Wednesday, April 24, 2024
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डायरी के पन्नों में काफ्का से मुलाकात

मित्रो, आज से हर सप्ताह ‘स्त्री दर्पण’ आपके लिए विश्व प्रसिद्ध लेखक काफ्का की डायरियों के पन्ने पेश करेगा।
इस शृंखला की शुरुआत आज से हो रही है। तो पढ़िए कल्पना पंत की इस टिप्पणी के साथ डायरी के कुछ अंश–
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बेंजामिन डी इसराइयली के पिता एवम प्रसिद्ध लेखक इसाक डी इसरायली अपनी किताब ‘Curiosities of Literature’ में लिखते हैं कि, “हम अनुपस्थित व्यक्तियों से पत्रों और स्वयं से डायरी द्वारा बातचीत करते हैं’।” इसरायली का उक्त कथन 20 वीं सदी के महान लेखकों में से एक फ्रांज़ काफ्का पर सटीक बैठता है। काफ्का की डायरियां हमें उस प्रतिभा के धनी व्यक्ति की अमूल्य अंतर्दृष्टि प्रदान करती है जिन्होंने Metamorphosis जैसी असाधारण कृति को रचा है और वह इस सदी की श्रेष्ठ कृतियों में एक शुमार की गयीं। काफ्का की मृत्यु के उपरांत 1948 में प्रकाशित इन डायरियों में काफ्का की चालीस वर्ष की आयु में हुई मृत्यु से एक वर्ष पहले यानी 1910 से 1923 तक के वर्षों का वर्णन है। ये डायरियां प्राग में उनके जीवन, पिता के लिए उनकी भावनाओं, जिस महिला से वह खुद को शादी करने के लिए रजामंद नहीं कर सके, स्वयं के अपराधबोध की भावना, और अपने स्व को बहिष्कृत होने की भावनाओं को मार्मिक रूप से वर्णित करती हैं। वे लगभग असहनीय तीव्रता के जीवन का लेखा-जोखा प्रस्तुत करते हैं।
ये डायरियाँ 1910 से 1913 तक की उस अवधि को दर्ज करती हैं , जब” द ट्रायल,” द कैसल,” आदि के लेखक काफ्का अपनी प्रतिभा को सामने लाने के लिए संघर्ष कर रहे थे। इस दौरान काफ्का सुबह सरकारी बीमा कार्यालय में काम करते थे, दोपहर में अपने पिता के कारखाने में और शाम को दोस्तों के साथ लिखने या मिलने जाते थे। उनकी डायरी, न केवल उनके विचारों और प्रतिबिंबों का भंडार थी, बल्कि वर्णनात्मक लेखन के स्क्रैप, उनके काम के टुकड़े, सपनों के नोटेशन, आलोचनात्मक टिप्पणियां, और मुख्य रूप से उनके सभी लेखनों को पूरा करने के लिए उनके गहन संघर्ष का भी रिकॉर्ड थीं।
काफ्का की डायरियाँ एक कलाकार के रूप में और एक ऐसे व्यक्ति के रूप में लेखक के विकास को दर्शाती हैं, जो अपने और दुनिया के मध्य सामंजस्य बिठाने की निरंतर कोशिश में रत था। डायरी ने उन्हें जीवन और उसकी गतिविधियों को रिकॉर्ड करने की जगह दी, जिसका उन्होंने विशेष रूप से आनंद लिया।
प्रस्तुत अनुवाद फ्रांज़ काफ्का की The Diaries of Franz Kafka 1910-1913 के जोसफ कैश द्वारा अंग्रेजी मे किये गए अनुवाद का हिंदी अनुवाद है।
(अनुवादक हैं – कल्पना पंत प्रोफेसर हिंदी
श्रीदेव सुमन विश्वविद्यालय ऋषिकेश
एवं
तनु बाली असिस्टेंट प्रोफेसर अंग्रेजी राजकीय महाविद्यालय पावकी देवी टिहरी गढ़वाल)
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“फ़्रान्ज़ काफ़्का की डायरी (1910-1913) के कुछ अंश”
पृष्ठ संख्या-14-15
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रविवार का दिन, 19 जुलाई , सोया, जागा, सोया, जागा, तकलीफ़देह ज़िंदगी। जब मैं इस बारे मैं सोचता हूँ तो, कह सकता हूँ कि कुछ मायनों में मेरी शिक्षा ने मेरा काफी नुकसान किया है, सीधे कहूँ तो मेरी शिक्षा किसी प्राकृतिक परिवेश जैसे- किसी खंडहर, पर्वतों-वास्तव में किसी ऐसी जगह नहीं हुई- जिसे मैं बुरा कहूँ। मेरे पूर्व अध्यापकों द्वारा इस बात को न समझ पाने की आशंका के बावजू़द मैं यह कहना चाहूँगा कि वे सभी कुछ समय तक खंडहरों के निवासी रहे होते, सूरज के उस ताप को महसूस कर पाये होते जो मेरे लिये खंडहरों के बीच में से किसी आईवी (लता) पर चमकता, हालाँकि अपनी अच्छाईयों के कारण मैंने आरंभ में कुछ दबाव महसूस किया है परंतु यह अच्छाइयाँ अनायास रूप से मेरे भीतर बढ़ती जा रही हैं|
जब मैं इस विषय में सोचता हूँ तो मुझे कहना ही होगा कि कुछ मायनों में मेरी शिक्षा ने मेरा काफी नुकसान किया है। मेरे भीतर मौजूद यह कटुता अनगिनत लोगों के लिए है — जैसे- मेरे माता-पिता, कई रिश्तेदार, हमारे घर में आने वाले भिन्न-भिन्न लोग , कई सारे लेखक, एक ख़ास रसोईया जो मुझे एक साल तक स्कूल ले जाता रहा, ढेर सारे अध्यापक (जिन्हें मुझे अपनी स्मृति में एक साथ संजो कर रखना ही है, अन्यथा वे मेरी यादों से दूर हो जाएँगे- हाँलाकि मैंने उन्हें अपनी यादों में बनाए रखने की जी तोड़ कोशिश की है, फिर भी वे इधर-उधर होते रहते है एक स्कूल निरीक्षक, धीरे-धीरे गुजरते हुए लोग; संक्षेप में, यह कटुता पूरे समाज से होकर एक खंजर की भांति मुझे आहत करती है। और मैं पुनः दोहराता हूँ कि दुर्भाग्यवश कोई भी ऐसा नहीं है, जो मुझे खंजर के प्रहार से आगाह कर सके। मैं इस तिक्त्तता का विरोध भी नहीं चाहता, क्योंकि पहले से ही बहुत विरोध झेल चुका हूँ, तो मैं इन विरोधियों को अपनी कटुता में जोड़ लेता हूँ, और अब यह घोषणा करता हूँ कि मेरी शिक्षा और विरोधों ने कई मायनों में मेरा बहुत अहित किया है। अक्सर मैं इस बारे में सोचता हूँ और फिर हमेशा मुझे यही कहना पड़ता है किन्हीं मायनों में मेरी शिक्षा ने मेरा नुकसान किया है। मेरा यह दोषारोपण अनगिनत लोगों के प्रति है, वास्तव में वे मेरे समक्ष एक पुरानी सामूहिक तस्वीर की तरह खड़े हैं, वे परस्पर बेगाने हैं, एक दूसरे पर दॄष्टि भी नहीं डालते, भूले से भी एक दूसरे को जानने का यत्न नहीं करत्ते। उनमें मेरे माता पिता, कई रिश्तेदार, कई अध्यापकगण, एक खा़स रसोईया, नृत्यशाला की कई लड़कियाँ, हमारे घर में आने वाले कई लोग, कई लेखक, एक तैराकी प्रशिक्षक, एक टिकट बेचने वाला, एक विद्यालय निरीक्षक और कुछ लोग जिन से मैं यूँ ही मिला हूँ, और बाकी वे लोग हैं जिन्हें मैं न याद कर सकता हूँ और न कभी याद करूँगा। और अंत में वे लोग जिन पर मैंने कतई ध्यान नहीं दिया क्योंकि उनकी हिदायतें थोड़ा मुझे मेरे लक्ष्य से भटकाने वालीं थीं। संक्षेप में इतने सारे लोग हैं कि मुझे यह ध्यान रखना होगा कि उनमें से किसी के नाम की पुनरावृति न कर लूँ। मेरा यह दोषारोपण उन सबके लिए है, इस तरह से मैं उन्हें एक दूसरे से जोड़ता हूँ। लेकिन मैं किसी भी प्रकार उलझना नहीं चाहता। क्योंकि अगर मैं ईमानदारी से कहूँ तो मैंने पहले से ही कई विरोधों को ज़ज़्ब किया है।और क्योंकि कई बार मैं नकार दिया गया हूँ, तो इन विरोधों को भी मैं अपने धिक्कार में शामिल करता हूँ मेरी शिक्षा के अलावा इन विरोधों ने मेरा अहित किया है।
पृष्ठ संख्या-17-20
अब शायद कोई सोचता होगा कि इतने सारे लोगों पर यह आक्षेप इसकी गम्भीरता को समाप्त कर देगा, कि इसकी गम्भीरता कम हो जायेगी क्योंकि मेरी यह कटुता आर्मी जनरल की तरह सपाट नहीं है अपितु व्यक्ति विशेष के आधार पर कम या ज्यादा है। विशेषतया इस संदर्भ में जबकि यह अतीत के लोगों के प्रति है , स्मृतियों में भले ही ये लोग कहीं गहरे बने रह सकते हैं, लेकिन उनके पास शायद ही इसका कोई आधार होगा ओर उनका नामोनिशान भी मिट चुका होगा, और ऎसी परिस्थिति में उन लोगों को उस भूल के लिए कैसे दोषी ठहराया जा सकता है जो उन्होंने एक ऐसे लड़के को शिक्षित कर की जो उन्हीं की भाँति समझ से बाहर है। लेकिन वास्तव में कोई उन्हें वह समय याद नहीं दिला सकता। कोई उन्हें यह करने के लिये बाध्य नहीं कर सकता, वे कुछ याद नहीं कर सकते और अगर आप उन पर दबाव डालते हो तो वे आपको ख़ामोशी से किनारे कर देते हैं, क्योंकि सम्भवतया वे आपकी बातों पर भी ध्यान नहीं देते हैं। थके हुए श्वान की भांति वे खडे रहते हैं क्योंकि अपनी पूरी शक्ति तो वे किसी की स्मृति में बने रहने हेतु खर्च कर देते हैं।
लेकिन अगर आप वास्तव में उनसे कुछ कहलवाना या सुनना चाहेंगे तो आप सिर्फ उनको निन्दात्मक शब्द बुदबुदाते हुए सुनेंगे, क्योंकि लोग मृतकों के प्रति असीम श्रद्धा भाव रखते हैं और उन्हें बहुत अधिक महत्व देते हैं, और यदि यह विचार उचित नहीं है तथा मृतक जीवितों के भीतर भय भी उत्पन्न करते हों, तब भी वे अपने ही जीवित अतीत को अधिक महत्व देंगे और पुनः हम इस बुदबुदाहट को सुनेंगे। आखिरकार ये उनके सर्वाधिक निकट है और यदि यह विचार भी सही नही है और तब भी किसी का पक्ष न ले पाने बावजूद मृतकों को आधारहीन दोषारोपण कतई स्वीकार्य नहीं हों सकते क्योंकि ये आरोप उसी प्रकार से सिद्ध नहीं किये जा सकते, जिस प्रकार से दो लोगों के मध्य किसी एक का चुनाव। शिक्षा के संबन्ध में पूर्व में हुई भूलों को सिद्ध न किये जा सकने का कारण उनकी जवाबदेही कम या अधिक नहीं हो सकती । अगर मैं अपने भीतर विद्यमान कटुता के विषय में कहूँ तो मुझे लगता है कि ऐसी स्थितियों में वह आह में नहीं बदलेगी।
इस कटुता को मुझे समझना ही है। सैद्धांतिक रूप से इसका गहरा आधार है, मेरे द्वारा जो कुछ भी बरबाद किया गया है, हालाँकि, थोड़े समय के लिये मैं उसे छोड़ देता हूँ, और न ही उसके बारे में कोई स्पष्टीकरण देता हूँ, तथा इस विषय पर कोई हंगामा खड़ा नहीं करता। वहीं दूसरी तरफ, मैं बेधड़क कह सकता हूँ, कि मेरी शिक्षा मुझे जो बनाना चाहती थी वह न बनकर मैं कुछ और ही बन गया हूँ । मेरे शिक्षक मुझे उद्देश्य के अनुसार ढाल सकते थे, परंतु उनके द्वारा ऐसा न कर पाने से हुए मेरे अहित के कारण मैंने उन पर सवाल खड़े किए। मैं शिक्षकों से उस व्यक्तित्व की माँग करता हूँ, जो मैं आज हूँ, और क्योंकि वे मुझे वह व्यक्तित्व नहीं दे सकते, मैं उन्हें धिक्कारता हूँ तथा उनके लिये अपनी कटुता के विषय में सोचता हूँ और जोर-जोर से हँसता हूँ परंतु इस सब का एक अलग ही उद्देश्य है। इस कटुता ने मेरे एक अंश को बिगाड़ दिया है- एक अच्छे और खूबसूरत अंश को बर्बाद कर दिया है। (मेरे स्वप्न में कभी-कभी यह मुझे उसी तरह प्रतीत होता है जैसे किसी को एक मृत दुल्हन दिखाई देती है। यह कटुता जो हमेशा आह में परिवर्तित हो जाने के बिंदु पर विद्यमान रहती है, इसे बिना किसी क्षति के एक विशुद्ध भर्त्सना के रूप में किसी अन्य भाव से पूर्व इसके लक्ष्य तक अपने मूल स्वरूप में पहुंचना चाहिए । इस प्रकार से यह प्रबल कटुता जिससे कुछ नहीं हो सकता, अपने साथ क्षुद्र आरोपों को लिए चलती है, यदि प्रबल कटुता आगे बढ़ती है दुर्बल कटुता कुलांचे मारते हुए उसके पीछे हो लेती है, गंतव्य तक पहुंचने पर ,यह स्वयं को अलग दर्शाती है जिसकी हमने हमेशा उम्मीद की है-और प्रबल के समकक्ष हो जाती है। अक्सर मैं इस पर विचार करता हूँ और बिना किसी हस्तक्षेप के अपने विचारों को स्वच्छंद छोड़ देता हूँ, लेकिन मैं सर्वदा इस निष्कर्ष पर पहुंचता हूँ कि जितना मैं समझता हूँ मेरी शिक्षा ने मुझको उससे कहीं अधिक क्षति पहुंचाई है। बाह्य रूप से मैं दूसरों की भाँति ही हूँ, क्योंकि शरीर को लेकर मेरी समझ मेरे शरीर की भाँति ही सामान्य थी, और अगर मैं थोड़ा नाटा या मोटा हूँ, फिर भी कई लोगों को, और तो और लड़कियों को भाता हूँ। इस विषय में कुछ भी नहीं कहा जा सकता, अभी हाल ही में उनमें से एक ने कुछ खास कहा-“आह, अगर मैं तुम्हें एक बार अनावृत देख सकती तो सम्भवतया तुम बहुत अच्छे और चुम्बनीय होगे।” लेकिन अगर मेरा एक ऊपरी होंठ, एक कान, एक पसली, एक उंगली, नहीं होती, अगर मेरा सिर गंजा होता और मेरे चेहरे पर चेचक के निशान होते, तब भी यह मेरी आंतरिक अपूर्णता को पर्याप्त रूप में पूर्ण नहीं कर पाता। यह अपूर्णता जन्मजात नहीं है इसलिए इसको सहन करना और भी अधिक कष्टदायक है क्योंकि औरों की भांति जन्म से मेरे अंदर मेरी मौलिकता, मानसिक दृढ़ता है और कोई भी विवेकहीन शिक्षा इसे इसके स्थान से हटा नहीं सकती। मानसिक संतुलन प्रयोग न किये जाने पर निष्प्रयोज्य हो जाता है और शरीर से एक बंदूक की गोली की तरह चिपक जाता हैअब भी यह मौलिकता मेरे भीतर विद्यमान है, लेकिन कुछ हद तक मेरे पास इससे सामंजस्य बिठाने वाला शरीर नहीं है । मेरी मानसिक मजबूती इस स्तर तक नेतृत्व करने का कार्य नहीं कर सकती और उद्देश्यहीन दृढ़ता विस्फोटक के समान शरीर में विद्यमान रहती है। परंतु यह अपूर्णता भी अर्जित नहीं की गई है, यह मेरे भीतर स्वतः उत्पन्न हुई है और इसमें मेरा कोई दोष नहीं है। इसीलिए बहुत तलाशने पर मुझे अपने भीतर कोई पछतावा नहीं मह्सूस होताहै, पछताना मेरे लिए बेहतर होगा, यह कष्ट को एक तरफ ले जाता है और सब कुछ अकेले सम्मानजनक रूप में निबटा देता है, हम सचेत रहते हैं क्योंकि यह हमें मुक्त कर देता है।
जैसा कि मैंने कहा था, मेरी अपूर्णता न ही जन्मजात है न हीं अर्जित है, परंतु मैं इसे दूसरे से बेहतर झेलता हूं, कल्पना की असीम शक्ति द्वारा, और असाधारण उपायों द्वारा छोटी-छोटी समस्याओं को सहन करता हूँ– जैसे उग्र पत्नी, गरीबी, एक अनिच्छित पेशे को सहना -लेकिन मैं निराशारूपी अंधेरे से घिरा नहीं हूँ अपितु उत्साह और शांति से युक्त हूँ।
अगर मेरी शिक्षा मुझे अपने अनुरूप ढाल पाती तो मैं ऐसा नहीं होता, शायद मेरी युवावस्था इसके लिए नाकाफी थी (बावजूद इसके अपने चालीसवें वर्ष में भी मैं खुलेमन से अल्पकालीन युवावस्था पर खुश हूँ ) सिर्फ इसी वजह से संभवतया मेरे पास इतनी सामर्थ्य शेष है कि मैं अपनी युवावस्था की हीनताओं के प्रति जागरूक हूँ, इन हीनताओं से पीड़ित हूँ, हर तरह से अतीत को दोषी ठहराता हूँ, और, अन्ततोगत्वा, मेरी सामर्थ्य क्षीण हो गई हैं। परंतु यह सारी शक्तियां पुनः उन शक्तियों का अवशेष मात्र हैं जो शैशवावस्था में मेरे भीतर मौजूद थीं। (परंतु ये सारी शक्तियां मेरे बचपन जितनी ही हैं जिन्होंने मुझे युवावस्था के भटकावों के समक्ष अनावृत कर दिया) ठीक उसी प्रकार, जैसे तेजी से दौड़ता हुआ एक रथ धूल और हवा के झोंकों से आवृत होने पर भी बाधाओं को पार करता है ताकि कोई प्रेम में विश्वास कर सके।
मेरी वह शक्ति जो मेरे भीतर की कटुता को बाहर धकेल देती है वही मुझे स्पष्ट रूप से मेरी वास्तविकता से रूबरू कराती है। समय था जब मेरे भीतर क्रोध से उद्दीप्त कटुता के अतिरिक्त कुछ नहीं था, जिस कारण शारीरिक रूप से ठीक होने पर भी, मैं गली में गुजरते लोगों को घेर लेता (रोक देता) था क्योंकि मेरे भीतर की यह कटुता बाहर आने के लिए वैसे ही विकल रहती थी जैसे तेजी से ले जाए जाते हुए टब का जल बाहर छलकने को आतुर रहता है।
वह समय बीत चुका है ये कटुताएँ मेरे भीतर उन अनजाने यंत्रों की भाँति सर्वत्र इस प्रकार फैली हुई हैं कि अब उन्हें झेलने का मेरे भीतर साहस नहीं है।साथ ही मेरी शिक्षा द्वारा मेरे भीतर छोड़ी गयी अनियमितताएँ मुझे अधिक से अधिक प्रभावित करती प्रतीत होती हैं, याद रखने की धुन जो कि मेरी अवस्था के एकाकी लोगों की सामान्य विशेषता है, मेरे हृदय में पुन: उन लोगों की स्मृति जागृत कर देती हैं जो मेरी कटुता के पात्र होने चाहिए, अतीत में होने वाली कोई घटना अब इतनी असामान्य है कि बरबस मेरा ध्यान उस ओर जाता है।
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