवान,बिहार ( १२ तक वहीं डीएवी से पढ़ाई)
*स्नातक….मास कम्युनिकेशन( गुरु जम्भेश्वर विज्ञान  एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय,हिसार)
*स्नातकोत्तर…..मास कम्युनिकेशन( माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय,भोपाल)
*स्नातकोत्तर करने के बाद स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर विभिन्न पत्र पत्रिकाओं और ऑनलाइन वेब पोर्टल के लिए काम किया। ऑल इंडिया रेडियो कोलकाता से भी जुड़ी रही हूं।
 
*पाखी,कथादेश,वागर्थ, वनमाली पत्रिकाओं में कहानी और कविताएं प्रकाशित।
 *बाबा साहब भीमराव अंबेडकर बिहार यूनिवर्सिटी, मुजफ्फरपुर से एलएलबी
*फिलहाल महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय,मोतिहारी (बिहार) से पीएचडी कर रही हूं।
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कहानी

पोस्टमार्टम
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कहानी की परिभाषा क्या होती है। क्या हर बार जरुरी होता है रचनात्मक भाषा और आकर्षक लहज़े में किसी कहानी को कहना। क्या सीधे सरल शब्दों में कही गयी कहानी मन में नहीं उतर सकती, मन के तार नहीं झनझना सकती। हम सब अपनी अपनी कहानी ही तो जी रहे हैं जिसे जीवन कहते हैं। समय और परिस्थिति के अनुसार हमारे क़िरदार बदल जाते हैं। हमारे अपने बदल जाते हैं। जो जिया वो कहानी, जो नहीं जिया वो भी कहानी और जिसे जीना चाहते हैं वो भी कहानी। मैं यहाँ आपको कहानी की परिभाषा नहीं बताउंगी। इटरनेट की दुनिया में ये परिभाषा ढूँढना कोई राकेट साइंस नहीं है।लेकिन मै आपको एक कहानी जरूर सुनाना चाहूंगी। बिल्कुल उसी तरह जिस तरह ये लिखी गयी है, मृत्यु से पहले अपनी डायरी में। हो सकता है कि एक अनुभवी पाठक या आलोचक के तौर पर आपको इस कहानी में तारतम्य न लगे। ये बातें बेहद उलझे हुए मन के साथ लिखी गयी है इसलिए इसमें लेखकीय दृष्टि से बहुत सी कमियां आपको लग सकती हैं। फ़िर भी आपको मोहिता की उलझनों और सवालों से एक बार गुज़रना चाहिए। ये एक माँ की डायरी है जो अपने बच्चे के साथ,अपने बच्चे के लिए जीना चाहती थी,लेकिन हार गयी। ख़ुद की वजह से या अपनों की वजह से ये आप तय कीजियेगा।
‘’जो बातें इंसान कह नहीं पाता उसे लिख कर मन हल्का कर लेता है। मैं नहीं जानती कि अपनी डायरी के इस हिस्से को लिखने के बाद मैं इस दुनिया में बची रहूंगी या नहीं। लेकिन जो तूफान मेरे भीतर चल रहा है अगर शब्दों के माध्यम से वो पन्नों पर न उतरा तो अपनी मृत्यु से पहले मैं हर पल हज़ार मौतें मरूंगी। मैं अपने साथ अधूरी इच्छाओं और सपनों का पिटारा लिए नहीं मरना चाहती। लेकिन मुझे जो बीमारी हुई है उसने मेरी जीने की इच्छा को तहस नहस कर दिया है। मेरी बीमारी इस समाज में अस्तित्वविहीन है। चुकी इसके निशान शरीर पर नहीं दिखते इसलिए इसे गंभीर बीमारी का दर्ज़ा नहीं दिया जाता। मैं एक मानसिक रोगी हूँ. पागल नहीं मानसिक रोगी। जैसे शरीर के किसी अंग में बीमारी होती है वैसे ही इंसान का मन भी कई बार अस्वथ हो जाता है. कभी कभी इतना कि वो शरीर को भी अपनी गिरफ़्त में ले लेता है। लेकिन ये बड़ी बात नहीं है। बड़ी बात ये है कि मुझे जिस तरह का मानसिक अवसाद हुआ है वो हमारे समाज में ऑड वन आउट की श्रेणी में आता है। न उसके विषय में ज़्यादा लोग जानते हैं, न बात करते हैं और न उसे अवसाद का दर्ज़ा तक देते हैं। जब मुझे बच्चा नहीं हुआ था तब मैंने भी पोस्टपार्टम डिप्रेशन शब्द पर यही प्रक्रिया दी थी कि क्या तमाशा है ये। भला किसी के लिए बच्चा डिप्रेशन की वजह कैसे बन सकता है। लेकिन जब ख़ुद इसकी क़ैद में आयी तो पता चला कि ये उतना ही सच होता है जितना जीने के लिए हवा खाना और पानी।
मैंने कभी नहीं सोचा था कि मुझे भी अवसाद होगा। मैं ख़ुश रहना जानती थी। लेकिन कब इसने चुपचाप मेरे जीवन और मज़बूत व्यक्तित्व में सेंध मार दी मुझे पता ही नहीं चला। ये मेरे भीतर वैसे ही चुपचाप पनपते गया जैसे कैंसर चुपचाप पनपते हुए आख़िरी स्टेज तक पहुँच जाता है।
शादी के 7 सालों बाद मेरी गोद भरी। 7 सालों तक सबके छुपे हुए शब्दों में मैं ख़ुद के लिए बाँझ सुनती रही हूँ।माँ बनना बेशक सौभाग्य की बात होती है। लेकिन औरत सिर्फ़ माँ बन कर ही पूरी होती है ये पितृसत्ता को बनाये रखने के लिए एक मिथ फैलाया गया है जिसकी जड़े बहुत भीतर तक समाज में फैल चुकी हैं। आज भी औरत की डिग्री और कमाया हुआ पैसा तब तक रद्दी का ढ़ेर होता है जब तक उसकी कोख की उर्वरता साबित नहीं हो जाती। जब तक औरत माँ नहीं बनती परिवार और समाज के लिए वो उस पेड़ की तरह होती है जिससे एक तय समय तक फल की आस होती है। फल नहीं आया तो काट कर फ़ेंक दिया। और अगर काटा नहीं गया तो छोड़ दिया मन से पूरी तरह सूख जाने के लिए, उजड़ जाने के लिए। शादी के तुरंत बाद बच्चा प्लान न करने में पति पत्नी दोनों की सहमति होती है लेकिन ज़िम्मेदार औरत को ही माना जाता है। मुझसे सब कहते रहे इलाज कराओ ज़रूर कुछ कमी होगी। किसी ने ये नहीं कहा कि पति पत्नी किसी में से एक या दोनों में कमी हो सकती है। कुछ ने यहाँ तक कहा कि जल्दी बच्चा पैदा कर लो नहीं तो सुमित दूसरी शादी कर लेगा। हैरान होती थी सुनकर। समझ नहीं पाती थी कि क्या प्रतिक्रिया दूँ इस मूढ़ता पर। शादी क्या सिर्फ़ ख़ानदान का नाम आगे बढ़ाने और जल्द से जल्द पुरुष की पौरुषता सिद्ध करने के लिए होता है। बच्चा पैदा करना बाज़ार से फल ख़रीद कर लाने जितना आसान और आम होता है क्या। शुक्र है कि आज बिना शादी किये लड़का लड़की दोनों के लिए क़ानूनी प्रक्रिया के तहत आईवीएफ के माध्यम से बच्चा पैदा करने का चलन धीरे धीरे समाज का हिस्सा बन रहा है। इसी तरह बच्चा गोद लेने का चलन भी हमारे समाज का अभिन्न अंग बन जाना चाहिए। हर व्यक्ति को इस बात की स्वतंत्रता होनी चाहिए कि वो किस उम्र में किस तरह से पेरेंटहुड अपनाना चाहता है। बच्चा पालने के लिए इंसान का तन मन और पैसे तीनो से परिपक्व और मज़बूत होना जरुरी होता है। इन 7 सालों में मुझसे किसी ने ये जानने की कोशिश नहीं की, कि अभी तक बच्चा नहीं होने का कारण क्या था .लेकिन हाँ मुझे एक बुरी औरत की सूचि में रखने के लिए सबने पल भर की भी देरी नहीं की थी. मैं बच्चा चाहती थी और जो महिला बच्चा नहीं चाहती वो बुरी औरत होती है ऐसा किसी किताब में नहीं लिखा। बस सबकी प्राथमिकताएं अलग़ होती हैं। मैं बच्चा उस समय चाहती थी जब मैं मानसिक और भावनात्मक तौर पर तैयार हो जाऊँ। ये अलग बात है कि हमारे समाज में औरत को ऐसी इच्छा रखने का कोई अधिकार नहीं होता। उसे बच्चा अपने लिए नहीं बल्कि परिवार के मान सम्मान नाम को बचाये रखने के लिए पैदा करना होता है.
ख़ैर ईश्वर ने मेरी गोद भरी। देर से गोद भरने के लिए मैं ईश्वर की शुक्रगुज़ार रहूंगी। जीवन के कुछ गूढ़ रहस्य आप सही उम्र में ही समझ पाते हैं। गर्भावस्था से जुडी संवेदना को समझने के लिए मेरी 30 साल की परिपक्व होती उम्र ही सही थी। 9 महीने की गर्भावस्था के दौरान मेरे भीतर बहुत कुछ नया निर्माण हुआ। इन 9 महीनों में जहाँ एक जीवन शारीरिक तौर पर विकसित होता है वहीँ उस जीवन को धारण करने वाली औरत का मानसिक, वैचारिक, बौद्धिक और भावनात्मक स्तर पर पुनर्जन्म होता है। एक जीवन को उत्पत्ति और विकास की ओर अग्रसर करने की इस यात्रा में स्त्री हर रोज़ एक नया जन्म लेती है- एक नयी संवेदना, नए दृष्टिकोण और ढ़ेर सारी ममता के साथ। हर रोज़ प्रकृति का एक नया सशक्त तत्व, एक नयी सकारात्मक ऊर्जा उसके भीतर प्रवाहित होती है। सृजन की इस पूरी यात्रा में स्त्री अपनी रचनात्मक दैविक ऊर्जा के चरमसीमा पर होती है। भय और चिंता भी साथ चलती है। जब जब मुझे अल्ट्रासाउंड के लिए जाना होता एक रात पहले मैं सो नहीं पाती थी। मेरा बच्चा ठीक तो होगा ,उसके सारे अंग बन तो गए होंगे,उसके दिल की धड़कन चल तो रही होगी।हज़ार ऐसी चिंताएं मुझे सुरसा के मुँह जैसे बड़ी लगने लगती। अल्ट्रासाउंड के दौरान जब सांय सांय करते हुए उसकी दिल की धड़कनों को सुनती तो लगता कि बस यही प्रकृति की सबसे सुन्दर ध्वनि है। इच्छा होती कि काश समय कुछ पल ठहर जाता यहीं। इच्छा होती कि काश पुरे जीवन उसे अपने भीतर सुरक्षित रख पाती मैं।जब डॉक्टर बताते कि देखो ये बच्चे का पैर है,ये ऑंखें, ये नन्ही उँगलियाँ, देखो ये चल रहा है किक मार रहा है ,मैं वहीँ रोने लग जाती। सोचती कितने सुन्दर प्राकृतिक संरचना का हिस्सा बनी हूँ मैं। कहीं तो नहीं था ये अस्तित्व में और अचानक से मेरे भीतर पनप गया।न जाने वो कौन सा लम्हा रहा होगा जब इसका दिल पहली बार मेरे भीतर धड़का होगा। सोचती कि हर इंसान तो ऐसे ही पनपता पलता है माँ के गर्भ में फ़िर दुनिया में इतना दुःख,इतनी हिंसा,युद्ध, अराजकता भेदभाव और द्वेष क्यों है। पेड़ पौधे जानवर भी तो ऐसे ही पनपते हैं अपने माँ के गर्भ में फिर इंसान ईश्वर की सबसे उत्कृष्ट संरचना होकर भी हर जीव के लिए, उस प्रकृति के लिए जहाँ से वो आया है सबके लिए संवेदना क्यों नहीं रख पाता। माँ बनने की यात्रा ने मुझे सबका सम्मान करना सिखाया और ये भी सिखाया कि अगर कोई तकलीफ़ दे तो उसे माँ के मन से माफ़ कर देना आसान होता है। पर ये सारी अनुभूतियाँ जिनमे ख़ुद के लिए सम्मान था, एक मानसिक वैचारिक ठहराव था, जहाँ मन में किसी के प्रति कोई दुर्भावना कोई रोष नहीं बचा था, वो अनुभूतियाँ भी अब बच्चा होने के बाद अपना करिश्मा नहीं दिखा पातीं । मुझे संभाल नहीं पातीं, हंसा नहीं पातीं। किसी तरह का सुकून नहीं दे पातीं। मैं सब कुछ छोड़ कर कहीं गायब हो जाना चाहती हूँ। चाहती हूँ कि जो जीवन जी रही हूँ वो बस एक बुरा सपना हो। जब ऑंखें खोलूं तो सब कुछ बदल चूका हो।
सब कहते हैं बच्चा अपने साथ ढेर सारी खुशियां लेकर आता है। सच कहते हैं। जब वो सोता है तो एक टक मैं उसका शांत चेहरा निहारती हूँ। सोता हुआ बच्चा दुनिया का सबसे खूबसूरत इंसान होता है। उसके चेहरे पर एक दैविक शांति फैली होती है। मानो जैसे उस शांत चेहरे के जरिये ईश्वर आपको निहार रहा हो। इस शांति को देखकर आप अपने सारे दुःख सारी चिंताएं भूल जाते हैं। मैं रोज़ मानव विकास की हर सूक्ष्म प्रक्रिया की साक्षी बनती हूँ। लेकिन आपको कोई ये नहीं बताता कि जीवन फिल्मों की सुन्दर कहानी सा नहीं होता है।एक छोटे से अबोले बच्चे को पालना आसान नहीं होता। ये एक ऐसे संवाद से भरा रिश्ता होता है जहाँ शब्द नहीं होते । बच्चे की ज़रूरत और तकलीफों को समझने में माँ को वक़्त लगता है। उसके पास कोई जादू का पिटारा नहीं होता। एक झोंके में सब कुछ बदल जाता है। इस बदलाव को आत्मसात करने में बहुत मानसिक शारीरिक और भावनात्मक ऊर्जा लगती है। अचानक से औरत हर तरफ़ से हर चीज के लिए बंध जाती है। हज़ार चिंताएं और ज़िम्मेदारियाँ किसी सुनामी की तरह उसके जीवन में प्रवेश कर जाती हैं। मुझे कई बार लगता है कि मैं ज़्यादा सोचती हूँ। क्या मैं एक बुरी माँ हूँ जो अपने बच्चे को ये महसूस करवाना चाहती है कि वो बोझ है मेरे जीवन में। जब ये मेरे भीतर पल रहा था तब तो मैंने कभी ऐसा नहीं सोचा था। फिर आज अचानक से क्या हो गया है मुझे। क्यों मैं अपने बच्चे को एक खुश माँ नहीं दे पा रही हूँ। मैं तो इस जिम्मेदारी के लिए तैयार थी, फिर आज क्यों मेरी स्थिति असहाय हो गयी है।हर वक़्त ख़ुद को अकेला महसूस करती हूँ। मन से इतनी कमज़ोर मैं आजतक नहीं हुई। रोज़ रोज़ एक सा रूटीन हो गया है। मुझे लगता है कि मैं हमेशा के लिए इस रूटीन में बंध गयी हूँ। ये तीन कमरे का फ्लैट जो मेरा घर है मुझे अब काटने को दौड़ता है। यहाँ की दीवारें जिन्हे मैंने बड़े प्रेम और जतन से खूबसूरत पेंटिंग्स और 7 साल के जीवन की यादों से सजाया है,मुझे कालापानी की सजा लगती है। वो पिले परदे जिनसे कभी धुप छन कर आती थी तो लगता मानो वसंत उतर आया हो मेरे घर में, आज उदास और कई बार मनहूस लगती हैं मुझे। जिस बालकनी में खड़े होकर सूरज को अस्त होते हुए और चिड़ियों को घर वापस लौटते हुए देखती थी वो आज मुझे मरुभूमि सी लगती है। डूबता हुआ सूरज जो मुझे बेहद पसंद था आज उसे अगले दिन उगता हुआ नहीं देखना चाहती। रात को सोती हूँ तो लगता है कि इस रात की कभी सुबह न हो।
क्या मैं बहुत स्वार्थी हो गयी हूँ। सिर्फ़ अपनी परेशानियों के विषय में सोच रही हूँ। एक नया जीवन जो अपनी माँ के दुलार और वात्सल्य के भरोसे इस संसार में पनपा, आज मैं चाह कर भी उसके आने का उत्सव नहीं मना पा रही हूँ। मुझे सब पर गुस्सा आता है। हर वक़्त रोना आता है। कभी थका हुआ शरीर मन को चपेट में ले लेता है तो कभी थका हुआ मन शरीर को चूर चूर करके रख देता है। हर वक़्त एक अनजाना सा भय घेरे रहता है। लगता है मानो मेरे बच्चे को कुछ हो जायेगा।आज तक किसी रिश्ते ने मुझे ऐसे अथाह मोह में नहीं डाला। अब तो मुझे अपने जीवन का भी मोह हो गया है। ये भय सताता है कि मुझे कुछ हो गया तो इसकी परवरिश कैसे होगी। मुझे आजकल सपने भी डरावने आते हैं। रातों को मैं हाँफते चिल्लाते हुए उठती हूँ। सपने में देखती हूँ एक काला भयानक साया जबरदस्ती मेरे बच्चे को मेरी गोद से छीन कर ले जा रहा है। ये सब मुझे कभी कभी खुली आँखों से भी महसूस होता है। कई बार मैं भूल जाती हूँ कि हफ्ते का कौन सा दिन है और महीने की कौन सी तारीख़। कमरे का पर्दा तक हटा कर देखने की इच्छा नहीं होती कि आज धरती पर धुप की छठा कैसी है। पूरा कमरा किताबों से भरा है लेकिन उन किताबों की सुगंध अब मुझे हलक में फंसे मछली के कांटे की तरह लगती है। सब कहते हैं घर के काम और बच्चे में मन लगाओ ,सब ठीक हो जायेगा, लेकिन कुछ भी ठीक नहीं होता। मैं जितना इन दो चीजों में मन लगाने की कोशिश करती हूँ मेरा मन उतना ही दूसरी और भागता है जहाँ मैं ख़ुद को स्व और पारिवारिक ज़िम्मेदारियों के बिच फंसा हुआ पाती हूँ। जहाँ मैं ख़ुद को एक निरर्थक औरत के रूप में देखती हूँ जो कुछ नहीं कर रही जीवन में सिवाए बच्चा पालने के। मुझे मेरा जीवन दिशाहीन लगता है। आगे सब कुछ अँधेरा। एक लड़की जिसका अकादमिक जीवन बहुत अच्छा बिता, जो अपने बेबाक व्यक्तित्व के लिए जानी जाती रही और कई बार नापसंद भी की गयी, जो कभी जीवन और ठहाकों से भरी हुई थी, जिसे ख़ुद पर हंसना भी आता था और ख़ुद को संभालना भी, वो आज सूखे हुए फूल की पंखुरियों जितनी कमज़ोर हो चुकी है जो छूने भर से टूट जाती हैं। आज वो सपनों से भरी लड़की ऐसा काम कर रही है जिसमे कोई रचनात्मकता नहीं। जिसका कोई अस्तित्व नहीं है इस समाज में। जिसे काम नहीं बल्कि औरत के नकारेपन और पिछड़ेपन का पैमाना माना जाता है। जिस काम को करते हुए न जाने कितनी औरतें घर की चारदीवारी में मर खप गयीं- बच्चा पालते हुए।
मैं समझ नहीं पाती हूँ कि मैं सही दिशा में सोच रही हूँ या नहीं। किसी से बाँटने में हिचकिचाहट होती है। मुझे लगता है परेशानियां बाँटने से इंसान और कमज़ोर होता है। मुझे सब स्वीकार है लेकिन ख़ुद को टूटते हुए दिखाना नहीं। अक्सर दुनिया टूटे हुए इंसान को सहानुभूति का भूखा समझ बैठती है। लोगों से बाँटने से बेहतर है किसी विशेषज्ञ से अपनी परेशानी बाँटना। लेकिन मुझे ये भी स्वीकार नहीं है। मेरा अति आत्मगौरव मुझे ये करने नहीं देता।मैं जानती हूँ ये खोखला आत्मगौरव है। जब दिल बुरी तरह डूबने लगे तो सही सहारा लेना चाहिए। मैंने आज तक किसी का कन्धा नहीं तलाशा है रोने के लिए। कई बार मुझे लगता है कि ये ज़िद्द मुझे खा जायेगा पूरी तरह। पर फ़िर एक दूसरा ज़िद्द सर उठा लेता है कि मेरा बच्चा एक कमज़ोर माँ का अधिकारी नहीं है। मैं जानती हूँ इस अंतर्द्वंद में मैं पूरी तरह डूब रही हूँ। हर पल सैकड़ों विचारों सवालों भय और चिंता का सैलाब मुझे लीलते रहता है। इस डायरी को लिखने से पहले तक मुझे नहीं मालूम था कि मुझे कोई बीमारी भी है। मुझे लग रहा था कि ऐसा सिर्फ मेरे साथ हो रहा है पर मैं बीमार हूँ। बहुत बीमार। मैं पोस्टपार्टम डिप्रेशन के तीसरे स्टेज में हूँ जहाँ महिला अपने बच्चे से भावनात्मक तौर पर जुड़ नहीं पाती। उसके भीतर आत्महत्या या बच्चे को खत्म कर देने जैसे भयानक विचार आते हैं। वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाईजेशन के रिपोर्ट के मुताबिक भारत की लगभग 22 प्रतिशत महिलाएं पोस्टपार्टम डिप्रेशन से ग्रसित हैं। और सिर्फ़ भारत में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में बच्चा जनने के बाद महिलाएं इस अवसाद का शिकार हो जाती हैं। ये एक वैश्विक समस्या है और अगर वैश्विक व्यापकता की बात की जाए तो पोस्टपार्टम डिप्रेशन की रेंज 0.5 % से लेकर 63.3 % तक है। भारत में लगभग हर 5 में से एक माँ पोस्टपार्टम डिप्रेशन से ग्रसित है। पोस्टपार्टम डिप्रेशन का कोई एक कारण नहीं होता। मैं जिस तरह के भय चिंता शारीरिक और मानसिक थकावट से गुज़र रही हूँ वो सब इस अवसाद के लक्षण हैं। पहली बार माँ बनना किसी औरत के लिए आसान नहीं होता ।कोई भी स्त्री अपनी माँ के कोख से माँ बनकर पैदा नहीं होती। हाँ ये अलग बात है कि जिस दिन वो पैदा होती है उस दिन से उसे किसी की होने वाली पत्नी और माँ की तरह ही पाला जाता है। अपनी ज़िम्मेदारी लेने से पहले दूसरों को ख़ुश रखना सिखाया जाता है। मैं आजकल बहुत चिड़चिड़ी रहती हूँ। मुझसे लोग पूछते हैं कि मैं क्या चाहती हूँ। मैं क्या कहूं उनसे कि अचानक से औरत के जीवन में एक हिस्सा जुड़ जाता है जो अथाह ज़िम्मेदारी और समय की मांग करता है। अचानक से उसकी निजी स्वतंत्रता भंग हो जाती है जिसमे निश्चिंत होकर वो सिर्फ अपने लिए कुछ नहीं सोच सकती, कोई फैसला नहीं ले सकती।ये बात खुल कर नहीं कही जा सकती क्यूंकि कोई औरत अपने ऊपर कलयुगी माँ का ठप्पा नहीं लगवाना चाहती। माँ कलयुगी नहीं होती बस इस नयी ज़िम्मेदारी को उठाने के क्रम में अपनों से थोड़ी सी सराहना हिम्मत और बढ़ावा चाहती है। आम दिनों से थोड़ा सा ज़्यादा प्यार और परवाह चाहती है ।अपने लिए कुछ समय चाहती है । हर नयी माँ बस इतनी सी ही निश्चिंतता चाहती है कि बच्चे के अच्छे बुरे के लिए उसे पालने के लिए अकेले वो ही प्रतिबद्ध न हो। नयी माँ बच्चे को पालने की ज़िम्मेदारियों में सिर्फ़ बराबरी चाहती है। पुरे परिवार का शारीरिक और मानसिक सहयोग चाहती है। इतना सा ही समझने की उम्मीद रखती है कि शरीर के साथ साथ मन से भी माँ बनने में समय लगता है। इस डिप्रेशन का एक बड़ा कारण शरीर में आ रहे हार्मोनल बदलाव भी होते हैं जो महिला के मूड को निर्धारित करते हैं. विज्ञान कहता है कि शारीरिक मानिसक गतिविधियों और बिमारियों के लिए होर्मोनेस ज़िम्मेदार होते हैं। जब महिला गर्भ से होती है तब उसके भीतर प्रोजेस्टेरोन और एस्ट्रोजन हॉर्मोन बहुत ज़्यादा मात्रा में बन रहा होता है। बच्चा होने के बाद इसका स्तर अचानक से कम होना शुरू हो जाता है। गर्भावस्था और उसके बाद औरत के शरीर में बहुत बड़े स्तर पर हार्मोनल बदलाव हो रहे होते हैं जिससे उसकी मानसिक और भावनात्मक गतिविधियां प्रभावित होती हैं.ये एक तरह का ट्रांसफॉर्मेशन फेज होता है उसके जीवन में। नदी में जब तेज तूफ़ान आता है तब उसके निशां पानी के लहरों पर कुछ देर तक दिखाई देते हैं। नदी अचानक से शांत नहीं हो जाती। बच्चा होने के बाद औरत की शारीरिक मानसिक और भावनात्मक स्थिति भी पानी के इन लहरों की तरह ही होती है.
लेकिन इन लहरों की बेचैनी को महसूस करने वाला कोई नहीं है मेरे आस पास। मेरा एक भरा पूरा परिवार है लेकिन किसी को हर पल टूटती बिखरती मैं नहीं दिखती। मैं सबको हंसती मुस्कुराती सामान्य दिखती हूँ क्यूंकि मैं अपने बच्चे के लिए ख़ुश रहने का प्रयास हर दिन करती हूँ। मानसिक अवसाद से ग्रसित इंसान की पीड़ा हर वक़्त चुपचाप आंसू बनकर आँखों में तैरती रहती है। जितना जरुरी उसका बोलना नहीं होता उतना जरुरी होता है उसे सुनना। उसकी ख़ामोशी तक को सुनना। लेकिन समाज और परिवार तभी एक मानसिक रोगी की पीड़ा महसूस कर पाता है जब वो आत्महत्या कर लेता है। हमारे देश में अवसाद से उबरने के लिए मोटिवेशनल बातें तो बहुत सुनने देखने को मिलती है। बस नहीं मिलता तो अपनों का साथ। नहीं मिलता तो बस इतना सा सुनना कि तुम सब कर लोगी। कि तुम अपनी क्षमता के अनुसार सबकुछ बेहतर कर रही हो अपने बच्चे के लिए। कि हम तुम्हारे साथ हर कदम पर हैं।कि तुम थोड़ा वक़्त ख़ुद को भी दो। औरत कभी अपने बच्चे की वजह से जीवन में नहीं पीछे रह जाती है। वो पिछड़ जाती है परिवार के मानसिक और भावनात्मक सहयोग के आभाव में। हम जिसे प्यार और आदत समझ रहे होते हैं दरअसल वो हमारे ही आंगन में अपनी इच्छाओं और समस्याओं का गला घोंटते रहने वाले बीज से पनपा पेड़ होता ,जिसपर जब फल उग जाते हैं तो काटना असंभव सा हो जाता है।सबका ध्यान सिर्फ़ बच्चे पर आकर टिक गया है और मैं सबके जीवन के मानचित्र से ऐसे नदारद हो गयी हूँ जैसे कभी अस्तित्व में ही नहीं थी। मेरी इच्छाएं मेरी थकावट मेरी परेशानियां सब कुछ शून्य हो चुकी हैं। सब कहते हैं कौन सा बड़ा और नया काम कर रही हूँ मैं। ये तो हर औरत करती है। जो कमाती है उसे भी बच्चा पालना ही पड़ता है। सही कहते हैं सब। ये भी सच है कि एक बच्चे की परवरिश के लिए बिखरा परिवार श्राप होता है। लेकिन ये भी सच है कि जो कमाती है वो प्रतिकूल परिस्थिति में अपने बलबूते पर भी बच्चे को पाल लेती है।
अब मुझे अपनी गलती समझ आती है।मुझे अपने अवसाद का कारण भी समझ आता है। मुझे घर पर हर वक़्त रहना खलता है। मुझे वो एक पल काटने को दौड़ता है जब मैं अपने माता पिता से ये कह न पायी थी कि मुझे अभी शादी नहीं पीएचडी पूरी करनी है।अगर करियर बनाने के बाद माँ बनती तो शायद खुद को बेहतर तरह से संतुलित रख पाती। मैंने ख़ुद अपने विकास की गति को रोककर अपना विनाश किया है। लेकिन अब बाहर निकलने का सोच कर भय भी लगता है कि किसी और पर बच्चे को छोड़ कर कैसे आगे बढूं। ईश्वर ने जब औरत को बनाया तो एक साजिश रची। उसके मन में मोह का बीज बो दिया। ऐसा बीज जो कभी नहीं सूखता। ऐसा भी तो नहीं कि मैं दिन भर आराम करती हूँ। कुछ भी तो आसान नहीं होता। न सिर्फ़ घर संभालना, न सिर्फ़ काम संभालना और न दोनों संभालना। अज्ञेय कहते हैं कि दुःख सबको मांजता है लेकिन मेरा सुख मुझे मांज रहा है। माँ बनने का सुख हर बीतते दिन के साथ मेरे अंतस में मानो एक तीसरी आंख को खोल रहा है। पिछले 7 सालों में मैंने जो अपने रिश्तों में त्याग समपर्ण प्रेम विश्वास की खाद डाली है आज उससे जन्मे पेड़ के हर पत्ते में मुझे मेरा बिखरा अस्तित्व दिखाई देता है। पैसा औरत के व्यक्तिगत विकास के लिए बहुत जरुरी होता है।काम पर जाना उसके हुनर को एक नया विस्तार देता है। शोध कहते हैं कि काम की व्यस्तता हमे अवसाद से बचाती है। समय की पाबंदी नकारात्मक विचारों को हम तक पहुंचने से रोकती है। परिवार और शादी चलाने में हम औरतें इतना व्यस्त हो जाती हैं कि भूल जाती हैं खुद से कुछ उम्मीद भी रखनी चाहिए और दूसरों से कुछ शिकायतें भी। ख़ुद के अस्तित्व और हुनर को साबित करने के लिए ज़हन में थोड़ा गुस्सा, थोड़ा मलाल, थोड़ी इच्छा और थोड़े सपने ज़िंदा बचे रहने चाहिए।औरत के हाथ में अगर अपना कमाया हुआ पैसा न हो तो एक समय के बाद वो कमज़ोर और आलसी दोनों हो जाती है और फ़िर हालात के सामने मज़बूर होने का मानसिक और वैचारिक पिछड़ापन ही उसे भाने लगता है। समय के साथ मैंने भी शायद ये पिछड़ापन चुपचाप अपना लिया है। पुरे दिन बच्चे से अत्यधिक नजदीकी मुझे उसके प्रति चिंता और भय को बढ़ावा देती है। जब तक जगा होता है तब तक समय कट जाता है। और उसके बाद घर में फैली शांति मुझे शमशान की शांति जितनी भयानक लगती है। हर वक़्त मुझे ये बात सालती है कि मुझे इसकी भी हर जरुरत को पूरा करने के लिए इसके पिता के सामने हाथ फैलाना होगा। क्या मेरी ज़िम्मेदारी बस इसे इस दुनिया में लाने भर की थी। आज मुझे डर लगता है ये सोच कर कि अगर मैं अपने बेटे को एक आर्थिक तौर पर मज़बूत माँ नहीं दे पायी तो कल को ये कैसे समझेगा कि औरत और मर्द ईश्वर के दो बराबर भाग होते हैं जिनके लिए सारे सामाजिक आर्थिक वैचारिक और मानसिक पैमाने समान होते हैं। मुझे डर लगता है ये सोच कर कि कहीं ये भी मुझे नाकारा न समझने लगे।
पर क्या सिर्फ़ मेरा न कमाना ही मेरे अवसाद का कारण है। क्या वो सामाजिक संरचना दोषी नहीं जिसने शहरीकरण के बदौलत एकल परिवार की अवधारणा को जन्म दिया। जहाँ नयी माँ को बच्चे से जुडी बातें बताने समझाने के लिए कोई दूसरा सदस्य शारीरिक तौर पर पास नहीं होता। जहाँ नयी माँ को पल भर आराम करने तक का सुख नहीं मिलता। जहाँ पति ऑफिस से थक कर आता है इसलिए आप उसे अपनी परेशानियों से परेशान नहीं कर सकते। क्या सोशल मीडिया इसका कारण नहीं जहाँ दो पल मन लगाने के लिए जाओ तो सिर्फ़ नकारत्मकता और बिगड़ी भाषा का बोलबाला है। क्या कोविड महामारी ने मेरे अवसाद के लिए ट्रिगर का काम नहीं किया है जिससे बचने के लिए लोग घर में बंद हुए, यात्राओं पर पाबन्दी लगी और इसके बदौलत मानसिक अवसाद दुगुना बढ़ा। क्या मेरा परिवार दोषी नहीं जिसके लिए पोस्टपार्टम डिप्रेशन नाम की कोई चीज ही नहीं होती। या मैं ख़ुद ही कारण हूँ जिसने दुनिया से ख़ुद को संभाल लेने की कोरी उम्मीद लगा रखी है और लोकलाज में किसी मनोचिकित्सक से बात करने से अभी तक कतरा रही हूँ । शादी चलाने में इतना व्यस्त हो गयी कि ख़ुद और लोगों से संवाद शून्य कर लिया, जिसके बदौलत आज कोई दोस्त नहीं जिससे अपने मन की बात बाँट सकूँ। पास सोते इस नन्ही सी जान का क्या दोष भला मेरी इस स्थिति में। ये तो मैं थी जो समझ न पायी कि अभी इसे लाने के लिए मैं मानसिक और आर्थिक दोनों तौर से तैयार नहीं थी। ये तो मेरे द्वारा लिए गए गलत फैसलों का भुगतान कर रहा है एक बिखरी हुई कमज़ोर माँ की कोख़ से पैदा होकर। क्या अपनी इस अस्थिर भावनात्मक परिस्थिति में मैं इसे एक मज़बूत और सुलझा हुआ शख्स बना पाऊँगी।‘’
इसके बाद इस डायरी के सारे पन्ने खाली रह गए। मोहिता की आँख लग गयी। और ऐसी आँख लगी कि कभी नहीं खुली। पन्नों पर अपने दिल का दर्द उड़लते हुए ख़ुद उसका दिल कब डूब गया उसे मालूम नहीं चला। लम्बे समय से मानसिक अवसाद की चक्की में पिसते पिसते दिल पर तकलीफों का ऐसा बोझ बढ़ा कि नींद में ही धड़कना बंद हो गया। मोहिता अपने आर्थिक तौर पर सम्बल न होने को अवसाद का कारण मानती थी। उसके परिवार में भी किसी को उसके भीतर से टूटते जाने की आवाज़ सुनाई नहीं दे रही थी।आर्थिक असुरक्षा पोस्टपार्टम अवसाद का एक मुख्य कारण होता है। कई शोध ये बताते हैं कि कामकाजी महिलाओं की तुलना में घर पर रहने वाली महिलाओं में पोस्टपार्टम अवसाद लम्बे समय तक रहता है। लेकिन कई बार आर्थिक संबलता भी पोस्टपार्टम डिप्रेशन को ठीक नहीं कर पाती। कई मशहूर प्रख्यात आर्थिक तौर पर सम्बल महिलाओं ने इस अवसाद से जुड़े अपने अनुभव साझा किये हैं। सबके कारण अलग अलग होते हैं। किसी को मोहिता सा न कमाने का मलाल होता है, कोई काम के कारण बच्चों से दूर रहने की वजह से परेशान रहता है तो कोई अपने शरीर में आये बदलावों से। अवसाद का कोई एक कारण नहीं होता है। अवसाद में रोता व्यक्ति नहीं जानता कि एक बार में वो कितने दुखों के लिए रो रहा है। सालों से आत्मा पर कई तकलीफ़ों की काई जमा होते आती है जो एक बार में ही इंसान को ले डूबती है। लेकिन मोहिता की कहानी एक बात सोचने पर मज़बूर करती है । कामकाजी महिला – क्या ये एक पक्षपाती विशेषण नहीं। क्या घर सँभालने वाली महिलाएं कामकाजी नहीं होतीं। अगर औरत के सिर्फ़ माँ वाले हिस्से की ही बात की जाए तो क्या बच्चे के लिए बालकनी में कपडे सुखाती माँ की चिंता ऑफिस में काम करने वाली माँ से कम होती है। क्या वर्किंग और नॉन वर्किंग माँ की ये वस्तुवादी श्रेणी इस पितृसत्ता समाज की साजिश नहीं जिसमे फँस कर औरतें अपनी ही बिरादरी के लिए उच्च और निम्न मनोग्रंथि का शिकार हो जाती हैं। स्त्री का आर्थिक तौर पर मज़बूत होना क्या सिर्फ़ इसलिए जरुरी है ताकि वो पुरुष की बराबरी कर सके।क्या कभी किसी पुरुष की तुलना ज़्यादा पैसा कमाने वाली औरत से की जाती है। उल्टा उसे यही समझाया सिखाया जाता है कि तुम्हारा मात्र पुरुष होना ही सर्वोत्तम और श्रेष्ठ होने की परिभाषा है। औरत का अस्तित्व हर भौतिकवाद को बढ़ावा देने वाले पैमाने से ऊपर है क्यूंकि वो प्रकृति है। उसकी देह को ईश्वर ने इतना सक्षम बनाया है कि वो अपने भीतर एक जीवन की संरचना कर सके। स्त्री के अंदर इतनी हिम्मत भी होती है कि अगर शरीर से रच न पाए तो मन से वो एक अप्रतिम व्यक्ति को गढ़ सकती है। गणेश और कृष्ण इसके दो सबसे बड़े उदाहरण हैं। क्यों सिर्फ़ काम पर जाती हुई औरत ही सुन्दर और स्वालम्बी मानी जाती है। बिखरे बाल के जुड़े और आँखों के निचे पड़ चुके काले धब्बों के साथ छाती से लगा कर बच्चे को सुलाती दुनिया को अस्तितविहीन क्यों लगती है। क्या आर्थिक संबलता ही बौद्धिक विकास को तय करने का एकमात्र मापदंड होता है। क्या दुनिया ऐसे अनगनित महान और मशहूर व्यक्तियों के उदाहरणों से नहीं भरी हुई है जिनकी माँ का नाम कोई नहीं जानता। जो औरतें कुछ नहीं करती सिवाए बच्चे पालने के वो भी ऐसे सुदृढ़ और मज़बूत व्यक्तित्व का निर्माण करती हैं जो समाज के विकास की गति को एक नयी दिशा देते हैं।
काश मोहिता ने ये बात समझी होती. काश उसने ख़ुद को इस गहरी अंधी खायी में गिरने से संभाल लिया होता। धैर्य रखा होता।समझा होता कि नयी शुरुवात करने की कोई तय उम्र नहीं होती। कुछ नहीं तो बदलाव के लिए अपने बच्चे को ही अपना सबसे मज़बूत सहारा और ठोस कारण माना होता। मन को मज़बूत करके वर्तमान में जीने की कोशिश की होती। किसी रचनात्मक कार्य में बचे कूचे समय को लगाया होता।अवसाद से बाहर आने के लिए योग ध्यान का सहारा लिया होता। ख़ुद को निर्भीक बनाने पर भीतर की सारी ऊर्जा को केंद्रित किया होता।. काश उसका कन्धा पकड़ कर उसके अपनों ने हिम्मत बँधायी होती।किसी ने उसकी चुप और बेजान आँखे पढ़ ली होतीं। उसे विश्वास दिलाया होता कि वो पूर्ण है। उम्मीदों का बोझ लादने की जगह भरोसा दिलाया होता कि उसकी प्रगति भमें सब उसके साथ हैं। वो पागल यही सोच कर समय निकालती रही कि बच्चा होने के बाद उसके प्रति परिवार पति का रवैया दोस्ताना हो जायेगा। काश शादी के 7 सालों में ख़ुद की मानसिक और भावनात्मक सुरक्षा का जिम्मा चुपचाप परिवार और पति के हाथों में न सौंपा होता। काश काश काश ,,,, अब किसी काश का कोई अर्थ नहीं था।कोई काश मोहिता को अपने बच्चे के पास वापस नहीं ला सकता था। वो मानसिक अवसाद का ग्रास बन चुकी थी। उसकी देह राख हो चुकी थी। घर पर रोते हुए उसके बच्चे को ये नहीं मालूम था कि वो किस दुःख के लिए रो रहा था।

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