Wednesday, April 24, 2024
sandhya novdita
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संध्या नवोदिता
 
*कवि ,अनुवादक , लेखक और पत्रकार। छात्र- जीवन से सामाजिक राजनीतिक मुद्दों पर लेखन। आकाशवाणी में एनाउंसर रही। समाचार-पत्र, पत्रिकाओं ,ब्लॉग और वेब पत्रिकाओं में लेखन।
जन-आंदोलनों और जनोन्मुखी राजनीति में सक्रिय दिलचस्पी।
 
*फिदेल कास्त्रो के दो भाषणों History will absolve me का हिंदी अनुवाद किया-  ‘इतिहास मुझे बरी करेगा’ , और Talk to intellectuals का अनुवाद ‘बुद्धिजीवियों से मुखातिब’,
 
*फ्रेंच दार्शनिक और स्त्रीवादी विचारक सीमोन द बोउआर के लेख का अनुवाद,
 
*सलवाडोर के कवि और पत्रकार रॉक डाल्टन,
अमेरिकी कवि और नागरिक अधिकार कार्यकर्ता माया एंजिलो की कुछेक कविताओं का अनुवाद।
 
*हंस, वागर्थ, तद्भव, नया ज्ञानोदय, लमही, आजकल, अहा ज़िन्दगी, पाखी, इतिहास बोध, विज्ञान प्रगति, दस्तक, समकालीन जनमत, आधी ज़मीन, स्त्री मुक्ति, नागरिक, रेतपथ , रचना उत्सव, भोर, माटी , गाथान्तर, वर्तमान साहित्य  आदि में कविताएँ प्रकाशित। बच्चों के लिए एक साइंस बुक का अनुवाद जिसका प्रकाशन नेशनल बुक ट्रस्ट ने किया है।
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कविताएं

खूबसूरत घरों में

खूबसूरत घर 
बन जाते हैं खूबसूरत औरतों की कब्रगाह 
 
खूबसूरत घरों में 
उड़ेल दी जाती हैं खुशबुएँ 
हज़ारों-हज़ार मृत इच्छाओं की बेचैन 
गंध पर
 
करीने से सजे सामानों में 
दफ़न हो जाती हैं इच्छाओं की तितलियाँ 
 
सब कुछ चमकता है 
खूबसूरत घरों में 
औरतों की आँखों के अलाव से 

गलती वहीं हुई थी

तुम्हारे अँधेरे  मेरी ताक में हैं
और मेरे हिस्से के उजाले
तुम्हारी गिरफ़्त में
 
हाँ
ग़लती वहीं हुई थी
जब मैंने कहा था
तुम मुझको चाँद ला के दो
 
और मेरे चाँद पर मालिकाना तुम्हारा हो गया

देश-देश

जो अपने खेतों में झूमता रहा 
जंगलों में, बीहड़ों में, गाँवों में पलता रहा
कब उग आया कंक्रीट के कैक्टसों में 
और एक पचास खम्भों वाली विशालकाय गोल इमारत में 
कैद हो गया.
 
यह देश
क्रिकेट के भगवान
सदी के महानायक
आइडलों और आइकनों के चक्रव्यूह में 
मासूम बच्चे सा फँसा लिया गया. 
 
देश, देश तुम क्या हो !
मैं अपने पानियों में जाल बिछाए निहारता मछुआरा हूँ 
अपने तटों पर पछाड़ खाता समंदर हूँ
हिमालय से टूट कर ढहने को विवश किया गया
विशाल बर्फीला चौराबारी का शोक हूँ 
दण्डकारण्य का साहसी चौड़ा सीना हूँ 
अबूझमांड में धडकता दिल हूँ.
 
देश, देश तुम कहाँ हो !
मैं इस धरती की रक्तवाहिनियों में हूँ 
नदियों में लहराता, झीलों में ठहरता 
घने जंगलों की साँस हूँ 
मैं लोहे का बना बस्तर हूँ
उड़ीसा के लाल कोयले की धधक रही आग हूँ 
अथाह जलराशि में डूबने को मजबूर किया गया टिहरी हूँ
खरबों रुपये डकारने की बदनीयती से मरती गंगा हूँ 
 
मैं इस सूखी धरती की प्यास हूँ 
 
मैं बैलाडीला की खदान हूँ 
जिस पर चढ़ बैठे हैं सभ्य सौदागर 
जिनका मुँह मेरे बच्चों के लहू से सना है 
मैं मानेसर का मान हूँ 
जहां घना अँधेरा पोता जा रहा है 
उत्तर-पूर्व का उपनिवेश हूँ 
सात बहनों की पीड़ा भरी छटपटाहट हूँ 
इरोम शर्मिला की आँखों से देखता हुआ लुटियन्स की दिल्ली को 
मैं जेल में गुमनाम  दम तोड़ता हज़ार चौरासीवाँ हूँ 
सबकी ख़ुशी के सपने देखने का अपराधी 
दुस्साहसी मुस्कुराता नौजवान हूँ 
 
मैं अँधेरे के गीतों का दस्तावेज़ हूँ 
दो हज़ार दो का जलता गुजरात हूँ 
फिर भी मैं अशफाक हूँ, भगत हूँ, सुखदेव हूँ 
राजगुरु और आज़ाद हूँ 
 
मैं जलियाँवाला की गोलियों की छलनी दीवार हूँ 
मैं अपने बहादुर ‘पाश’ की अंतिम हिचकी हूँ 
 
देश, देश तुम क्यों हो !
मैं हूँ, क्योंकि तुम हो 
तुम्हारी रोटी, तुम्हारे सम्मान का विस्तार हूँ मैं 
मैं घर हूँ तुम्हारा, तुम्हे अपने सीने से लगाए 
मैं हूँ पूरी दुनिया जैसा, दुनिया है मुझ सी 
मैं हूँ पेड़ की एक पत्ती, एक कली
इस दुनिया के जंगल की, बाग़ की
मैं हूँ उनमें जो मुझमें हैं 
मेरी मिट्टी से बने, मेरी जड़ों पर खड़े 
 
देश, देश तुम कैसे हो !
मैं आंसुओं का महाराग हूँ
सैंतालीस का टहकता दाग हूँ 
भयानक परछाईं हूँ टूटे सपनों की 
एतद्द्वारा का टुकड़ा-टुकड़ा संविधान हूँ 
अमीरों के जबड़ों में फँसा  
माँस का नरम, स्वादिष्ट, वैध स्वाद हूँ 
जिसकी रेसिपी संविधान के किसी टुकड़े में दर्ज है 
 
देश, देश तुम मेरी आँख में भर आया आँसू हो
मेरे सीने में उठी आह हो, 
दर्द से सिकुड़ी मेरी पेशानी हो, 
फिर भी मेरी तनी हुई रीढ़ हो, 
फिर भी मेरा क्रोध से भिंचा जबड़ा हो, 
गद्दारों की बदनीयती और साजिशों से लड़ती मेरी उम्मीद हो, 
मेरा गर्व हो,
चुनौतियों से टकराती मेरी जिजीविषा हो !
देश, देश तुम मेरा प्यार हो !

गणेश कथा

एक दुःख , दो दुःख
चार दुःख , आठ दुःख
इस तरह मैं दुखों का पहाड़ा पढ़ती हूँ
और रोज एक पहाड़ चढ़ती हूँ
 
दो बार मुख कैंसर के शिकार हुए गणेश
जो दूसरा आपरेशन कराने गए अकेले ही टाटा हॉस्पिटल मुम्बई
महज छत्तीस बरस के गणेश
 
अकेले, इतना अकेले गए गणेश 
कि कोई यह तक कहने वाला न था उनके साथ
कि छोटा ही आपरेशन है गणेश
धीरज रखो
सब ठीक हो जाएगा
 
कैंसर के पहले आपरेशन में ही आधी कटी ज़ुबान
पहले से ही रहे अधूरे शब्द
मुख के दूसरे आपरेशन में अधूरे भी बाकी न रहे
 
लौटे गणेश दूसरा आपरेशन करा के
बल्कि कहें लौटना चाहा गणेश ने बड़ी व्याकुलता से 
प्यारी पत्नी और लाड़ले चार बच्चों के पास 
वो चाहते थे बस जीना
जाना नहीं चाहते थे बिलकुल
 
गणेश मामूली इच्छाओं वाले मामूली आदमी
न रुपया जमा किये, न सोना
न खेती बढ़ाई, न नौकरी देखी
भाइयों की नजर में बेकाम के गणेशदेश के आखिरी नागरिक थे
 
तो आपरेशन करा के चल पड़े गणेश
पता नहीं कब की समेटी हिम्मत चुक गयी
आधे रास्ते पहुँची गाड़ी
मुम्बई से इलाहाबाद नहीं 
बीच में ही डेड बॉडी बन गए गणेश
 
यात्रियों को बदबू भरे गणेश इंसान नहीं लगे
सो ज़िद करके उतार दिए गए गणेश अपनी मृत देह के साथ बीच राह में किसी जंक्शन पर
 
अब दुखों का पहाड़ा तो ऐसे ही बढ़ता है
तपती दोपहरी का सूरज ऐसे ही सर चढ़ता है 
इधर गणेश सिधारे उधर इलाहाबाद में इंतज़ार करते उनके बूढ़े पिता भी चल बसे थोड़ी देर बाद
 
तो चले मित्र केशव इलाहाबाद से गणेश की मृत देह लाने
कि कम से कम अंतिम संस्कार तो हो नसीब
बेच के अपना फोन इंतज़ाम किया, लकड़ी का ताबूत बनाया बढ़ई ने ज़्यादा रुपया लेकर
काहे से कि वो शादी के मण्डप बनाने वाला बढ़ई था
 
कटे फटे, बदबू मारते गणेश को बरफ की सिल्लियों बीच सहेज लाए केशव
और लिटा दिया उनके पिता की मृत देह के बगल
 
गणेश के नन्हें पुत्र ने उस रात दो पिताओं को अग्नि दी
 
केशव एक स्नेह हैं, एक खूँटी हैं
जहाँ गणेश का बेसहारा परिवार अपनी जरूरतों को टांगता है
सोचते हैं और गहरी साँस लेते हैं केशव
शायद मैं अपने मित्र गणेश से बरसों बाद
अचानक उसकी मृत्यु के छः माह पहले इसीलिए मिला था
 
दोहराते हैं केशव, भीगती है सुनने वाली हर शय
अँधेरा भीगता है, लम्बी होती परछाइयाँ भीगती हैं
रास्ते भीगते हैं, पेड़ , चाँद, सरोवर सब भीगते हैं
 
यह सिर्फ दुखों का पहाड़ा है गणेश का
जिसे अब उसकी पत्नी अपने चार बच्चों के साथ पढ़ती है
दुखों का पहाड़ रोज चढ़ती है
 
और मैं सोचती हूँ
ये कठिन पहाड़े किसी के जीवन में न आएं कभी
सबको केशव नहीं मिलते
 
दुखों के पहाड़ अकेले नहीं चढ़े जाते
अकेले तो सुंदर पार्क भी नहीं घूमे जाते
अकेले होना ही इस पहाड़ को कई गुना ऊँचा बनाता है
 
मैं सोचती हूँ और बोलती हूँ
गणेश की अभागी पत्नी से
तुम्हारे साथ मेरा होना क्या इसे कुछ सहज बनाता है।

मैं हरेपन में बोलती हूँ

मैं हरेपन में बोलती हूँ
आप मेरा अनुवाद हरीतिमा में कर सकते हैं
 
जब आप मुझे चुप करेंगे
मैं कोंपलों में उग आऊँगी
 
जब रोकेंगे नज़र से ओझल करके
मैं आपकी आँखों से बह रही होऊँगी
 
आप मुझे जाने देंगे
और खुद को जाता हुआ देखेंगे मुझ में
 
मैं आपके भीतर हूँ ठीक उसी जगह
जहाँ रूधिर का प्रवाह सबसे तेज़
आप हथेली रखेंगे वहाँ
और मैं आपकी उँगलियों के पोरों में धड़क जाऊँगी
 
सबसे ज्यादा मुखर हो जाऊँगी मैं
आपके मौन में

आरे के पेड़ -1

आरे के पेड़ कटते हैं
अमेजन के जंगल जलते हैं
 
पेड़ कटते हैं
सारे जीव बिलख उठते हैं
नन्हीं गिलहरियां रोती हैं
तितलियाँ रोती हैं
चींटियाँ पेड़ों के शवों पर बिछ जाती हैं
पंछी कातर रुदन करते हैं
 
एक पेड़ कटता है
धरती कराहती है
 
एक पेड़ कटता है
सौ बरस का इतिहास कटता है
पानी कटता है
शर्म कटती है
विवेक कटता है
प्यार कटता है
 
एक पेड़ कटता है
एक के पीछे एक चलते हैं दस ट्रक 
एक पेड़ को लादे
 
देखो एक पेड़ की शव यात्रा जा रही है
उसके ठीक पीछे हम हैं
जाने कब के मर चुके
हमारी सड़न से बहुत बुरी गंध आ रही है।
 

आरे के पेड़ -2

आरे के पेड़ कटते हैं
अमेज़न के जंगल जलते हैं
 
मनुष्यता के आखिरी पायदान पर 
खड़ी
हम मनु की संतानें प्रलय को पुकारती हैं
 
वही है हमारा अभीष्ट
 
हम जहाँ से बचा कर लाए गए
नूह की कश्ती से फेंक रहे हैं हम एक एक लहर पर एक एक जीवन
एक एक प्रजाति
 
चौरासी लाख योनियों वाले हम महारथी
बाकी रखेंगे सिर्फ चौरासी योनियाँ
हम मार काट के धुरन्धर
हम भस्मासुर अभिशप्त हैं विनाश के वरदान से
कि हम जो छुएंगे वह राख में बदल जायेगा
 
हम रक्तबीज 
हम संहारक
स्वर्ग की सीढ़ियों को उलटकर
नरक में उतरने को व्याकुल
 
हम विध्वंस के स्वामी
प्रगति की ट्रेन अपने सीनों पर चलाते हैं
सबसे बड़े विनाशक को हम शक्तिमान की पदवी देते हैं
 
हम अहंकारी, चाँद सूरज को रौंदने को विक्षिप्त
नदी, पहाड़ों, जंगलों, हवा, पानी के खिलाफ खड़े हैं पूरी ताकत से
 
और हम भस्मासुर पर हँसते हैं !
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किताबें

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