Wednesday, April 24, 2024
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स्त्री प्रतिरोध की कविता और उसका जीवन

प्रतिरोध की कविताएं

कवयित्री सविता सिंह

स्त्री दर्पण मंच पर प्रसिद्ध कवयित्री सविता सिंह के संयोजन में ‘प्रतिरोध कविता श्रृंखला’ के तहत आप पाठकों ने अब तक वरिष्ठ कवयित्रियों में शुभा, शोभा सिंह, निर्मला गर्ग, कात्यायनी, अजंता देव एवं प्रज्ञा रावत की कविताओं को पढ़ा। सराहा। प्रतिरोध की कविताओं को आप पाठकों द्वारा पसंद किया जाना हमारे लिए गर्व की बात है।
आज हम इस श्रृंखला की अगली कड़ी प्रसिद्ध कवयित्री व आलोचक सविता सिंह की ही कविताएं पेश कर रहे हैं।
प्रतिरोध कविता श्रृंखला” पाठ – 6 में वरिष्ठ कवयित्री प्रज्ञा रावत की कविताओं के बाद आपके समक्ष “प्रतिरोध कविता श्रृंखला” पाठ – 7 में प्रसिद्ध कवयित्री एवं आलोचक सविता सिंह के परिचय के साथ उनकी कविताएं हैं।
प्रेरित एवं प्रोत्साहित करने के लिए आप पाठकों का आभार व्यक्त करते हुए आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार हैं।
रीता दास राम
आज हिन्दी में स्त्री कविता अपने उस मुकाम पर है जहां एक विहंगम अवलोकन ज़रुरी जान पड़ता है। शायद ही कभी इस भाषा के इतिहास में इतनी श्रेष्ठ रचना एक साथ स्त्रियों द्वारा की गई। खासकर कविता की दुनिया तो अंतर्मुखी ही रही है। आज वह पत्र-पत्रिकाओं, किताबों और सोशल मिडिया, सभी जगह स्त्री के अंतस्थल से निसृत हो अपनी सुंदरता में पसरी हुई है, लेकिन कविता किसलिए लिखी जा रही है यह एक बड़ा सवाल है। क्या कविता वह काम कर रही है जो उसका अपना ध्येय होता है। समाज और व्यवस्थाओं की कुरूपता को बदलना और सुन्दर को रचना, ऐसा करने में ढेर सारा प्रतिरोध शामिल होता है। इसके लिए प्रज्ञा और साहस दोनों चाहिए और इससे भी ज्यादा भीतर की ईमानदारी। संघर्ष करना कविता जानती है और उन्हें भी प्रेरित करती है जो इसे रचते हैं। स्त्रियों की कविताओं में तो इसकी विशेष दरकार है। हम एक पितृसत्तात्मक समाज में जीते हैं जिसके अपने कला और सौंदर्य के आग्रह है और जिसके तल में स्त्री दमन के सिद्धांत हैं जो कभी सवाल के घेरे में नहीं आता। इसी चेतन-अवचेतन में रचाए गए हिंसात्मक दमन को कविता लक्ष्य करना चाहती है जब वह स्त्री के हाथों में चली आती है। हम स्त्री दर्पण के माध्यम से स्त्री कविता की उस धारा को प्रस्तुत करने जा रहे हैं जहां वह आपको प्रतिरोध करती, बोलती हुई नज़र आएंगी। इन कविताओं का प्रतिरोध नए ढंग से दिखेगा। इस प्रतिरोध का सौंदर्य आपको छूए बिना नहीं रह सकता। यहां समझने की बात यह है कि स्त्रियां अपने उस भूत और वर्तमान का भी प्रतिरोध करती हुई दिखेंगी जिनमें उनका ही एक हिस्सा इस सत्ता के सह-उत्पादन में लिप्त रहा है। आज स्त्री कविता इतनी सक्षम है कि वह दोनों तरफ अपने विरोधियों को लक्ष्य कर पा रही है। बाहर-भीतर दोनों ही तरफ़ उसकी तीक्ष्ण दृष्टि जाती है। स्त्री प्रतिरोध की कविता का सरोकार समाज में हर प्रकार के दमन के प्रतिरोध से जुड़ा है। स्त्री का जीवन समाज के हर धर्म जाति आदि जीवन पितृसत्ता के विष में डूबा हुआ है। इसलिए इस श्रृंखला में हम सभी इलाकों, तबकों और चौहद्दियों से आती हुई स्त्री कविता का स्वागत करेंगे। उम्मीद है कि स्त्री दर्पण की प्रतिरोधी स्त्री-कविता सर्व जग में उसी तरह प्रकाश से भरी हुई दिखेंगी जिस तरह से वह जग को प्रकाशवान बनाना चाहती है – बिना शोषण दमन या इस भावना से बने समाज की संरचना करना चाहती है जहां से पितृसत्ता अपने पूंजीवादी स्वरूप में विलुप्त हो चुकी होगी।
***
स्त्री प्रतिरोध कविता की इस श्रृंखला में हमारी सातवीं प्रतिष्ठित कवयित्री सविता सिंह हैं जिन्होंने हिंदी में स्त्री कविता और आलोचना दोनों विधाओं में गहरा काम किया है। उनकी कविता ‘मैं किसकी औरत हूँ’ और आलोचनात्मक लेख ‘सौन्दर्य के भयावह फूल : शमशेर की टूटी हुई बिखरी हुई का स्त्रीवादी पाठ, दोनों ने ही हिंदी साहित्य में स्त्री विमर्श को उसके आंतरिक सौन्दर्य बोध में उजागर कर उसे गौरवपूर्ण ढंग से स्थापित किया। भारतीय एवं दुनिया की तमाम अन्य भाषाओं में अनूदित एवं सम्मानित, सविता सिंह को इस श्रृंखला में शामिल कर हमें अपार खुशी हो रही है।
– रीता दास राम
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सविता सिंह का परिचय –
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ख्यात कवयित्री एवं स्त्री विमर्शकार सविता सिंह जी का जन्म फरवरी 1962 को आरा (बिहार) में हुआ।
शिक्षा: राजनीति शास्त्र में एम . ए., एम. फिल., पी-एच.डी. (दिल्ली विश्वविद्यालय)। मांट्रियल कनाडा स्थित मैक्गिल विश्वविद्यालय में साढ़े चार वर्ष तक शोध का अध्यापन। शोध का विषय:’ भारत में आधुनिकता का विमर्श’। सेंट स्टीफंस कॉलेज से अध्यापन आरंभ करके डेढ़ दशक तक दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाया। सम्प्रति इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (इग्नू) में प्रोफेसर। स्कूल ऑफ़ जेंडर एंड डेवलपमेंट स्टडीज की संस्थापक निदेशक।
इंटरनेशनल हर्बर्ट मारक्यूस सोसायटी, अमेरिका के निदेशक मंडल की सदस्य एवं को-चेयर। हिन्दी व अंग्रेजी में सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य, स्त्री विमर्श और अन्य वैचारिक मुद्दों पर निरंतर लेखन, अनेक शोध-पत्र और कविताएं अंतरराष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित।
पहला कविता संग्रह ‘अपने जैसा जीवन’ (2001), दूसरा कविता संग्रह – ‘नींद थी और रात थी’ (2005), तीसरा कविता संग्रह – ‘स्वप्न समय’ (2013), चौथा कविता संग्रह – ‘खोई चीजों का शोक (2021); दो द्विभाषिक काव्य-संग्रह ‘रोविंग टुगेदर’ (अंग्रेजी-हिन्दी) तथा ज़ स्वी ला मेजो़ दे जेत्वाल (फ्रेंच-हिन्दी) 2008 में प्रकाशित, उड़िया में जेयुर रास्ता मोरा निजारा शीर्षक से संकलन प्रकाशित। अभी तक हिन्दी में अप्रकाशित एक और नए कविता संग्रह ‘प्रेम भी एक यातना है’ का उड़िया अनुवाद प्रकाशित (2021)। अंग्रेजी में कवयित्रियों के अंतर्राष्ट्रीय चयन सेवन लीव्स, वन ऑटम (2011) का संपादन जिसमें प्रतिनिधि कविताएं शामिल, पचास कविताएं: ‘नई सदी के लिए’ चयन श्रृंखला के तहत प्रतिनिधि कविताएं प्रकाशित। ‘ ल फाउंडेशन मेजों देस साइंसेज ल दे’ होम, पेरिस की पोस्ट-डॉक्टरेल फैलोशिप के तहत कृष्णा सोबती के ‘ मित्रो मरजानी’ तथा ‘ए लड़की’ उपन्यासों पर काम एवं शोध पत्र प्रकाशित। राजनीतिक दर्शन के क्षेत्र में ‘रियलिटी एंड इट्स डेप्थ : ए कन्वर्सेशन बिटवीन सविता सिंह एंड भास्कर रॉय’, प्रकाशित। आधुनिकता, भारतीय राजनीतिक सिद्धांत और भारत में नारीवाद आदि विषयों पर तीन बड़ी परियोजनाओं पर काम जारी। ‘ पोयट्री एट संगम’ के अप्रैल 2021 अंक का अतिथि संपादन। उड़िया बांग्ला मराठी कन्नड़ आदि भारतीय भाषाओं के अलावा फ्रेंच जर्मन स्पेनिश, पुर्तगाली, डच आदि विदेशी भाषाओं में कविताएं अनूदित-प्रकाशित। कई विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में कविताएं शामिल और उन पर शोध कार्य।
हिन्दी अकादमी और रजा फाऊंडेशन के अलावा महादेवी वर्मा पुरस्कार (2016) तथा युनिस डि सूजा अवार्ड (2020) से सम्मानित।
संपर्क : [email protected]
सविता सिंह की कविताएं :
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1 मैं किसकी औरत हूँ
मैं किसकी औरत हूँ
कौन है मेरा परमेश्वर
किसके पाँव दबाती हूँ
किसका दिया खाती हूँ
किसकी मार सहती हूँ
ऐसे ही थे सवाल उसके
बैठी थी जो मेरे सामने वाली सीट पर रेलगाड़ी में
मेरे साथ सफ़र करती
उम्र होगी कोई सत्तर-पचहत्तर साल
आँखें धँस गयी थीं उसकी
मांस शरीर से झूल रहा था
चेहरे पर थे दुख के पठार
थीं अनेक फटकारों की खाइयाँ
सोचकर बहुत मैंने कहा उससे
‘मैं किसी की औरत नहीं हूँ
मैं अपनी औरत हूँ
अपना खाती हूँ
जब जी चाहता है तब खाती हूँ
मैं किसी की मार नहीं सहती
और मेरा परमेश्वर कोई नहीं’
उसकी आँखों में भर आई एक असहज खामोशी
आह ! कैसे कटेगा इस औरत का जीवन !
संशय में पड़ गयी वह
समझते हुए सभी कुछ
मैंने उसकी आँखों को अपने अकेलेपन के गर्व से भरना चाहा
फिर हँस कर कहा ‘मेरा जीवन तुम्हारा ही जीवन है
मेरी यात्रा तुम्हारी ही यात्रा
लेकिन कुछ घटित हुआ जिसे तुम नहीं जानतीं –
हम सब जानते हैं अब
कि कोई किसी का नहीं होता
सब अपने होते हैं
अपने आप में लथपथ
अपने होने के हक़ से लकदक
यात्रा लेकिन यहीं समाप्त नहीं हुई है
अभी पार करनी हैं कई और खाइयाँ फटकारों की
दुख के एक दो और समुद्र
पठार यातनाओं के अभी और दो चार
जब आख़िर आएगी वो औरत
जिसे देख और भी तुम विस्मित होओगी
भयभीत भी शायद
रोओगी उसके जीवन के लिए फिर हो सशंकित
कैसे कटेगा इस औरत का जीवन फिर से कहोगी तुम
लेकिन वह हँसेगी मेरी ही तरह
फिर कहेगी –
‘उन्मुक्त हूँ देखो,
और यह आसमान
समुद्र यह और उसकी लहरें
हवा यह
और इसमें बसी प्रकृति की गंध सब मेरी हैं
और मैं हूँ अपने पूर्वजों के श्राप और अभिलाषाओं से दूर
पूर्णतया अपनी’
2 विमला की यात्रा
उसे जाना है आज शाम चार बजे रेलगाड़ी से
जाना है पति के घर से इस बार पिता के घर
एक घर से दूसरे घर जाते हैं वही
नहीं होता जिनका अपना कोई घर
बारह साल की उम्र में
विमला ब्याह दी गयी
जब वह गयी पति के घर पहली बार
उस घर को उसने बनाया अपना
लीप-पोत कर चमकाया उसे
कूट-पीस कर हमेशा इकट्ठा किया और रखा
साल-भर का अनाज
धोए सबके पाँव
सिले सबके उधड़े-फटे कपड़े
कहते हैं पति का घर होता है पत्नी का घर
इस बार लेकिन
विमला को जाना है दुख की ऐसी यात्रा पर
जिसके पार उतर
जीवन स्वयं अपने पार उतरता है
दुख से मिल दुख
किसी उजाड़ में जा भटकता है
पति की मृत्यु के बाद औरत का जैसे संसार बदलता है
सुबह से ही ठीक कर रही है विमला
अपने कपड़े
संभाल रही है कशीदाकारी के लकड़ी वाले फ्रेम
रेशम के आधे-अधूरे
उलझे-सुलझे धागे
वे कपड़े जिन पर काढ़ रखे हैं उसने वे सारे फूल
जिन्हें प्रकृति भी नहीं खिलाती
वे फूल जो अमर होते हैं
और सिर्फ स्त्री के हृदय में खिलते हैं
या फिर विमला के लिए
चुपचाप उसके गुमसुम संसार में
पति की मृत्यु के बाद
आज शाम चार बजे
विमला जा रही है अपने पिता के संग
कुछ दिनों के लिए बहलाने मन
वह जा रही है रेलगाड़ी से एक ऐसी यात्रा पर
जिसमें कहीं नहीं आता उसका अपना घर
मन ही मन इसलिए वह मनाती है
हे ईश्वर हों जीवन में मेरे ऐसी यात्राएं अब कम
हो मेरा एक ही जीवन
एक अपना घर
जैसे है मेरी एक आत्मा
3 कुसुम का सत्याग्रह
उसके संताप का आज चौदहवा दिन है
वह कहती है नहीं छूयेगी अन्न
अभी और सात दिन
नहीं बांधेगी केश
न करेगी प्यार
न दया
न देगी दान किसी को
स्वयं को धूल में मिला डालेगी
सब उसके लिए अब है नगण्य
वह सचमुच है मरणासन्न
संताप के इन कठिन दिनों में
बताती है कुसुम
उसे कभी नहीं मिला भर-पेट भोजन
अक्सर बचा-खुचा ही मिला
देखा संभ्रांत पुरुषों ने उसकी तरफ़
कामवश ही अक्सर
किया उसे मजबूर बेबस
किसी ने दया नहीं की उस पर
उसे प्रेम कभी नहीं मिला
समझा गया उसे एक स्त्री ही
फटेहाल दुर्बल
बाल खोले
कभी नहीं बांधने का संकल्प लिए
आत्मसंताप के आखिरी दिन रोती
लेटी है कुसुम सत्य के आग्रह में
4 नया अँधेरा
कोई नया अँधेरा है यहाँ इस बार
विचलित करने वाली सघनता है इसमें
सधी हुई इस तरह कि ढँक दिया है इसने
अंधेरे में भी दिख जाने वाली उन ढेर सारी चीज़ों को जिन्हें जानती थीं हमारी इन्द्रियाँ
बदल दिया है इसने उन तमाम परिचित आवाज़ो को जिनमें संगीत के अलावा थीं चुम्बनों और मनुहारों की अस्फुट ध्वनियाँ
इस अँधेरे को पहचानने आया था एक बच्चा
जिसकी नींद में ख़लल पड़ा था
एक स्त्री आई थी पीले चेहरे वाली लिये हाथ में आईना
एक आदमी उतरा था अपनी साइकिल से इसे देखने
सोचता हुआ कहीं भटक तो नहीं गया वह रास्ता
5 जहाँ मेरा देश था
कुछ दिनों पहले जहाँ एक राह थी
अब वहाँ एक दीवार है
थीं जहाँ हमारी इच्छाएँ वहाँ लालच है सिर्फ
कामना थी जहाँ लहराती वासना है
जहाँ खुशी थी दुख की गझिन छाया है
जहाँ सारा साहस था वहाँ गज़ब की लाचारी है
जहाँ मेरा देश था अब वहाँ एक बाज़ार है
वहाँ उस पेड़ पर बैठा पखेरू जैसा दिखता है जो
वह असल में कुछ और है
रंगीन आँखों वाली मछली जल में तैरती
दरअसल युद्ध में काम आने वाला एक मारक यंत्र है
पड़ोस में रहने वाले सामान्य से दिखते लोग
खतरनाक गुप्तचर हैं हमारा नाम-पता बटोरते
दफ्तर में कोने में बैठने वाला क्लर्क
करता है आजकल अपनी हैसियत से बड़ा काम
वह दर्ज कर रहा है मारे जाने वालों के नाम
मेरा प्रतिनिधित्व करती दिखती सरकार मेरी नहीं
मेरा देश हथिया चुका है कोई और देश
हद है जो कुछ जैसा दिखता है वह वैसा नहीं अब
जहाँ जो कुछ था वहाँ नहीं अब
6 अधिनायक तंत्र
अभी तो सारा का सारा ही जल हिल रहा है
अभी समुद्र पूरा का पूरा हिल रहा है
उफनने का स्वाँग नहीं कर रहा
हिल रहा है
अभी बहुत कुछ होने का अंदेशा हो रहा है
थोड़ी देर में पृथ्वी चौपट हो सकती है
पूरा लोकतंत्र बिखर सकता है
अभी वह भी सोकर जागा है
आलिंगन में उस प्यार को भरने
जिसे वह खो चुका है
अभी सारा का सारा जल हिल रहा है एक साथ
समुद्र जाने कैसा दिख रहा है
अपनी मछलियों को
वह कैसे बचाता है
जब वह इतना हिल रहा है
सोचना बाकी नहीं, जरूरी है
यह तो एक घोंघे ने मुझे बताया
मेरे पैरों तले जो दबा था
कि सारा का सारा जल
भीतर से बाहर तक हिल रहा है
कोई देश जैसे हिलता है अधिनायक तंत्र में
7 मृत्यु तुम कहाँ रहती हो
जब शाम अपने वस्त्र बदल रही हो
रात झपका रही हो पलकें
मृत्यु तब तुम और कहाँ से झाँक रही होती हो
तुम्हारे बारे में वैसे अभी सोचना नहीं चाहती
उस अज्ञात के बारे में सोचना चाहती हूँ
जीवन सरीखी जो भीतर धँसी रहती है
बाहर-भीतर एक करती हुई
सारे दुखों को
मृत्यु तुम अभी दफा हो जाओ
वैसे वे कौन-सी जगहें हैं
जहाँ तुम होती हो
वहीं जाओ
क्या कहा तुमने
तुम हर सिम्त
हर जगह हो
हर प्रांत हर काल में
तुम्हें कैसे पहचानूँ तब
क्या तुम कोई बैक्टीरिया या वायरस
ट्रक या रेलगाड़ी या फिर हवाई जहाज
या वह बिस्तर हो
जिस पर लोग त्यागते हैं प्राण
वह शून्य जिसमें विलीन होते हैं
प्रिय
कौन हो तुम
वैसे भूख की तरह तुम्हें
बहुतों ने जाना है
क्या तुम भूख हो
मगर कैसी
उदर की या मस्तिष्क की
क्या तुम प्रेम की भूख हो
इस भूख में किस तरह मारती हो
तुम मनुष्य को
क्या ऐसी भूख दूसरे जीवों की भी होती है
शायद तुम जानती हो
मत कहना प्रेमियों से ही पूछो
तुम अपने सायं-सायं करते
शून्य को दिखाओ
जिसमें गयी वह आठ बरस की बच्ची
जिसे कई लोगों ने मिलकर मारा
बिस्तर में
बेहोशी और नींद में
पवित्र स्थल में
क्या तुम्हें देखा जा सकता है
क्या हमारा आपस में कभी सामना हुआ है
क्या तुम एक स्त्री सी दिखती हो
चेहरे को ढके हुए
इस संसार से वैसे क्या पर्दा है तुम्हारा
तुम्हारी आँखें मैं देख पाई थी उस दिन
तैरती अनंतता थी वहाँ
अनेक परछाइयों सा तैरता समय
जो जितना दिखता था उतना ही नहीं
मैं उसी अव्यक्त धुंधलके में हूँ
क्या यहाँ मिलना संभव है
खो गए लोगों से
मारी गई आयशा से
क्या वह वहाँ सुरक्षित है अपनी देह संग
क्या वहाँ हमारे जन्म
स्मृतियाँ
धोखे में परिणत होते प्रेम
सब सुरक्षित होंगे
हमारे पाप
क्रूरताएं
क्या सब तुम्हारे पास हैं तुम्हारी सायं-सायं में
मृत्यु क्या सचमुच तुम कोई नींद हो
और यह जीवन एक स्वप्न
यह बात मेरी ही कही है मगर अब पुरानी लगती है
क्या तुम पहचानी जाते ही बदल लेती हो अपना ढब
क्या तुम नई होती रहती हो
कुछ कम निश्चित
ज्यादा निष्ठुर अपने कामों में
मेरे पास कब आओगी
क्या तुम पानी का कोई जहाज बनकर आओगी
मुझे अंदेशा रहता है
एक दिन मैं किसी पानी के जहाज पर चढ़ूँगी
और वह ले डूबेगा मुझे
पानी से हमेशा डर लगता है मुझे
नाव पर तो चक्कर भी आते हैं
जल को चीरती जाती नाव की ओर नहीं करती अपनी आँख
मैं आसमान में ताकती रहती हूँ तब तक
जब तक किनारे ना पहुँचूँ
मुझे सबसे अच्छा पैदल चलना लगता है
तुम सायकिल बनकर आना
और मुझे मारती हुई चली जाना
मामूली होगी यह मौत
मुझे भी पता ना चलेगा
मैं एक मामूली मौत ही मरना चाहूँगी
कई तोपों की सलामी
न हो-हल्ला चाहिए होगा मुझे
बस कोई भीड़ न मारे मुझे
जबरन जय श्री राम न कहलवाए
कोई सरकारी अफ़सर गायब न करे मेरी मिट्टी
जाऊँ बिना झंझट के झगड़े के
बिना क्षत-विक्षत हुए
जैसे हवा जाती है एक घाटी से
दूसरी घाटी में
कोई चिड़िया जैसे
एक डाल से दूसरी डाल पर
8 संपत्ति यह पृथ्वी
यहाँ तो सब कुछ तुम्हारी संपत्ति है
पूरी पृथ्वी ही है निशाने पर तुम्हारे
तुम्हारी तृष्णा से कुछ भी बचा नहीं रहेगा एक दिन
सब कुछ पर होगा तुम्हारा आधिपत्य
छोटी से छोटी भावना पर निर्मम क्रूर दृष्टि तुम्हारी
जानवरों से लेकर मनुष्यों तक
सब पर अधिकार है वैसे भी तुम्हारा
तुम्हारे बच्चे तुम्हारी संपत्ति हैं
तुम उन्हें किसी और तरह से जानते भी नहीं
पत्नियों के स्वामी तो अनंतकाल से रहे हो तुम
मगर बच्चे इस धरती के होते हैं जैसे हम तुम स्वयं भी
प्रकृति जिन्हें सींचती है अपनी नम आँखों से
अपनी हवा से बनाती है जिनके मन
अपनी बारिशों से पैदा करती है वासना
जीवन के लिए
अपने हरे लाल-पीले-बैंगनी अनगिनत दूसरे रंगों से
गढ़ती है उनके अपने रंग
और अब तो उसके पास एक दूसरी कल्पना भी है
तुम्हारे स्वामित्व से उबरने की
जैसे है स्त्री की भी एक अपनी कल्पना
जबरन प्रेम और मोह की गिरफ्त से
छूट कर इस संसार में जीने की
यहाँ सब कुछ तुम्हारी संपत्ति नहीं
कुछ इस तरह सोच कर देखो
कितनी अबाध दिखेगी तुम्हें अपनी ही स्वायत्तता!
9 सहमति
खुशी-खुशी चल रहा है सारा अत्याचार
अपने सिर उतार कर पेश कर रहे हैं लोग खुशी-खुशी
अब तो अपना ही जल्लाद है
जैसे है अपना नाई
वकील और डॉक्टर अपना एक
दर्जी भी एक अपना
वैसे ही खरीदार है अब सबका अपना अपना
खरीदता है जो सब कुछ सारी देह सारा दिमाग
समूचा अंतकरण
सारी सहमति
बेचते हुए कितना हलकापन महसूस होता है
खरीदे जाते हुए कितना संतोष
यह तो बाजार ही जानता है अब
या बाजार में बिकती चीजें
10 अनिद्रा में
कुछ कम उदास करो मुझे मेरे देश
कुछ कम चाहो मुझसे
कितने बदहाल यहाँ के लोग
कितने कम लोगों की ख़ुशी के लिए
फ़ाक़ाज़दा दिन और वैसी ही रातें
कितने थोड़े भरे पेटों के लिए
जंगल के जंगल कारतूस और बंदूकों से लैस अब
रात भर जगे रहते हैं पेड़
कुछ बच नहीं पा रहा
न मर्द, न औरतें, न बच्चे
न रात, न उसका रहस्य
अंधकार प्लास्टिक के फूल-सा मामूली वस्तु भर
स्वप्न बुलेट-सी बिंधी एक आँख
अनिद्रा में तैयार हो रहा है एक
नया देश
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