Wednesday, May 29, 2024
सीमा संगसार , सम्प्रति अध्यापन प्राथमिक विद्यालय
जन्म तिथि – 02 – 12 – 1978
पता – फुलवरिया 1, बरौनी, बेगूसराय , बिहार
 
प्रकाशित रचनाएँ – एक शहर का जिन्दा होना ( कविता संग्रह) लोकोदय नवलेखन सम्मान से सम्मानित
अन्य रचनाएँ – अंतरंग , नया ज्ञानोदय , नया पथ , लहक , लोक विमर्श, दुनिया इन दीनों , इन्द्रप्रस्थ भारती ( हिन्दी अकादमी ) , मंतव्य , स्त्री काल , आधी आबादी एवं हिन्दुस्तान सहित तमाम पत्र पत्रिकाओं में एवं शब्द सक्रिय हैं , पहली बार , लिटरेचर प्वांइट, बिजूका आदि ब्लॉगों में प्रकाशित ।
सम्पर्क ईमेल – [email protected]

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कविताएं

सम्पूर्ण पुरुष

समंदर जैसे सीने में
न जाने कितने बूंदे हैं 
आंसूओं के
जिसे छुपा कर रखना
तुम्हारी नियति है
गोकि तुम्हें बनना है
कछुए की कठोर पीठ..
 
इस कठोर पीठ पर सवारी करते हुए
मैं भूल जाती हूँ कि
उसके नीचे दबा है 
खरगोश की तरह 
एक मुलायम दिल 
जिसकी छोटी छोटी आंखों में
भरा है ढेर सारा प्रेम
जिसे तुम कभी जताना नहीं चाहते
 
तुम चाहते हो कि 
बिना कहे ही मैं 
जान लूं तुम्हारा सच …
 
तुम्हारी सारी मुलामियतें
छुप जाती हैं
इन्हीं कठोर आवरण के नीचे
जिसे तुमने ढोया है जबरन
अपनी पीठ पर …
 
स्त्रियां जी लेती हैं अपनी जिन्दगी
आंसूओं के प्रवाह में बहते हुए
तुम चट्टान बन कर खड़े हो जाते हो
उन सैलाब को रोकने के लिए
 
जबरन थोपने की कला 
तुम खुद पर ही आजमाते रहते हो
आओ न एक दिन सब भूल कर कि 
तुम एक पुरुष हो
और बिना स्त्री बने ही 
सोख लो सारे दुख 
अपने कठकरेज पर …
 
यकीन मानो तुम्हारी सहनशीलता
प्रसव पीड़ा को भी पार कर जाएगी उस दिन
आओ मेरे पास बैठ कर रो लो एक दिन
भूल कर कि तुम एक पुरुष हो
एक सम्पूर्ण पुरुष बन जाओगे…
 
अपनी मानवोचित करुणा और त्याग के साथ 
तुम थोड़े थोड़े पुरुष बन जाना 
थोड़ी थोड़ी स्त्री बन जाना
या फिर बस तुम बन जाना …
 
गोकि तुम जैसे हो बस तुम हो मेरे लिए …
#संगसार

तुम्हारी पीठ

पीठ अवलंबन का केन्द्र बिन्दु ही नहीं
अपितु सांसों की भूमध्य रेखा भी है
जिसके आरोह अवरोह से
स्पंदित होती है यह.धरती
तुम्हारी पीठ
इस दुनिया की सबसे आरामदायक जगह है
जहाँ मैं अपना सिर टिका कर
भूल जाती हूँ दुनियावी प्रपंचों को 
 
जब भी अपनी अंगूलियों से उकेरती हूँ 
तुम्हारी पीठ पर कुछ अस्फुष्ट शब्द
तुम्हारी तरंगें ढूंढ् लेती हैं
उन धूमिल शब्दों के अर्थ
तुम्हारी पीठ सिर्फ मेरे सिर टेकने की जगह नहीं
लाड़ जताने का एक जरिया भी है 
 
गंगा के मैदानी इलाकों की तरह
तुम्हारी पीठ भी कहीं चिकनी तो कहीं उबर खाबड़ है
इस बालूई मिट्टी में जब तपती हुई धूप
स्वर्ण की तरह चमचमाती है
मेरा भरोसा उतना ही तपता जाता है
 
जैसे बेफिक्र होकर 
एक रेल धड़धड़ाती हुई चली जाती है
पुल के उस पार 
मैं उतनी ही धंसती चली जाती हूँ
तुम्हारी पीठ के सुरंग में…
#संगसार

एक हूक सी उठती है

तुम वक्त को इतना लंबा खींचते हो
कि मैं उन के मध्य
एक रिक्त स्थान की भांति
ठहर जाती हूँ
 
ठीक वैसे ही जैसे
तार की खींची हुई 
पतली शिराओं के मध्य
हुकनुमा चिमटा लिए हुए
करती रहूं प्रतिक्षा
 
उस घड़ी की 
जब मैं उन शेष काल पर
अपनी उपस्थिति की हूक को टांग सकूं
तुम्हारी वक्त की पीठ पर 
 
तुम्हारी बातें लंबी सांसों की
आरोह अवरोह है
जो विश्राम पाती है
मेरी धमनियों में
 
तूम्हारी बातों का वह सिरा
कभी पकड़ नहीं पाती
जिसे तुमने छेड़ दिया था
मुझे रिझाने के लिए
काश कि तुम पतंग होते
मैं माझे में लपेट कर रखती तुम्हें
 
तुम्हारी बातों के वियावान में
मैं और भी सरकती जाती हूँ
तुम्हारे समीप 
 
राहुल सांकृत्यायन जैसे 
घुमंतू साहित्यकार का दर्शन
और क्रांतिकारी नेरूदा 
की प्रेम कविताएं
 तो एक बहाना है
मेरे समीप आने की …
 
एक ही वक्त में तीनों काल की सैर कराते वक्त
तुम भूल जाते हो कि
मैं तुम्हारी बाल्यावस्था में ही अटक कर रह जाती हूँ
ठीक उसी हूक की भांति
जो फंसी रह जाती है
तुम्हारी कारस्तानियों में 
 
लंबी रहगुजर से गुजरती हुई
एक हूक सी उठती है कि
तुम वही काफिर हो या न हो 
#संगसार

कच्चापन

जीवन के कुछ अनुभव
कच्चे होते हैं
बिल्कुल खिज्जे अमरूद की तरह
जिसका हरापन भी
उतना ही कच्चा होता है
जितना कि उसका बीज …
 
आवरण भले ही कड़ा हो
लेकिन भीतर सब कुछ मुलायम होता है
कच्चापन जीवन का एक स्वाद है
जो कि हमेशा कड़वाहट लिए होता है …
 
फिर भी लोग पके अमरूद पसंद नहीं करते
क्योंकि जीवन का घुलघुलापन 
उन्हें कभी रास नहीं आता
पके हुए फल अक्सर टपक जाया करते हैं ज़मीन पर
लेकिन कच्ची अमिया या कच्चे अमरूदों को
तोड़ने की लगाई जाती है जुगत …
 
तो क्या यह मैं मान ल़ूं कि
हमारी जीभ कसैलेपन की आदी हो चुकी है?
या फिर हमें अभी भी पके फलों की मीठास चाहिए?
इस रंग बदलती दुनिया में
सब कुछ हरा ही नहीं होता
एक दिन पीले पड़ जाते हैं लोग ….
#संगसार

पहली बारिश

पहली बारिश पहले प्यार जैसा अनछुआ होता है
सड़कें भीग कर सुकुमार हो जाया करती हैं
अपनी फिसलती त्वचा पर भीगी लटों को संवारती हुई
न जाने कब मन  कीचड़ कीचड़ हुआ जाता है…
 
भीगना क्या है अकस्मात अपने आपको डूबो देना
कल कल करती हुई 
एक नदी बहती है हमारे तुम्हारे बीच
जिसकी आवाज बाहरी कोलाहल में
मंद पड़ जाती है..
 
कभी ध्यान से सुनना
जल की ध्वनि में एक नवजात शिशु का क्रंदन सुनाई देगा
प्रेम जीवन को जन्म देता है और जीवन प्रेम को
बरसात उर्वर धरती को सींचता है
 
भीगता हुआ जंगल उत्सव है जीवन का
प्रेम की बेला में जैसे नाच उठते हैं हम तुम
हुलस उठती है नीम की कच्ची पत्तियां
जैसे जन्मी हो अभी अभी इस धरा पर..
 
विहंसते हुए तुम जब उतारते हो अपनी गीली पीठ से
भीगी हुई कमीज सिकुड़ी हुई मांसपेशियों की तरह
सिमट जाया करती है मेरी हथेलियों पर
मैं तुम्हें पसार देना चाहती हूँ अलगनी पर
ताकि तुम बन सको एक नरम मुलायम तकिया
जो पूरी तरह से सुखाया जा चुका हो
नरम धूप में …
 
देहरी लांघते हुए जब भी तुम मेरे बदन को छूते हो
मेरे तन का एक एक कतरा बारिश की बूंद बन जाती है
तुम्हें भीगना पसंद है न
और देखो मानसून ने दरवाजे पर दस्तक दे दी है
जाओ भीग लो एक बार पूरी तरह
और सुनो ऐनक उतार कर जाना 
नहीं तो खामख्वाह किताबों में छपी काली बूंदे धुंधला जाएगी
और नाहक ही तुम मुझ पर गुस्सा करोगे ..
 
आकाश को तकती हुई
तुम्हारा इंतजार करुंगी
कब वह काली रोशनाई छिड़क कर नीली होगी 
और तुम लौट आओगे मेरे पास नीली कमीज को भीगा कर
 
मैं अपनी नरम हथेलियों से 
आग में सेंकते हुए
देखूंगी तप्त अंगीठी पर
गरम भुट्टों को पटपटाते हुए
तुम उस पर नींबू और काला नमक रगड़ कर खाना
 
मैं देखती रहूंगी भुट्टे को पॉपकर्न बनते हुए
 
पहली बारिश का बरसना कुछ कुछ ऐसा ही होता है
जैसे कि तुम मेरा पहला पहला प्यार हो 
#संगसार

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किताबें

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