Wednesday, April 24, 2024
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“फणीश्वर नाथ रेणु की पत्नी लतिका रेणु जैसा मैंने उन्हें जाना”

डॉ. गीता पुष्प शॉ

अब तक आपने हिंदी के करींब 25 नामी गिरामी लेखकों की पत्नियों के बारे में पढ़ा। किस तरह उन्होंने परिवार संभाला त्याग किया और अपने पति की अहर्निश सेवा की। इस बार आप पढ़िए महान कथा शिल्पी एवम स्वतंत्रता सेनानी फणीश्वरनाथ रेणु की पत्नी लतिका रेणु के बारे में। उन्होंने अपने पति की जितनी सेवा और मदद की वह हिंदी की दुनिया मे अप्रतिम उदाहरण है। लतिका जी ने रेणु की दूसरी पत्नी बनना स्वीकार किया। रेणुजी की पहली पत्नी पद्मा गांव में रहती थीं जबकि लतिका जी पटना में रेणुजी के साथ रहती थीं। रेणुजी ने दोनों पत्नियों से अपना रिश्ता बनाए रखा और पहली पत्नी से उनके बाल बच्चे होते रहे।आइए पढ़ते है लतिका जी के बारे में गीता पुष्प शॉ का संस्मरण जिसमें लतिका जी का व्यक्तित्व खुल कर सामने आता है। गीता जी खुद भी एक जानी पहचानी लेखिका हैं और रेणुजी से उनके पति रॉबिन शॉ पुष्प का बड़ा आत्मीय सम्बन्ध रहा है। गीता जी ने रेणु दम्पत्ति को बड़े करींब से देखा है।
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शादी के बाद मैं जबलपुर से बिहार आ गई. बिहार मेरे लिए नया था. एक बार मैं अपने पति रॉबिन शॉ पुष्प के साथ ट्रेन से आरा से पटना आ रही थी. आरा स्टेशन से गाड़ी छूटने ही वाली थी कि एक अत्यंत साधारण सी महिला सूती तांत की पाड़वाली साड़ी पहने झोला लटकाए लगभग दौड़ती हुई ट्रेन में चढ़ी और हमारे पास आकर बैठ गई. कुछ देर बाद उसने मूंगफलियां खरीदीं. हमें भी खाने को दीं. बातों-बातों में मैं जान चुकी थी कि वे शिक्षिका हैं किसी स्कूल में. पटना-आरा ‘डेली पैसेंजरी’ करती हैं. पटना स्टेशन आया. हम उतरकर जाने लगे तो मैंने कहा- “ये मेरे पति रॉबिन शॉ पुष्प लेखक हैं. आप तो शिक्षिका हैं. आपके पति क्या करते हैं?” वे झटपट स्टेशन से बाहर जाते हुए बोलीं- “मेरा आदमी भी कहानी लिखता है.”

एक दिन अचानक रेणु जी हमारे सब्ज़ीबाग वाले घर में आए. पुष्प जी से बोले- “आप तो कॉफी हाउस (जहां रोज़ शाम रेणु जी का अड्डा जमता था और वे कई लोगों से घिरे रहते थे) आते नहीं इसलिए मैं ही आपके घर आ गया.” तब मकईबारी चाय पी जा रही थी रेणु जी को भी चाय दी गई. खुश होकर बोले- “अरे वाह! मकईबारी मेरी भी फेवरेट है”. फिर तो जब आते इसी चाय की फ़रमाइश करते. पुष्प जी ने ‘मकईबारी’ का नाम ‘रेणु लीफ’ रख दिया था. रेणु जी के आते ही पुष्प जी कहते- “गीता, ‘रेणु लीफ’ बनाओ. दोनों की दोस्ती इसी (महंगी, उस समय पटना में मुश्किल से मिलने वाली) चाय से हुई थी. एक दिन रेणु जी बोले- “कभी आपलोग भी आइए हमारे राजेंद्र नगर के फ्लैट में.” इतवार का दिन तय हुआ. हम शाम को तैयार होकर उनके घर पहुंचे. फ्लैट नंबर 2/30, गोल चक्कर, राजेंद्र नगर, पटना. तख्ती लगी थी ‘फणीश्वर नाथ रेणु.’ दरवाज़ा खटखटाया. दरवाजा खुलते ही हम अवाक् रह गए. वही सफेद सूती तांत की पाड़वाली साड़ी पहने साधारण सी महिला सामने खड़ी थीं, जो बोली थीं- “मेरा आदमी भी कहानी लिखता है.” ओह! तो यही हैं रेणु जी की पत्नी लतिका रेणु. वे बोलीं- “बैठिए, रेणु जी घर पर नहीं हैं. आ जाएंगे.” फिर उन्होंने हमें फरही (मुरमुरे) भून कर खिलाई. चाय पिलाई. रेणु जी नहीं आए. देर तक इंतज़ार करके उदास मन से हम घर लौटे. कपड़े बदल लिए. तभी कॉल बेल बजी दरवाजा खोला तो सामने रेणु जी खड़े थे. बोले- “अरे, मैं तो लतिका को बताना ही भूल गया था कि आप लोग आने वाले हैं. आपके लिए ही फल, मिठाई, शरबत लेने बाज़ार गया था. वहां कुछ लोग मिल गए. गप्प में देर हो गई. अब आपको फिर चलना होगा नहीं तो वह सब कौन खाएगा? नहीं चलेंगे तो मैं आज यहीं सोफे पर सो जाऊंगा.” फिर हमें दोबारा तैयार होकर उनके घर जाना पड़ा. उसके बाद रेणु जी से और लतिका दी से बहुत आत्मीयता हो गई.

पुष्प जी ने रेणु जी के कई इंटरव्यू लिए जो धर्मयुग, माधुरी, सारिका आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए. मैंने रेणु जी के बालों के बारे में इंटरव्यू किया था जो ‘छेड़ो ना मेरी ज़ुल्फें’ शीर्षक से धर्मयुग के होली विशेषांक में छपा था. वह एक अनूठा यादगार इंटरव्यू है. फिर तो पुष्प जी ने रेणु जी पर किताब ही लिख डाली ‘सोने की कलम वाला हीरामन.’

लतिका दी रेणु जी की सच्ची जीवनसंगिनी थीं. रेणु जी के पीछे की वह सशक्त महिला थीं जिनकी निरंतर सेवा और सहयोग से रेणु महान साहित्यकार बन पाए. लतिका दी बंगाली थीं पर किसी बंग बाला की तरह तीखे नैन नक्श वाली विपुल केश राशिवाली सुंदरी कदापि नहीं थीं. वह एक सीधी-सादी साधारण नाक-नक्श वाली महिला थीं जिनका चेहरा सदा प्रेम, दया, करुणा जैसे भावों से दीप्त रहता था. अपने घर को एकदम साफ-सुथरा चमकाकर रखतीं. ढेर सारी किताबें, पत्र-पत्रिकाएं जिन्हें अलमारी में जगह नहीं मिलती उन्हें सहेज कर ज़मीन पर ही अलग-अलग ढेरों में करीने से रखतीं. रेणु जी की सेवा में वे जी जान से लगी रहतीं. उनके खाने-पीने, पसंद-नापसंद का पूरा ख्याल रखती थीं. उन्होंने ही बताया था कि रेणु जी को खाने में अरवा चावल और हींग-जीरा छौंकी रहर दाल बहुत पसंद थी. बचा सादा भात कभी पसंद नहीं करते. बने भात को भी कहते कि तल दो. सब्ज़ी में कद्दू, कोहड़ा, तोरई बिल्कुल नहीं खाते थे. कोई साग भी पसंद नहीं था. चबाकर थूक देते थे. परवल बहुत पसंद था. मुर्गी या चिड़िया का मीट बहुत पसंद था. एक टाइम रोज़ मांस या मछली होना ज़रूरी था. खाने में सबसे महंगी हिलसा मछली पसंद थी जो धार के विरुद्ध बहती है. रेणु जी का भी यही स्वभाव था. फलों में मालदा आम कितना भी महंगा हो वही खाते. एक बार में 7-8 आम खा लेते थे. सिगरेट कैप्स्टन या गोल्ड फ्लेक्स पीते पर अपनी माचिस कभी नहीं खरीदते. वह कहतीं- “हम ही को माचिस देना पड़ता था. पहले खादी की धोती पहनते. खूब भारी. हम धो नहीं पाते तो फिर पायजामा पहनने लगे. बाद में धोबी के धुले कपड़े पहनने लगे. खूब खर्चीले. पैदल कभी नहीं चलते हरदम रिक्शा पर”. कहते हुए वे कहीं खो जातीं और इसके विपरीत हमने देखा, सबने देखा था लतिका दी को सदा पैदल चलते, कभी स्कूल जाते, कभी सब्ज़ी-मछली खरीदने मछुआ टोली पैदल जाते हुए. दोनों पति-पत्नी को साथ जाते हुए कभी नहीं देखा.

लतिका दी से रेणु जी की पहली मुलाकात पटना के मेडिकल कॉलेज अस्पताल में जो पी.एम.सी.एच. के नाम से मशहूर है और गंगा के किनारे है, यहीं हुई थी. 1944 में रेणु जी गंभीर रूप से बीमार हुए थे और क्रांतिकारी कैदी के रूप में यहाँ आए थे. यहीं लतिका दी मिडवाइफरी की ट्रेनिंग ले रही थीं. उनकी सेवा से रेणु जी उनके प्रति आकर्षित हुए. रोज़ उनका इंतज़ार करते. नहीं आतीं तो चिट्ठी लिखकर भेजते. जमादार चिट्ठी लेकर जाता और कहता- “एक नंबर बाबू चिठिया दिहिन हैं” (वे एक नंबर रूम में रहते थे इसलिए अस्पताल में उन्हें एक नंबर बाबू कहा जाता था). लतिका दी झिड़क देतीं- “हमें नहीं चाहिए चिट्ठी- विट्ठी” तो जमादार फिर कहता- “एक नंबर बाबू जवाब मांगिन हैं.” ये इतना पीछे पड़े कि लतिका दी को झुकना पड़ा.

एक बार रेणु जी अच्छे होकर गांव चले गए पर फिर दूसरी बार पी.एम.सी.एच. में फिर भर्ती हुए. इस बार उनके मुंह से खून की उल्टियां हो रही थीं. तब लतिका दी सब्ज़ीबाग़ के चाइल्ड वेलफेयर सेंटर की इंचार्ज थीं. रेणु जी ने उन्हें अस्पताल बुलवाया. बहन के मना करने पर भी वे चली गयीं और फिर रेणु जी की सेवा में लग गयीं. इस बार अच्छे होने के बाद रेणु जी ने ज़िद पकड़ ली और फिर हज़ारीबाग जाकर लतिका दी से शादी करके ही माने. शादी के बाद पटना आकर उसी चाइल्ड वेलफेयर सेंटर में रहने लगे. यहीं उन्होंने अपना उपन्यास ‘मैला आंचल’ लिखा था जिसने उन्हें ख्याति के शिखर पर पहुंचाया था.

लतिका दी रेणु जी को ‘जाजी’ कहकर संबोधित करतीं थीं.उन्होंने बताया- “ये पहले बहुत गुस्सैल थे. गुस्से में कुर्ता फाड़ देते. बर्तन-रेडियो सब पटक देते. एक बार अपना रिस्ट वॉच को ईंटा से मार-मार कर चूर कर दिए थे. हमारी शादी के बाद हमारी सहेलियां बोलीं कि शादी का पार्टी दो. रात में हम इन से बोले तो खूब गुस्सा किये बोले- “शादी हमारा हुई, हमसे पार्टी मांगतीं तुमसे पार्टी क्यों मांगी? हम कमाते नहीं हैं इसलिए? तुम नौकरी छोड़ दो. बोलके रातभर हमसे झगड़ते रहे.”

शादी के बाद एक बार लतिका दी अकेली रेणु जी के गांव पहुँचीं. लोग बोले- “कैसे जाएंगी वहां बैलगाड़ी से जाना होगा”. पर वे पहुंच गयीं. जाकर देखा तो आंगन में कुछ महिलाएं और बच्चे. वे बैठीं तो एक महिला ने एक छोटा बच्चा उनकी गोद में रखकर कहा- “तोहर बच्चा छऊ.” वे चौंक गयीं. तब उन्हें पता चला कि रेणु जी पहले ही दो शादियां कर चुके थे. पहली पत्नी रेखा को पैरालिसिस था. बड़ी लड़की उनकी है. दूसरी पत्नी पद्मा और बच्चे सामने थे. लतिका दी कांपते स्वर में बता रही थीं- “जब हमने उनसे पूछा आप शादीशुदा थे, दो शादी कर चुके थे तो फिर हमसे झूठ क्यों बोले? ये बोलने लगे आदमी ज़िंदा रहने के लिए चोरी-डकैती करता है, मर्डर करता है. हम तो सिरिफ झूठ बोले. हम चुप रहे उस दिन कुछ नहीं बोले पर जिस दिन पहली बार फ़िल्म ‘तीसरी क़सम’ का गाना सुने ‘सजन रे झूठ मत बोलो खुदा के पास जाना है’ तो खूब ज़ोर–ज़ोर से फूट-फूट कर रोए”.

लतिका दी के खुद के बच्चे नहीं हुए क्योंकि रेणु जी नहीं चाहते थे बच्चों में आगे चलकर लड़ाई हो. एक बार महिलाओं की नई पत्रिका निकल रही थी- ‘वामा.’ उसके सम्पादक ने मुझसे ‘सूनी कोख का दर्द’ विषय पर संतानहीन महिलाओं से इंटरव्यू लेकर भेजने का आग्रह किया. मैं लतिका दी के पास भी गयी. मैंने पूछा- “आपके अपने बच्चे नहीं हैं, इस बात का दुःख नहीं होता?” वे उदास होकर बोलीं- “बहुत बुरा लगता है जब ये चुपचाप अपने बच्चों के लिए खिलौने, मिठाई, कपड़े वगैरह लेकर गाँव जाते और हमसे छुपाते. कभी गाँव से आते तो हम चुपचाप उनका झोला खोलकर देखते- सफ़ेद कागज़ पर बने हुए छोटे-छोटे बच्चों के पैरों के नाप. हम समझ जाते कि इसी नाप से बच्चों के चप्पल-जूते खरीदकर गाँव ले जाएंगे चुपचाप… फिर हम उस कागज़ को कलेजे से लगाकर जी भरकर रोते रहते.”

“उस दिन भी हम खूब रोए जब ‘रूपु’ भाग गया. ये (रेणु जी) हमको एक असमिया तोता ला दिए. बोले तुम अकेली रहती हो. अब इससे बातें करना. हम उस तोते का नाम ‘रूपु’ रखे. खूब होशियार. खूब बोलने लगा था. पर जिस दिन पिंजरे से निकलकर उड़ गया, उस दिन हम खाए-पीए नहीं और खूब रोते रहे. तब इन्होंने हमसे कहा-रोती काहे हो? ये तो सिरिफ तोता उड़ा है… यहाँ तो एक दिन चुपचाप आदमी भी उड़ जाता है”.

और कुछ वर्षों बाद सच में एक बार फिर रेणु जी बीमार होकर अस्पताल में भर्ती हुए. इस बार उन्हें कोई नहीं बचा सका… जो लतिका दी सावित्री की तरह राजरोग से पीड़ित रेणु जी को कई बार यमराज से बचा कर लाई थीं इस बार वे भी नहीं बचा सकीं. रेणु जी के अवसान के बाद पुष्प जी का ह्रदय स्पर्शी आलेख ‘धर्मयुग’ में छपा था- ‘उड़ गया सोने की क़लमवाला हीरामन.’ लतिका दी त्याग की मूर्ति थीं. बार-बार बीमार पड़ने वाले रेणु जी की उन्होंने जी जान से सेवा की. रेणु जी के मना करने पर नर्स की नौकरी छोड़कर शिक्षिका बनीं. इसके लिए उन्होंने बंगला में एम.ए. भी किया. बहुत कष्ट सहे. पहले रोज़ पटना-आरा ट्रेन से जा कर पढ़ाती थीं फिर पटना में पढ़ाने लगीं. अंत तक बच्चों की ट्यूशन करती रहीं. अपनी ममता का गला घोंटकर सूनी कोख का दर्द सहा. सारे दुखों को आत्मसात करके अंत तक रेणु जी का साथ दिया.

पद्मा रेणु, रेणु जी की दूसरी पत्नी के बारे में मैं कुछ नहीं जानती. कभी देखा भी नहीं उन्हें पर उनके प्रति मेरे मन में श्रद्धा है. रेणु जी ने उन्हें अपनी सुविधाजनक शहरी दुनिया से दूर रखा. गुमनाम रखा. फिर भी उन्होंने अपने घर-बार, खेत और बच्चों को संभालने की ज़िम्मेदारी पूरी निष्ठा से निभाई. अंत समय में, रेणु जी के गुज़रने के वर्षों बाद पटना में अकेली रह रहीं लतिका दी को उनके पुत्र अपने गांव ले गए. पद्मा जी और उनके बच्चों ने आखिरी समय तक लतिका दी की देखरेख की. उन्हें अपने साथ रखा. शायद यह लतिका दी के पुण्य कर्मों का ही फल था जो उन्हें गांव के घर में प्यार और सहारा मिला. रेणु जी के पुत्र ‘पद्म पराग वेणु’ जो विधायक भी हुए थे, उन्होंने गर्व से कहा था कि लतिका मां हमारे पिताजी के लिए और हमारे लिए बड़ी ‘सगुनिया’ थीं.
सच में एक सगुनिया औरत चुपचाप इस दुनिया से चली गई बिना शोर-शराबे के. बिना किसी दिखावे के. कम ही लोग जान पाए कि रेणु को महान कथाकार बनाने के पीछे बार-बार यमराज के हाथों से छीन लाने वाली एक सीधी-सादी दृढ़ प्रतिज्ञ महिला लतिका रेणु थीं जिन्होंने रेणु जी के लिए अपना जीवन होम कर दिया.

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