Thursday, May 23, 2024

जन्म- सहरसा, बिहार
शिक्षा- एम. ए , नेट
पी.एच.डी(अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटी)
भाषा-हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत, मैथिली (मातृभाषा)
कुछ प्रकाशित रचनाएं- कादंबनी, अभिनव प्रत्यक्षा, आलोकपर्व, अरण्यवाणी आदि कई पत्र- पत्रिकाओं में, ब्लॉग पर।
वर्तमान पता-अलीगढ़, उत्तर प्रदेश।

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कविताएं

रीढ़-विहीन लोग

उसकी रीढ़ की हड्डी
झुकती जा रही है
वह हैरान नहीं है,
थोड़ा परेशान है
अपने बचपन की मासूमियत को खोकर
आशंका है कि
कल लोग रीढ़- विहीन हो जाएंगे
उनके कान लम्बे किन्तु
छिद्र प्राय: बंद होंगे
सबके आंखों पर एक मोटी कांच की दीवार होगी
जिसमें सबकुछ धुंधला दिखेगा
स्वंय के बनाए हुए यंत्र ही
उसे ढाल देंगे एक यंत्र में
जहां उसके सोचने- समझने की शक्ति
संचालित होगी रोबोट की रिमोट से
हाड़- मांस का बना यह शरीर
एक यंत्र में बदल जाएगा
खत्म हो जाएगी उसकी संवेदना
उसकी हंसी, उसके आंसू
सब नकली होंगे
रीढ़- विहीन लोग
हताश होकर दौड़ रहें हैं
चारों दिशाओं में
कभी आकाश, कभी पाताल
अंतरिक्ष के हरेक कोने में झांक रहे हैं
और ढूंढ रहे हैं अपने लिए
एक पहाड़- खुशियों का।

एक गहरी चुप्पी

इतिहास में दर्ज हो जाएगी
कल की तरह ही
आज की घटनाएं भी
वो तमाम बातें
वो तमाम किस्से
इतिहास के पन्नों से निकलकर
क्या कभी चीखेगी?
क्या कभी मांगेगी हिसाब
काली स्याह रात की उन तमाम घटनाओं का
जहां मानवता ने साध रखी थी,
एक गहरी चुप्पी
दृश्य तेजी से घटित हो रहा था
पर आंखें बंद थी सबकी
कराहती आत्माओं की पुकार सुनकर भी
सबने बंद कर लिए थे अपने कान
चौराहे के बीचों-बीच सजी
उन तीनों मूर्तियों की शक्लें भी
अब बदल गई है
एक ने अपनी आंखों पर काला चश्मा चढ़ा रखा है
दूसरे ने अपने कान में खोस लिया है ईयर- फोन
जिसमें बज रहा था कोई पॉप म्यूजिक
और तीसरे की ज़बान निरंकुश होकर
लपलपा रही थी बाहर को
दृश्य तेजी से घटित हो रहा था और
सामने जीता-जागता बुतों की शक्ल में
एक लंबी भीड़ खड़ी थी
सभ्यता और संस्कृति का बोझ बनकर।

अब स्मृतियों में बचा है अपना घर/ अपने लोग

रोज़ अपनी ही गलियों से होकर
गुजरता हूं
तलाशते हुए
अपना घर/ अपने लोग
कई चेहरे
जिसकी स्मृतियां भी
अब धुंधली पड़ गई है
उन चेहरों की झुर्रियां
या कहूं कि
एक लम्बा गुजरा हुआ समय
घूरता है मुझे, अजनबी समझकर
अपनी ही गलियों में
मेरी स्मृति में बची हुई
भीत का वह घर
जिसकी नींव को भी
बहा ले गई बाढ़
जिसकी दीवारें
मां की बनाई हुई
सुंदर चित्रकारियों से
हमेशा ही सजी रहती थी
वो गलियां जहां अपने
यार- दोस्तों के साथ
कभी कंचा तो कभी
गुल्ली- डंडा खेलते थे हम
वो गलियां
जो हरपल हमारी हंसी- ठिठोली से गुंजायमान रहती थीं
बेशक,
उस रात की लहरें
अपने साथ बहा ले गई
भीत का वह घर
वो गलियां
वो बचपन की यादें
किंतु , मेरे मन में बसी
भीत की वह दीवार
कमजोर नहीं थी
उसकी नींव मेरे अंदर
गहरी जमीं है
जिसे कोई आंधी या कोई बाढ़
अपने साथ बहाकर
नहीं ले जाएगी
भटक- भटककर
थका- हारा मैं
लौट आया हूं
अपनी स्मृति की गलियों में
जहां सुरक्षित बचा है
अपना घर/ अपने लोग

भागते हुए लोग

भागते हुए लोग
जल्दी-जल्दी में
भर-भरकर रख रहे हैं
धूप को
हवा को
मिट्टी को
कल शायद कम न पड़ जाएँ
कल अकाल पड़ेगा
धूप
हवा और
मिट्टी का।

उखड़े हुए लोग

शहर को शहर बनाते हैं
गांव से उखड़े हुए
कुछ लोग
जिसकी न ज़मीं अपनी होती
न आसमान अपना होता
आधी रोटी खाते
और आधी ही उम्र जीते
ये लोग
उग आते हैं शहर में
कुकुरमुत्ते की तरह
गगनचुंबी इमारतें बनाते
सजाते- संवारते
शहर को शहर बनाते
ये लोग
अपना ठौर तलाशते
भटकते रहते हैं
खानाबदोश की तरह
शहर की तंग गलियों में
नमक की तरह
घुल जाने की इनकी आदत
शहर की हवा संग
घुल जाना चाहती है
किंतु,खाराजल समझकर
शहर ने हमेशा ही
इसे दरकिनार किया
गांव की गंध में लिपटा हुआ तन- मन
न कभी शहर का हो सका
और न ही गांव का
‘गंवार’ का तमगा लटकाए
डोलते रहते हैं
शहर की तंग गलियों में
रोटी की तलाश में।

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