Thursday, May 23, 2024
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नाम- वीणा वत्सल सिंह
जन्म – 19 अक्टूबर 1970
पुस्तकें प्रकाशित –
दो उपन्यास – तिराहा एवं बेगम हज़रत महल
दो कहानी संग्रह – अंतर्मन के द्वीप एवं पॉर्न स्टार और अन्य कहानियाँ
वर्तमान कार्यरत – कंटेंट एडिटर,प्रतिलिपि ( नसादिया टेक्नोलॉजी प्रा.लिमिटेड)

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कहानी

कहानी – टाइमपास 
वह किसी फिल्म की हीरोईन नहीं थी | लेकिन , उसे देखकर सुप्रसिद्ध हिरोईन कंगना राणावत का भ्रम होता था | उसने वेश –भूषा से लेकर हाव – भाव सबकुछ कंगना से उधार लिया हुआ था | उसने टाईट काले रंग की लेगिंस के ऊपर पूरे बाजू की रस्ट कलर की शर्ट पहन राखी थी | जिस पर चटख लाल रंग के बड़े – बड़े फूल थे | शर्ट की बाजू आधी फोल्ड की हुई थी | कंधों पर कटे हुए घुंघराले बाल फैले हुए थे | चेहरे पर सलीके से किया गया मेकअप था | जैसे ही वह ट्रेन में दाखिल हुई एकाएक सबके आकर्षण का केंद्र हो गई | नाम नहीं मालुम होने की सूरत में कुछ पुरुष आपस में फुसफुसाते हुए उसे कंगना कहकर छिछोरी बातों में व्यस्त हो गए |
 
डबलडेकर ट्रेन थी वह – जो दिल्ली से लखनऊ और लखनऊ से दिल्ली के बीच दिनभर में अप और डाउन दोनों फेरे लगा लेती थी | दो मंजिलों पर सीटों की व्यवस्था होने के कारण लोगों को रिजर्वेशन आसानी से मिल जाता था और अन्य ट्रेनों की तुलना में उसकी टिकट दर भी कम थी | पूरी ए.सी. ट्रेन और टिकट के कम पैसे लगने हों तो जाहिर है ट्रेन में बैठी भीड़ की मानसिकता भी ठंढी – गर्म मिक्स ही होगी |
 
तो ,कंगना ने सीढियों से ट्रेन की ऊपरी मंजिल पर चढ़ते ही साथ के लगेज बैग को पूरी नजाकत से उठाकर सीट के ऊपर बने कम्पाउंड में रखना चाहा | लेकिन , बैग ने कंगना की नजाकत का साथ देने से इंकार कर दिया | बैग की इस हिमाकत से कंगना ने परेशान हो पूरी बोगी पर सरसरी निगाह डाली | और ,उसकी नजर जाकर रुक गई एक पंजाबी नवयुवक पर | नवयुवक को देखकर साफ़ – साफ़ पता चलता था कि उसने हाल – फिलहाल में ही किशोरावस्था की दहलीज लांघकर युवावस्था में प्रवेश किया है | गोरे सुन्दर चेहरे पर दाढी – मूंछ की शक्ल में कोमल काले बाल उसके व्यक्तित्व की खूबसूरती को बढ़ा रहे थे |
 
कंगना ने उस सुदर्शन युवक के चेहरे पर नजरें गड़ाकर मीठी आवाज में कहा – “ कैन यू हेल्प मी “
 
युवक धन्य हो गया और फुर्ती से उठकर उसने कंगना के हाथ से बैग ले जगह पर जमा दिए | हाँ , बैग लेने और जमाने के बीच उसने सयास कंगना के शरीर से खुद को सटाने का सफल प्रयास भी किया जिसे कंगना ने सहजता से लिया | लेकिन पूरी बोगी में बैठे लोगों की निगाह में वह चुभ गया | कुछ सहयात्रियों ने तो आपस में फुसफुसाकर यह भी कह डाला कि ,” काश ! उन्हें लगेज जमाने का मौक़ा मिलता |”
 
जान बूझकर जोर से की गईं फुसफुसाहटें कंगना के कानों में भी पहुँच गईं | जिसके जवाब में कंगना के चेहरे पर विजयी मुस्कान फ़ैल गई | उसके चेहरे पर उसे अपने सौन्दर्य और वेशभूषा के प्रति अभिमान झलक उठा | साथ ही उसके हाव – भाव की लापरवाही कह रही थी –‘ऐसा पहली बार नहीं हुआ है | अक्सर वह आकर्षण का केंद्र बनी रहती है |’
 
अपनी सीट पर बैठते ही कंगना को भूख लग गई | उसने अपने बड़े से हैण्ड बैग से एक सेब निकाला और आँखों में शरारत भर उस पंजाबी नवयुवक की ओर बढाते हुए कहा – “ खाओगे ? अरे हाँ नाम क्या है तुम्हारा |”
 
“नो थैंक्स | मेरा नाम जसवंत है लेकिन मुझे सभी जस्सी कहते हैं |” जस्सी ने लम्बी मुस्कान के साथ कहा | उसकी आँखों के रास्ते कंगना से बात कर लेने की ख़ुशी बाहर निकल रही थी |
 
जस्सी के मना करते ही कंगना ने बड़ा सा मुंह खोलकर अपने दांत सेब में गड़ा दिए और ख़ास स्टाईल के साथ उसे काटकर चबाने लगी | आस पास के सहयात्रियों के दिल से सिसकारी निकल ओठों पर दम तोड़ गई |
 
दिल्ली से खुली ट्रेन अपनी रफ़्तार में भागी जा रही थी | ट्रेन की गति के साथ कंगना का मन भी कुछ अलग जगह पर अटका हुआ था | अचानक उसने जसवंत की ओर मुखातिब हो कहा – “ जस्सी अगर तुम्हें कोई प्रॉब्लम ना हो तो यहाँ पड़ी खाली सीट पर आ जाओ | बहुत बोरियत हो रही है |”
 
जस्सी इसी आमंत्रण का वेट ही कर रहा था | तुरत उठकर कंगना के बाजू में विराजमान हो गया | फिर तो , कंगना उसके साथ बातों में डूब गई | हाव – भाव ,बॉडी लैंग्वेज – सबकुछ जैसे वर्षों से एक – दूसरे को जानते हों |
 
उन दोनों की ओर इशारा कर एक सहयात्री ने अपने बगल के यात्री से कहा – “ लो जी शुरू हो गई ट्रेन में लव स्टोरी |”
 
“ कोई लव – वभ ना है जी | यह सब बस ऐसे ही है | आजकल की छोरी है ; छोरे नूं मजा ले रही है | आजकल की सभी छोरियां ऐसी ही होती हैं |” – बगल वाले यात्री ने मूंह बनाते हुए कहा |
 
पास की सीट पर बैठी एक लड़की ने उसकी ओर आँखें तरेरी और कडक आवाज में बोली – “ सबको एक सा ना कहें | तमीज सीखें आप बात करने की |”
 
उस यात्री ने लड़की के कड़े तेवर देख बात को रफा – दफा करने में ही अपनी भलाई समझी और मित्रता बढाने के उद्देश्य से बोला – “ माफ़ करना जी ,ऐसे ही बोल गया | आपका नाम क्या है जी |”
 
“ झाँसी की रानी “ – लड़की का अंदाज पहले सा ही कड़क था |
 
आसपास की महिला सहयात्रियों ने लड़की के इस उत्तर पर अपने – अपने अंदाज में सहमति जताई | कंगना इस चल रहे पूरे प्रकरण से नावाकिफ थी | फिर , भी उसने अंतिम बात –चीत सुन ली थी और लड़की के नाम बताने के अंदाज से खुश हो हाथ उठा जोर से बोली – “लाईक “
 
आसपास के यात्रियों के चेहरे पर मुस्कान तैर गई |
 
ट्रेन अब तक अलीगंज पहुँच चुकी थी | कुछ नए यात्री भी ट्रेन पर सवार हो गए थे | अब तक जस्सी और कंगना के बीच की सभी दूरियां नजदीकियों में बदल गई थीं | ट्रेन के खुलते ही चेयर कार में दोनों के सीट के बीच का हत्था हट गया और अब दोनों के शरीर एक – दुसरे से रगड़ खा रहे थे | नए आये यात्रियों के लिए यह सामान्य था लेकिन पहले के सहयात्रियों में से एक ने सर ऊंचा कर बगल वाले के कान में फुसफुसाकर उन दोनों की ओर इशारा किया | बगल वाले ने भी उसी फुसफुसाहट में जवाब दिया – “ देखते चलो भाई | ट्रेन लेट हो चुकी है ,कम से कम हमारा टाइमपास तो हो रहा है | “
 
उस कम्पार्टमेंट में बैठे सभी यात्री समझ चुके थे कि ट्रेन आज आधी रात के बाद ही लखनऊ पहुंचाएगी | तो , सभी अपने – अपने हिसाब से कंगना और जस्सी का आनन्द लेने लगे | हर कोई समय – समय पर किसी न किसी बहाने उठ उनकी सीट के पास जाकर दो – तीन मिनट खडा होता और उनकी बातों के साथ चल रहे अंग – संचालन का मजा लेता |
 
जस्सी और कंगना के हाथ बातों के क्रम में एक – दुसरे की सीमाओं का अतिक्रमण कर रहे थे | कभी किसी का हाथ वर्जित क्षेत्र को छू कर हट जाता तो दोनों के चेहरे सुख से दहक उठते | वे आसपास की परवाह किये बिना एक – दुसरे के आनंद में बह रहे थे |
 
रात के ग्यारह बज गए थे | लेकिन उस कम्पार्टमेंट के किसी भी यात्री को नींद नहीं आ रही थी | जिन्हें झपकी आई भी उन्हों ने गुटखा खाकर या चाय – चिप्स खाकर खुद को जगाये रखा | सबकी आँखों में कान उग आये थे और कानों को आँखें हो गईं थीं | जो हो रहा था – कल्पना उससे अधिक की मन कर रहा था | दो का आनंद एक साथ पचपन – साठ लोगों में फ़ैल चुका था | कुछ युवा सहयात्रियों ने ट्रेन और अधिक लेट होने की भविष्यवाणी भी कर दी | पर ,उनकी यह भविष्यवाणी अन्य भविष्यवाणियों की तरह दम तोड़ गई | और , ट्रेन सवा बारह बजते – बजते लखनऊ स्टेशन पर आ खड़ी हुई |
 
स्टेशन पर कंगना के पिता उसकी छोटी बहन के साथ उसे रिसीव करने आये थे | जस्सी ने कंगना का सामान ले उसे ट्रेन के दरवाजे तक बड़े भावुक अंदाज में छोड़ा और एक सच्चे प्रेमी की तरह आँखों में आँखें डाल रुंधी आवाज में “ बाय ,मिलते हैं “ कहा |
 
कुली के सर पर सामान रखवाकर जब कंगना के पिता कुली के साथ आगे बढ़ गए तो कंगना की छोटी बहन ने आँखें झपकाते हुए पूछा – “ दीदी ,कौन था वह ? बड़े नाजो – अंदाज से तुमसे विदा लेते हुए सामान तुम्हे पकड़ा रहा था | पापा ने भीड़ अधिक होने के कारण देखा नहीं | वरना अब तक तुम्हें सारी रामायण सुना दिए होते |”
 
बहन की बात सुन कंगना ने आसमान की ओर देख हल्के से ठहाका लगाया और बोली – “ कोई नहीं था | बस यूँ ही टाइमपास का मैटेरियल था |”
 
“ लेकिन वह तो कह रहा था – मिलते हैं “ – छोटी बहन तसल्ली कर लेना चाहती थी |
 
“मैं उस सडू से मिलने कभी नहीं जाऊँगी | टाइमपास सिर्फ टाइमपास होता है – समझी |”

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किताबें

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