Thursday, May 23, 2024
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“स्त्री और प्रकृति : समकालीन हिंदी साहित्य में स्त्री कविता”

महादेवी वर्मा की जयंती में ‘स्त्री दर्पण’ मंच ने एक नई शृंखला शुरू की है। जैसा कि आप सभी जानते हैं इस ‘प्रकृति संबंधी स्त्री कविता शृंखला’ का संयोजन प्रसिद्ध कवयित्री सविता सिंह कर रही हैं। इस शृंखला में स्त्री कवि की कविताओं को प्रस्तुत किया जा रहा है। जिसमें उनकी प्रकृति संबंधी कविताएं हैं।
पिछले दिनों आपने इसी शृंखला की अगली कड़ी के रूप में छायावादोत्तर काल की प्रसिद्ध कवयित्री एवम लेखिका सुमित्रा कुमारी सिन्हा की कविताएं पढ़ी।
अब पढिए चर्चित व लोकप्रिय कीर्ति चौधरी की कविता। कीर्ति जी सुमित्रा जी की पुत्री हैं और हिंदी के सुप्रसिद्ध लेखक अजित कुमार की बहन। वह अज्ञेय द्वारा संपादित तीसरे सप्तक की कवयित्री रही। जिसमें कुंवर नारायण, विजय देव नारायण साही और केदारनाथ सिंह भी शामिल थे। वें अपने पति ओंकारनाथ श्रीवास्तव के साथ ब्रिटेन में बस जाने के कारण हिंदी साहित्य से ओझल हो गयी। उनके पति बी.बी.सी. में थे। कीर्ति जी ने कम लिखा पर जो लिखा उत्कृष्ट लिखा।
आप पाठकों के स्नेह और प्रतिक्रिया का इंतजार है।
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कवयित्री सविता सिंह
स्त्री का संबंध प्रकृति से वैसा ही है जैसे रात का हवा से। वह उसे अपने बहुत निकट पाती है – यदि कोई सचमुच सन्निकट है तो वह प्रकृति ही है। इसे वह अपने बाहर भीतर स्पंदित होते हुए ऐसा पाती है जैसे इसी से जीवन व्यापार चलता रहा हो, और कायदे से देखें तो, वह इसी में बची रही है। पूंजीवादी पितृसत्ता ने अनेक कोशिशें की कि स्त्री का संबंध प्रकृति के साथ विछिन्न ही नहीं, छिन्न भिन्न हो जाए, और स्त्री के श्रम का शोषण वैसे ही होता रहे जैसे प्रकृति की संपदा का। अपने अकेलेपन में वे एक दूसरी की शक्ति ना बन सकें, इसका भी यत्न अनेक विमर्शों के जरिए किया गया है – प्रकृति और संस्कृति की नई धारणाओं के आधार पर यह आखिर संभव कर ही दिया गया। परंतु आज स्त्रीवादी चिंतन इस रहस्य सी बना दी गई अपने शोषण की गुत्थी को सुलझा चुकी है। अपनी बौद्धिक सजगता से वह इस गांठ के पीछे के दरवाजे को खोल प्रकृति में ऐसे जा रही है जैसे खुद में। ऐसा हम सब मानती हैं अब कि प्रकृति और स्त्री का मिलन एक नई सभ्यता को जन्म देगा जो मुक्त जीवन की सत्यता पर आधारित होगा। यहां जीवन के मसले युद्ध से नहीं, नये शोषण और दमन के वैचारिक औजारों से नहीं, अपितु एक दूसरे के प्रति सरोकार की भावना और नैसर्गिक सहानुभूति, जिसे अंग्रेजी में ‘केयर’ भी कहते हैं, के जरिए सुलझाया जाएगा। यहां जीवन की वासना अपने सम्पूर्ण अर्थ में विस्तार पाएगी जो जीवन को जन्म देने के अलावा उसका पालन पोषण भी करती है।
हिंदी साहित्य में स्त्री शक्ति का मूल स्वर भी प्रकृति प्रेम ही लगता रहा है मुझे। वहीं जाकर जैसे वह ठहरती है, यानी स्त्री कविता। हालांकि, इस स्वर को भी मद्धिम करने की कोशिश होती रही है। लेकिन प्रकृति पुकारती है मानो कहती हो, “आ मिल मुझसे हवाओं जैसी।” महादेवी से लेकर आज की युवा कवयित्रियों तक में अपने को खोजने की जो ललक दिखती है, वह प्रकृति के चौखट पर बार बार इसलिए जाती है और वहीं सुकून पाती है।
महादेवी वर्मा का जन्मदिन, उन्हें याद करने का इससे बेहतर दिन और कौन हो सकता है जिन्होंने प्रकृति में अपनी विराटता को खोजा याकि रोपा। उसके गले लगीं और अपने प्रियतम की प्रतीक्षा में वहां दीप जलाये। वह प्रियतम ज्ञात था, अज्ञात नहीं, बस बहुत दिनों से मिलना नहीं हुआ इसलिए स्मृति में वह प्रतीक्षा की तरह ही मालूम होता रहा. वह कोई और नहीं — प्रकृति ही थी जिसने अपनी धूप, छांह, हवा और अपने बसंती रूप से स्त्री के जीवन को सहनीय बनाए रखा। हिंदी साहित्य में स्त्री और प्रकृति का संबंध सबसे उदात्त कविता में ही संभव हुआ है, इसलिए आज से हम वैसी यात्रा पर निकलेंगे आप सबों के साथ जिसमें हमारा जीवन भी बदलता जाएगा। हम बहुत ही सुन्दर कविताएं पढ सकेंगे और सुंदर को फिर से जी सकेंगे, याकि पा सकेंगे जो हमारा ही था सदा से, यानी प्रकृति और सौंदर्य हमारी ही विरासत हैं। सुंदरता का जो रूप हमारे समक्ष उजागर होने वाला है उसी के लिए यह सारा उपक्रम है — स्त्री ही सृष्टि है एक तरह से, हम यह भी देखेंगे और महसूस करेंगे; हवा ही रात की सखी है और उसकी शीतलता, अपने वेग में क्लांत, उसका स्वभाव। इस स्वभाव से वह आखिर कब तक विमुख रहेगी। वह फिर से एक वेग बनेगी सब कुछ बदलती हुई।
स्त्री और प्रकृति की यह श्रृंखला हिंदी कविता में इकोपोएट्री को चिन्हित और संकलित करती पहली ही कोशिश होगी जो स्त्री दर्पण के दर्पण में बिंबित होगी।
स्त्री और प्रकृति शृंखला की हमारी चौथी कवि कीर्ति चौधरी हैं। इनकी कविताओं में प्रकृति को अपनाने की उत्कंठा दिखती है। वह लतर जो फूलों के गुच्छों से लदी है, मगर कहीं और खिली है, इन्हें अपनी ही लगती है। स्त्री के अंतःस्थल में कामना किसी फूल, किसी सांझ, किसी पत्ते की प्रीति पाने की है, और आंखों में सांझ को अंजन की तरह भर लेने की अभिलाषा “आंखों में अंजन अंजी सांझ”! सांझ के साथ ऐसी आत्मीयता! यहां प्रियतम प्रकृति ही है, ‘हिय में प्रेम सी बसी। वही एक मात्र सत्य है।’ इसलिए कवि के मन पर अफ़सोस तारी हो जाता है जब वह देखती है कि इतना सहज संबंध भी बिसार देने को मजबूर किया जा रहा है हमारी आधुनिक पितृसत्ता के द्वारा, ” यह कैसी लाचारी है, कि हमने अपनी सहजता ही एकदम बिसारी है”. फिर भी वह इलाहाबाद के कंपनी बाग की तरफ निगाह दौड़ती है, फूल और सिलसिलेवार घास तो दिखती है, मगर बंजर खाली जमीन और मैदान भी दिख ही जाते हैं। इसलिए वह कहती है, ‘प्यार करो, सबसे प्यार करो, जो हमारी तुम्हारी संपत्ति भी नही, उससे भी प्यार करो। प्रकृति के हर तृण को प्यार करो।’ दुनिया इसी से बचेगी और खुशहाल होगी।
आज आप भी पढ़ें कीर्ति चौधरी जी की कविताएं — पैरों के नीचे पतझर के पीले पत्ते / हाथों में ताजे फूलों के हंसते गुच्छे।
कीर्ति चौधरी की कविताएं
—————-
1. लता
बड़े-बड़े गुच्छों वाली
सुर्ख़ फूलों की लतर :
जिसके लिए कभी ज़िद थी —
’यह फूले तो मेरे ही घर !’
अब कहीं भी दिखती है
किसी के द्वार-वन-उपवन,
तो भला लगता है ।
धीरे-धीरे
जाने क्यों भूलती ही जाती हूँ मैं !
ख़ुद को, और अपनापन !
बस, भूलती नहीं है तो
बड़े-बड़े गुच्छों वाली
सुर्ख़ फूलों की लतर :
जिसके लिए कभी ज़िद थी —
’यह फूले तो मेरे ही घर !’
2. आकांक्षा
वृक्षों को फूल दिए
नदियों को पानी
बादल को रंग
हवा करती मनमानी
मुझको ही केवल आकांक्षा-आकांक्षा
तृष्णा
व्याकुल हूँ
नस-नस में उठता तूफ़ान
अरे, कौन दिशा जाऊँ,
मन किससे बहलाऊँ ?
यह गंधों का उत्कट आहवाहन !
आह, व्याकुल हूँ
ऊँचे गिरि गह्वर में,
निर्झर में, प्रस्तर में,
बार-बार घूमा हूँ,
सिंधु के किनारे भी प्यासा हूँ
मधुबन में झर-झर सुवास बीच
कितना चल आया हूँ !
ज्यों का त्यों रिक्त, निर्गरध
रह जाता हूँ
शंकित हूँ, तृषित हूँ
बहुत मोहित, चकित हूँ
आह! किस्से यान शासित हूँ-
जान नहीं पाता हूँ
3. रे मन, रे, तृष्णा कस्तूरी है
और कहाँ पाएगा
फिर-फिर भरमाएगा,
गंध तो तुझी में रे,
यहाँ कहाँ दूरी है !
रे मन, रे, यह तो कस्तूरी है !
धरती की रोशनियाँ
ये तो बुझती ही हैं
कई-कई रंगों वाली
धरती की रोशनियाँ
वे भी बुझ जाते हैं नभ के अंगारे
जो कहलाते पथ-दर्शक
हर भूले-भटके को रास्ता दिखाते हैं
वे भी बुझ जाते हैं
जब बढ़ता है अंधकार
हहराती नदिया-सा
बहते ही जाते हैं
कुंज घने लतिकाएँ द्रुम पल्लव
बड़ी-बड़ी दीवारें घर-आँगन
चिरपरिचित मुखड़ों के आश्वासन, मनुहारें
धार अंधकार की समेट ले जाती है
बरसों का साथ मददगार हाथ
ऐसी कुबेला मे छोड़कर अकेला
आह ! वे तो बुझती ही हैं
कई-कई रंगों वाली धरती की रोशनियाँ
वे भी बुझ जाते है नभ के अंगारे
जो कहलाते पथ-दर्शक
जलती है तो केवल ज्योति वही अंदर की
झिलमिल-झिलमिल
जिसे भूल जाता हूँ बाहरी उजाले में
फिर-फिर उकसाता हूँ
मन के इस निपट निराले में
आह! जलती तो केवल वही है
बाक़ी सब अभिनय है
मिथ्या है
4. पीले पत्ते हँसते गुच्छे
पैरों के नीचे पटझर के पीले पत्ते
हाथों में ताजे फूलों के हँसते गुच्छे
मैं देख रहा-
धीरे धीरे सब बीत गया
मेघावालिया वातास गंध
कुसुमित कानन का कल
वे अंतहीन धूसर उजाड़
हू हू करता पागल समीर
धरती का यह नीरव चिंतन
धीरे-धीरे सब बीत गया
मैं देख रहा पीछे-पीछे
जिस ज्वाला से जल उठता है
वन का अंतस
मेरे नयनों में भी जागी थी वही आग छूने को चाँद उमड़तीं ज्यों ऊँचे लहरें
मेरे अंतर में भी उमड़ी थी वही साध
मुझको मेरी आकांक्षा ने भरमाया था
वन-प्रांत नदी-नद- मेघ-खंड के पार
चकित दौड़ाया था
क्या पाया मैंने क्या पाया ?
माथे पर केवल रेखाएँ
दे आया मैं पथ हो
अपनी सारी संचित अभिलाक्षाएँ
फिर वहीं आ गया दौड़-धूप
लेकर अनुभव झूठे-सच्चे
पैरों के नीचे पतझर के पीले पत्ते !
हाथों में ताज़े फूलों के हँसते गुच्छे !
5. कम्पनी बाग़
लतरें हैं, ख़ुशबू है,पौधे हैं, फूल हैं।
ऊँचे दरख़्त कहीं, झाड़ कहीं, शूल हैं।
लान में उगाई तरतीबवार घास है।
इधर-उधर बाक़ी सब मौसम उदास है।
आधी से ज़्यादा तो ज़मीन बेकार है।
उगे की सुरक्षा ही माली को भार है।
लोहे का फाटक है, फाटक पर बोर्ड है।
दृश्य कुछ यह पुराने माडल की फ़ोर्ड है।
भँवरों का, बुलबुल का, सौरभ का भाग है।
शहर में हमारे यही कम्पनी बाग़ है।
6. एक साँझ
वृक्षों की लम्बी छायाएँ कुछ सिमट थमीं ।
धूप तनिक धौली हो,
पिछवाड़े बिरम गई ।
घासों में उरझ-उरझ,
किरणें सब श्याम हुईं ।
साखू-शहतूतों की डालों पर,
लौटे प्रवासी जब,
नीड़ों में किलक उठी,
नीड़ों में किलक उठी,
दिशि-दिशि में गूँज रमी ।
पच्छिम की राह बीच,
सुर्ख़ चटक फूलों पर,
कोई पर, कूलों पर,
पलकें समेट उधर
साँझ ने सलोना सुख हौले से टेक दिया।
एकाएक जलते चिराग़ों को
चुपके से जैसे किसी ने ही मंद किया ।
दुग्ध-धवल गोल-गोल खम्भों पर,
छत पर, चिकों पर,
वहाँ काँपती बरौनियों की परछाहीं बिखर गई ।
आह ! यह सलोनी, यह साँझ नई !
7. मै तो प्रवासी हूँ :
ऊँचा यह बारह-खम्भिया महल,
औरों का ।
दुग्ध-धवल आँखों में,
अंजन-सी अँजी साँझ
कजरारी, बाँकी, कँटीली,
उस चितवन-सी सजी साँझ
औरों की ।
मेरी तो
छज्जों, दरवाज़ों,
झरोखों, मुँडेरों पर
मँडराते,
घुमड़-घुमड़ भर जाते,
धुएँ बीच,
घुटती, सहमती, उदास साँझ
और–और–और वह शुक्रतारा !
सुबह तक जिस पर अँधियारे की परत जमी ।
8. फूल झर गए
क्षण-भर की ही तो देरी थी
अभी-अभी तो दृष्टि फेरी थी
इतने में सौरभ के प्राण हर गए ।
फूल झर गए ।
दिन-दो दिन जीने की बात थी,
आख़िर तो खानी ही मात थी;
फिर भी मुरझाए तो व्यथा हर गए
फूल झर गए ।
तुमको औ’ मुझको भी जाना है
सृष्टि का अटल विधान माना है
लौटे कब प्राण गेह बाहर गए ।
फूल झर गए ।
फूलों-सम आओ, हँस हम भी झरें
रंगों के बीच ही जिएँ औ’ मरें
पुष्प अरे गए, किंतु खिलकर गए ।
फूल झर गए ।
9. वक्त
यह कैसा वक़्त है
कि किसी को कड़ी बात कहो
तो वह बुरा नहीं मानता|
जैसे घृणा और प्यार के जो नियम हैं
उन्हें कोई नहीं जानता|
ख़ूब खिले हुए फूल को देख कर
अचानक ख़ुश हो जाना,
बड़े स्नेही सुह्रद की हार पर
मन भर लाना,
झुंझलाना,
अभिव्यक्ति के इन सीधे-सादे रूपों को भी
सब भूल गए,
कोई नहीं पहचानता
यह कैसी लाचारी है
कि हमने अपनी सहजता ही
एकदम बिसारी है!
इसके बिना जीवन कुछ इतना कठिन है
कि फ़र्क़ जल्दी समझ में नहीं आता
यह दुर्दिन है या सुदिन है|
जो भी हो संघर्षों की बात तो ठीक है
बढ़ने वालों के लिए
यही तो एक लीक है|
फिर भी दुख-सुख से यह कैसी निस्संगता !
कि किसी को कड़ी बात कहो
तो भी वह बुरा नहीं मानता|
यह कैसा वक़्त है?
10. प्यार करो
प्यार करो
अपने से
मुझसे नहीं
सभी से प्यार करो।
वह जो आँखों से दूर
उपेक्षित पड़ा हुआ,
वह जो मिट्टी की
सौ पर्तों में गड़ा हुआ।
वह जिसकी साँसें
अभी आश्रित जीती हैं,
वे आँखें जो एकदम
सपनों से रीती हैं
उन सबसे
उन सारे के सारे सब से
प्यार करो।
क्या जाने
किसकी बाँहों पर कल का सूरज टिक कर जागे
किसकी आँखों में छुपी ज्योति से
अँधियारा युग-युग भागे।
इतने असंख्य में कौन कि
जिसके माथे स्वर्गिक दाय पले,
क्या पता कहाँ, किसके इंगित पर
कोटि चरण पदचाप चले।
इसीलिए उगते हर अंकुर को
सोते औ’ जगते सब सुर को।
छोटे से रज कन को।
अनदेखे, भूले औ’ बिसरे
हर क्षण को प्यार करो।
अपने से, मुझसे नहीं, सभी से प्यार करो।
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