Thursday, May 23, 2024
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“क्या आप विद्यावती सिंह को जानते है?”

हिंदी लेखकों की पत्नियों की शृंखला में आपने रविन्द्र नाथ टैगोर, नाथूराम शर्मा शंकर, रामचन्द्र शुक्ल, मैथिली शरण गुप्त, राजा राधिका रमण प्रसाद सिंह, शिवपूजन सहाय, जैनेंद्र, हजारी प्रसाद दिवेदी, गोपाल सिंह नेपाली, रामविलास शर्मा, नागार्जुन, कुंवर नारायण, विनोद कुमार शुक्ल, प्रयाग शुक्ल आदि की पत्नियों के बारे में पढ़ा। अब पढ़िए हिंदी के प्रख्यात कथाकार और “कथा” पत्रिका के संपादक जनवादी लेखक संघ के संस्थापकों में से एक मार्कण्डेय की पत्नी के बारे में।उनकी डॉक्टर बेटी स्वास्ति ठाकुर ने अपनी माँ के बारे में लिखा है जो अब उनके साथ रहती हैं। वह 92 वर्ष की हैं। अगर आपने “पान फूल “और “हंसा जाई अकेला” कहानी पढ़ी है तो मार्कण्डेय जी को कभी भूल नहीं सकते। उन्होंने कहानी की आलोचना पर भी काफी महत्वपूर्ण लिखा है। वे राजेन्द्र यादव और नामवर जी के लगभग हमउम्र थे।अमरकांत, मार्कण्डेय और शेखर जोशी की त्रयी हिंदी कहानी में प्रसिद्ध रही है। तीनों ने हिंदी की नई कहानी को समृद्ध किया। तो आइए जानते हैं विद्यावती जी को ।
“क्या आप विद्यावती सिंह को जानते है?”
– स्वास्ति ठाकुर
———————————————————————————————— प्रख्यात कहानीकार मार्कण्डेय की जीवनसंगिनी विद्यावती सिंह का जन्म 4 नवम्बर 1931 को भगवान सिंह और सुंदरी देवी की पहली संतान के रूप में बहू बाजार, कोलकाता में हुआ। इनके पिता भगवान सिंह कोलकाता में पोस्ट ऑफिस में अधिकारी थे। विद्यावती जी की प्रारम्भिक शिक्षा वहीं पर हुई। लेकिन पिता जी सेवानिवृत्त होने के बाद वापस अपने गाँव रजला, वाराणसी आ गये, जिससे विद्यावती जी की आगे की पढ़ाई बाधित हो गयी। इनके पिता जी ने बहुत कोशिश की परन्तु गाँव में कोई अध्यापक एक लड़की को पढ़ाने के लिए तैयार नहीं हुआ, क्योंकि गाँव की और कोई लड़की पढ़ने नहीं भेजी जाती थी। इस तरह विद्यावती जी की पढ़ाई छूट गयी।विद्यावती जी का विवाह मार्कण्डेय जी के साथ 1947 ई. में हिन्दी के अषाढ़ महीने में हुआ। प्रारम्भ के सात वर्ष गाँव में रहने के बाद विद्यावती जी 1954 ई. में इलाहाबाद आ गयीं। उनके इलाहाबाद आने के बाद मार्कण्डेय जी का पहला कहानी-संग्रह ‘पानफूल’ 1954 में ही प्रकाशित हुआ। फिर 1956 ई में मार्कण्डेय जी ने अपना खुद का प्रकाशन नया साहित्य प्रकाशन शुरू किया। 1958 ई में मार्कण्डेय जी और विद्यावती जी की पहली सन्तान के रूप में बेटी का जन्म हुआ। विद्यावती जी खुद भी अपने माता-पिता की पहली सन्तान थीं। 1958 ई में ही मार्कण्डेय जी ने रेडियो में नौकरी ज्वाइन की, लेकिन लखनऊ तबादला होने पर छः महीने बाद ही नौकरी छोड़ दी और फिर कभी नौकरी नहीं की। जीवनपर्यन्त वे मसिजीवी रहे। ऐसे में विद्यावती जी के लिए परिवार का पालन-पोषण और एक लेखक को उसकी स्वायत्तता देने की कठिन चुनौती स्वीकार करनी पड़ी और उन्होंने इस भूमिका का निर्वाह बखूबी किया।मार्कण्डेय जी 2 डी, मिण्टो रोड पर रहते थे। यहीं संस्कृत के विद्वान और लोकविद श्रीकृष्ण दास अपनी पत्नी सरोजनी दास के साथ रहते थे। विद्यावती जी जब इलाहाबाद आयीं तो दोनों परिवार एक साथ ही रहने लगे। श्रीकृष्ण दास भी जौनपुर के थे और मार्कण्डेय जी भी। मार्कण्डेय जी भी लोक संस्कृति के अध्येता थे, हालांकि बाद में उन्होंने डाॅ रामकुमार वर्मा के निर्देशन में किया जा रहा अपना यह शोध कार्य छोड़ दिया, लेकिन उससे लगाव बना रहा। विद्यावती जी का प्रारम्भिक जीवन कोलकाता में बीता था और वे नगरीय जीवन शैली में पली-बढ़ी थीं, लेकिन उन्होंने पहले गाँव और बाद में मार्कण्डेय जी जैसे ग्रामीण और लोक जीवन के रचनाकार के साथ तादात्म्य स्थापित कर लिया। वे गर्मी की छुट्टियों में बच्चों को लेकर गाँव जाती थीं। मार्कण्डेय जी के साथ रहते हुए उन्होंने अपनी पढ़ाई छूट जाने की कशक को साहित्य के पठन-पाठन से पूरा किया।विद्यावती जी ने रूसी, फ्रेंच साहित्य के साथ गांधी, टैगोर, प्रेमचंद का साहित्य भी पढ़ा। एक तरफ यह और दूसरी तरफ घरेलू कार्यों की पूरी जिम्मेदारी। यह घरेलू कार्य सिर्फ परिवार के पालन-पोषण से ही नहीं जुड़े थे, बल्कि उसका दायरा बहुत बड़ा था। मार्कण्डेय जी साहित्यकार के साथ ही संस्कृतिकर्मी भी थे। वे प्रगतिशील लेखक संघ और बाद में जनवादी लेखक संघ के आयोजनों और लेखक सम्मेलनों के कर्ता-धर्ता भी होते थे। इसलिए मार्कण्डेय जी का निवास साहित्यकारों, लेखकों, संस्कृतिकर्मियों, छात्रों के लिए एक सामूहिक जगह थी। हमेशा कोई न कोई आता रहता। इनके खान-पान, आदर, सत्कार की भी जिम्मेदारी विद्यावती जी अकेले उठाती थीं। यह सब करते हुए कभी भी उन्होंने कोई शिकायत मार्कण्डेय जी से नहीं की। मार्कण्डेय जी हमेशा उन्हें विद्या जी कहकर बुलाते थे। बाद के दिनों में जब मार्कण्डेय जी को लिख पाने में दिक्कत होने लगी, तो विद्यावती जी उसमें भी भागीदार हो गयीं। मार्कण्डेय जी बोलते थे और वे लिखती थीं। लिखते समय वे किसी प्रसंग या चरित्र को अपने अनुकूल न पाकर टीका-टिप्पणी भी करती थीं। मार्कण्डेय जी की अन्तिम और अधूरी कहानी ‘खुशहाल ठाकुर’ को लिखते हुए वे बार-बार टोकतीं, कि क्या-क्या लिखते रहते हैं आप भी। मार्कण्डेय जी यद्यपि कि एक सुरुचिपूर्ण और व्यवस्थित जीवन शैली के व्यक्ति थे, लेकिन उनके इस व्यक्तित्व को बनाये रखने में विद्यावती जी बराबर की भागीदार रहीं। लेखकों के जीवन का यह पक्ष प्रायः अनकहा ही रह जाता है, जबकि उसका महत्व बहुत बड़ा होता है। मार्कण्डेय जी के लेखकीय व्यक्तित्व में विद्यावती जी का महत्व भी उतना ही बड़ा रहा।मार्कण्डेय जी का 18 मार्च 2010 को कैंसर से नयी दिल्ली में निधन हुआ। विद्यावती जी उनके आखिरी समय तक उनकी हमसफर, सुख-दुख की साथी रहीं। बीते 4 नवम्बर को विद्यावती जी ने अपने जीवन के बानबे वर्ष में प्रवेश किये हैं। वे अभी भी स्वस्थ और सक्रिय हैं तथा देश-दुनिया की पूरी खबर मुझे news paper से पढ़कर और TV से सुनकर रोज़ देती हैं, जब मैं दिन भर की हॉस्पिटल के व्यस्तता से वापस लौटती हूँ।माँ ने हमें भी बहुत प्रोत्साहित किया। आज मैं डॉक्टर बन पाई तो इसके पीछे मां का बहुत बड़ा योगदान है लेकिन स्त्रियों का त्याग संघर्ष अनचीन्हा ही रह जाता है। किसी भी बेटी को अपनी माँ के बारे में बात करना और बताना एक आत्मिक सुख देता है।

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