Thursday, May 23, 2024
सविता पांडेय
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सविता पांडेय
जन्म: 26 अप्रिल,1984, पटना
लेखिका और चित्रकार

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स्त्री-लेखन में मुखर उनके अधिकार

मुट्ठी भर आसमान और सीमाबद्ध धरती का अक्स समेटे भारतीय स्त्री ने आंगन की भित्तियों को लाल गेरु से पोतकर उस पर बड़ा-सा ’स’ लिख दिया।
यह साहित्य का ’स’ था। एक खूबसूरत ’स’ जो स्त्री-चेतना को गुनगुनी धूप में सेंक सकता था। और उनकी मुट्ठी में सितारे भर सकता था। यह ’स’ अद्भुत रूमानियत, शान्ति, रहस्यों और पवित्रता से भरा था। साहित्य के ’स’ ने स्त्री के ’स्’ के साथ सामंजस्य बिठाया और स्त्रीत्व की नई परिभाषा रच डाली।
देवी, माँ, बहन, बेटी, प्रेयसी, पत्नी, कुटनी, पतिता की आक्रांत छवियों से भयभीत नारी ने नये आयाम और संभावनायें खोज निकालीं।
दया, करुणा , प्रेम, सौंदर्य, कोमलता, विश्वास और ईश्वरीय शक्ति होने की जड़ता से परे स्त्री-मन को सारे उद्वेगों, द्वंद्व और तनाव को बिला देने वाला वह तार चाहिये था, जो मन-से-मन का संवाद स्थापित कर सके। उसके सुंदर सपनों की सबसे लुभावनी वस्तु ’घर’ और उसकी परिधि के बाहर आने वाले कुल, कुटुम्ब, परिवार, कबीले, कस्बे में उसके अनिश्चित, मुश्किल और आशंकित जीवन को इबारत का स्वर चाहिये था। ये स्वर और सपने समकालीन स्त्री लेखन में गहराई से प्रतिध्वनित होते हैं।
उसने रोजमर्रा की बाधा दौड़ों के बीच जीना और लिखना सीख लिया । लेखन ने स्त्री को नई ऊर्जा, अभिव्यक्ति, कीर्ति और आत्मनिर्भरता दी। आत्मिक निर्भरता और स्वप्न दिए। अब कोरे कागज वह मोर्चा बन गये जहाँ वह अपनी हर बात लिख सकती थी और हर लड़ाई लिखकर जीत सकती थी। उसकी लेखनी पुराने अर्थों, संदर्भों, पराधीनता की बेड़ियों को तोड़ने के सफलतम प्रयास करती रही। आजादी की सदी से अधिक समय और उसके पूर्व महिला-लेखिकाओं ने न सिर्फ शारीरिक, आर्थिक और परिवारिक शोषणों को उल्लिखित कर कलम उठाने का साहस किया बल्कि सामाजिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक -वैचारिक , आर्थिक समकालीन मुद्दों पर भी खूब लिखा।
यह समस्त विश्व की बानगी है। संपूर्ण विश्व में जन्म लेने वाली चेतना की महागाथा। स्त्रीगाथा। अभिव्यक्ति की इस उड़ान और स्वतंत्रता ने तमाम भाषाओं और अलग-अलग काल-खंडों में स्त्री स्वर को गरिमा दी है। स्त्री-मुक्ति भले ही अभी एक ’नारा’ बनकर रह गया हो लकिन सृजन और विचार की दुनिया में महिलाओं की उपस्थिति ने स्थापित दृष्टिकोणों को बदला ही है। चाहे यूरोपियन साहित्य हो या अन्य विदेशी भाषायें सबमें स्त्रियों की अभिव्यक्ति के समान रंग मुखरित हैं। अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में मेरी वुलस्टोनक्राफ्ट अपनी पुस्तक ’विंडिकेशन’ में स्त्री शिक्षा और अधिकारों की आवाज पुष्ट करती हैं, जो स्त्रियों को उनकी पहचान, आजादी और समानता दिला सके। महिलाओं की आर्थिक-समाजिक और कलात्मक आवश्यकताओं के स्वर वर्जिनिया वुल्फ मुखर करती हैं तो वही फ्रांस की प्रसिद्ध लेखिका सिमोन द बोउवार स्त्री को पुरुष का दूसरा भाग संबोधित कर अपनी पुस्तक ’द सेकेण्ड सेक्स’ में तमाम कोणों से स्त्री शक्ति की भूमिका और उसे सेकेण्ड्री बनाने के उपक्रमों पर प्रकाश डालते हुए कहती हैं कि “स्त्री पैदा नही होती, बना दी जाती है“। एलिन सोवाल्टर ’ गायनोक्रिटिक्स’ थ्योरी उद्धृत कर स्त्री जाति की शारीरिक, मानसिक, भाषायी और सांस्कृतिक अवयवों की सुंदर व्याख्या करती हैं तो सिल्विया प्लैथ पितृसत्ता को न सिर्फ एक क्रूर संचालक बल्कि बर्बादी और विनाश की ओर धकेलने वाला बल कहती हैं। शिम्बोस्का, क्लाश, जेटकिन जैसी लेखिकाएं विदेशी साहित्य में स्त्रीवादी सिद्धांत की एक अनुशासन के रूप में पूरी तरह से परिपक्व और बहुआयामी अस्तित्व की व्याख्या करती हैं। जॉर्ज एलियट और इसाक डेनिसन छद्म पुरुष नामों से लिखने का दबाव झेलती दिखती हैं जो अपने को महिलापने से अलग करके एक लेखिका के रूप में प्रमाणित कर सकें।
विभिन्न भारतीय भाषाओं के साहित्य में भी वरिष्ठ पीढ़ी के साथ नई युवतर पीढ़ी भी सक्रिय है। महाश्वेता देवी, मयनामती (बंगाली); प्रतिभा राय, कुकुन्तला कुमारी देवी (उड़िया); अमृता प्रीतम (पंजाबी); लल्ला देवी, बेगम हव्वा खातून, पंडितानी अरनिमाल (कश्मीरी); श्रीमती लीलावती मुंशी (गुजराती) ; दासी जनाबाई, लक्ष्मीबाई तिलक (मराठी); औवैयार, आंडल (तमिल) नालपट्टू बालामणिअम्मा, ललिताम्बिंका (मलायलम) आदि विभिन्न बोलियों- भाषाओं की लेखिकाओं के लेखन में रचनात्मक स्वर हैं जो सिर्फ ’महिला- लेखन’ तक सिमटे नहीं रह सकते। वे मनुष्यता बनाये और बचाये रखने के स्वर हैं जो किसी प्रकार के रचनात्मक आरक्षण की दरकार नहीं रखते। महिला-लेखन की संपूर्णता का प्रतिबिंब वैदिक साहित्य, संस्कृत साहित्य, प्राकृत साहित्य अप्रभंष साहित्य तक में दिखता है। रोमषा लोपामुद्रा, श्रद्वा, कामायनी, यमी, वैवस्ती, पालोमी, शची, विष्वधारा, अपाला, ममता, वाक्, अदिति, शाष्वती, आत्रेयी, ब्रम्हवादिनी घोषा इत्यादि ऋषिकाओं द्वारा रचित साहित्य तत्कालीन लोकजीवन के प्रतिबिंब हैं । लोक साहित्य और लोकगीतों से झांकती नारी मन की विभिन्न अभिव्यक्तियां लोक-चेतना और मनोवृतियों के अंतरावलंबित स्वरूप को तो दर्शाती ही हैं।
हिन्दी स्त्री-लेखन में महादेवी वर्मा, मैत्रेयी पुष्पा से लगायत गीताश्री, जयश्री
राय, नीलाक्षी सिंह, प्रत्यक्षा आदि अनेकों लेखन में स्त्री से जुड़े सवाल उठते और औपचारिक स्वीकृति पाते रहे। दर्शन , इतिहास, भूगोल, अर्थशास्त्र , समाजशास्त्र , यौनविज्ञान , कानून, मनोविष्लेषण, फिल्म और कला के क्षेत्रों में ज्ञानक्षेत्र का स्त्रीवादी संस्करण साहित्य के माध्यम से मुखरित हुआ है। प्रभा खेतान के ‘अन्या से अनन्या’ (आत्मकथा ) लिखने के साहस को नारी-विमर्श की ’स्वतंत्रता’ की तरह देखा जाना चाहिये।
कृष्णा सोबती की ’मित्रो मरजानी’, मृदुला गर्ग का ’ चितकोबरा’, मन्नू भंडारी का आपका बंटी, ’महाभोज’, इसमत चुगताई की ’लिहाफ’, लवलीन का ’चक्रवात’, मैत्रेयी पुष्पा का ’गुड़िया भीतर गुड़िया’ जैसी ढेरों कृतियां विभिन्न आयामों को छूते साहित्य का उदाहरण भर नहीं स्त्री की नई परिभाषा है जो उसे पुरुष की अंकशायनी बने रहने भर से इतर करता है।
सुभद्रा कुमारी चौहान, महादेवी वर्मा, अमृता भारती, महाश्वेता देवी जैसी लेखिकाओं ने हर तरह के समाजिक और रचनात्मक आंदोलनों में बढ़-चढ़कर भागीदारी की और जोखिम उठाये। अन्नपूर्णा देवी, उषा देवी मित्रा, चंद्रकिरण सौनरेक्सा, शिवरानी देवी, कौशल्या अश्क स्वतंत्रता पूर्व के आरंभिक दौर में कठिन समय की लेखिकाएं रहीं। जिन्होंने अपनी मूक अभिव्यक्तियों को कलम की धार संग बहने देने का कठिन साहस किया। सतीत्व, पत्नीत्व, मातृत्व जैसे विषयों संग नारी चेतना के आत्मबोध और संघर्षरत छवियों को चित्रित किया। उनकी रचनाओं ने निश्चय ही स्त्री की परजीविता और मूल्यों की वकालत की है। अलका सरागवी, गगन गिल, चित्रा मुद्गल, नासिरा शर्मा, मृदुला गर्ग, मेहरून्निसा परवेज, कुसुम अंचल, मंजुल भगत आदि की कृतियां आत्म विद्रोह, जीवन मूल्यों के पुनर्स्थापन और समन्वयन, परिवर्तन, चुनौतीपूर्ण दात्विबोध जैसे विषयों से पटी हैं और नये मानव मूल्य गढ़ती हैं जो पारंपरिक मूल्यों के तिलिस्मी रहस्य को तोड़कर उपजी हैं। आज का समय महिलाओं के उत्थान के चारों ओर घुम रहा है और समस्त विश्व में एक अलग तरह की संघर्षचेतना एक साथ पनप रही है। निश्चय ही भारतीय परिवेश में भी यह चेतना समा रही है और महिला साक्षरता वृद्धि , महिलाओं संबंघी कानूनों, मीडिया, स्त्री-पुरुष संबंधों पर इसका व्यापक असर पड़ा है। इन बदलते इुए कानूनों, शिक्षा व्यवस्था मीडिया के प्रभावों और नारीवादी आदोलनों ने लेखिकाओं केा आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता से लबरेज किया ही है उनके लिखने का तेवर भी बदला है। व्यक्तिगत ’स्पेस’ की अवधारणा को नया प्रारूप मिला है जिसने पारंपरिक ढांचे को हिलाकर रख दिया है। पुरुष सत्ता के वर्चस्ववादी मूल्यों को इससे झटका लगा है। मूल्यों के खांचे टूट से गये हैं। गजब का राजनैतिक और वैचारिक लेखन समाज को केंद्र में रखकर हुआ है।
लेकिन यह दुर्भाग्य ही है कि महिलाओं के लेखन को ’महिला-लेखन’ के साँचे में सेट कर दिया गया है। अपने लिखे को महिलापने से अलग रखने का दबाव लेखिकाओं पर बना ही रहता है । लेखन में नारीवाददर्शन की तहकीकात और शोध तो होना ही चाहिये। लेकिन ’महिला लेखन’ के पुर्वग्रह से आसक्त हुये बिना! समय कब का आ चुका है कि महिला लेखन की अलग से इकहरी तस्वीर खिंचनी बंद की जाये और महिला लेखन के इकहरे ढांचे को तोड़ दिया जाये जो साहित्य से लचीलापन और विविधता छीन लेता है। महिला लेखन को ’घर’ की दीवारों और छप्परों के साथ जोड़ दिया गया है। दांपत्य जीवन के संदर्भ विवाहेत्तर संबंध, पारिवारिक मूल्य निज स्वंतत्रता, नीति-अनीति जैसे विषयों को अगर महिलाओं ने देखा, समझा और रचा है तो यह ’घर’ के दायरे में रहकर तीव्र, गहन अनुभूतियों को कलमबद्व करना ही है। ’घर’ स्त्री-पुरूष का सम्मिलित ठिया है। एक लेखक विशुद्ध रचनाकार होता है। महिला – पुरुष नहीं। अनुभूति, अभिव्यक्ति, स्वानुभवों और आत्मचेतना की अभिव्यक्ति को बांटना कितना सही है ?
महिलाओं के लेखन और सोच में प्रखरता, परिपक्वता और नई भंगिमा ने नये धरातल का निर्माण किया है। इस डगमगाते धरातल के संरक्षण के लिये नये कानून और अधिकार बने तो हैं लेकिन साहित्य की तरह ही आम महिला वर्ग का प्राय उसे नहीं दिला सके हैं। नारी लेखन समस्त स्त्री जाति के मौन शब्द हैं। स्त्री ने स्त्री की दबी घुटी पीड़ा को अभिव्यक्त किया है। चाहे वह पीड़ा और मुखालफत तसलीमा नसरीन के जन धर्मी -जीवनधर्मी साहित्य में या अरुंधति राय के ’खतरनाक’ लेखन में व्यक्त हुआ हो या बहुत ही शांत चित्र आक्रोश के साथ ’एक कहानी यह भी’ में। लेखिकाओं ने अन्य स्त्रियों को उनके अधिकारों और मूल्यो के प्रति सचेत किया है। लेकिन जिनके लिये नारी चेतना को झकझोरता लेखन किया जाता है उनतक पहुँचता ही नहीं। दरअसल यह कमी सिर्फ महिला लेखन संदर्भ में नहीं समूचे हिन्दी साहित्य की दुखभरी बानगी है। कथा लेखन के क्षेत्र में लेखिकाओं की कमी और समाज से दूरी सालती जरूर है। जहाँ महिलाओं की जनसंख्या प्रतिशत ही कम हो वहाँ लेखन के क्षेत्र में कमी स्वाभाविक ही है। इसी क्रम में पाठकों और प्रशंसकों में भी पुरुष ही अधिक हैं। फिर भी संभावनाओं की धरती हरियाती जा रही है। नये परिवेश में नयी प्रतिभायें न सिर्फ अंकुरित हो रही हैं, उनसे सुंदर फूल और मीठे फल भी मिल रहे हैं। सृजनात्मक दुनिया विस्तारित हुई है।
’मेरी देह वापस करो’ तो ठीक है लेकिन स्त्री लेखन को यह भी सावधानी तो बरतनी ही है कि ’दलित-विमर्श’ की तरह ’शेष समाज’ को दुश्मन न मान लिया जाये या स्त्री अधिकारों की बात करते – करते पूरे पुरुष समाज को ही प्रतिद्वंदी न मान लिया जाये। स्त्री लेखन को देह- विमर्श बनाने से बचना होगा। देह ओर देह के पार खुले आकाश को घर बनाना होगा। श्रीमद्भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि वह स्त्रियों में कीर्ति , श्री , वाक् , स्मृति , मेधा , धृति और क्षमा के रूप में विराजते हैं। इसलिए स्त्री मुक्ति भारतीय रास्ता यही हो सकता है कि सप्त शक्तियां फूल सकें और खिल सकें। स्त्री मुक्ति एक विचार , शक्ति है। इसलिए नारी मुक्ति को भारतीय रास्ता देने की जरूरत है।
स्त्री लेखन को जीवन के अनेक रंग अभी रचने हैं। जीवन को सुंदर बनाना है। व्यापक भी!

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तसलीमा नसरीन जी को जन्मदिन की बहुत-बहुत बधाई! शुभकामनाएँ!

प्यार मेरा घर है। 
   .. मैं सच के लिए अपना जीवन लगा दूंगी। मैं लिखना जारी रखूंगी – तसलीमा नसरीन 
 
” मैं हिंदी समझती हूँ लेकिन हिंदी में बोल नहीं पाती। 
मैं राजेंद्र यादव जी के प्रति कृतज्ञ हूँ क्योंकि वो चाहते थे कि मैं ‘हंस’ के लिए लिखूँ, जो कि एक बड़ी साहित्यिक पत्रिका है। आज राजेंद्र जी हमारे बीच नहीं हैं और मैं उन्हें बहुत याद करती हूँ। मैं उनसे कई बार मिली। मैंने महसूस किया कि वो बाकी लेखकों से अलग थे। आप सब लोग जानते ही होंगे कि मैं एक बंगाली लेखिका हूँ जो बैंड है, जिसकी किताबें बैंड हैं। और मुझे पूर्व या पश्चिम बंगाल कहीं भी रहने की स्वतंत्रता नहीं है। अखबारों और मैगज़ीन्स के एडिटर मुझे छापने से डरते हैं। इन सबके बीच राजेंद्र यादव ने मुझे जगह दी। वो बहुत साहसी थे। मैं रचना जी की भी आभारी हूँ कि इन्होंने मेरे आर्टिकल्स को छापना जारी रखा। मैंने कभी नहीं सोचा था कि इस तरह मेरी कोई किताब पब्लिश होगी। किताब का प्रोडक्शन काफी अच्छा है। मैं राजेंद्र यादव जी, रचना जी और ‘हंस’ की पूरी टीम के प्रति बहुत आभारी हूँ कि उन्होंने मेरी रचनाओं को पब्लिश किया और मेरा सम्मान बढ़ाया।  मैं बहुत गौरवान्वित हूँ कि मैं ‘हंस’ टीम का एक हिस्सा हूँ। मैं उम्मीद करती हूँ कि आपको ये आर्टिकल्स पसंद आयें। आज मैंने ट्विटर पर अपनी बात लिखी है। फेसबुक ने मुझे सच कहने के लिए बैन कर दिया है। मेरे पास कोई जगह नहीं है। मेरा कोई देश नहीं है। मेरा कोई घर नहीं है। लोग नहीं हैं, खुशियाँ नहीं हैं। कई वर्षों से मेरे लिए देश और घर की परिभाषाएँ ही बदल चुकी हैं। करीब 27 सालों से मैं निर्वासन में रह रही हूँ। मैं अपने देश वापस जाना चाहती थी लेकिन सरकार ने मुझे जाने नहीं दिया। यहाँ तक कि मुझे पश्चिम बंगाल से भी निकाल दिया गया। मेरा कोई देश नहीं है। तीन-चार सालों तक मैं पश्चिम बंगाल में रही। फिर मुझे भारत से भी निकाल दिया गया। पिछले 27 सालों में मैंने महसूस किया कि देश कोई अलग अवधारणा है। घर होना कुछ और होना है। जब मुझे लोगों से मुझे प्यार , सम्मान और अपनापन मिलता है तब मुझे घर में रहने का अहसास होता है।
 प्यार ही मेरा घर है। यह सिर्फ इंडिया या इसके सब कॉन्टिनेंट में ही नहीं होता, यूरोप में भी ऐसा ही होता है। ऐसा होना सभी के लिए एक तरह का ही होता है। मैंने यूरोपियन देशों को भी छोड़ दिया है। मेरे पास ग्रीन कार्ड है। मैं संयुक्त राष्ट्र अमेरिका की स्थायी निवासी हूँ। लेकिन मैंने सब छोड़ दिया। अपनी भाषा के लिए !  मैं बंगाली लोगों, बंगाली वातावरण के साथ रहना चाहती थी। लेकिन कोई बात नहीं! चाहे कहीं भी मैं रहूँ, मैं लिखना जारी रखूंगी। औरतों के अधिकार, मानवाधिकार, सेक्युलरिजम के लिए लिखती हूँ। मेरे देश, बांग्लादेश में कोई भी पब्लिशर मेरी किताबें नहीं छापता था। यही हाल पश्चिम बंगाल में भी रहा । यहाँ तक कि न्यूजपेपर और मैगजीन वाले भी मुझे छापने से डरने लगें। सोशल मीडिया पर ही मैं लिख सकती हूँ लेकिन बीती रात फेसबुक ने मुझे सच बोलने के लिए बैन कर दिया। 
अभी कुछ दिनों पहले बांग्लादेश में जो कम्युनल हिंसा हुई थी, उसमें कई हिंदू लोगों के घरों और मंदिरों को इस्लामिस्ट द्वारा उजाड़ दिया गया। मैंने इस पर लिखा और फेसबुक ने मुझे बैन कर दिया। मुझे नहीं पता फेसबुक, ट्विटर आदि इस्लामिस्ट और जिहादियों से इतना डरते क्यों हैं!  कि वो फ्री-थिंकर्स, मानवाधिकार के प्रति बोलने वालों को बैन कर देते हैं; चूँकि मैंने बांग्लादेश में रह रहे माइनॉरिटी कम्युनिटी को डिफेंड किया उनका पक्ष लिया तो मुझे सोशल मीडिया तक पर बैन कर दिया जाना चाहिए। हम जैसे लोग कहाँ जायें? अपने विचार कहाँ रखें जो दूसरों से अलग हैं? इस्लाम की आलोचना कहीं संभव नहीं है। मीडिया, न्यूजपेपर, मैगज़ीन, टी वी, रेडियो कहीं संभव नहीं है, यहाँ तक कि सोशल मीडिया पर भी नहीं। यह पहली बार नहीं है जब फेसबुक ने मुझे बैन किया है। फेसबुक ने मुझे कई बार पहले भी बैन किया है। कुछ इस्लामिस्ट रिपोर्ट करते हैं और फ्री-थिंकर्स की आवाज को दबा दिया जाता है। फ्री-थिंकर्स क्या कहना चाहते हैं, ह्यूमन राइट्स डिफेंडर्स क्या कहना चाहते हैं। यह हम फ्री-थिंकर्स के लिए बहुत खराब समय है। लेकिन मैं ‘हंस’ के एडिटर्स और पब्लिशर्स के प्रति बहुत आभारी हूँ कि उन्होंने मेरे लेखों को सेंसर नहीं किया। हो सकता है मेरे विचार उनके विचारों से अलग हों लेकिन वे मेरे विचारों का सम्मान करते हैं। अगर आपके पास लोकतंत्र है तो आपके पास अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार भी होना ही चाहिए। इसके बिना लोकतंत्र कुछ भी नहीं है। मैं सेक्युलरिजम और कम्युनल हार्मनी के लिए संघर्ष कर रही हूँ। लेकिन जो लोग सेक्युलरिजम के विरोधी हैं, जो कम्युनल हैं, फंडामेंटलिस्ट हैं, वे मुझे मार देना चाहते हैं। मुझे परेशान करना चाहते हैं लेकिन मैं चुप नहीं रहूंगी। मैं अपनी लड़ाई जारी रखूंगी। अपनी मृत्यु तक मैं सच कहती रहूंगी। मैं जानती हूँ कि मीडिया मुझे बैन कर देगा। सरकार मुझे, मेरी किताबों को बैन कर देगी लेकिन तब भी मैं चुप नहीं रहूंगी। मैं सच कहती रहूंगी। मैंने बहुत सारे लेखकों और जर्नलिस्ट को देखा है कि वे सच नहीं कहते, सरकार के पक्ष में बोलते हैं लेकिन मैं सच के लिए अपना जीवन लगा दूंगी। मैं लिखना जारी रखूंगी” 
 
 दिल्ली 
– एक नवंबर, 2021, राजेंद्र यादव स्मृति समारोह में तसलीमा नसरीन । 
 
– प्रस्तुति :  सविता पांडेय 
 – Courtesy : Taslima Nasrin 
    #हंस #राजेंद्रयादवस्मृतिसमारोह #डायरी 
     #नोट्स #एक_रिपोर्टर_की_डायरी2021
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कविताएं

महुए की बेटियाँ

“भला अब कौन पीता है महुए की शराब?”
यह सुनकर अचानक ही थमे रह गये महुआ बीनती लड़कियों के हाथ!
-“भला ऐसा भी कभी हो सकता है कि महुए से न बने शराब?!”
-“ऐसी भी कोई शराब होती है क्या, जो बन जाए बिना महुए के?!”
सोचते-सोचते हँसती हैं लड़कियाँ, महुए के फूलों सी।
…तभी चू पड़ते हैं उनकी आँखों से महुए के फूल!
ये महुए की बेटियाँ हैं।
….और इस तरह उनकी आँखों से महुए का बरसना
इतिहास की सबसे भयानक घटनाओं में शुमार हो
सकता है।
“धत्त! कोरी बकवास है यह, नहीं बनती बिना महुए की कोई भी शराब”!
असमंजस और आश्वस्ति के बीच पड़ी लड़कियाँ
बीनती रही महुए के फूल!
तब तक…
जब तक कि महुए के ढेर से बना नहीं लेतीं अपने हिस्से जितनी धरती।
और.. अपने डूबने -उतराने जितनी महुआ- शराब की एक छोटी सी नदी!
और ,इसमें आश्चर्य ही क्या कि
बाजारवाद के युग में महुए की बेटियाँ जानती हैं कि कृत्रिम रंगों और गंधों के प्रयोग से बदला जा सकता है
महुए की शराब का महुए की शराब की तरह लगना।
xxxxxxxxxx
सरे बाजार उम्दा शराबों के सबसे अज़ीम खरीददार,
जो है उसे उसके न होने का भ्रम खरीदते
चख लेना चाहते हैं लड़कियों की आँखों से झरती नमी की शराब!
वे उम्दा चमकती बूंदें जिनके पीछे छुपी है महुए की शराब!
महुए की बेटियों के मुख से स्वतः ही फूटने लगता है महुए का मृतप्राय गीत!!
-सविता पांडेय
प्रकाशित: जनसत्ता

मन्नू भंडारी के लिए-

..” बस, मुझे लिखना है!”
…”मैं लिखना चाहती हूँ!”
 
किसी लेखिका (जो लेखिका जैसी नहीं लगती) के कॉपी के 
पन्नों से निकल हवा में तैरते ही हैं ये शब्द ,
…कि उन्हें ढँक लेते हैं 
  जूट के परदे!
परदे, जिनपर उकेरे हैं खूबसूरत हस्त-चित्र।
और, क्या बात है!.. कि
ये चित्र ,उन्हीं हाथों ने बनाए हैं
जिन्होंने लिखे हैं ये शब्द!
 
घर-परिवार के लोग, छात्र-छात्राएँ, दोस्त, पार्टियाँ, अलग-अलग तरह की कटोरियों में सजी तरह-तरह की सब्जियों में रंग, गंध और मसालों की तरह घुल-मिल जाते हैं ये शब्द!
 
….और …अहा! …कि
उन्हीं हाथों ने उतने ही मन से बनाए हैं ये राजस्थानी- व्यंजन कि जितने मनोयोग से लिखे हैं ये शब्द
..” बस, मुझे लिखना है!”
…”मैं लिखना चाहती हूँ!”
 
….और…और..
यही सच है कि
न्यूरोल्जिया, एग्जिमा,डिप्रेशन, नॉन-कनेक्टिविटी, स्ट्रोक…., 
 जैसे नकारा शब्द,
मार देते हैं सृजनशील और सकारात्मक शब्दों को!
आहिस्ता!आहिस्ता!
 
शब्द, जो उनकी लेखिका की
आँखों, शरीर, जुबान और हाथों की तरह धुंधलाते, बुढ़ाते ,लड़खड़ाते,टूटते-फूटते
रहते हैं!
 
शब्द, जिनमें छुपी हुई है 
एक संक्रामक टीस कि
…वो बस, लिखना चाहते हैं!
 
            -सविता पांडेय
प्रकाशित: हंस

मृत्यु और प्रेम

दुनिया के सबसे सुंदर गीत मार दिए गए,
अजन्मी लड़कियों के साथ!
ये प्रेम संबंधों की जायज संतानें थीं जिनकी मृत्यु ,
उनके होने से पहले से ही तय थी !
इस तरह प्रेम और मृत्यु की साझेदारी सिर्फ प्रेम कहानियाँ ही नहीं बनातीं,
असौंदर्य भी बनाती हैं,
दुनिया के सबसे सुंदर गीतों के बिना!!
– सविता पांडेय
प्रकाशित: जनसत्ता

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