Wednesday, May 29, 2024
रजनी गुप्‍त
 
जन्‍मतिथि एवं जन्‍मस्‍थल –  02-04-1963  चिरगांव , झांसी , उ.प्र.
 
शिक्षा- एमफिल. पीएच.डी . जे.एन.यू.नई दिल्‍ली
 
प्रकाशित पुस्‍तकें –
 
उपन्‍यास – 1- कहीं कुछ और  – 
 
2   किशोरी का आसमां
 
3-एक न एक दिन –
 
4- कुल जमा बीस – 
 
5 – ये आम रास्‍ता नही 
 
6- कितने कठघरे – 
 
7 – नए समय का कोरस
 
8- याद जो करें सभी ( राष्‍ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्‍त के जीवन पर आधारित उपन्‍यास ) 
 
9. तिराहे पर तीन
 
10. अंधेरे समय में चमकती आंखें –  ( प्रकाशनाधीन ) 
 
कहानी संग्रह    
 
1- एक नई सुबह – 
 
2- हाट बाजार 
 
3- प्रेम संबंधों की कहानियां
 
4- अस्‍ताचल की धूप –
 
5-  फिर वहीं से शुरू –
 
6. ढलान पर धूप-  कहानी संग्रह 
 
7. सतह पर चांद- कहानी संग्रह 
 
स्‍त्री विमर्श –
 
1-  सुनो तो सही ( आलोचनात्‍मक पुस्‍तक ) 
 
2- बहेलिया समय में स्‍त्री – स्‍त्री मुद्दों पर आलेखों की किताब 2016  ।
 
 
संपादन    
 
1- आजाद औरत कितनी आजाद   
 
2- मुस्‍कराती औरतें     –
 
3- आखिर क्‍यों लिखती  हैं स्त्रियां –
प्रमुख सम्‍मान –
1आर्यस्‍मृति साहित्‍य सम्‍मान   2006
2 किशोरी का आसमां ‘ पर अमृत लाल नागर पुरस्‍कार  2008
-3 कितने कठघरे पर महादेवी वर्मा अवार्ड 2016
 
 
सम्‍प्रति * सरकारी बैंक में मुख्‍य प्रबंधक पद पर कार्यरत ।
 
……………………..

कहानी

 अंधेरे में चमकती आंखें   

                                 रजनी गुप्‍त 

                      

एक समय था, जब हम तेजी से भागते तितलीनुमा समय को माचिस की डिब्‍बी में कैद करने के लिए उतावले हो उठते और वह हमें अंगूठा दिखाते कहीं दूर जा बैठता था। आज वही समय हमारा साथ छोड़कर ऐसी तेजी से भाग जाता है जैसे मेले में खोए बच्‍चे का हाथ पकड़कर कोई अजनबी बड़े बड़े डग भरता हुआ भाग रहा हो और हम उसे पिछियाते हुए किसी भी तरह उसे पकड़ लेने के लिए उतावले हो उठे हों। तेज रफ्तार भागते समय को पकड़ने की न तो वैसी मनोदशा रही, न पकड़ने की कोई कारगर युक्ति हमें सूझतीं बल्कि इसके विपरीत समय हमें अपनी गति मति से यहां वहां बेवजह भगाता रहता। धीरे धीरे समय संग जबरन यात्राएं करना हमारी आदतें बनतीं गईं जिन्‍हें चाहकर भी छोड़ नही पाए। कभी मोहवश तो कभी लालचवश तो कभी अनकहे अदम्‍य आकर्षण के चलते हम यहां वहां खुद को फेंकते रहे, यह जानते हुए भी कि यह आकर्षण क्षणिक है, चंद सालों तक कुर्सी तक टिके रहने वाले रिश्‍ते कभी दूर तक नही चल पाएंगे, बावजूद इसके, हम भनभनाते भंवरे की तरह कभी पद सत्‍ता, प्रतिष्‍ठा, पावर की हनक या रूतबे की चकाचौंध में इतने अंधे, बहरे या गूंगे हो चुके होते कि हमें तब इस कुर्सी के आगे पीछे कुछ और दिखता ही नही था या देखकर अनदेखा करना हमारी आदत में शुमार होता जा रहा था। शैलजा की गिरती हालत देखकर अविनाश का मन भर आता। सालोंसाल वह कितनी गहन त्रासदी से गुजरती रही। स्‍मृतियों पर हाथ रखते ही एक एक करके सारी तस्‍वीरें जिंदा हो उठीं। 

वही शैलजा जो राजनीतिशास्‍त्र की प्रोफेसर थी जिसने अविनाश को आईएएस की कोचिंग में राजनीतिशास्‍त्र से जुड़े महत्‍वपूर्ण नोट्स व टिप्‍स दिए थे। अविनाश को आईएएस प्रतियोगी परीक्षा हेतु राजनीतिशास्‍त्र विषय पर चर्चा के दौरान उनके बीच दोस्‍ती गहराती गई । शुरू में ऐसा नही लग रहा था कि वह नौकरी छोड़ने का इतना बड़ा फैसला इतनी जल्‍दी ले लेगी।

 पहले वह अवैतनिक अवकाश पर रही लेकिन अविनाश की पावरफुल नौकरी, ऊंची पोजीशन और रूतबा देखकर ऐसा लगने लगा कि वह अब ज्‍यादा दिन इस कॉलेज की नौकरी चला नही पाएगी। ऐसी जहीन, ऐसी प्रभावी वक्‍ता शैलता एक झटके में अपना करियर, नौकरी सब कुछ छोड़कर अविनाश संग शादी करके चलती बनी, यह अविश्‍वसनीय सच था। शादी के बाद कॉलेज आई तो कितना तो चहक रही थी। अविनाश इतना हैंडसम, स्‍मार्ट और जहीन था जिसे देखकर लगा कि शैलजा ने सही समय में शादी का फैसला लेकर बिल्‍कुल सही निर्णय चली आई।यहां अकेले कहां रह पाती उस अविनाश के बगैर जो बात बात में अपनी डार्लिंग शैलजा का खूब खयाल रखता। उसके सोने से लेकर उठने तक अगले दिन की हर गतिविधि का चिट्ठा उसे चिटि्ठियों में लिखकर भेजा करता। हफ्ते में तब लगभग तीन चार चिट्ठियां शैलजा के पास अविनाश की जरूर आतीं। 

मार्क्‍सवादी जीवन दर्शन को जीने में ढालने वाली शैलजा दर्शन और इतिहास की गहन अध्‍येता थी। हीगेल, कांट, सार्त्र, सिमोन के साथ इतिहास में गहन रूचि थी और मुगल राजाओं के दिलचस्‍प किस्‍सों की पूरी थान उसके पास थी। कभी किताबों की दुनिया में डूबकर ज्ञान गंगा में गहराई तक डूबती तो कभी ऐतिहासिक इमारतों की सैर करते हुए उन जगहों से जुडी घटनाओं की परिकल्‍पनाएं उसे जीवंतता का एहसास करवाती। सारनाथ जाकर बौद्ध दर्शन से जुड़े त्रिपिटकों का खूब मनन करती। अपने पसंदीदा विषय पर घंटों उलझे रहना शैलजा का स्‍वभाव था। ठीक इसी तरह अपने विषय को पढ़ाते समय सैद्धांतिकी के साथ व्याव‍हारिक दुनिया से जुड़े सूत्रों को आज के परिदृश्‍य से जोड़ते हुए समझाती। उसके पढ़ाए बच्‍चे सचमुच उसके मुरीद थे जो आगे चलकर उच्‍च प्रतियोगी परीक्षाओं को पास करके शैलजा का गुणगान करते रहते। इससे उसके व्‍यक्तित्‍व में अतिरिक्‍त आत्‍मविश्‍वास के नए रंग घुलते गए। शैलजा के लिए नौकरी महज पैसों का पर्याय नही बल्कि राजनीतिशास्‍त्र पढ़ाते हुए वह देश विदेश की नवीनतम जानकारी पर लंबी बहस करने लगती तो स्‍टूडेंट्स के सवाल जवाबों के बीच समय का एहसास ही नही होने पाता बल्कि ऐसी चर्चा करते समय वह खुद को तरोताजा पाती। वैचारिक ऊष्‍मा से भरे उनके व्‍यक्त्तिव में ऐसा तेज, इतना निखार आता जैसे नवोदित चंद्रमा की तिरछी रेखाएं उसके चेहरे को मनमोहक बनाने लगी हों। 

ऐसे ही एक विलक्षण विद्यार्थी अविनाश राजनीतिशास्‍त्र पर उससे घंटों चर्चा करते हुए देर रात सड़कों पर घूमते हुए चाय पर चाय पीता रहता। उसके हर नखरे को उसका हुकुम समझ सिर आंखों पर साधते अविनाश ने उसकी नाजुक हथेली को अपनी मुट्ठी में लेते हुए पूछा था- इतना कुछ जानती हो तो खुद क्‍यों नही आईएएस में बैठती ?’ 

‘ न, प्रशासनिक सेवा में जाने में जरा भी दिलचस्‍पी नही। तमाम नौकरशाहों को राजनेताओं के तलुवे चाटते देखकर वितृष्‍णा होती गयी। मेरा भाई सारी जिंदगी ऐसी नौकरी के घनचक्‍कर में फंसा रहा। कहता है- सब कुछ है, समय के सिवा। सोचो जरा, जब समय ही न हो तो सब कुछ भोगेगा कैसे ? उसके पास किसी भी चीज को इंजॉय करने का वक्‍त ही नही। देर रात लौटे तो भी चार आदमी फाइल लादे चले आ रहे1 सुबह 8 से रात 11 तक समय की चक्‍की में पिसते रहे वे।‘  

‘ शैलजा, मेरा इंतजार करना। तुम्‍हारे साथ ही जिंदगी गुजारने की तमन्‍ना पाले हूं।‘ चुटकी बजाते हुए अविनाश ने उसके लहराते बालों को छूते हुए हवा में उड़ते दुपट्टे को उंगली में लपेट लिया। 

सुनते ही मुस्‍कराने लगी शैलजा। ऐसे मौकों पर चुप रहकर मुस्‍कराने में भी एक खास अदा देखने लगा अविनाश। सुदूर आसमान में फैली कालिमा को जज्‍ब करते हुए बोली- ‘ अविनाश, तुमने जैसी जिंदगी चुनने का फैसला लिया है जो मेरे स्‍वभाव से मैच नही करता, तो हमारी जिंदगी कैसे कटेगी ? ये कॉलेज तो छोड़ने से रही मैं, आई लव माई स्‍टूडेंट्स एंड टीचिंग इज माई पैशन। नए बच्‍चों को नई जानकारियां शेयर करना मेरा जुनून बन चुका है।‘ 

‘ जानता हूं, तुम्‍हारे इस जज्‍बे को सैल्‍यूट भी करता हूं। तुम इसी तरह पढ़ाती रहना, कोई बात नही। रही बात समय की, तो वो मैं मैनेज कर लूंगा। एक खास समय हमेशा तुम्‍हारे लिए रिजर्व कर लूंगा, बोलो, कौन सा समय ठीक रहेगा ? सुबह के 6 बजे..  सुनते ही शैलजा को जोर की हंसी आ गयी। 

‘ वाह, वाह, क्‍या खूब कहा, हंसते हुए बोली- ‘ अविनाश,घर गृहस्‍थी के चकरघिन्‍नी में ऐसे कुछ भी प्रिफिक्‍स नही किया जा सकता। ‘ 

‘ तो क्‍या करूं ? किसी स्‍टैम्‍प पेपर पर साइन करके दे दूं ?’ अविनाश ने उसकी हथेलियों पर प्‍यार से अपनी पकड़ बनाते हुए कहा। फिर वही हंसी ठहाके। उन्‍मुक्‍त मनोदशा में प्रेम में डूबे जोड़ों की कही सुनी बातें जो सिर्फ प्रेमीजन अपने अपने एकांत को भरने के लिए करते रहते, जोड़े में बैठे पंछियों की तरह चोंच से चोंच मिलाए गुटरगूं करते हुए। अपनी अंदरूनी धुनों को सुनते हुए उनकी धड़कनें एक दूसरे के हवाले होतीं रहीं। पहली बार में ही अविनाश ने यूपीएससी का किला फतेह कर लिया था। 

तब दूर दूर तक इसका अंदाजा लगा पाना मुश्किल था कि ऐसी गहन दोस्‍ती के बाद हुई शादी धीरे धीरे इतनी बदरूप हो सकती है। बड़े ओहदे पर कार्यरत अविनाश की जिंदगी घर से शुरू होकर देर रात तक दफ्तर के गलियारों में ही गुजरती। दर्जनों लोगों से घिरे अविनाश के पास समय के सिवा सब कुछ था। दफ्तरी प्रभामंडल का असर घर पर पड़ने लगा। सारे दिन बेटे संग गुजारने के बाद शैलजा का मन करता कि अविनाश के लौटते ही कहीं इंजॉय करने चला जाए, मूवी देखी जाए या दोस्‍तों संग ठहाके लगाने चला जाए़ या कुछ नही तो शॉपिंग ही कर ली जाए।अविनाश की पसंद की साडि़यां, ज्‍वेलरी या कुछ भी खरीदा जाए। पहले की तरह अविनाश के मुख से अपने लिए सराहना के दो शब्‍द सुनने के लिए शैलजा तरस जाती। इधर अविनाश अपनी दिनोंदिन व्‍यस्‍त, अतिव्‍यस्‍त दुनिया में खोता गया, जब कि शैलजा बच्‍चे की परवरिश, पढाई, करियर ग्रोथ के अलावा तमाम फालतू किस्‍म के कामों में खुद को खपाती चली गई। एक संभावनापूर्ण व्‍यक्तित्‍व किस कदर शून्‍य में अपना वजूद खोता जा रहा था, वह सोचती तो शून्‍याकाश में घंटों ताकते हुए सोचती ही रहती। पिछले दो दशक याद करते हुए आंखें भर आईं। 

पहला झटका तब लगा, जब वह खुशी खुशी नौकरी से रिजाइन करके अविनाश के साथ शहर दर शहर बदलते हुए बच्‍चे के स्‍कूल बदलती रही। पुराने दोस्‍त बिछड़ने पर रोते बिसूरते बच्‍चे के चेहरे पर खुशी लाने के लिए वह उनके स्‍कूलों में देर तक बैठी रहती। बच्‍चों को लेने छोड़ने के लिए वह उनकी मम्मियों से परिचय बढ़ाकर घर लाती। बच्‍चे को पढ़ाने से लेकर करियर बनाने या बाहर भेजने जैसे हर मोड़ पर उसका साथ देने में जिंदगी के बीस साल फुर्र से निकल गए। पचास पार करते ही पहाड़ सा अकेलापन उसकी राह तक रहा था जैसे। न, आम अफसर पत्नियों की तरह किटी पार्टी इंजाय करना उसके स्‍वभाव में नही था, न कहीं पब्लिक प्‍लेस पर नाचना गाना सुनाकर महफिल लूटने में उसकी दिलचस्‍पी थी तो वह करे तो क्‍या करे ? खालीपन भरने हेतु नौकरी जैसे सवाल सुनते ही अविनाश टेढ़ा मुंह करते हुए गोलमोल जवाब देकर दफ्तर निकल जाते- ‘ किसी स्‍कूल की मास्‍टरी करना चाहती हो तो बताओ ?’ फिर उसका जवाब सुने बिना ही फरमान जारी – ‘ क्‍या करोगी ? दिन भर खटकर भी हाथ में आएंगे वही बीस पचीस हजार। इतने रूपए तो मैं अपने ड्राइवरों को देता हूं।‘ 

‘ बात पैसे की नही, समय काटने की है। मेरा मन नही लगता यहां खाली सूने घर में कैदी जैसे दम सा घुटता है।‘ 

‘ तो कुछ दिनों के लिए अपने मायके हो आओ। मन बहल जाएगा। कहीं और घूमने का मन हो तो टिकट करवा दूंगा।‘ 

‘ तुम चलोगे साथ ? अकेले कहीं जाने का मन नही करता। सब अपने अपने परिवार संग आते जाते हैं।‘ फिर वही जवाब‍* 

‘ अरे बाबा, टाइम नही है, कल से इलेक्‍शन ड्युटी है. . 

‘ आज इसमें तो कल उसमें, या परसों किसी और झमेले में, पिछले बीस सालों से यही सब तो सुनती रहती।‘ पूरी बात सुने बिना ही अविनाश दफ्तर निकल गया। उस दिन जल्‍दी में अविनाश का मोबाइल घर पर छूट गया। दफ्तर जाकर उसने शैलता को फोन करके बताया। पता नही वो कितना मनहूस दिन था, जब शैलजा को पहली बार अविनाश के मोबाइल को देखने का मौका हाथ लगा। यह उसकी उत्‍सुकत जिज्ञासा थी कि मोबाइल संदेश देखते देखते उसके पांव तले की जमीन हिलने लगी। ऐसा भूकंप उसने पहली बार महसूस किया कि वह अपने को नही संभाल पाई। छटपटाहट ऐसी कि कलेजा मुंह तक आ गया जैसे फफोलों पर कोई जोर से हाथ रख दे। असहनीय दर्द से छलछला आईं आंखें। आंखें वहां से हटने के बजाए चिपकी रह गईं।  देखते देखते तमाम तरह की विकृत कल्‍पनाएं मूर्त रूप लेने लगी। यह क्‍यों हुआ, कैसे हुआ, कब से ये सब चल रहा है ? दिमाग लगातार इसी दिशा में तेजी से घूमने लगा। गुस्‍से में घर का एक एक सामान उठा उठाकर फेंकने का मन करता तो कभी अपने जीवन को नष्‍ट करने का मन करता कि वह किसके लिए जी रही है, किसे उसकी जरूरत है। अपने एक अजीज दोस्‍त को फोन करने का मन किया पर, क्‍या फायदा, ये सब सुनकर कोई हमारे बारे में क्‍या सोचेगा ? यह सिर्फ और सिर्फ मेरा दुख है, मेरी तकलीफें। तमाम तरह के डर, आशंकाएं और असुरक्षा का भूत शैलजा को परेशान करने लगा। एक एक करके सारे भ्रम टूटकर खंडहर बनते गए। मोह माया के रिश्‍ते कांच के टूटे टुकड़ों की तरह खुद शैलजा के वजूद से चिपककर लहुलुहान करने लगे। 

 इतनी सारी रूपसी सुंदरी लड़कियों के संदेशों के बीच अविनाश संग उसकी खास कलीग नीतिका की क्‍लोज तस्‍वीरें, बिल्‍कुल प्रेमी प्रेमिका की तरह, गले में बांहें डाले, एक दूसरे के भीतर जाने की छटपटाहट में होठों की थरथराहट को तस्‍वीरों में कैद करने की बेताबी, तो कभी अविनाश की जांघ पर बैठी मुस्‍कराती नीतिका, ये वही लड़की थी जो अविनाश के साथ कई बार घर आकर उससे मिलती थी। अलग अलग पोज में गठीले बदन की नुमाइश करती नीतिका और अविनाश की तस्‍वीरों पर नजरें ऐसे चिपक गई जैसे शहद में चिपकी मधुमक्‍खी पूरी ताकत लगाने के बावजूद टस से मस न होने पाए। सैल्‍फी की तस्‍वीरों में हंसती नीतिका के खुले बालों से ढके नग्‍न कंधों पर टिके अविनाश के हाथ, पूरी कहानी बयां करने के लिए पुख्‍ता सुबूत थे। जितनी बार गौर से देखती, उतनी बार आंखें भर आतीं। यह अविनाश के प्रति मोहाविष्‍ट मन का टूटना था या विश्‍वासघात से उपजा आक्रोश, पर घंटों बैठे बैठे सोचते सोचते सिर घूमने लगा। मन में आया, इस मोबाइल को उठाकर कहीं दूर फेंक दें और अपने सिर को दीवार पर दे मारें। अपनी बढ़ती थरथराहट और कंपकंपाती जुबान पर काबू पाने के लिए शैलजा कई गिलास पानी गटकती गयी पर बेचैनी थी कि कैसे भी कमतर नही हो पा रही थी। दर्द के कतरे सीने को चीरते हुए निकल गए! क्‍या नीतिका के अलावा भी कहीं किसी और के साथ अविनाश के ऐसे ही किस्‍से चल रहे होंगे ? ऐसे कंटीले सवाल सोचते हुए कई और लड़कियों की तस्‍वीरें देखने की कोशिश की, पर इतनी निकटता कहीं और नजर नही आई। 

कुछ सालों से हमारे रिश्‍तों में बढ़ती बेरूखी या दूरियों के पीछे भी क्‍या यही नीतिका है ? यह शैलजा के लिए कल्‍पनातीत था, सोचते हुए नम आंखों को कई बार पोंछती लेकिन अगले ही पल फिर आंखें भर आतीं, तभी अविनाश का फोन आया- ‘हैलो, लिसन, मेरा मोबाइल छूट गया है। ‘  

‘ अविनाश, साफ साफ बताओ, पिछले कितने सालों से तुम्‍हारा अफेयर चल रहा है ? अपनी समूची जिंदगी तुम्‍हारे नाम कुर्बान कर देने का क्‍या यही सिला दिया तुमने, ऐं ? अच्‍छी सजा भुगत रही हूं। क्‍या इसी दिन के लिए नौकरी से रिजाइन करवाकर यहां लाए थे तुम ? बोलो, चुप क्‍यों हो ?’ चीखकर तेज तेज बोलते हुए शैलजा की आवाज में सालों पुराना इकट्टादर्द, टीस और तकलीफें उभर आईं। सिर का भारीपन बढ़ता गया और रोते रोते आंखें सूज गयी। 

‘क्‍या हुआ तुम्‍हें ? तुम्‍हारी रोनी आवाज सुनाई दे रही है ? बेकार बातें क्‍यों कर रही हो ? आखिर हुआ क्‍या है ? पहले पूरी बात तो बताओ।‘ वह सचाई जानने के लिए बेताब हो उठा। 

‘ बनो मत। जस्‍ट स्‍टॉप एक्टिंग। साफ साफ बताओ, नीतिका के साथ कब से चक्‍कर चल रहा है तुम्‍हारा ?’ इस बार सीधे सीधे पूछना पड़ा ।

‘ बकवास बंद करो। कौन सा चक्‍कर ? नथिंग लाइक दैट, सेल्‍फी खिचवा लेने से क्‍या चक्‍कर चल जाता है ?’ 

‘ सारी तस्‍वीरें सच बयां कर रहीं हैं अविनाश। ऐसा विश्‍वासघात ? इतना बड़ा धोखा देते हुए तुम्‍हें जरा भी शर्म नही आई ?’ 

‘ बेवकूफी भरी बातें कर रही हो। एनी वे, आकर बात करता हूं .. कहते हुए फोन कट गया। 

हिंसक शब्‍द हथौड़े बनकर उसके सिर पर पड़ते रहे। सफाई देते लेते लंबा समय बीतता रहा। तब से महीनों एक दूसरे से कटा कटापन रहा। रोज बगावत, रोज सीजफायर, रोज मान मनौव्‍वल के लंबे दौर पर अपनी सफाई में कुछ ठोस नही बोल पाए अविनाश। बच्‍चे से छिपाने की पूरी कोशिश के बावजूद एक दिन बेटे ने पापा से सीधे सीधे पूछ ही लिया- ‘ पापा, आपका किससे अफेयर चल रहा है ? मम्‍मा क्‍यों रोती रहतीं हैं ? कौन है वो? इतनी जोर जोर से रोज की लड़ाइयों से बेहतर है कि आप दोनों अलग अलग हो जाएं।  बोलिए न, आप क्‍या चाहते हैं ?’ 

‘ तू चुप कर। हमारे बीच बोलने की कोई जरूरत नही।‘ 

‘ जरूरत है पापा। इस घर में छाई मनहूसियत से दम घुटता है मेरा। महीनों से छाई खामोशी में सांस लेते हुए दहशत होने लगी है। मम्‍मा की हालत देखकर नर्वस हूं। पता नही वे क्‍या सोच सोचकर रोती रहती हैं . .बोलिए न साफ साफ।‘
’ फालतू की बकवास मत कर, बस,तू अपनी स्‍टडी पर फोकस कर।‘ बीच में बात काटते हुए वह बोल पड़ा- ‘ स्‍टडी ठीक है मेरी। अगले मार्च तक हॉस्‍टल चला जाऊंगा तो ममा की देखभाल कौन करेगा ? आप तो अपनी दुनिया में मग्‍न रहते।‘ 

‘ चुप होगा कि नही ?’ इस बार अविनाश ने उसे जोर से डांट दिया। 

कभी दफ्तरी कामकाज के दबाव तो कभी मातहतों द्वारा सृजित जयजयकार के प्रभामंडल में अपने को खोते गए अविनाश। धीरे धीरे दोनों एक दूसरे के लिए अजनबी बनते गए। आपस में कम से कम बातें करते। अविनाश जैसे ही फोन लेकर बाहर निकलता, शैलजा की बड़बड़ाहट शुरू हो जाती- ‘ जरूर किसी चुड़ैल से बतिया रहे होंगे।‘ फिर उनका अनर्गल प्रलाप देर तक चलता रहता। फिर जब वे चुप होती तो एकदम से खामोश हो जातीं। अविनाश अपनी नौकरी में आगे बढ़ते रहे, उधर शैलजा अपने मन की अंधेरी बंद गहरी गुफा में पसरे एकांतवास में गहरे तक धंसती चली गयी। धीरे धीरे अंधेरे में उसकी आंखों ने लुप्‍त रंगों को पहचानना सीख लिया था। अंतस में अविनाश के लिए पलते इंतजार का सुख सूखता जा रहा था। न अविनाश के पास इतना वक्‍त रहता कि वे उसे अपने होने का एहसास कराते, न शैलजा के मन में अविनाश के लिए तलब जग पाती। 

सबसे बुरा होता है, इंतजार का खत्‍म होते जाना। इंतजार की कोंपलें मुकम्‍मल हवा पानी न मिलने पर एक एक करके सूखती जा रहीं थीं। हमारी जिजीविषा का सबसे बड़ा स्रोत होता है- इंतजार लेकिन सपोज, जब यही न रहे, तो ? जीवन की धुरी ही गड़बड़ाने लगती और जीवन के रंग बिरंगी खूबसूरती बिखरने में देर नही लगती। अकेलापन वेग से उसे अपनी जद में लेकर काटने डसने लगता। जब सोच विचार से थक जाती तो विक्षिप्‍त की तरह बर्ताव करने लगतीं- तुमने मुझे धोखा क्‍यों दिया अविनाश। पूरी बात सच सच बताते क्‍येां नही ? नीतिका के अलावा भी कोई और लड़की आ गयी जिंदगी में ?’ 

‘ शक का इलाज तो हाकिमों के पास भी नही होता, शैलजा। अपने अपने दिमाग का इलाज कराओ। ‘

 कहते हुए अविनाश धीरे धीरे शैलजा के प्रति विमुख होते गए। उनके शब्‍द तड़तड़ गिरते अनचाहे ओले की तरह सीधे पीठ पर गिरते रहे। स्त्रियों के प्रति सहज दोस्‍ताना रवैया क्‍यों नही रख पाते ये पुरूष ? सोचते ही दर्द की इबारतें रची जाने लगी अंतस में। धीरे धीरे अकेली पड़ती गई वह। अंदर बाहर के अंधेरों से घिरी शैलजा धीरे धीरे अपने जीने का मकसद को ही नकारती गई। पहले अपने समय को भरने के लिए शैलजा ने झोपड़पट्टी के बच्‍चों को पढ़ाने के लिए गैराज में जगह बनाई थी, जहां शाम को स्‍कूल चलाने की शुरूआत अच्‍छी रही। मगर जैसे जैसे उसकी तबियत बिगड़ने लगी, उसकी दिमागी हालत अस्थिर होती गई। कहीं भी चित्‍त एकाग्र ही नही कर पाती। एक एक दिन ऐसे कटे हैं जैसे भारी भरकम पहाड़ को पूरी ताकत से धक्‍का मारने की कोशिश में वह एक इंच भी टस से मस न हुआ हो। एक एक मिनट भारी टीला बनकर ऐन रास्‍ते के बीचोंबीच कहीं से लुढ़कता आ जाए तो ? दुख की शक्‍लें बदलतीं गईं, कभी नया तो कभी पुराना। 

करियर के शिखर पर पहुंचे अविनाश दिनोंदिन विजी होते गए। अपने विजी रूटीन में अविनाश सुबह 9 बजे से रात 9 बजे तक लौटते और खाना खाकर खर्राटे भरने लगते। शैलजा के लिए उनके पास था ही क्‍या ? थका हारा शरीर, ऊंचा ओहदा या बढ़ते रूपए, जिसकी जरूरत तो शैलजा को कभी थी ही नही। अपने पेंशन के रूपए तक तो वह पूरी तरह इस्‍तेमाल कर नही पाती थी। अपने कमरे में बंद करके स्‍टडी करता रहता और वह अपने अंधेरे में बनती बिगड़ती आकृतियों से संवाद करती रहती और अपने निरर्थक जीवन के बारे में सोचकर आंखें भर आतीं, न, इस घर में किसी को उसकी जरूरत नही। अपने अंतस के नरम नाजुक कागज पर वह तर्को के नुकीले पेन से इतनी बार काटपीट कर चुकी थी कि उस पर नई इबारत लिखा जाना मुमकिन ही नही था। अपने अंधेरे में घिरी शैलजा की आवाजें सुनने की फुर्सत किसके पास थी ? उसकी चिड़चिड़ाहट या बड़बड़ाहट को अनसुना करके अविनाश तेजी से दफ्तर निकल जाते और घर लौटते ही फोन कॉल्‍स में उलझे अविनाश की हंसी ठहाकों की अनुगूंजें शैलजा को चुभने लगतीं। सत्‍ता का चश्‍मा इतना मोटा होता है जो अविनाश को सचाई  देखने नही देता। पावर की हनक, सत्‍ता का स्‍वाद या रोब वाकई इतना मल्‍टीलेयर्ड होता है जिसकी चकाचौंध से घिरे अविनाश के भीतर की इंसानियत का झरना इस कदर सिकुड़ता सूखता गया कि उन्‍हें एकांतवास झेलती शैलजा के प्रति कोई भाव या संवेदना नही उमड़ती। भावनाओं के आदान प्रदान का दूसरा नाम प्रेम है और जब वही भावनाएं खाक हो जाएं तो ? किसको लेना देना उससे ? आखिर क्‍येां हो लेना देना ? 

कितनी बार समय के सबक उसकी चेतना को झंकृत करते- आखिर क्‍यूंकर छोड़ी उसने अपनी नौकरी, फिर खुद को जस्‍टीफाई करने लगती, अकेले पड़ते बेटे के लिए। आर्थिक समस्‍या तो थी नही। वैसे भी पेंशन के पैसे तो मिलते ही है, सोचते ही कई बार बाजार जाकर अपनी पसंद के कपड़े गहने वगैरह उठा लाती मगर पहनकर जाएगी ? अपने पति के रूतबे की नुमाइश करती किटी पार्टियों में उसे घुटन होने लगती तो कभी अपने बहनों के यहां चल देती। पढ़ने के लिए बच्‍चे के बाहर निकल जाने पर घर की चहारदीवारी में पूरी तरह कैद शैलजा की दिमागी बीमारी नियंत्रण से बाहर होती गयी। क्रमश: बाहरी दुनिया उसके लिए निरर्थक, बेजान या खाली होती गई। साल दर साल निकलते रहे पर शैलजा का मानसिक संताप इतना ज्‍यादा बढ़ता गया कि वह पूरी तरह दवाओं पर निर्भर होती गयी। इन दवाइयों ने उसे नींद में ऐसे धकेला कि लेटे लेटे शरीर पर चर्बी चढ़ती गई। अंधेरे में आकृतियां बनती बिगड़तीं उसे डरातीं रहतीं। खुद को आइने में देखकर हैरान हो उठती- इतना चौड़ा चेहरा, मोटी गर्दन और ये 80 किलो का फूला शरीर लेकर वह जाए तो जाए कहां ? धीरे धीरे जीने की अदम्‍य लालसा दम तोड़ने लगी। जब तक अविनाश से शिकायतें रहीं, बहसें, चर्चाएं या कुचर्चाएं के बीच कुछ तो बाकी था मगर बाद में दोनों अपनी अपनी चुप्‍पी में कैद होते गए। उनके बीच संवाद की अभेद्य दीवारें तनती गयीं। अविनाश से चुकते जा रहे संवाद से रहे सहे संबंध भी सूखने शुरू हो गए। एक दूसरे के प्रति रूचियां तेजी से घटतीं गईं। धीरे धीरे शैलजा की खाने के प्रति रूचि घटती गयी। घंटों दीवार तकते रहने से शैलजा की रातों की नींद उड़ती गयी कि लगातार जागने से मानसिक बीमारी दिनोंदिन बढ़ती गई तो डॉक्‍टर से दवा लिखवाकर अविनाश अपने कर्तव्‍य की इतिश्री करके पूर्ववत अपने रूटीन को जीते रहते। दोनों के बीच भावनात्‍मक निर्भरता तेजी से चुकती जा रही थी। क्रमश: अपने में सिमटती सिकुड़ती शैलजा घंटों अपने बनाए अंधेरों से मौन संवाद करती अपने अनकहे दर्द को पीने की कोशिश में डूबी रहती। अजीब सा सूना पन, अकेलापन और दिनोंदिन सब कुछ छिनते जाने का कसैला एहसास मन को तिक्‍तता से भरता गया। उसके वजूदनुमा कुएं से जैसे सारा पानी निकाल लिया गया हो। कितना कुछ देख लिया उसने, बदलते चेहरों को। 

धीरे धीरे दांम्‍पत्‍य की दीवारें मोटी और अभेद्य होती गयी जिन्‍हें समय पर न तोड़े जाने से वे लौह दरवाजों में तब्‍दील होती गईं। शैलजा के अंतस में अविनाश के प्रति कुविचारों की इतनी ज्‍यादा कट्टमपिट्टी हो चुकी थी जिसे फाड़कर नई इबारत लिखने की सामर्थ्‍य ही नही बची। विगत के काले चैप्‍टर को फाड़कर नही फेंक पाई। शैलजा को लगने लगा, कि उनके जीवन में कुछ नया अध्‍याय लिखने की न तो उम्र बची थी, न मृत एहसास जिंदा होने का नाम ले रहे थे। 

दुखद यादें रह रहकर दिमाग पर दस्‍तक देते हुए चेतना को कुंद करती रहती। अविनाश को अपने विचारों व भावनाओं संग न चल पाने की बेबसी से परेशान शैलजा ने अपने जीवन की दिशा ही बदल डाली। मन के गहरे कुएं में झांकने पर चारों तरफ कैद कुविचारों से परेशान शैलजा को चारों तरफ अंडमानी काला समंदर दिखने लगता जिसमें कूदने का मन करता। खुद को मिटा डालने की इच्‍छाएं बलवती होती नजर आई। अविनाश संग एक राह पर चलते रहने की इच्‍छाएं अपने आप दम तोड़ती गई कि एक दिन तैश में आकर बौखलाई शैलजा छत के नीचे झुककर झांकती रहीं, पर ऐन मौके पर बचा लीं गईं ।

 अब दवाओं की भारी भरकम डोज जबरन दी जाने लगी जिसे खाकर वह घंटों बिस्‍तर पर निढाल निष्‍चेष्‍ट पड़ी रहती, लगभग अर्धमूर्छित अवस्‍था में आंखें खुलती तो सोचती- न जाने कब से कुंभकर्णी नींद सो रही है वह कि दिन कब रात का चोला पहन लेती या रात कब आधी रात में बदलकर सुबह के चार बजा देती, समय बोध ही नही रहता। हालिया घटी घटनाएं याद करके आंखें भर आतीं। घंटों लेटे रहने से पहले की तरह अच्‍छा सोचने समझने की सामर्थ्‍य खत्‍म होती जा रही थी। कभी खुद को जस्‍टीफाई करने लगती, वह अकेली कहां कहां जाकर अविनाश की हरकतों पर कंट्रोल कर सकती थी ? तमाम महिलाओं के नाम उस तक चलकर आते जाते रहे लेकिन फिर कभी मोबाइल चेक करने का मन ही नही किया। अजीब बदहवासी भरे दिन गुजारती शैलजा कभी उठती तो रसोई जाकर कुछ खाने पीने का लाती, फिर टीवी देखती या बिस्‍तर पर ढह जाती। न कोई तमन्‍ना जगती, न कोई सपना आंखों में तैरता, न कोई आकांक्षा पनपने पाती। चिडि़याएं जरूर सुबह सवेरे अपने कुनबे संग उसे टेरने आतीं रही। उनकी आवाजें सुनकर लगता जैसे वे विशाल आकाश के मौन सन्‍नाटे को तोड़ने आती हों। ऐसा नया क्‍या कहना चाहती हैं ये चिडि़याएं रोज रोज ? वह भी तो इनकी तरह चिचियाने के लिए अकुला उठती लेकिन अविनाश उसे बीमार समझ अपने कमरे में लौट जाते। प्राणवायु बन सुबह की ताजी हवा में ये आवाजें मन के सूनेपन को तोड़तीं । 

शुरू में विक्षिप्‍त शैलजा का चीखना चिल्‍लाना अविनाश को बहुत डिस्‍टर्ब करता सो वह उसे बड़े नामी डॉक्‍टरों के पास दिखाने ले गया तो ठीक है, कहकर दवा देकर अपने कर्तव्‍य की इतिश्री कर ली जाती, जब कि उस समय शैलजा की दिली तमन्‍ना होती कि अविनाश उसके साथ कुछ अंतरंग लम्‍हे गुजारें। पहले की तरह हंसी की फुलझडि़यां जलाएं, ठहाकों के पटाखे फोड़ें मगर वह तो अपनी फाइलों, फोन और दफ्तर के झमेलों से घिरे रहे और इधर शैलजा की ख्‍वाहिशें दम तोड़तीं रही। वह धीरे धीरे काष्‍ठ प्रतिमा में तब्‍दील होती जा रहीं थीं। पल पल, तिल तिल जलती बुझती लकड़ी की मूर्ति क्रमश: जलती अगरबत्‍ती में तब्‍दील होती जा रहीं थीं जिसका एहसास तक अविनाश को नही था। इतनी फुर्सत, इतने इत्‍मीनान से बैठकर शैलता की आत्‍मा की पुकार सुनने की कोशिश ही कहां की अविनाश ने ? ऐसे साथ की साझा भावनाएं तब तक दम तोड़ चुकी थीं। दोनों एक दूसरे के लिए घर के जरूरी सामान की तरह तब्‍दील होते गए। दोनों की जिस्‍मानी जरूरत को पहले ही उसी घटना के दौरात खत्‍म हो गयी जब शैलजा ने अविनाश को लड़कियों संग अंतरंग मुद्रा में देख लिया था। खुद को वहां से काटने में  बहुत लंबे दर्द से गुजरती शैलजा के दामन से अविनाश के प्रति पनपती अपेक्षाएं खुद ब खुद झरती गईं। अपनी उम्‍मीदों को पति से हटाने के सिवा उनके पास कोई और रास्‍ता ही नही बचा था। अकेले सब कुछ झेलते रहना बहुत त्रासद था। उनके जीवन का यह तकलीफदेह दौर चलता रहा सालोंसाल। कभी कभार पुरानी भावनाएं लौट लौटकर चक्‍कर लगातीं जैसे पालतू पशु छोड़ दिए जाने के बाद मालिक के पास मोहवश चला आता है पर ठांव न मिलने पर निराश होकर वापस चल देता। 

मुकम्मल हवा पानी या धूप न मिलने पर पुराने एहसास धीरे धीरे गुपचुप तरीके से मरने लगते हैं सालों पुराने एहसास।  शैलजा का मन अब बगावत करने पर उतारू हो जाता, नही, अब और नही सहना।

 डॉक्‍टर की दवाओं के दुष्‍प्रभाव से शैलजा दिनोंदिन सुप्‍तावस्‍था के अंधेरों में गुम होती गयी। जिस समय शैलजा को दवा की नही, अविनाश के कोमल संस्‍पर्श की सख्‍त जरूरत थी, वह अनचाहे रूप में दवाओं के काले सागर में चली जाती। समय पर समय देना ही शैलजा का एकमात्र इलाज था जो उन्‍हें नही मिल पाया। दोनों एक दूसरे को ऐसे उचाट भाव से देखते जैसे चलते फिरते कोई तस्‍वीर को देख लिया जाता है, देखकर भी अनेदखा जैसा। एक समय ऐसा भी आया जब शैलजा के भीतर से गुस्‍सा, नफरत, चिड़चिड़ाहट और आक्रोश की चिंगारियां अपने आप बुझती गईं। एक अजीब सी निस्‍पृहता, तटस्‍थ रवैया उसके स्‍वभाव में शुमार होता गया। चोट खायी भावनाएं अंदरूनी कोमलता या जिजीविषा को बचाने के लिए अपने इर्द गिर्द कई कठोर परतें चढ़ाने लगती। अक्‍सर शैलजा सोचती, ज्‍यादा शब्‍द फेंकते रहने से शब्‍द बेअसर होते जाते सो एक दिन उसने शब्‍दों को बरतना ही बंद कर दिया। पहले वह अविनाश से तीखा बोलकर वह अपना गुस्‍सा निकालती थी- ‘आज जो इतनी तितलियां तुम्‍हारे आगे पीछे घूमती हैं, एक दिन ऐसा आएगा, जब कौआ भी तुम्‍हारे दरबज्‍जे की मुंडी पर बैठने नही आएगा। आज जिस कुर्सी की चकाचौंध तुम्‍हें अंधा, बहरा या गूंगा बना रही है, एक दिन ऐसा भी आएगा, जब यह कुर्सी नही रहेगी, मैं भी ज्‍यादा दिन रहने वाली हूं नही, सो सिर्फ घड़ी की टिक टिक सुनते रहना जिंदगी भर। 

 फिर एक दिन सोचा- ऐसे बोलकर अपनी इनर्जी बर्बाद करने से क्‍या फायदा ? मुंह तक आकर शब्‍द बाहर नही आ पाते। जैसे रोते बिसूरते बच्‍चे को मनाकर चुप न कराओ तो वह रोते रोते सो जाता है, वैसे ही सोती गयी भावनाएं। धीरे धीरे वह चुप्‍पी के गहरे कुएं में धंसती गयी। जातीं धीरे धीरे स्‍मृतियां भी साथ छोड़ने लगी थी।  अविनाश ने बाद में बहुत कोशिशें की कि शैलजा अब पहले की तरह हंसने बोलने लगे कि वह किसी मुद्दे पर चर्चा करे, कि वह कुछ मसलों पर बहस करे कि वह बेवजह लड़े झगड़े जिससे घर की मुर्दनी छंटे पर सालोंसाल अपने एकांत को घूंट घूंट पीती शैलजा अपनी अंदरूनी खोह में ही रहने की आदी होती गई।

धीरे धीरे वक्‍त ने करवट बदली। जिस समय के पीछे वे जिंदगी भागते रहे, आज वही उसी समय ने उनका साथ सबसे पहले छोड़ा । कुर्सी से बाहर निकलते ही अब पहले जैसी रोबदार, कड़क आवाजें नुकीली तलवार की तरह पैनी नजरें और मुंह से निकलते एक एक शब्‍द को लपककर करने को आतुर पावर के पीछे भागने वाले पालतू लोग सर्र से दूर फिकते गए। सत्‍ता का गुरूर या पावर गेम सांप से तजी केंचुली की तरह उनका दामन छोड़ता गया। अब समय ही समय का विशाल समंदर ठाठें मारता रहता। हर मिनट को गुजरते हुए देखते रहते। ऐसा खालीपन कि दीवार पर चढ़ती उतरती धूप को नापने लगते। 

अविनाश को रह रहकर विगत की यादें दबोच लेती जब उसके जीवन में चारों तरफ प्रफुल्‍लता बिखरी थी। नया सूरज हर रोज अद्भुत नायाब रंग लेकर उगता। एक से बढ़कर एक खूबसूरत लड़कियां उससे संपर्क सानिध्‍य पाने के लिए लालायित रहतीं। मीठी मनुहार करते उनकी आवाजें अमृत बनकर कानों में अनूठा रस घोलते – ‘ सर, ब्रिलिएंट आइडिया। ग्रेट फिलॉस्‍फी सर, आपके दिमाग में जरूर कोई वंडरफुल चिप लगी है कि ये बात हमारे दिमाग में क्यों नही आई ? लुकिंग सो ग्रेसफुल । तब दूर दूर तक शैलजा की मौजूदगी का एहसास तक नही जगने पाता।  

 न तो अब वैसी सुंदरियां बचीं, न उनके खूबसूरत होठों से झरते अमृततुल्‍य मीठे बोल। अब तो आसापास छाया है वही मनहूस सन्‍नाटा, शांत दरो दीवारें और एकाध पुराने दोस्‍त के फोन। अकेले पड़़े अविनाश की जिंदगी में आई औरतें भी न जाने किस गुफा में कब की गुम हो चुकी थी। उनके आसपास चौबीसों घंटे रहने वाली शैलजा जीते जी निष्क्रिय माटी में तब्‍दील हो चुकी थी। उस एकांतवास में अविनाश को घुटन होने लगती। यही हाल जिंदगी का रहा है, दिन रात, सुबह, दुपहर, शाम की भागदौड़ में शैलजा के अकेले पड़ते जाने का एहसास तक नही रहा । पछतावे का काला प्रेत उनके ऊपर अट्टहास करने लगता- तो अब क्‍या करोगे अविनाश ? किस पर रोब गांठोगे ? किसे अपना मनमीत बनाओगे ? भाग गई सारी चहचहाती चिडि़याएं जो अपना मतलब साधने तुम्हारे गले पड़ी रहतीं थीं।  दफ्तर से घर भागने की जल्‍दी और घर से दफ्तर भागने की जल्‍दी में पिसते रहे ताजिंदगी  मगर माया मिली न राम। ठूंठ में परिणत होते रिश्‍तों को हरा भरा करने के लिए समय समय पर धूप पानी दिखाना जरूरी है, पर अविनाश धीरे धीरे शैलजा से कटते परे होते गए।  

वे शैलजा को अपने फेमिली डॉक्‍टर को दिखाने जरूर ले जाते और फिर उनके कहने से मनोचिकित्‍सक के पास भी ले गए। शैलजा को समय से दवा देकर उनकी ड्युटी खत्‍म । शैलजा की गिरती हालत देखकर अपराधबोध की कचोट परेशान करने लगती, काश कि समय रहते वह जाने अनजाने में हुई भूल सुधार कर पाते, काश कि व्‍यस्‍त जीवन में से कुछ समय सिर्फ और सिर्फ शैलजा के लिए बचाकर रख पाते पर समय निकल जाने पर वही अपराध बोध कैंसरनुमा गांठ बनकर सालने लगता। जीवन की कडुवी सचाइयां मुंह बाए सामने खड़ी थी, जब डॉक्‍टरों ने साफ साफ कह दिया- दवाओं के सहारे ही जी पाएंगी शैलजा, थोड़ा बहुत खाना खिलाते रहना। बेचारी कब से अपने गढ़े अंधेरे दवाबों तले सालों से जी रहीं हैं। इन्‍हें देखकर लगता है जैसे जीने की इच्‍छा ही नही बची इनमें। इन्‍हें अब अस्‍पताल में ही रखना ठीक रहेगा। आपको दिन रात खयाल रखना होगा। हमारे हाथ में ज्‍यादा कुछ बचा नही। चाहें तो बेटे को बुलवा लें ।‘ 

‘ एबसोल्‍यूटली राइट डॉक्‍टर . . बमुश्किल इतना ही बोल पाए वे। इधर डॉक्‍टर प्रार्थना के लिए कह रहे थे, उधर अविनाश अपने जीवन में आई नई पुरानी लड़कियों की संख्‍या गिनने लगे। कितनी क्‍यूट थी चित्रा जो उसकी एक मुस्‍कान और आवाज पर फिदा रहती। उसके एक इशारे पर कुछ भी करने को आतुर इरा उसे दीवानों की तरह चाहने लगी थी- सर, आपकी स्‍मैल पागल बना देती है।‘ बाद में एचआर हैड नीरा हर रोज उसे शानदार मैसेज भेजती। उसका एकाग्र प्रेम,भावुक व बौद्धिक बातें सुनकर अविनाश तरोताजा हो उठते। अब तक तो वे तमाम औरतों से हल्‍की फुल्‍की बातें करके मन बहला लेते पर ये नीरा अजीब मिट्टी की बनी और‍त है, जिसे उनसे कुछ भी तो नही चाहिए। जैसी एकाग्र निष्‍ठा नीरा में नजर आती, वैसी कहीं नही, सोचकर वे परेशान होते। नीरा के नाराज होने पर वे उसे दसियों दफे मीठा बोलकर माफी मांगकर मनाते जैसे रेडियो की आवाज गड़बड़ होने पर वे उसे ठीक करने लगे हों।अगले ही पल शैलजा को लेकर अपराधबोध घेरने लगता। घर लौटकर शैलजा की रोनी सूरत देखकर खुद को जस्‍टीफाई करने लगते- अब शैलजा को मेरी जरूरत ही नही। जब घर पर कुछ नही मिलेगा तो आदमी बाहर तो कुछ न कुछ खोजेगा ही। आखिर आदमी की कुछ जरूरतें भी तो होती ही हैं।अकेला आदमी कहीं न कहीं तो सहारा ढूंढेगा ही, इसमें बुरा क्‍या है, सोचते तर्क वितर्क करते हुए खुद को जस्‍टीफाई करने लगते । 

तब दफ्तर की हरदम हंसती मुस्‍कराती औरतें रास आतीं। उनके एक इशारे पर कुछ भी करने वाली औरतों की कमी नही थी।  उनके कहने से कुछ औरतें छोटी कुर्सी से बड़ी कुर्सी तक भी पहुंचीं थीं। दफ्तर का काम झटपट संभालने वाली दोस्‍त नीरा को अपनी पत्‍नी की बीमारी का हवाला देकर अपने अकेले पड़ते जाने का खूब रोना रोकर सहानुभूति बटोरना चाहते पर नीरा को उनके स्‍वार्थ, अवसरवादिता और भावुकता के बीच का फर्क करना आ गया।  

 आज उन्‍हें दफ्तर की उसी पुरानी दोस्‍त नीरा की याद आई । उन्‍होंने फोन करके हालचाल लेने की कोशिश भी की पर बड़ी औपचारिक सी बातें हुई– ‘ ठीक हूं, आजकल विजी हूं। बाद में बात करते हैं, मगर फिर कभी फोन नही आया। कहां वो  ऐसा सुनहरा दौर था, जब उनकी एक आवाज सुनकर ही वह सूखी फसल पर पड़ती बूंदों की तरह लहलहाने लगतीं पर आज सब कुछ उलट पुलट गया। अब इस सचाई का भान हुआ कि प्रेम का सारा खेल भावनाओं का ही होता है। आवेग चुकते ही वही प्रेम अपनी अर्थवत्‍ता खोने लगता। समय रहते उस आवेग को स्‍पेस देते रहते तो आज भी उन कोमल प्रेम का एहसास बना रहता। प्रेम की पनपती सुकुमार कोंपलें को मुकम्‍मल हवा पानी न मिले तो वे असमय मुरझा जाती है। अफसोस कि वे कुछ भी तो संभाल सहेज नही पाए। काश कि समय रहते हमने नेक इंसानों की परख कर ली होती तो आज इतना अकेलापन नही घेरता।

यूं ही बेतरतीब बेमजा जिंदगी की गठरी लादे समय भागते भागते तब ठहरा, जब अविनाश रिटायर होकर घर पर रहने लगे। ऊंची कुर्सी, लोगों की भीड़ भाड़, मीटिंग्‍स और ऊंचे अधिकारियों, राजनेताओं से मिलते हुए वक्‍त का पता ही नही चलता था और अब ? इस भारी भरकम समय को पकड़ने वाला कोई नही बचा, सोचकर समय अट्टहास करने लगा। खाली खोखली बांसुरी में से कोई भी सुरीली आवाज नही निकल सकती। सचमुच, समय, किसी के प्रति लगाव व सघन प्रेमिल भावनाएं अगर एक बार किसी का साथ छोड़कर दूसरी दिशा में मुड़ गईं तो फिर कभी उस इंटेसिटी के साथ दुबारा नही पनपने पातीं। अफसोस कि बाकी सब के बावजूद आज जीवन कितना बेसुरा और बदरंग लगने लगा। वे और उनके पदचाप, बस यही है उनकी जमापूंजी। 

अब जब अविनाश के पास समय ही समय था, शैलजा के पास अविनाश के लिए समय ही कहां बचा ? शैलजा ने अकेले रहकर कैसे इतना एकांतवास झेला होगा, सोचते ही रूह कांपने लगी । सचमुच, समय रहते समय का हाथ पकड़कर जिंदगी जी लेना चाहिए वरना समय निकल जाने पर बाद में समय ही समय बचा रहता जिसे पल पल काटना भारी पड़ने लगा। सुबह निकल जाए तो शाम भारी कटती, शाम कट जाए तो रात नही कटती। शैलजा थी तो जीवन था, उसकी शिकायतें थीं तो शिकायतें दूर करने का जज्‍बा भी था। जिंदगी में आगे ब़ढ़ने का जुनून था, पर अब न तो वो जज्‍बा बचा रह पाया, न जुनून। कुछ भी पाने की इच्‍छा हथेली पर बैठे पंछी की तरह फुर्र से छूमंतर। 

धीरे धीरे समंदर का वेग शांत गंभीर नदी में तब्‍दील होता गया जिसने अपनी दिशा ही बदल दी थी। अस्‍पताल परिसर में दिन रात का अंतर नजर ही नही आता था। भर्ती शैलजा को देखकर बेटे ने आकर मां को आवाज दी। पूरी ताकत से हिलाने डुलाने के बाद वे बमुश्किल अपनी आंखें खोल पाईं लेकिन अंधेरे में बनती बिगड़ती आकृतियां भर नजर आईं। बेटे के स्‍पर्श से उनकी चेतना जागी- पानी . . बेटे ने पानी पिलाया जो होठों के दोनों तरफ से बाहर निकल गया। पास खड़ी नर्स ने बेटे के कान में बुदबुदाया- बेचारी को होश नही है। इनके लिए प्रार्थना करें। एक साथ कितनी बीमारियों से सालों से अकेले ही लड़तीं जूझतीं रहीं हैं ये। परिवार के होते हुए भी वे अवसाद में रहीं, बेहद तन्‍हा, लाचार और बेबस। सब कुछ होते हुए भी इनके पास अपनापन नही था। मैम ने एक बार अपनी रामकहानी सुनाई थी। इतने ब़ड़े पद पर आपके पिता और कहां इतनी लाचारी में जिंदगी और मौत से जूझती रहीं ये, सो सैड।‘ 

‘ हूं. . अनायास बेटे को एक घटना याद आ गई, जब दवा खाने के बाद भी जब वह अपने लैपटॉप का तार तलाशने ममा के कमरे में गया तो उस घुप्‍प अंधेरे में भी उनकी चमकतीं आंखें देखकर चौंक पड़ा वह। फिर मां को ध्‍यान से देखते हुए पूछा- ‘ ममा, आप सोई नहीं ?’ सुनकर उन्‍होंने बेटे को अपने पास बुलाया- कभी इन अंधेरों के बीच में नींद टूट जाती हैं तो घबराहट होने लगती। दिन भर मेरे वजूद के सैकड़ों टुकड़े हो जाते बेटा जिन्‍हें रात होते ही जोड़ने में जुट जाती। रात भर मेरे ही टुकड़े बिस्‍तर पर मुझे चुभने लगते, फिर उन्‍हें जोड़ने में पूरी रात निकल जाती। जब सब टुकड़े सांसों की लय के साथ जुड़ जाते, तब जाकर नींद आ पाती है।‘ वे सोचते हुए बोलती जा रहीं थी। 

‘ कैसी अजीब बातें सोचती रहती हो ममा।कुछ भी समझ नही आ रहा। आपने आज की दवा खाई ?’  

‘ हां बेटा, यदि मुझे कुछ हो जाए तो पापा के साथ प्‍यार से रहना।‘ कहते हुए उनकी आंखें भर आईं। 

‘ ऐसी फालतू की बातें मत सोचो ममा, आपको कुछ नही होगा. . कहकर उसने चादर उड़ाई। लेकिन उसके बाद उनकी सेहत सचमुच बिगड़ती गई। 

पास से गुजरत डॉक्‍टर ने तरेरती नजर से अविनाश और उनके बेटे को देखा और बिना बोले किसी और मरीज को देखने लगे। अविनाश ने तेज कदमों से डॉक्‍टर से बात करनी चाही कि बेटे की आवाज सुनाई दी- ‘ पापा, अब और ऐसी सुलाने वाली दवाएं मत दो उन्‍हें। कई सालों से यही दवाएं खाकर ही उनकी ये हालत हुई है।‘ 

‘ करेक्‍ट बेटा,  पास खड़ी उसी नर्स ने जवाब दिया। तब तब डॉक्‍टर ने अविनाश की तरफ मुखातिब होकर कहा- ‘ यस, समय पर दवाएं देते रहो। बाकी अब ज्‍यादा कुछ कहा नही जा सकता। जस्‍ट प्रे फॉर हर।‘ 

न चाहते हुए भी अनजाने में उनके हाथ प्रार्थना में जुड़ते चले गए जैसे वे जाने अनजाने शैलजा के प्रति हुए अपने रवैए पर शर्मिंदा होकर कुछ कहना चाह रहे हों। शैलजा के कहे एक एक शब्‍द उनके सिर पर हथौड़े की तरह प्रहार करने लगे- जैसे किसी साध्‍वी के मुख से निकला श्राप सही सत्‍य साबित हो गया हो- ‘ आज जिस कुर्सी की चकाचौंध तुम्‍हें अंधा, बहरा या गूंगा बना रही है, एक दिन ऐसा भी आएगा, जब यह कुर्सी नही रहेगी, मैं भी ज्‍यादा दिन रहने वाली हूं नही, सो मेरे जाने के बाद सिर्फ घड़ी की टिक टिक सुनते रहना जिंदगी भर।‘ कितना सही कहा था शैलजा ने, सोचते हुए उनकी आंखें भर आईं। उन्‍हें देखकर ऐसा लगा जैसे उनके चेहरे पर शैलजा के प्रति पछतावे का भाव चस्‍पां हो गया हो। आंखें मूंदे ध्‍यानस्‍थ योगी की तरह अविनाश की स्‍मृति में शैलजा की पुरानी तस्‍वीरें फिर से जिंदा होने लगीं। 

– तभी बेटे ने उनको हिलाते हुए कहा- ‘पापा, पापा, देखो तो’ . . उस धूपछांही नीम अंधेरे में बेटे की चमकती आंखें देखकर वे चौंके- ‘ क्‍या ?’

‘ लिसन, ममा मेरी तरफ देखकर मुस्‍कराई थीं।‘ ‘ अच्‍छा, कहकर उन्‍होंने शैलजा की ठंडी हथेली पर अपनी गर्म हथेली रखकर छूना चाहा मगर यह क्‍या, देखते देखते शैलजा की हथेलियां शिथिल पड़कर झूलने लगीं जैसे बिना कुछ कहे सुने उन्‍होंने अपनी यात्रा समाप्ति की घोषणा कर दी हो। 

5/259 विपुलखंड, गोमतीनगर लखनऊ 

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