Wednesday, April 24, 2024

सोनी पांडेय

सोनी पाण्डेय का जन्म बारह जुलाई को उत्तर प्रदेश के मऊ नाथ भंजन जिले में हुआ।आपके पिता श्री शेषमणि त्रिपाठी इण्टर कालेज में प्रधानाचार्य एवं माँ श्रीमती तारा त्रिपाठी गृहणी हैं।पाँच भाई-बहनों में माता-पिता की तीसरी कन्या संतान सोनी की शिक्षा एम.ए.(हिन्दी),बी.एड.एवं पी.एच.डी. तक है। अब तक कुल छः पुस्तकें प्रकाशित हैं।"मन की खुलती गिरहें" और "आखिरी प्रेम- पत्र " कविता संग्रह तथा "बलमा जी का स्टूडियो",तीन लहरें,एवं "मोहपाश" कहानी संग्रह हैं।निराला के कथा साहित्य पर एक आलोचनात्मक पुस्तक भी प्रकाशित है।यशपाल कथा सम्मान एवं शीला सिद्धांतकार कविता पुरस्कारों से पुरस्कृत सोनी की रचनाएं हिन्दी की सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित है।

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भात

सोनी पांडेय

उसे याद आ रहा था रह -रह कर माँ का चलते रहना,सुबह से देर रात तक पूरे घर में साढ़े चार फीट ऊँची, सुडौल देह -धाजे वाली माँ का गोरा-चिट्टा चेहरा देख आजी मुँह बिचका कर कहतीं- एगो रंगवे भर त है ना त खेद देले रहतीं नइहर। " आजी और माँ में पूरे जीवन कभी पटरी नहीं बैठी।लम्बी-चौड़ी आजी में माँ जैसी दो स्त्रियाँ समा जाएं, ऐसी थी आजी और अपार धैर्य सीने में सहेजे खटती -पिटती माँ।उसे याद आ रहा है... आँगन में लल्लू ने दाना छींट दिया है...पूरे आँगन में चने का दाना डगर -मगर लुढ़क रहा है... अरे राम हो राम! इ अन्न क दुरगति देखा। कहाँ हो बाबा जी बो!.... धबड़ -धबड़ लल्लू की पिटाई और हुआँssss हुआँ के तीव्र स्वर के साथ उसका रुदन।पिताजी का दुवार से आँगन में प्रवेश और भण्डारे में कुछ फटकती -पछोरती माँ।आजी का एक मन उलाहना और तमतमाते हुए पिता का माँ पर हाथ -लात चलाना , पूरे घर में सिसकती माँ की हिचकियाँ। माँ के साथ -साथ भाई  का रोना और अन्त में माँ की छाती से सटकर चुप हो जाना फिर बैल की तरह माँ का काम में जुट जाना।पिता को शिकायत रही जीवन भर कि बौनी लड़की से शादी हो गयी।दादी का दुख की जो लड़कियाँ जनी तो बौनी न हो जांए।इन तमाम दुखों के बीच माँ ने चार सन्तानों में एक भी बौनी औलाद नहीं जना।सब हट्टे -कट्टे छः फुट्टे,उसका श्रेय भी आजी को ही जाता कि उसने बड़े देवता- पित्तर पूजे थे।                                       बस हिचकोले खाते किसी गढ्ढे से निकलती है तो उसकी तन्द्रा टूटती है।आँँखो से अविरल धार बह रही है।आँचल से पोंछ कर खिड़की से बाहर देखती है।मौसम आज कुछ ठण्डा है...आसमान में बादल घिर रहे हैं।स्मृतियों के कपाट रह -रह कर खुल रहे हैं। हे गोपालगंज वाली!देखो त छत पर रहर भींग रहा है। इ डुमरांव नरेश की बेटी तान कर सोई हैंं का ? आजी दुवार से चिल्लाते घर में घुसती हैं। छोटी बहन को चारपाई पर रोता छोड़ माँ छत पर भागती है।उठाते- उठाते पानी की धार और रहर का भींगना।पिता का छत पर आना और फिर वही लात- हाथ।अभी तीन महीने ही तो हुए थे उसे बेटी जनमें।आजी छाती कूट- कूट चौखट पर बैठ रोई थीं।बेचारी छोटी को जीते जी आजी ने कभी गोद में नहीं लिया। कितना तो भरा है हलाहल,...आकण्ठ हलाहल।वह जार-जार रोती है चलती बस में।बगल में बैठी बूढ़ी औरत सांत्वना देती है।यही दुनिया की रीत है बेटी!..जो आया है सबको एक दिन नौ मन चइली पर ही राख होना है, पर माया जो न कराये।वह थोड़ी संयत होती है...सोचती है ,कैसे जान लिया इस औरत ने बिना कहे कि मैं मृत्यु के शोक में हूँ।कितना अजीब है न औरतों का एक दूसरे का दुख समझ लेने की अनुभूति।  पिता की नफरत और आजी के उलाहनों के दो पाटों में माँ आजीवन पिसती चली गयी ,पीछे छूट गया भरा -पूरा परिवार।वह सोचती है ...क्या माँ के बाद भी उन्हें वैसे ही तीज -खिचड़ी,सावन ,आद्रा में याद किया जाएगा? मन में एक हूक उठती है....हूं! जिस पिता ने कभी सिर पर स्नेह से हाथ नहीं रखा ,उससे क्या उम्मीदें।भाई पहले ही साड़ी कपड़े के नाम पर बहनों को लालची और अँचार -चटनी देते देख चटोरी घोषित कर अपमानित करते रहे,अब तो यह स्नेह भी खत्म उस आँगन से जहाँ जन्म ले पलीं -बढ़ीं।उसका दिल तरह -तरह की कल्पनाओं में उफन रहा था।                                               बारिश छूट गयी है,बस के यात्री खिडक़ी का शीशा बन्द कर रहे हैं।बीच- बीच में कन्डेक्टर यात्रियों को उनके स्टापेज पर उतार रहा है। दर्द का रास्ता और विरह की रात कटती ही नहीं है,रास्ता जैसे पहाड़ सा होता जा रहा है।मन में खीझ उठती है..इ बस है की बैलगाड़ी, हर पाँच मिनट में रोकता,चढ़ाता,उतारता चल रहा है।पति के सेना में सिपाही होने से वह बच्चों को पढ़ाई के लिए अकेले ही ले शहर में किराए के मकान में रहती थी।आज माँ की बीमारी की खबर सुन बच्चों को रिश्तेदार के पास छोड़कर झटपट भागी थी।पिता ने जिन शब्दों में फोन पर खबर दी थी उससे उसे माँ के अब इस दुनिया में न होने की गन्ध अनायास ही मिल रही थी।बेचैनी की हालत में वह घर से निकल पड़ी थी। ह्रदय दर्द से फटा जा रहा है...इस सावन को भी आज ही इतना बरसना था?इस साल आधा सावन सूखा रहा और आज ना जाने कहाँ से इतने बादल उमड़ आए थे आकाश के सीने पर और हहर -भहर- बरस रहे थे।सोचती है...सावन से माँ को बहुत प्रेम था,चूड़िहारिन से भर -भर हाथ हरी चूड़ियाँ पहनती थी माँ ,फेरी वाले से हरी साड़ी मोल- तोल कर लेती और भर सावन पहनती।कूटते -पीसते ,माजते -धोते  सावन के गीत गुनगुनाती ,गाती.... कजरी केही संग खेलूं मोरी सखियाँ पिया मोरे गये विदेसवा ना...... कितना प्रेम था इस सावन से माँ को....अरूई के पत्ते का रीकवच,महुवे का लाटा,पुआ और अदउरी कोहड़े की सब्जी खूब मन से बना गरम -गरम पूड़ियों संग भर -भर पेट खिलाती ।जाँत में चने का बेसन पीसती ,ओखल में दाल छांटती ,मधुर कण्ठ से कजरी गाती ।हरी सूती साड़ी पर पीले सरसों के फूल की छाप सी तो कभी कोहबर में हल्दी ,गेरू ,चन्दन की गन्ध सी मोहक माँ।वह फिरसे फूट -फूट कर रोती है।यात्री सांत्वना देते हैं...कंडेक्टर अब यात्रियों से जल्दी उतरने -चढ़ने को कहने लगा है।समझ रहा है कि अब मुझसे यात्रा असहनीय हो चला है। बस की रफ्तार भी कुछ पहले से तेज हुई है।कुछ पहचाने हाट बाजार दिखने लगे हैं धीरे -धीरे। गाँव भी दीखने लगा है...कलेजा धौंकनी की तरह धड़क रहा है,दर्द के ताप से झुलसती वह तड़प उठती है।वह कैसे देखेगी माँ का मृत चेहरा...आज पहली बार माँ उसकी नजर उतारते हुए धार नहीं देगी।उसके चेहरे को देख कर दुबले होने का उलाहना नहीं होगा...आह! sss कैसे वह सहेगी यह वेदना ,सोचती है और छाती को कसकर  मींजती है।कंडक्टर आवाज देता है..महुवारी आ गयाsss चलो उतरो ...चलो उतरो.....। वह साहस बटोर कर अपना छोटा सा बैग पकड़ बस की भीड़ को धक्का देते जैसे -तैसे उतरती है।गाँव अभी भी एक कोस दूर है ,वह पगडंडियों का सार्टकट रास्ता पकड़ तेजी से आगे बढ़ती है..कुछ दूर आगे बढ़ते ही बस्तियाँ दीखने लगती हैं,वह चमरौटी से होकर निकलती है...यह रास्ता सीधे उसके घर तक जाता है।लाठी टेके बूढ़ी मंगइ बो धीरे -धीरे चली जा रही हैं।उसे देखकर ठिठकती हैं...आँचल मुँह में ठूस लेती हैं...वह उन्हें पकड़ कर खूब रोती है।गाँव की पहली स्त्री की छाती से सटी वह ऐसे बिलख उठती है जैसे पहली विदाई में माँ से।मंगइ बो समझा बुझा कर ले चलती हैं टोले की ओर...उसे याद आता है ...मंगइ बो की दावेदारी पूरे टोले के बच्चों पर है।सबका नार इन्होंने ही काटा है।बहुत जसी हाथ..एक भी मुआछ(मृत्यु) नहीं।सारे शिशु हँसते -खिलखिलाते जवान हो गये।इन दिनों नई बहुएँ शहर जा रही हैं...हर किसी का पेट काट बच्चा पैदा होते देख वह बहुत दुखी रहने लगीं हैं।औरतें देह नास रहीं हैं का दुख लिए वह अब कम ही घर से निकलती हैं किन्तु आज का दुख उन्हें इधर ले आया है।हम चार भाई- बहनों के सात बच्चे और भरी- पूरी माँ की कोख की अक्सर बलाएँ उतारने वाली गाँव की जाय माँ मंगइ बो मेरा हाथ थामें चली आ रही है दुवार पर,पीछे औरतों का हुजूम।सामने दरवाजे पर चद्दर से ढ़की माँ की मृत देह ,पास में विलाप करती छोटी बहन।मुझे देखते ही भाईयों की आवाज आती है--अब जल्दी से नहलाओ धुलाओ सब!  देर हो रही है।  सब मेरे इन्तजार में थे...मैंने काँपते हाथों से मुँह से चद्दर हटाया....भर माँग पीला सिन्दूर, लाल बिन्दी... हरी साड़ी और कलाईयों में आज भी हरी- भरी चूड़ियाँ, चेहरे पर हल्की मुस्कान संग चीर निद्रा में सोई माँ  के गालों को छोटी थपथपा कर जगाना चाहती है।छोटी सबसे छोटी माँ की संतान... चालीस की उम्र में एक और बेटे की चाहत में पैदा हुई अनचाही संतान।अभी पिछले साल ही इसकी शादी की थी माँ ने।कितनी खुश थी कि अब बेटियाँ ब्याह गयीं,सावन में गंगा नहाएगी।पता नहीं यह भी उसका सपना पूरा हुआ या नहीं।दोनों भाभियाँ हमें परे हटा माँ को चौकी पर उठवा कर ले गयीं, हम वहीं धरती पर पड़ीं रोतीं-बिलखतीं बेटियों के कान में पिता की रौबदार आवाज पड़ती है...अच्छा अब बस करो तुम लोग,जो होना था हो चुका...अम्मा की विदाई की तैयारी कराओ मिलकर। विदा शब्दकोश का सबसे क्रूर शब्द तीर सा चुभता है कलेजे में।माँ की यह अन्तिम विदाई पिता के लिए कितनी सहज प्रक्रिया है,देख रही हूँ।वह सबसे बोल-बतिया रहे हैं,बिना किसी शोक के।जैसे माँ का जाना उनके जीवन से कोई कमी नहीं होगा।वह सिर पकड़ लेती है...उफ्फ!...यदि माँ की जगह आज यहाँ पिता की लाश होती तो क्या माँ भी इतनी ही सहज होती?....नहींssssनहीं!उसकी तो दुनिया ही उजड़ जाती...सुहागने छूने से ड़रतीं,एक अभागी स्त्री का ठप्पा लिए बाकी जीवन किसी उजाड़ खण्ड की बखरी सा उपेक्षित हो जाता ,पर पिता तो पिता हैं....लोग कह रहे हैं... भागवाले पत्नी को कंधा देते हैं। बुआ लोग समझा -बुझा हमें वहाँ ले गयीं जहाँ माँ को भावजें नहला रहींं थीं। चादर का पर्दा मरदों की तरफ तान कुछ औरतें खड़ी थीं तो कुछ भावजों को क्या करना है समझा रहीं थीं।बगल की बड़की अम्मा ने आदेशित किया -"बाल्टी की पानी में कुश ,गंगा जल ड़ाल दो और हाँ पाव भर शुद्ध घी जरूर ले लेना देह में लगाने को नहीं तो सूख गयी तो ठीक से जलेगी नहीं देंह।" बड़ी भाभी कैंची से देंह के कपड़े काट गहने उतार रही थी...छोटी गहनों को गिन कर जिठानी को बता कम चेता ज्यादा रही थी कि छः थान गहना निकला है...दो चाँदी,चार सोना।बड़ी ने जलती आँखों से दाँत पीसकर जवाब दिया--"भाग नहीं रही हूँ लेकर,बाउजी हिसाब करेंगे की क्या होगा इसका।" छोटी कुछ सोच कर चुप रह गयी...शायद मृत्यु की बेला,वरना वह इतनी संतोषी नहीं थी कि जिठानी को एक जौ रखने दे बिना बांंटै। माँ दोनों के व्यवहार से दुखी थी,छोटी आए दिन अलग होने का नारा लगा घर में कुहराम मचाती और बड़ी सीधे ससुर से जा लहरा आती कि माँ ने सिर चढ़ाया है।पिता सबको छोड़ माँ से लड़ने बैठ जाते।यह सब माँ से असहनीय होता जा रहा था और इसी दुख ने उसे  मात्र साठ की उम्र में हमसे छीन लिया। खैर लोकलाज के भय से भावजों ने माँ को नहला -धुला कर तैयार कर दिया ,हमें इस काम से बड़की अम्मा ने दूर रखा यह कहते हुए कि यह बहुओं का काम है,बेटियों के छुए मुक्ति बिगड़ जाएगी।लाल चुनरी में माँ को खूब अच्छे से उन बहुओं ने आज सजाया था जो जीते जी पानी देने के लिए भी एक दूसरे का मुँह देखती थीं।पिता ने पण्डित के कहने पर माँग में पीला सिन्दूर भरा और पिण्डा पार अर्थी उठी।छोटी दौड कर अर्थी से लिपट गयी,बड़े भाई ने उसे बड़ी मुश्किल से अर्थी से अलग किया, सभी रो पड़े...माँ की पेटपोछनी औलाद।अभी तो बीस साल की ही है बेचारी... बी.ए. इसी साल पूरा हुआ और उन्नीसवें में ब्याह भी दी गयी। हम बेटियों के हिस्से चाह कर भी मन की शिक्षा नहीं रही,इण्टर में ही मेरी शादी कर आजी ने गंगा नहाया।आजी तो पिता की जंघा पवित्र करना चाहती थीं मेरा बाल विवाह करा ,पर शुक्र है कि पिता के लाख अत्याचार को सह कर माँ अड़ गयी कि बिना जवान हुए लड़की नहीं ब्याही जाएगी।साल भर आजी माँ से मुँह फुलाए बैठी रहीं।बात -बात पर अपमान सहती माँ ने पढ़ना -लिखना भाईयों से चिट्ठी-पतरी भर ही सीख पाया था किन्तु घर के काम निबटा चुपके से अखबार लेकर बैठ जाती पढ़ने और हमें भी पढ़ने को कहती।सोचती हूँ कि माँ को बागी बनाने वाला अखबार ही था जिसमें वह स्त्रियों के स्वास्थ्य सम्बंधित कालम खूब मन से पढ़ती थी।यह अखबार ही था जिसने हमारे जीवन में उजास भरा ,वरना माँ का मौन हमें वहीं पटकता जहाँ माँ का जीवन था और इस तरह जाना कि शिक्षा की लौ स्त्री मुक्ति के लिए सबसे जरूरी तत्व है। माँ की अर्थी उठने के साथ ही दरवाजे से भीड़ छट गयी,टोले के पुरूष दाह -संस्कार के लिए गंगा जी चले गये,औरतें नहाने -धोने चली गयीं। दोनों भावजें बेटियों की मदद से घर -आँगन धोने -पोतने में लग गयीं। माँ का बिस्तर, पहना कपड़ा गठ्ठर बना कर बड़ी  भाभी गढ़हे मेंं फेंक नहाने बैठ गयीं....छोटी नहा चुकी थी,अपने बच्चों को रसोईं का बचा खाना जल्दी-जल्दी खिलाने लगी तो बड़ी भड़क उठी----अरे! घर में अउर लइका छेहर हैं, तनी उनका भी खयाल रहे,अब चूल्हा में आग कल सांझ से पहले नहीं जलेगा। छोटी झनकते हुए अपनी कोठरी में चली गयी..हं...हं हमारे बच्चे तो दलिद्दर हैं,पूरा घर ठूस जाएंगे।हमारे बच्चे सबकी नज़र में धसते हैं।बहुत सहा,अब बीते तेरह दिन,चौदहवां नहीं होगा दीदी! वह ललकारती -फुँफकारती अपनी कोठरी में चली गयी।बड़ी दो मिनट सुन्न रही,नल चलाती तेरह साल की बड़ी भतीजी अचानक जोर -जोर से रोने लगी।मैं हिम्मत कर आँगन में पहुँची।मुझे देख भाभी भी विलाप करने लगी।एक अज्ञात भय ने हम हब को घेर लिया।मैं अन्दर ही अन्दर डर से काँपने लगी...तो क्या माँ की अर्थी के साथ ही घर की एकता भी चली गयी? बड़ी भाभी को नहला बड़ी मुश्किल से मैं सम्हाल पाई आज...बड़की बीबी! अम्मा को दिया वचन कैसे पूरा करूँ?अब आपही लोग बताइए।इ महरानी तो हमेशा बात बिगाड़ने में लगी रहती हैं।किसी की जायज-नाजायज एक भी बात बर्दाश्त नहीं।आखिर हम भी कितना सहें? बड़ी भाभी ने सिसकते हुए हम दोनों बहनों से कहा। आप बड़ी हैं भाभी, छोटी तेज तो है ही।इसमे किसी को शक नहीं लेकिन सम्हालना तो अब आपको ही घर पड़ेगा।दुनिया क्या कहेगी कि रामायन बाबा के लड़के साल भर भी माँ का मृत्यु शोक न मना सके।  बड़ी भाभी का हाथ अपने हाथ में ले खुद से बारह साल बड़ी भाभी को मैंने सजल आँखो से देखा...वह लिपट गयीं।मैं कहे जा रही थी....अब तो आप ही माँ भी हैं हमारी....हम कहाँ जाएंगे? मेरी बात सुनते छोटी बहन और दोनों भतिजियाँ भी भाभी से लिपट गयीं।हम सब पर उस चालीस साल की स्त्री ने उस दिन आँचल ड़ाल सांत्वना दिया कि कुछ भी हो,वह घर नहीं टूटने देगी।  हम नहा -धो रोते -रोते थक कर बैठ गये थे।न जाने क्या सोच छोटी आँवले का तेल ले अपनी कोठरी से निकली और हम सब के माथे पर एक-एक चुरूआ रख थोप कर दबाने लगी।मैंने उसका स्नेह से हाथ थाम बड़ी भाभी की ओर इशारा किया,उसने मान रखा और जिठानी के सिरहाने जा बैठी।बड़ी ने रोका....अब दस दिन तेल ना रखे क है भाई! वह अन्दर से भावुक हो रही थी।छोटी ने जबरन सिर पर तेल रख कहा...दीदी इ तो औषधी है..कडुवा तेल नहीं लगाया जाता है।हमारे घर आजी के मरने पर गुरू महाराज ने कहा था। इस दृश्य ने मुझे सन्तोष से भर दिया,शायद हमारी बातें सुन उसे लगा हो कि यह राढ़ ठानने का उचित समय नहीं ,या फिर वास्तव में अपने व्यवहार का पछतावा हो।जो भी हो ,आज उसका यह रूप हम सबके लिए सुखद था।छोटी बहन निढ़ाल निखहरी खटिया पर पड़ी थी..रोते -रोते थकी अपने तीन माह के शिशु को छाती से चिपकाए।बड़ी भाभी ने छोटी से कहा-एक गिलास दूध छोटकी बबुनी को पिला दो,लड़का पिलाना है।बीमार पड़ गयी तो बच्चे को दिक्कत होगी और हाँ बचा दूध लड़कियों को पिला दो।दूध घण्ट से पहले मरद -मानुस और हम लोग नहीं पी सकते।छोटी उठ कर चली गयी।बड़ी मुश्किल से छोटी बहन आधा गिलास दूध पी पाई थी।धीरे -धीरे रात घिरने लगी...चारों तरफ सन्नाटा।बादल आसमान में जमे थे ,गनिमत इतना ही था कि बरखा नहीं हो रही थी।दोनों बुआ लोग दुवार पर बैठी टकटकी लगाए आसमान को देख ईश्वर से गुहार लगा रही थीं कि जब तक लाश न जल जाए बरखा न हो।घर में क्या पूरे टोले में निरवता इस कदर आज बसी थी कि कुत्ते -बिल्ली की आवाज पर सिहरन उठ जाती....रात के नौ बजे अचानक बिजली की कड़क के साथ बारिश छूटी तो सबके कलेजे जोरों से धड़कने लगे।हम सब अब ईश्वर से प्रार्थना करने लगे कि सभी मर्द सकुशल घर लौट आएँ। इधर बरखा पूरे वेग में थी और बड़की फुआ का अलाप भी....मउअत में बरखा का करा दे केहू ना जाने धिया।दउवो के आजे बरखे के रहल है। हम सब चिन्ता से घिरे अब दुवार के बरामदे में आ बैठे...आज बिजली भी नहीं आई...इन दिनों रात को बिजली आती थी।गाँवों में बिजली एक हफ्ते रात को तो एक हफ्ते दिन में बिजली आती थी।              रात बारह बजे दाह से लोग लौटे,बड़की भाभी ने तगाड़ में गोंइठी सुलगा पत्थर और लोहा रखा,कटोरी में काली मिर्च।सबने हगथ पैर धो आग ,पत्थर, लोहा छुआ और काली मिर्च मुँह में ड़ाल घर में घुसें।पिता की चारपाई बरामदे में अलग बिछी।वह एक कंबल और मारकीन की चादर संग अब बारह दिन अलग रहनेवाले थे। घर में दिन भर के उपासे...थके -मादे लोग जहाँ-तहाँ निढ़ाल  पड़ गये।रात बिती और अगली सुबह बिना माँ के चेहरे के घर में हुई...पिता संग भाई दयाद नहाने और घण्ट बाँधने चले गये...इधर बड़ी भाभी संग कुटुम्ब की स्तियाँँ इनार पर नहाने चली गयीं।हम बेटियाँ माँ के शोक की इन क्रियाओं से वंचित चुपचाप सब देखती रहीं।बड़की माई ने हमारे उदास चेहरे को देख कर कहा....काहें मुँ गिराए बैठी हो बड़की बबुनी!..अरे! बेटियों का खाना और पतोहों का नहाना मिरतक को मिलता है।जाकर तनी नमकीन ,बिस्कुट मुँह में लगा लेती लोग।अब हम सब को तो संझा तक भात मिलेगा। बड़ी भतीजी को भेज उन्होंने नमकीन, बिस्कुट मंगाया,हम बड़ी मुश्किल से एक चम्मच खा पाए।पेट मरोड़ थहा था...शरीर अन्न मांग रहा था लेकिन आत्मा थी  की कुछ स्वीकारती ही नहीं। मुँह में कुछ ड़ालते उबकाइ आने लग रही थी।अजीब स्थिति थी शरीर और मन की।दिन भर हीत-नातों का तांता लगा रहा।दोपहर तीन बजे दुवार पर चूल्हा जुड़ा और आम की चइली(लकड़ी) जला बड़े से पतीले में पानी चूल्हे पर चढ़ा दिया गया ,अधहन खौलने लगा।हम दोनों बहने माँ की कोठरी में उसके पलंग पर निखहरे पड़े हुए थे।बाहर से खौलते पानी में चावल के डालते भात की मीठी सुगंध नथुनों में भरने लगी।याद आने लगा कि नयका भात माड़ संग माँ हम सब की थाली में गरम -गरम परोसती और आजी की नज़र बचा भाईयों संग हमें भी देसी घी एक -एक चम्मच देती।देसी घी संग माड़-भात की गन्ध माँ की स्मृति संग आँखें के रास्ते बह निकली।हम दोनों ने बिना आवाज मुँह से निकाले मन भर रोया और थककर चुप भी खुद ही हो गयीं।आँगन में पिता संग पुरूषों की पंगत बैठी और दूध-भात गिरा रस्म पूरी की।पुरूषों के बाद स्त्रियाँ बैठीं और लड़कियों से कहा गया वह खुद ही लेकर खा लें।भतीजियों थाली में बिना हल्दी की दाल,भात और उबले आलू का चोखा लाकर हमें भी दे गयीं।भात ठण्डा हो गया था...माँ होती तो ठण्डा भात कभी हमारे हिस्से नहीं आता.....।

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