
देश के जाने माने लेखकों की पत्नियों की शृंखला में आपने अब तक गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर, भारतेंदु काल के लेखक नाथूराम शर्मा “शंकर”, रामचन्द्र शुक्ल, मैथिली शरण गुप्त, राजा राधिका रमण प्रसाद सिंह, शिवपूजन सहाय, रामबृक्ष बेनीपुरी, जैनेंद्र, हजारी प्रसाद दिवेदी, गोपाल सिंह नेपाली, रामविलास शर्मा, नागार्जुन, नरेश मेहता, कुंवर नारायण, विनोद कुमार शुक्ल एवं प्रयाग शुक्ल आदि की पत्नियों के बारे में पढ़ा। अब पढ़िए हिंदी के यशस्वी कथाकार और ‘पहल’ पत्रिका के चर्चित संपादक ज्ञानरंजन की पत्नी के बारे में। जबलपुर की लेखिका श्रद्धा सुनील उनके बारे में आपको बता रहीं हैं। ज्ञानरंजन अपने आप में एक संस्था रहे हैं और खुद में एक आंदोलन भी। वे युवा पीढ़ी के प्रेरणा स्रोत भी रहे हैं। उनकी पत्नी से जो कोई मिला उनके आतिथ्य को भूल नहीं सकता और वह भी हिंदी साहित्य समाज को प्रेरणा देती रहीं हैं।
तो आईए पढ़ते हैं श्रद्धा सुनील जी की यह दिलचस्प टिप्पणी।
मैं एयर होस्टेस बनना चाहती थी पर प्रारब्ध में ज्ञान जी की पत्नी बनना लिखा था।
————————————————————————————————– श्रद्धा सुनील ज्ञान रंजन जी की जीवन संगिनी सुनयना नागर जी का जन्म २३ अक्टूबर १९४५ को इलाहाबाद में एक प्रतिष्ठित गुजराती ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता सूर्य नाथ नागर पूर्वजों से प्राप्त आयुर्वेद चिकित्सा का व्यवसाय करते थे। नागर परिवार की परम्परा से चली आ रही ख्याति को देखते हुए दूर दूर से लोग उनसे इलाज के लिए आते थे। ६ बहनों और एक भाई में सुनयना जी अपने माता-पिता की तीसरी संतान हैं। उनका पालन पोषण सम्पन्न सम्रद्ध परिवार में हुआ। मोहक, तेजस्वी और आकर्षक व्यक्तित्व की स्वामिनी सुनयना जी ने स्नातक तक शिक्षा प्राप्त किया है। वह कहती हैं कि मैं एयर होस्टेस बनना चाहती थी। अभिनय में गहरी रुचि थी।कालेज में, खेल में एन. सी. सी. में उनकी बहुत सक्रियता रही। वह महत्वकांक्षी थी लेकिन पिता को पसंद नहीं था लड़कियों का स्वतन्त्र रह कर कार्य करना ।। मेरे प्रारब्ध में लिखा था सुविख्यात ज्ञान रंजन जी की पत्नी होना। उनकी प्रेम कहानी ज्ञानरंजन जी की अप्रतिम कहानियों से कम दिलचस्प नहीं है। उतार चढ़ाव से भी भरी थी। सुनयना जी अपनी प्रेम कहानी बताती हैं कि इलाहाबाद में लूकरगंज मुहल्ले में हमारा घर है। इक्कीस कमरे का भव्य घर एक विशाल हवेली है। इस चौराहे पर हमारा घर है तो उसके अगले चौराहे पर फर्लांग भर की दूरी पर ज्ञानरंजन जी का घर है। वह कहती हैं हम दोनों के परिवारों में काफ़ी अच्छे सम्बन्ध थे। आना जाना उठना बैठना था। ज्ञान जी के पिता और सुनयना जी के पिता की आपस में खूब बनती थी।विचारों का आदान-प्रदान होता था। अनगिनत विषयों पर लम्बी चर्चाएं हुआ करती थीं। ज्ञान जी की मां और सुनयना जी की मां के बीच गहरी मित्रता थी। ज्ञान जी की बहन मृदुला से भी सुनयना जी की मित्रता थी। यही नहीं सुनयना जी के इकलौते भाई दीपक की ज्ञान जी से मित्रता थी। इस तरह दोनों ही परिवारों के बीच हम उम्र सदस्यों के बीच अंतरंगता थी ।।ज्ञानजी के पिता श्री राम नाथ सुमन जी उस जमाने के प्रसिद्ध साहित्य कार थे। उनकी बड़े’बड़े लेखकों से मित्रता थी और सुनयना जी के पिता वैद्य थे। दोनों का अपने अपने कार्य क्षेत्र में आदर मान था। दोनों परिवारों में एक दूसरे के प्रति सम्मान भाव था। सुनयना जी कहती हैं कि मेरे पिता के मन में नागर ब्राह्मण होने का गर्व था ।।सुनयना जी के भीतर स्त्रियों की स्वतंत्रता के लिए और समाज में स्त्रियों के साथ दोयम दर्जे के व्यवहार के लिए आज जो आक्रोश है, उसके बीज उनके व्यक्तित्व में युवावस्था से ही दिखाई देने लगे थे और ज्ञान जी इन्हीं गुणों से उनकी तरफ आकर्षित हुए थे। वह अपनी बहन मृदुला से कहते, देखो सुनयना कितनी स्मार्ट है, उसका पहनावा रहन सहन आधुनिक है। वह साइकिल चलाती है तुम भी ज़रा साहस करो और उसकी तरह कपड़े पहनो, पैन्ट पहनो, हिम्मत करके घर से बाहर निकल कर सुनयना के घर तक जाओ।।ज्ञान जी को उस वक्त नहीं पता था कि सुनयना जी उन्हीं के लिए बनी हैं क्योंकि उस समय ज्ञान जी अपनी भाभी की बहन से विवाह करना चाहते थे। सुनयना जी आधुनिक वेष भूषा के साथ आधुनिक सोच भी रखती थीं। वह कहती हैं मैं खिलाड़ी थी, बैड मिन्टन, शाॖॅट पुट, जेबलिन थृॊ वगैरह खेलती थी। ज्ञान जी के साथ सुनयना जी सभी बातें साझा किया करती थीं और ज्ञान जी भी सुनयना जी से अपने सुख दुख बांटते। दोनों के बीच अंतरंगता थी ।।ज्ञान जी का विवाह भाभी की बहन से नहीं हो सका। उस दुख में सुनयना जी उनकी सच्ची हमदर्द साबित हुईं।सुनयना जी से विवाह के लिए बहुत से गुजराती परिवार इच्छुक थे। धनवान वर के रिश्ते भी आये थे लेकिन उन्होंने सबको ठुकरा कर ज्ञान जी की सहचरी बनाना स्वीकार किया। गुपचुप तरीके से दोनों ने विवाह कर लिया।नागर परिवार इस शादी से खुश नहीं था। उसे अपनी प्रतिष्ठा पर प्रहार लगा क्योंकि ब्राह्मण परिवार की बेटी ने कायस्थ लड़के से विवाह कर लिया। दोनों परिवारों के आत्मीय संबंध कट्टर दुश्मनी में तब्दील हो गये। बहुत लड़ाई हुई। वर्षों का दोस्ताना और उदारवादी वैचारिक आदान-प्रदान सब हवा हो गया। यथार्थ में रह गया जातिवाद और मतभेद। यह समय था १९६७ का। उस समय अंतर्जातीय विवाह बहुत बड़ा अपराध हुआ करता था।नागर परिवार को सामाजिक तौर पर समाज में अपमानित होना पड़ा। सुनयना जी कहती हैं – २५ किलोमीटर दूर से लोग मेरे पिता को सिर्फ़ ताना मारने के लिए बेटी के विवाह की बधाई देने आते थे। बाद में उन्ही की बेटियों ने ईसाई लड़कों से विवाह किया, तब सुनयना जी के पिता २५ किलोमीटर दूर उन्हे बधाई देने गये।माता पिता ने बहुत कोशिश की कि बेटी लौट आए लेकिन सुनयना जी अगाध प्रेम और विश्वास से बंधी थीं। वह कैसे लौट कर आतीं। पिता ने अंत में मुकदमा दायर किया। बेटी को मां ने समझाया कि वकील से कह देना कि तुमको ज्ञान ने फुसलाकर विवाह कर लिया है। लेकिन तब भी और आज भी सुनयना जी भीगी आंखों से भावुक अन्तर्मन से एक ही बात कहती हैं – मैं ज्ञान को अकेला छोड़ देती तो यह साधू हो जाता। मेरे बिना नहीं रह सकता था।ज्ञान जी के साहित्यक जीवन में ४० वर्षों में नागार्जुन, त्रिलोचन, शमशेर से लेकर सातवें-आठवें दशक के हिन्दी का ऐसा कोई लेखक कवि नहीं जो ज्ञान जी के घर न आया हो और उस कम ज़र्दी में भी जब दो कमरों के घर में संघर्ष के दिनों में छोटे बच्चों की पढ़ाई का वक़्त, कभी कोई आधी रात के समय या असमय आ गया, कोई २४ घंटे रहा तो कोई १४ दिन, कोई २० दिन भी रहा। एक बार आलोक धन्वा डेढ़ महीने तक रहे और वहीं रहते हुए उन्होंने “कपड़े के जूते” और “ब्रूनो की बेटियां” कविताएं लिखीं। नागार्जुन जी आए। वह अस्वस्थ थे, उनके कपड़े धो कर सुखा कर उन्हें दिया। खिचड़ी बनाकर खिलाया। कभी अचानक आधी रात में कोई साहित्यकार आ रहा है। सभी का ध्यान रखा। भोजन करवाया ऐसा भी होता था। किसी को शराब पीना होता था। घर भी छोटा था। इस तरह की अस्त व्यस्त साहित्यक दुनिया में, जो ज्ञान जी की जीवन शैली का अभिन्न अंग रही है, भी हर हाल में उन्होंने मेहमानों की आवभगत में कभी कोई कमी नहीं रखी।आज भी उनके बनाए खाने की तारीफ़ लोग करते हैं ।।सुनयना जी ने हर स्थिति परिस्थिति में अपनी सहभागिता बखूबी निभाई ।।”पहल” की पैकिंग में ज्ञान जी के हर छोटे से छोटे काम में वह सहयोग करती रहीं। ज्ञान जी के जीवन में सुनयना जी की गरिमामय उपस्थिति जीवन पर्यन्त बनी रही और आने वाली हर कसौटियों पर वह खरी उतरती रहीं हैं। वह कहती हैं – “यह सब हमने इसलिए नहीं किया कि कहीं दर्ज़ हो।” हमने बच्चों को भी यही सिखाया कि अपने घर पर आया कोई भी अतिथि भूखा नहीं जाना चाहिए ।।साहित्यिक अभिरुचि के प्रश्न पर वह कहती हैं–मेरी रूचि खेल में थी अभिनय में थी। कुछ नाटकों में काम भी किया है। साहित्यक गहराई की मुझे समझ नहीं है लेकिन हां मुझे कविताएं पढ़ना बहुत पसंद हैं।नरेश सक्सेना, मंगलेश डबराल, आलोक धन्वा मेरे प्रिय कवि हैं। ज्ञान जी की कहानियों में “पिता” कहानी उन्हें सबसे अधिक पसंद है ।।सुनयना जी का स्त्री ह्रदय आज भी यही महसूस करता है कि ज्ञान की देखभाल उनके अतिरिक्त कोई नहीं कर सकता है। गहन समर्पण, प्रेम और विश्वास से सराबोर आज भी वह ज्ञान जी के अतिरिक्त कुछ नहीं सोच पातीं हैं ।बचपन की अबोध अल्हड़ उम्र से आज विवाह के ५५ वर्ष पूरे होने पर वह अपनी प्रेम कहानी को डूब कर एक-एक क्षण को उसी जीवंतता से सुनाती और महसूस करती हैं ।।ज्ञान जी के चिन्तन में विश्व और विश्व की समस्याएं हैं वह एक प्रतिबद्ध रचनाकार हैं लेकिन सुनयना जी के चिन्तन में ह्रदय में सिर्फ़ ज्ञान जी के साथ बिताए क्षण के अतिरिक्त कुछ नहीं है। उनका जन्म सिर्फ़ ज्ञान जी को सम्हालने के लिए हुआ है। एक स्त्री ‘मां’ जिसने उन्हें जन्म दिया और ‘सुनयना’ जिन्होंने जीवन भर साथ निभाया और अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया ।।