Wednesday, April 24, 2024
....................

सीत बैजंती मिश्र

वर्तमान में फिल्म लेखन में सक्रिय। उपन्यास- रूममेट्स प्रकाशित, कई पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं, कहानियां और लेख प्रकाशित।

…………………………..

कविताएं

तुम नौकरी में थे

तुम्हारी व्यस्तता छीन लेती थी
मेरे हिस्से का वक्त
देर रात लौटते ही
नींद का खुमार तुम पर छा जाता था
नहीं करना चाहते थे बात
तुम नहीं सुनते थे मुझे
हरारत में तुम, तुम नहीं रहते
उस वक्त मेरे हिस्से में आता था
तुम्हारा गुस्सा, तुम्हारी झल्लाहट
पूरे दिन घर में बंद रहने के बाद
मैं चाहती थी खुद को तुमसे बांटना
अपनी बेरोजगारी का दर्द
इस समाज के प्रति
अपनी खीझ और झल्लाहट भी
लेकिन सबकुछ खुद में समेटे
मुझे चुप्प रहना था
क्योंकि तुम नौकरी में थे
तुम्हारी नींद ज्यादा जरूरी थी
तुम्हारी थकान ज्यादा महत्वपूर्ण

तुम नौकरी में नहीं हो

खफा हो समाज से
लानत भेजते हो नाकाबिल-ए-बर्दाश्त लोगों को
तुम्हें सारी चीजों पर गुस्सा आता है
मेरी बातें तुम्हें खफा कर देती हैं
सबकुछ तोड़ देने और नष्ट कर देने की हद तक गुस्सा
तुम दुनिया को तबाह कर देना चाहते हो
जिंदगी को बेमानी बताते हो
और जला देना चाहते हो सबकुछ
जो कभी नहीं जलता
लेकिन हमारे बीच लगातार कुछ राख हो रहा है
मैं फिर चाहती हूँ, खुद को तुमसे बांटना
लेकिन अब तुम नौकरी में नहीं हो
तो तुम्हारा गुस्सा जायज है
तुम्हारा दुःख बड़ा है
और तुम्हारा दर्द सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण

प्रेम की परिभाषा

प्रेम की नई परिभाषा गढ़ी उसने
साथ रहना, सोना, खाना-पीना प्रेम नहीं
दैनिक जीवन का हिस्सा है
बढ़ती उम्र के साथ जिस्म की भी जरुरत होती है
और उसे प्रेम का नाम देना गलत है
जरुरतें प्रेम की दिशा तय करती हैं
जब मां की जरुरत थी तब सिर्फ मां से प्रेम था
जब शारीरिक जरुरतें जागी
तो प्रेम का दायरा व्यापक हुआ और मेरा प्रेम तुम तक सिमट गया
फिर सामाजिक जरुरतें जाग्रत हुई तब पत्नी से प्रेम हुआ
लेकिन बच्चों के जन्म के साथ
प्रेम दूसरी दिशा में प्रवाहित होने लगा
उनमें से कुछ रिश्ते आज भी मुझमें पल रहे हैं, कुछ मृत भी हो गए।
लेकिन क्या फर्क पड़ता है जीवन मजे में है।
जब जरुरतों की सीमाएं नहीं, तो भला प्रेम की क्यों हों?
प्रेम और जरुरतें फिर बदलने लगी हैं
समझ रहा हूँ अभी, फिर समझाउंगा तुम्हें
प्रेम की नई परिभाषा।।

जय -जयकार

सुनो
एक काम करते हैं,
तुम मुझे बदनाम करो
हम खुद को तुम्हारे नाम करते हैं
तुम हमें बहलाओ और दुत्कारो भी
हमें चुभलाओ और करो दारोश भी
दुर्गा कहकर कुचलो पैरों तले
लक्ष्मी कहकर छीन लो जीने का अधिकार
हम वंदना करेंगे तुम्हारी
पुजेंगी तुम्हें
सौन्दर्य का ताज पहनाकर कैद करो
बेड़िया डालो रूढ़ियों की
हवाला दो शास्त्रों का
बांध लो बाहोपाश में
और खींच दो लक्ष्मण रेखा
काट दो हमारे पंख
हम उफ्फ तक नहीं कहेंगी
टूटकर चाहेंगी तुम्हें
तुम्हारे अंश को खुद में पालेंगी
देंगी तुम्हें बाप बनने का गौरव
तुम हमपर लांछन लगाना
फिर भी तुम्हारा गुणगान करेंगी हम
कृतज्ञ रहेंगे तुम्हारी, आजीवन आभारी भी
अब भी तो सांसे चल रही हैं हमारी
तुमने हमारा अस्तित्व कुचला
लेकिन हमें मिटाया नहीं
हम इसे अपनी नियति मानते हैं
हमारे नियंता हो तुम
तुम्हारी जय-जयकार हो ।।

साथ

सुनो…
एक बार फिर लौटकर आना तुम
पूछना प्रेम करोगी मुझसे
मैं इनकार कर दूंगी
तुम फिर इजहार करना कई बार
लेकिन इस बार तुम इजहार करते-करते हार जाना
और मैं इनकार करते हुए जीत जाऊंगी
 
समय और हालात के उलट
हम बदल लेंगे अपनी परिस्थितियां
खीज, नाराजगी और गमों से लदे हुए
कुछ एहसास जो तुमसे परे रहे
कुछ हसरतें जो मेरी अधूरी थीं
उन्हें हम जिएंगे अलग-अलग
अपने-अपने तरीके से।

प्रेम

किसी समय जब तुम प्रेम में डूबे हो
और अचानक जेहन में कौंधता है पुराना प्रेम
जो कभी पुराना नहीं पड़ा
खयाल यह भी रहता है
कि तुम अपनी पत्नी के बाहोपाश में हो
वह एक याद तुम्हें शिथिल कर देगी
तुम्हारा ह्दय बीते प्रेम में डूबने लगेगा
लेकिन तुम्हें फिर याद आएगा वर्तमान
जिसे तुमने जकड़ रखा है भुजाओं में
समय को भूला देने की चाहत में
तुम बंद कर लोगे अपनी आँखें
और खुद को खोने दोगे वर्तमान में
यह समझकर कि वह कभी पुराना नहीं पड़ने वाला प्रेम है
उसका साथ निबाहना है आजीवन
तुम उसे ऐसे महसूस करोगे जैसे किसी और को महसूसा
ऐसे प्रेम करोगे जैसे किसी को और किया
स्मृति में प्रेयसी को लिए
डूब जाओगे
उसी तल्लीनता के साथ पत्नी-प्रेम में।
 
शायद मैं समझ जाऊं तुम्हारी बेबसी
और सारे इल्जाम वापस रख लूं।
या कि तुम समझ जाओ मेरा दर्द
फिर हम चल पड़े साथ-साथ।
…………………………..

किताबें

…………………………..
error: Content is protected !!