Wednesday, May 29, 2024

पुष्पा भारती 11 जून 1935 को उत्तरप्रदेश के मुरादाबाद में जन्म। 1955 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए.। 1956 से कलकत्ता विश्वविद्यालय से संबद्ध श्री शिक्षायतन कॉलेज में 5 वर्ष अध्यापन। 1961 में धर्मवीर भारती से विवाह के उपरांत स्वतंत्र लेखन कार्य आरंभ। रेडियो और दूरदर्शन के लिए विभिन्न कार्य किए। भारत सरकार की बालचित्र निर्माण संस्था से जुड़ी, फिल्म सेंसर बोर्ड में नियुक्ति। न्यूयार्क में संपन्न विश्व हिन्दी सम्मेलन में सक्रिय भागीदारी, प्रधान मंत्री राजीव गांधी के साथ पत्रकार की हैसियत से अनेक देशों की यात्राएं की। प्रकाशन : रोमांचक सत्य कथाएं (दो भागों में), प्रेम पियाला जिन पिया, ढाई अक्षर प्रेम के, सरस संवाद, सफर सुहाने, आधुनिक साहित्य बोध, एक दुनिया बच्चों की, यादें, यादें और यादें, पुस्तकों के अलावा अनेक पुस्तकों का संपादन जिनमें प्रमुख- अक्षर अक्षर यज्ञ, धर्मवीर भारती से साक्षात्कार, मेरी वाणी गैरिक वसना, साँस की कलम से, धर्मवीर भारती की साहित्य साधना, हरिवंशराय बच्चन की साहित्य साधना, पुष्पांजलि (धर्मवीर भारती के प्रेम पत्र) आदि। पुरस्कार/ सम्मान : 1955 में 'डॉ राजेंद्र प्रसाद अखिल भारतीय वाद-विवाद प्रतियोगिता' में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी का प्रतिनिधित्व किया और स्वयं राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद जी के कर कमलों से प्रथम पुरस्कार प्राप्त किया। साहित्य भूषण उत्तरप्रदेश हिन्दी संस्थान, भारती गौरव (भारती पुरस्कार परिषद महाराष्ट्र), सारस्वत सम्मान (आशीर्वाद संस्थान), साहित्य श्री (स्वजन सम्मान), महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकाडमी सम्मान, हिन्दी सेवा सम्मान (कालिदास अकादमी, उज्जैन), चरागै-दैर (गालिब अकादमी वाराणसी), संस्कृति रत्न (वाजाल संस्था), लाइफ टाईम अचीवमेंट अवार्ड 2019 (लिट् ओ फेस्ट)।

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पुष्पा भारती की रचना (संस्मरण)

अगर तुम साथ होतीं तो... -------------------------- राजीव गांधी कैंब्रिज में पढ़ते थे उन दिनों। छुट्टियों में घर आए हुए थे और दोस्तों को तमाम सारे फोटो दिखा रहे थे। एक फोटो वो बार बार दिखाते और पूछते कैसी लगी ? इतनी बार दिखाना और दोस्तों की प्रतिक्रिया जानने की उत्सुकता देखकर सब को अंदाज हो गया कि जरूर कोई खास ही बात होगी। बेहद करीबी दोस्त होते हुए भी शालीनता और सभ्यता सबमें इतनी नफीस थी कि निजी जिंदगी में झांकने की हिमाकत किसी ने नहीं की। बात आई गई हो गई। कुछ दिनों बाद राजीव जी अपने प्रिय मित्र अमिताभ के घर गए और उन लोगों से पूछा कि इटली से मेरी एक मित्र भारत घूमने आना चाहती हैं, क्या उन्हें बच्चन परिवार के साथ ठहराया जा सकेगा ? 'ना' का प्रश्न ही नहीं था। श्री हरिवंशराय बच्चन तो बहुत ही उत्साहित हो उठे और घर की नई साज सज्जा करवाने में जुट गए। इटली से हवाई जहाज आधी रात में आता था - तीन चार करीबी दोस्तों को राजीव जी ने अपने घर पर ही बुला लिया था शायद अच्छे ख़ासे नर्वस थे वे। कहीं नींद ना लग जाय - इस डर से ना खुद सोए ना किसी को सोने दिया और समय से काफ़ी पहले सब लोग एयरपोर्ट पर पहुंच गए- राजीव को शायद पहली बार लग रहा था कि समय किस कदर मंथर चाल से चलता है। खैर, प्रतीक्षा की घड़ियां पूरी हुईं और एक दुबली-पतली बेहद आकर्षक लड़की नमूदार हुई। रात अभी बीती नहीं थी और भोर अभी बस फूटने ही वाली थी। तय किया गया कि घर जाने से पहले सोनिया को दिल्ली घुमाया जाय - उस समय सडकें वीरान थीं लेकिन दिल की दुनिया तो आबाद होने की ओर चल ही पड़ी थी। चार पांच घंटे यूँ ही इधर-उधर की सैर करने के बाद वे लोग बच्चन जी के घर पहुंचे। सोनिया हैरान कि राजीव अपने घर क्यों नहीं ले जा रहे ? मित्र के घर क्यों ठहराया है ? सोनिया को बड़े करीने से समझाया गया कि ससुराल की दहलीज पूरी गरिमा के साथ लाँघनी होगी तुम्हें ! पूरे भारतीय रीति रिवाज और संस्कारों के बाद तुम्हें ले जाएँगे । अभी यहाँ इसलिए रहना है कि तुम भारत को देख लो, जिसे प्यार करती हो उसके माहौल को, उसके परिवार के लोगों को, उसके यार-दोस्तों को, उसके पूरे परिवेश को जान लो और फिर जब तुम्हारा मन पूरी तरह से सब कुछ स्वीकार करने को राजी हो- तभी उस बंधन में बंधना जो अटूट होगा पवित्र होगा। जन्म जन्मांतर के लिए होगा। नवंबर 1967 में आई थीं सोनिया। नवंबर, दिसंबर, जनवरी और फिर फरवरी (1968) ! इतना समय लग गया और जब सोनिया ने समझ लिया कि हर दिन हर पल राजीव के लिए वह अधिक से अधिक समर्पित होती जा रही हैं, राजीव के लिए, राजीव के परिवार, राजीव के देश के लिए उनका प्यार ज्यादा से ज्यादा बढ़ता ही जा रहा है तो बस वह दिन भी आ गया जब सर से पांव तक फूलों का सिंगार किए हाथों में मेहँदी लगाये दुल्हन अपने धर्म भाई अमिताभ बच्चन के घर से विदा होकर अपने पति के घर गई। अपना देश छोड़ा, माता-पिता, परिवार, परिजन छोड़े और पति के देश को, पति के घर को अपना स्वर्ग बना लिया। भारतीय रीति रिवाज सीखे, भारतीय भोजन बनाना सीखा, भारतीय पहनावा अपनाया और भारत की राष्ट्रभाषा हिंदी सीखने के लिए एक पाठशाला में प्रवेश लिया। बस एक ही दिन घबराई थीं सोनिया-- जिस दिन शादी के बाद अपने माता-पिता को वापस इटली के लिए विदा करके आई थीं - अचानक उन्हें घर बेहद खाली-खाली और डरावना-सा लगने लगा था। उदासी ने घेर लिया था उन्हें, कि अचानक घर के दरबान ने उन्हें एक लिफ़ाफ़ा दिया-- खोला तो पाया उसमें एक छोटी-सी चिट रखी है-- Sonia we all love you. - Mummy मम्मी यानी श्रीमती इंदिरा गांधी ! भारत की प्रधान मंत्री ! नई नई बहु अपने माता-पिता को एयरपोर्ट छोड़कर आयी है-- अकेला अनुभव कर रही होगी सो उसे सांत्वना देने, उसे अपनापन देने की बात उन्होंने समझी और सोची। उसके पास बैठ सकती नहीं क्योंकि इतने बड़े देश का काम करना होता है। दफ्तर में फ़ाइलों का अंबार लगा होता है लेकिन वह विलक्षण महिला जानती थीं कि दिल के किस तार को कब छुना होता है। उन्होंने उस नन्ही सी चिट से जैसे केवल एक बार मिज़राब मारी की सोनिया के मन-प्राण सितार की तरह बज उठे। चिट मिलनी थी कि सोनिया की उदासी काफूर हो गई। गुनगुनाते हुए उठीं और कमरें की छोटी-छोटी सजावट करने में स्वयं को उलझा लिया। खूब सहेज कर रख छोड़ी है वह छोटी सी चिट सोनिया ने अपने निजी ख़ज़ाने में। उस छोटी-सी चिट से शुरू होने वाला वह ख़ज़ाना एक से एक नायाब यादगार क्षणों और उपलब्धियों से अकूत भरता ही चला गया कि अचानक आज 21 मई 1991 की भरी दोपहर में सोनिया के माथे का सूरज डूब गया--चारों ओर अंधेरा ही अँधेरा छा गया। 21 मई की काली हत्यारिन रात सोनिया को इस भरी दुनिया में तन्हा छोड़ गई। मैंने 1985 में उनकी इंटरव्यू लेते समय उनसे पूछा था कि अपने देश, अपने परिवार से इतनी दूर अकेली आई थीं तो आपको डर नहीं लगा था ? तो बोली थीं वे कि डर काहे का ? जब औरत किसी को सच्चे मन से प्यार करती है तो वह प्यार एक अज़ीब-सी ताक़त दे देता है, उस ताकत के मिलने के बाद डर वगैरा नहीं लगता--जिसे प्यार करते हो वह मिल जाय तो और कुछ नहीं चाहिए। मुझे राजीव मिल गए। फिर वह भारत लाएं या दुनिया के किसी भी कोने में ले जायें मैं क्यों डरूँ ? राजीव ही मेरी सबसे बड़ी सिक्योरिटी थे। उनके अलावा मैं कुछ सोचती ही नहीं थी। " और अभी जब दूरदर्शन के पर्दे पर सफ़ेद साड़ी में लिपटी सोनिया जी को देखा तो कलेजा दहल उठा। पुत्री प्रियंका माँ की छाह सी बनी हर समय उन्हें सहारा दिए हुए थी। पुत्र राहुल भी जब तब माँ को बाँह में समेट उन्हें एहसास दे रहा था कि माँ घबराना मत। लेकिन मैं क्या करूं कि मुझे याद आ रहे थे उनके वे शब्द-- "राजीव ही मेरी सबसे बड़ी सिक्योरिटी थे, मैं क्यों डरती ?" अपनी उस सबसे बड़ी सिक्योरिटी को वह किस तरह सिक्योर रखती थीं इसका एक उदाहरण ही काफ़ी होगा। राजीव जी के साथ प्रेस के एक सदस्य के रूप में कई विदेश यात्राएं की थी मैंने। यह बात एक यात्रा के दौरान निजी अनौपचारिक बातचीत में बताई थी सोनिया जी ने मुझे। बात यूँ चली कि मैंने उनसे कहा कि आजकल लोग आप पर एक आरोप लगाते हैं कि विदेश के दौरों पर आप राजीव जी के साथ होती तो हैं लेकिन आपके भाव शून्य चेहरे पर हल्की सी भी मुस्कान नहीं होती। एकदम तना हुआ (stiff) चेहरा होता है आपका। आप कठपुतली की तरह उनके साथ टंगी रहती हैं। तो एक क्षण को उनके माथे पर बल पड़े पर दूसरे ही क्षण उपेक्षा से हँसकर बोलीं, "आरोप लगाने वालों को क्या मालूम कि साथ रहते हुए भी पति की सुरक्षा के लिए हर पल आशंकित और घर पर छूटे बच्चों की सुरक्षा की ओर से आशंकित औरत चाल में शोखी और मुँह पर मुस्कान ला ही नहीं सकती। झूठी दिखावट करना मेरे स्वभाव में शामिल ही नहीं।फिर बोली आप इस आरोप की बात कर रही हैं मैं दूसरे आरोप की बात बताती हूँ आपको--अभी 2 अक्टूबर 1986 गांधी जयंती के दिन राजघाट पर जब राजीव पर हमला हुआ और वे बाल-बाल बच गए तब मैं उनके साथ ही थी। आप समझ सकती हैं कि उस समय किस तरह मेरे प्राण मुँह में आ गए होंगे। राजीव भी घबरा तो जरूर गए होंगे मगर वे अपनी शांतता बनाएं हुए थे। प्रार्थना सभा में बैठने से पहले मुझसे बोले, "सोनिया तुम घर चली जाओ तुरंत। मैंने मना किया पर फिर उन्होंने अपनी बात दोहराई। इस बार उनकी दृष्टि में उनका आदेश एकदम साफ़ था और मेरे लिए उसे टालने का सवाल ही नहीं उठता था। मैं उनकी टेंशन बढ़ाना नहीं चाहती थी। लेकिन मैंने मन में निश्चय कर लिया था कि ऐसे समय में मैं उन्हें अकेला छोड़कर नहीं जाऊँगी-- उन लोगों का कोई दूसरा साथी फिर हमला करने आ जाय तो ? और मैंने ड्रायवर से कहा कि गाड़ी उस पेड़ की ओट में खड़ी कर दो। मैं गाड़ी के पीछे से खड़ी खड़ी राजीव को देखती रही। मैं इस तरह खड़ी थी कि राजीव मुझे देख नहीं सकते थे पर वे मुझे साफ़ साफ़ दिखाई दे रहे थे। औरत का दिल अज़ीब तरह का होता है जिसे प्यार करती है उसके लिए बड़ी भीषण कल्पनाएँ भी कर लेती है। मैं खड़ी खड़ी यही तानेबाने बुन रही थी कि मान लो हत्यारा उधर से आता दिखेगा तो मैं यूँ झट से भाग कर जाऊँगी, इधर से आएगा तो मैं यों फाँद कर झपटकर वहाँ पहुँच जाऊँगी और अपनी पूरी ताकत से उसे परे धकेल कर राजीव के ऊपर खुद को गिराकर उन्हें चारों ओर से ढक लूँगी। मेरी जान भले ही चली जाय उन्हें बचा लूँगी मैं। "सोनिया बोली शुक्र है भगवान का उस दिन फिर कोई नहीं आया और सभा समाप्त होते ही मैं झट से गाड़ी में बैठ कर चल दी ताकि उनके घर पहुँचने के पहले ही मैं वहाँ पहुँच जाऊँ। पर पुष्पा जी जितनी देर मैं वहाँ खड़ी रही उतनी देर किस तरह जी जी कर मरती रही हूँ यह मैं ही जानती हूँ। पर मालूम है आपको ? मेरे ऊपर यह आरोप लगाया गया कि यदि कोई भारतीय पत्नी होती तो उस दिन उस समय राजीव को राजघाट पर अकेले छोड़कर घर न चली गई होती। कौन बताएं उन्हें कि यह इटालियन लड़की अपने पति को किसी भी भारतीय पत्नी से कम प्यार नहीं करती। उनकी कड़ी दृष्टि से डरती भी है। और उन्हें जी जान से प्यार भी करती है। अपनी पीड़ाओं की साक्षी मैं खुद रही हूँ , इसलिए आरोपों से नहीं डरती मैं। मैं तो सिर्फ वही करती हूँ जो मेरे परिवार के लिए जरूरी होता है। " उस दिन तो जरूरत नहीं पड़ी थी बिजली की सी गति से दौड़ कर पति को अपने आँचल की ओट में छिपा लेने की। पर जिस दिन ये होना था उस दिन दौड़कर बचा लेने को वह पांव,हत्यारे को परे धकेलकर अपने आगोश में समेट लेने वाली वह बाँहें, पति को चौकन्नी निगाह की गिरफ्त में समेटे रखने वाली वो आँखें तो सैकड़ों मील दूर दिल्ली में थी। अकेले थे राजीव उस हत्यारी रात मे। सोनिया, तुम होती साथ तो यह हादसा यों ना घटित हुआ होता। सोनिया मुझे याद आता है तुमने कहा था झूठी दिखावट मेरे स्वभाव में शामिल नहीं है। मैं वही करती हूँ जो मेरे परिवार के लिए ठीक होता है। इस समय भी आपको वही करना है। आपका यह छोटा सा परिवार ये दोनों बच्चे हमारे राष्ट्र की धरोहर है। अब इन्हें माँ की ममता और पिता की छांह दोनों ही आपको अकेले देनी है-- अपने परिवार की सुरक्षा के लिए टूटना नहीं है आपको। आज इतिहास का माथा तो शर्म से झुक गया है लेकिन आपको राहुल और प्रियंका की ख़ातिर मज़बूती से सीधे खड़े रहना है। पूरे देश की शुभकामनाएं है आपके साथ ! मई 1991

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