Wednesday, May 29, 2024
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* नाम : रुचि बहुगुणा उनियाल
 
* जन्म स्थान : देहरादून
 
*जन्म तिथि :18-10-1983 
 
* निवास स्थान : नरेंद्र नगर, टिहरी गढ़वाल
 
* प्रकाशन : प्रथम पुस्तक – मन को ठौर, 
 
              (बोधि प्रकाशन जयपुर से प्रकाशित)
 
  प्रेम तुम रहना,प्रेम कविताओं का साझा संकलन 
 
  (सर्व भाषा ट्रस्ट से प्रकाशित)
 
वर्ष 2022 में दूसरा कविता संग्रह २ १/२ आखर की बात (प्रेम कविताएँ) न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन नई दिल्ली से प्रकाशित। 
 
*मलयालम, उड़िया, पंजाबी, बांग्ला, अंग्रेजी व अन्य कई भारतीय भाषाओं में अनुवाद 
 
*उत्तराखंड राज्य की प्रतिष्ठित पत्रिका युगवाणी में वर्ष 2018 में राज्य की राष्ट्रप्रसिद्ध अनूठी प्रतिभाओं की साक्षात्कार श्रृंखला प्रकाशित व समय-समय पर कविताओं का प्रकाशन 
 
* भारतीय कविता कोश व प्रतिष्ठित वेब पत्रिका हिन्दवी के साथ ही पहलीबार ब्लॉगस्पॉट पर रचनाएँ प्रकाशित
 
*संपर्कसूत्र[email protected]
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कविताएं

पहाड़ी औरतें

पहाड़ की औरतें
सूरज को जगाती हैं
मुँह अंधेरे
बनाकर गुड़ की चाय
और उतारती हैं
सूर्य रश्मियों को
जब जाती हैं “धारे” में
भर लेती हैं सूरज की किरणों को
जब भरती हैं
“बंठा” धारे के पानी से
पहाड़ की औरतें रखती हैं
सूरज के लिए
कुछ पल आराम के
भरी दुपहरी में
सुस्ता लेता है भास्कर
पहाड़ी औरतों के सर पे रखे
घास के बोझ तले!
और सांझ को
जब गोधूलि बेला में
आते हैं पशु पक्षी अपने
आशियानों में लौटकर
तो सूरज को भी कर देती हैं
विदा…..
अपनी रसोई में चूल्हे की
आग जलाकर!
पहाड़ी औरतें
रखती हैं बनाकर यादों को
“कुट्यारी”
और जब
कमर झुक जाती है उनकी
तो “समूण” बनाकर
सौंप देती हैं वो “कुट्यारी”
अपने नाती _पोतों को!
पहाड़ी औरतें असमय ही
हो जाती हैं बूढ़ी!
क्योंकि उन्हें होता है
तजुर्बा चढ़ाई का और रपटीली
ढलानों का भी!
पहाड़ी औरतों के
चेहरे की झुर्रियों में
पूरा पहाड़ दिखाई देता है
लदा होता है उनके कांधों पर
बोझ पहाड़ जैसा!
पहाड़ की औरतें
नहीं डरती चढ़ाईयों को देखकर
यूं ही नहीं घबराती
उतरती रपटीली पगडंडियों
पर चलने से
क्योंकि वो रोज़ ही
भरती हैं कुलाँचे
किसी कस्तूरी मृग सी
इन रास्तों पर
असल में पहाड़ी औरतें
रखती हैं एक पूरा पहाड़
अपने अंदर!
उनके “गुठ्यार” में
लिखी होती हैं
पहाड़ की पीड़ाएँ!

बेटी के पिता

१)जिनके पास था 
बेटियों का प्यार 
उन पिताओं ने
प्रेम कविताओं से भी
अच्छा प्रेम लिखा!
 
२)जिन पिताओं ने
विदा की बेटियाँ ब्याह के
उन्होंने विरह को किया
जीवंत अपनी कविताओं में!
 
३)बेटियों का ख़याल रखते हुए
दुनिया के पिताओं ने
जीया अपने अंदर
एक माँ की ममता को!
 
४)बेटियों के पिताओं ने
कविता का समीकरण
और कविता का व्याकरण
न समझते हुए भी
लिखीं दुनिया की
सबसे अच्छी कविताएँ!

संदेह

चाट जाता है हमारे विश्वास को
जैसे दीमक कर देता है
नष्ट उत्तम लिपियों की 
पुस्तकों के पन्ने खाकर!
 
बहा ले जाता है वेगवती नदी सा
हमारी आत्मीयता भी साथ
जैसे कि तेज़ लहरों में
बह जाते हैं
रेत के टीले ऊँचे-ऊँचे!
 
कभी-कभी होता है
बारूद से भी ज्यादा
विस्फोटक!
जिसके शोर में दब जाती हैं
हमारी बेहतरीन यादों की
खिलखिलाहट!
 
कहने को तो तीन अक्षरों का
छोटा सा शब्द है “संदेह” 
लेकिन कर देता है बेअसर
हमारे रिश्तों की गर्माहट!

सुख और दुःख

(1)
 ईश्वर की दो संतानें हैं 
लेकिन ईश्वर ने सदा दुःख को
अधिक लाड़ किया। 
 
(2)
सुख और दुःख जीवन के दो स्तम्भ रहे सदा 
दुःख ने सुख का अस्तित्व 
कभी ख़तरे में नहीं आने दिया। 
 
(3)
सुख एक परछाई के जैसा रहा 
जिसे दुःख अपने साथ-साथ 
लेकर चला सदा। 
 
(4)
असल में सुख एक छद्म आभास रहा 
जिसे दुःख ने पोषित किया। 
 
(5)
दुःख ने बचाई स्मृतियाँ मस्तिष्क में 
सुख ने सुरक्षित की आशाएँ
इस तरह दुःख का स्वरूप विराट 
और सुख का सूक्ष्म हो गया। 

धरती का विलाप

उजड़ता है जब घोंसला कोई
तो धरती करती है रूदन
 
जब पेड़ों की लाशें बिछाई जाती हैं
तो धरती का हृदय फटता है
बहते हैं धरती के आँसू!
 
और जब लड़कियाँ होती हैं उदास
तो धरती उस क्षण अचानक ही भारी हो जाती है
अपनी धुरी पर बुक्का मार के रोती है
करती है विलाप! 
उस एक क्षण में धरती अपनी
धुरी पर घूमना बंद कर देती है!

दुःख की ठोकर

दुःख की ठोकर ने
समझाया सुख के महत्व को
सुख अपने दंभ में हाथ झटकता निकल गया
 
दुःख की एक ठोकर ने
हज़ार-हज़ार सीख दी
सुख के एक आलिंगन से भी 
हो गया मतिभ्रम 
 
दुःख के अवरोध ने सिखाया 
कैसे निकलना है बाधा की बेड़ी के बंधन से 
जबकि सुख के प्रवाह ने 
बनाया पंगु अक़्सर ही प्रतिभा को।
 
दुःख की हर छोटी-बड़ी ठोकर ने राह के काँटों के प्रति
सदैव सजग रहना सिखाया
जबकि सुख के मात्र एक मखमली स्पर्श ने
अलंघ्य बना दिया हर छोटे-बड़े पड़ाव को।

तासीर

महल के ऊँचे झरोखे से
दिनभर तकती रहती थी 
दो आँखें
 
वैद्य न ढूंढ पाया
बीमारी की वजह
नब्ज़ टटोल के। 
 
शवयात्रा के साथ साथ
चल रहा था कोई 
चुप्पी साधे, आँसू रोके
 
आजकल सीढ़ियों पर बैठे
पानी पर उकेरता है
एक चेहरा कोई।
 
पानियों की तासीर
अचानक बहुत ही
फ़ायदेमंद हो गयी है। 
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किताबें

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