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Wednesday, July 10, 2024
Homeकविता“स्त्री और प्रकृति : समकालीन हिंदी साहित्य में स्त्री कविता”

“स्त्री और प्रकृति : समकालीन हिंदी साहित्य में स्त्री कविता”

स्त्री दर्पण मंच पर महादेवी वर्मा की जयंती के अवसर पर एक शृंखला की शुरुआत की गई। इस ‘प्रकृति संबंधी स्त्री कविता शृंखला’ का संयोजन प्रसिद्ध कवयित्री सविता सिंह कर रही हैं। इस शृंखला में स्त्री कवि की प्रकृति संबंधी कविताएं शामिल की जा रही हैं।
पिछले दिनों आपने इसी शृंखला के तहत हिंदी कविता क्षेत्र में विशिष्ट नाम सविता सिंह की कविताओं को पढ़ा।
आज आपके समक्ष प्रसिद्ध वरिष्ठ कवयित्री, उपन्यासकार और स्त्री विमर्शकार अनामिका की कविताएं हैं तो आइए उनकी कविताओं को पढ़ें।
आप पाठकों के स्नेह और प्रतिक्रिया का इंतजार है।
………………………….
कवयित्री सविता सिंह
………………………….

स्त्री का संबंध प्रकृति से वैसा ही है जैसे रात का हवा से। वह उसे अपने बहुत निकट पाती है – यदि कोई सचमुच सन्निकट है तो वह प्रकृति ही है। इसे वह अपने बाहर भीतर स्पंदित होते हुए ऐसा पाती है जैसे इसी से जीवन व्यापार चलता रहा हो, और कायदे से देखें तो, वह इसी में बची रही है। पूंजीवादी पितृसत्ता ने अनेक कोशिशें की कि स्त्री का संबंध प्रकृति के साथ विछिन्न ही नहीं, छिन्न भिन्न हो जाए, और स्त्री के श्रम का शोषण वैसे ही होता रहे जैसे प्रकृति की संपदा का। अपने अकेलेपन में वे एक दूसरी की शक्ति ना बन सकें, इसका भी यत्न अनेक विमर्शों के जरिए किया गया है – प्रकृति और संस्कृति की नई धारणाओं के आधार पर यह आखिर संभव कर ही दिया गया। परंतु आज स्त्रीवादी चिंतन इस रहस्य सी बना दी गई अपने शोषण की गुत्थी को सुलझा चुकी है। अपनी बौद्धिक सजगता से वह इस गांठ के पीछे के दरवाजे को खोल प्रकृति में ऐसे जा रही है जैसे खुद में। ऐसा हम सब मानती हैं अब कि प्रकृति और स्त्री का मिलन एक नई सभ्यता को जन्म देगा जो मुक्त जीवन की सत्यता पर आधारित होगा। यहां जीवन के मसले युद्ध से नहीं, नये शोषण और दमन के वैचारिक औजारों से नहीं, अपितु एक दूसरे के प्रति सरोकार की भावना और नैसर्गिक सहानुभूति, जिसे अंग्रेजी में ‘केयर’ भी कहते हैं, के जरिए सुलझाया जाएगा। यहां जीवन की वासना अपने सम्पूर्ण अर्थ में विस्तार पाएगी जो जीवन को जन्म देने के अलावा उसका पालन पोषण भी करती है।
हिंदी साहित्य में स्त्री शक्ति का मूल स्वर भी प्रकृति प्रेम ही लगता रहा है मुझे। वहीं जाकर जैसे वह ठहरती है, यानी स्त्री कविता। हालांकि, इस स्वर को भी मद्धिम करने की कोशिश होती रही है। लेकिन प्रकृति पुकारती है मानो कहती हो, “आ मिल मुझसे हवाओं जैसी।” महादेवी से लेकर आज की युवा कवयित्रियों तक में अपने को खोजने की जो ललक दिखती है, वह प्रकृति के चौखट पर बार बार इसलिए जाती है और वहीं सुकून पाती है।
महादेवी वर्मा का जन्मदिन, उन्हें याद करने का इससे बेहतर दिन और कौन हो सकता है जिन्होंने प्रकृति में अपनी विराटता को खोजा याकि रोपा। उसके गले लगीं और अपने प्रियतम की प्रतीक्षा में वहां दीप जलाये। वह प्रियतम ज्ञात था, अज्ञात नहीं, बस बहुत दिनों से मिलना नहीं हुआ इसलिए स्मृति में वह प्रतीक्षा की तरह ही मालूम होता रहा. वह कोई और नहीं — प्रकृति ही थी जिसने अपनी धूप, छांह, हवा और अपने बसंती रूप से स्त्री के जीवन को सहनीय बनाए रखा। हिंदी साहित्य में स्त्री और प्रकृति का संबंध सबसे उदात्त कविता में ही संभव हुआ है, इसलिए आज से हम वैसी यात्रा पर निकलेंगे आप सबों के साथ जिसमें हमारा जीवन भी बदलता जाएगा। हम बहुत ही सुन्दर कविताएं पढ सकेंगे और सुंदर को फिर से जी सकेंगे, याकि पा सकेंगे जो हमारा ही था सदा से, यानी प्रकृति और सौंदर्य हमारी ही विरासत हैं। सुंदरता का जो रूप हमारे समक्ष उजागर होने वाला है उसी के लिए यह सारा उपक्रम है — स्त्री ही सृष्टि है एक तरह से, हम यह भी देखेंगे और महसूस करेंगे; हवा ही रात की सखी है और उसकी शीतलता, अपने वेग में क्लांत, उसका स्वभाव। इस स्वभाव से वह आखिर कब तक विमुख रहेगी। वह फिर से एक वेग बनेगी सब कुछ बदलती हुई।
स्त्री और प्रकृति की यह श्रृंखला हिंदी कविता में इकोपोएट्री को चिन्हित और संकलित करती पहली ही कोशिश होगी जो स्त्री दर्पण के दर्पण में बिंबित होगी।
स्त्री और प्रकृति श्रृंखला की हमारी बारहवीं कवि अनामिका हैं। यहां प्रस्तुत कविताओं में एक पूरा ब्रह्मांड है जिसमे मनुष्य का जीवन अपने तमाम रूपों, प्रताड़नाओं और तड़प के साथ प्रस्तुत होता है। यहां नदी भी एक प्यास है और प्यास नदी, यहां एक स्त्री खुद को ही गूंथती है, आटे की तरह बेलती है, बाहर भले ज्वालामुखी बेलते हैं पहाड़। उसका छुटकारा चौका बर्तन करने की नियति से नहीं। उसका अलगाव प्रकृति से इतना है कि वह अपने ही जीवन को प्रकृति का जीवन समझने लगती है जबकि प्रकृति अगाध है अपनी सुंदरता और स्वच्छंदता में। उससे उसका वार्तालाप भी है तो इस अर्थ में कि वह सतही स्तर पर ही उससे बात कर पाती है, “नमस्कार पानी कैसे हो”. इस कवि को एक अंदेशा है, तीसरे युद्ध का, जो शायद हमें और प्रकृति को भी समाप्त कर दे। वह आइंस्टीन से पूछती जैसे आम्रपाली ने बुद्ध से पूछा था कि इस जीवन का क्या हासिल है, जब सबकुछ नष्ट ही हो जाना है। यह एक मासूम सा सवाल है लेकिन इसमें एक दार्शनिकता छिपी हुई है। क्यों आखिर ऐसा सवाल कोई पूछता है यदि गहरी आशंका न हो चीज़ों के टूट जाने या समाप्त हो जाने की, “फूलती है जब कुमुदिनी / मेरी हताहत शिराओं में/ तो टूट जाती है नींद/ एक पक्षी चीखता है विरहदग्ध/ आसमान भी किसी आहत जटायु -सा बस गिरा चाहता है/ कंधों पर।” और यह तब होने जा रहा है जब कोई किसी का ठीक से अपना भी न बन पाया। फिर वह यह भी सोचती है कि आखिर इन हालातों में कैसे हो प्रकृति से मैत्री, “मदिर मौन से शब्दों की…प्रकृति की विकृति से, आकाश की धरती से / आग से पानी की कैसे सधे मैत्री”.
स्त्री की देह से ही एक नई सभ्यता संभव होगी ऐसा कवि को लगता है, वही जनेगी वैसे मनुष्य जो फिर से सबकुछ ठीक कर पायेगा। यह प्रकृति की ही शक्ति होगी आखिरकार!
अनामिका की ऐसी महत्वपूर्ण कविताएं जो जीवन का भेद खोलती हों, आप भी पढ़े।
बरसों से बिछूड़ी / दो वृद्धा बहनें – चांद और धरती/ आलिंगनबद्ध खड़ी हैं निश्चल! ढीली गठरी उनके दुखों की तट पर पड़ी है।
अनामिका की दस कविताएं
——————–
1. चौका
मैं रोटी बेलती हूं जैसे पृथ्वी।
ज्वालामुखी बेलते हैं पहाड़।
भूचाल बेलते हैं घर।
सन्नाटे शब्द बेलते हैं, भाटे समुंदर।
रोज सुबह सूरज में एक नया उचकुन लगाकर,
एक नई धाह फेंककर
मैं रोटी बेलती हूं जैसे पृथ्वी।
पृथ्वी-जो खुद एक लोई है
सूरज के हाथों में
रख दी गई है, पूरी-की-पूरी ही सामने
कि लो, इसे बेलो, पकाओ,
जैसे मधुमक्खियां अपने पंखों की छांह में
पकाती हैं शहद।
सारा शहर चुप है,
धुल चुके हैं सारे चौकों के बर्तन।
बुझ चुकी है आखिरी चूल्हे की राख भी,
और मैं अपने ही वजूद की आंच के आगे
औचक हड़बड़ी में
खुद को ही सानती,
खुद को ही गूंधती हुई बार-बार
खुश हूं कि रोटी बेलती हूं जैसे पृथ्वी।
2. विस्फोट
पहला बम फोड़ती है हरदम भाषा ही
उंगली उठाकर,
उंगली जो एक सामने वाले पर उठती है
तो चार अपनी तरफ!
भाषा की अलग-अलग जेबों में
अलग-अलग पॉकेट बम-
विस्फोट अर्थों-अनर्थों का!
टुकुर-टुकुर देख रहे हैं शब्द सारे
सब-कुछ है धुआं-धुआं!
जिन्दगी फिर पढ़ रही है ककहरा!
याद आ रहे हैं आइंसटीन-
तीसरा युद्ध जो हुआ तो चौथा
पाषाण युग के हथियारों से ही
लड़ा जायेगा!
विस्फोट के ऐन एक मिनट पहले
किसी ने वादा किया था,
जिन्दगी का वादा!
घास की सादगी
और हृदय की पूरी सच्चाई से
खायी थीं साथ-साथ जीने और मरने की कसमें!
विस्फोट के ऐन एक मिनट पहले
किसी ने चूमा था नवजात का माथा!
विस्फोट के ऐन एक मिनट पहले कोई सत्यकाम
जीता था सर्वोच्च न्यायालय से
लोकहित का कोई मुकदमा
तीस बरस के अनुपम धीरज के बाद!
पहला ही नम्बर घुमाया था
विस्फोट के ऐन एक मिनट पहले!
विस्फोट के ऐन एक मिनट पहले
नालान्दा पुस्तकालय की
जली हुई चौखट पर
बुद्ध से मिली आम्रपाली-
‘हे भन्ते,
नहीं जानती,
मेरे जीवन का हासिल क्या!
जीने की तैयारी में
सारी जिन्दगी गयी!
मेरे सगे थे वही जिनकी मैं सगी न हुई
मेरे वे सारे सम्बन्ध
जो बन ही नहीं पाये,
वे मुलाकातें जो हुईं ही नहीं,
वे रस्ते जो मुझसे छूट गये
या मैंने छोड़ दिये,
उढ़के दरवाजे जो खोले नहीं मैंने
शब्द जो उचारे नहीं
और प्रस्ताव जो विचारे नहीं-
मेरे सगे थे वही
जिनकी मैं सगी न हुई!
रोज आधी रात को
फूलती है जब कुमुदिनी
मेरी हताहत शिराओं में
तो टूट जाती है नींद!
एक पक्षी चीखता है कहीं विरहदग्ध!
आसमान भी किसी आहत जटायु-सा
बस गिरा ही चाहता है
मेरे कन्धों पर
और हृदय में उमड़ता है सन्नाटा
प्रलय मेघ-सा!
कब तक चलेगा भला ऐसा?
क्या है उपाय शान्ति का
बाहर या भीतर हृदय के हृदय में?
कैसे सधे मैत्री
मदिर मौन से शब्द की,
श्यामविवर वाले स्तम्भन से
मौन की महाप्राण यतिगति की,
प्रकृति से विकृति की,
आकाश से धरती की मैत्री,
दुख के दारुण दावानल से
सुख-स्वप्न की झींसियों की,
आग से पानी की
कैसे सधे मैत्री-
जो इतने दिन नहीं सधी,
कैसे मानें कि सधेगी ही!
कुछ कहा था बुद्ध ने फिर से
कानों के कान में नहीं
विस्फोट के ऐन एक मिनट पहले!
3. जनम ले रहा है एक नया पुरुष
सृष्टि का नौवां महीना है, छत्तीसवां हफ्ता
मेरे भीतर कुछ चल रहा है
षड्यन्त्र नहीं, तन्त्र-मन्त्र नहीं,
लेकिन चल रहा है लगातार!
बढ़ रहा है भीतर-भीतर
जैसे बढ़ती है नदी सब मुहानों के पार!
घर नहीं, दीवार नहीं और छत भी नहीं
लेकिन कुछ ढह रहा है भीतर:
जैसे नई ईंट की धमक से
मारे खुशी में
भहर जाता है खण्डहर!
देखो, यहां……बिलकुल यहां
नाभि के बीचों-बीच
उठते और गिरते हथौड़ों के नीचे
लगातार जैसे कुछ ढल रहा है,
लोहे के एक पिण्ड-सा
थोड़ा-सा ठोस और थोड़ा तरल
कुछ नया और कुछ एकदम प्राचीन
पल रहा है मेरे भीतर,
मेरे भीतर कुछ चल रहा है
दो-दो दिल धड़क रहे हैं मुझमें,
चार-चार आंखों से
कर रही हूं आंखें चार मैं
महाकाल से!
थरथरा उठे हैं मेरे आवेग से सब पर्वत,
ठेल दिया है उनको पैरों से
एक तरफ मैंने!
मेरी उसांसों से कांप-कांप उठते हैं जंगल!
इन्द्रधनुष के सात रंगों से
है यह बिछौना सौना-मौना!
जन्म ले रहा है एक नया पुरुष
मेरे पातालों से-
नया पुरुष जो कि नहीं होगा-
क्रोध के और कामनाओं के अतिरेक से पीड़ित,
स्वस्थ होगी धमनियां उसकी
और दृष्टि सम्यक-
अतिरेकी पुरुषों की भाषा नहीं बोलेगा-
स्नेह-सम्मान-विरत चूमा-चाटी वाली भाषा,
बन्दूक-बम-थप्पड़-घुड़की-लाठी वाली भाषा,
मेरे इन उन्नत पहाड़ों से
फूटेगी जब दुधैली रौशनी
यह पिएगा!
अंधियारा इस जग का
अंजन बन इसकी आंखों में सजेगा,
झूलेगी अब पूरी कायनात झूले-सी
फिर धीरे-धीरे बड़ा होगा नया पुरुष-
प्रज्ञा से शासित-अनुकूलित,
प्रज्ञा का प्यारा भरतार,
प्रज्ञा का सोती हुई छोड़कर जंगल
इस बार लेकिन वह नहीं जाएगा।
4. पूर्ण ग्रहण
बरसों की बिछड़ी
दो वृद्धा बहनें-
चांद और धरती-
आलिंगनबद्ध खड़ी हैं निश्चल।
ग्रहण नहाने आई हैं शायद
गंगा तट पर।
ढीली गठरी उनके दुखों की-
तट पर पड़ी!
ठुड्डी उठाई जो
चांद ने धरती की तो
बिलकुल सिहर गई!
तेज बुखार था उसे
रह गई थी सिर्फ झुर्रियों की पोटली!
वह रूप कहां गया?
‘ऐ मौसी,
टीचरजी कहती हैं, नारंगी है पृथ्वी!’
‘नारंगी- जैसी लगती है,
लेकिन नारंगी नहीं है
कि एक-एक फांक चूसकर
दूर फेंक दी जाए सीठी!
5. नमस्कार, दो हजार चौंसठ
नमस्कार, दो हजार चौंसठ!
नमस्कार, पानी!
कैसे हो? इन दिनों कहां हो?
नमस्कार, पीपल के पत्तो,
तुमको बरफ की शकल याद है न?
दूर वहां उस पहाड़ की चोटी पर उसका घर था,
कभी-कभी घाटी तक आती थी-
मनिहारिन-सी अपनी टोकरी उठाए:
दिन-भर कहानियां सुनाती थी परियों की!
कैसे तुम भूल गए उसको?
नमस्कार, नदियो!
दुबली कितनी हो गई हो।
आंखों के नीचे पसर आए हैं साये!
क्या स्वास्थ्य अच्छा नहीं रहता?
स्वास्थ्य केन्द्र चल तो रहा है?
कैसा है पीपल का पेड़ और ढाबा?
कई बरस पहले
मुझे टेªन में एक लड़का मिला था?
उसकी उन आंखों में
इस पूरी दुनिया की बेहतरी का सपना था!
क्या तुमने उसको कहीं देखा?
उसके ही नाम एक चिट्ठी है,
एक शुभकामना-सन्देश मंगल-ग्रह का:
चांद की मुहर उस पर है,
आई है कोरियर से लेकिन
पता है अधूरा,
मोबाइल नम्बर भी है आधा मिटा हुआ!
क्या मिट्टी कर लेगी इसको रिसीव
उसकी तरफ से?
आओ, अंगूठा लगाओ, मिट्टी रानी,
नमस्कार!
अच्छा है- कम-से-कम तुम हो-
पीछे-पीछे दूर तक मेरे-
उड़ती हुई!
6. भाषा थेरी बोली
झोली फैलाए हुई, मैं भाषा थेरी के घर चली गई।
वह ममता का सागर थी, मुझसे कहने लगी-
‘सत्य ही मेरा स्तन्य है,
मेरी यह गोद है तुम्हारा घर!
मेरा घर?
मेरे हैं कई – कई घर, कई सहचर,
मैं कहीं अंटती नहीं,
सांसें हैं मेरी असवारी,
जाती हूं भीतरी शिराओं तक तुम्हारी
और लौट आती हूं वापस अपनी खुदी तक!
जो देखता है, मुझे देखता है,
जो सुनता है, सुनता है मुझको!
मैं स्वाद हूं, मैं ही जिह्वा,
मैं गन्ध, मैं ही हूं पृथ्वी-
फूलों-फलों-औषधियों का मत्त विलास!
जो जानता है, मुझे जानता है,
वाणी मैं, ब्रह्माण्ड है कोख में मेरी!
सातों समुन्दर मेरा आंचल,
सन-सन-सन बहती हुई सब दिशाएं मैं,
इस सृष्टि का पहला आंसू,
उद्दीप्त मुस्कान पहली,
हरीतिमा घास की मैं ही, आकाश की नीलिमा,
हिमाच्छन्न हो मेरा मन तो मैं
साधूं निरंकुश सी सकदम,
रस-रंग-गंध और ध्वनियां इस सृष्टि से बहिष्कृत करूं
और मना कर दूं फूलों को-
खबरदार, यदि खिले।
सारा यह रूप तुम्हारा, तुम्हारी यह चेतना, मेरा उपहार है तुम्हें!’’
7. जानना
किसी को जानना
मोल ले लेना है
अपने लिए एक और आईना
और एक अच्छा इयरफोन
जिससे कि साफ-साफ सुन सकते हैं
कि आखिर क्या बातें करता है
बाड़े की भटकोइयों से
बिके हुए खेत की तरह फैला सन्नाटा!
सुन सकते हैं जरा और ध्यान देने पर
हवाओं में गोल-गोल नाचती हुई झीनी बुइया-सी
किसी और देश-काल से आई
वृद्धा वेश्याओं की फीकी हंसी
दुनिया के सबसे बड़े पागलखाने के
किसी पुरातन पागल के एकतारे की जैजैवन्ती,
किए-अनकिए सारे अपराधों की लय पर
झन-झन-झन जंजीरें बजा रहे कैदी की
अचानक जगी कुकुरखांसी,
सारे नियमों की उलटबांसी,
और वे गुम आहटें
मृतप्राय भाषाओं की
जिनका कि एक भी अक्षर
पड़ता नहीं पल्ले-
फिर भी जिनमें होती है कुव्वत
पानी के भीतर बसे अपने
मायावी नागलोक-तक खींच लेने की
(तिनकों का कोई सहारा लिए बिना डूबे सन्दर्भ बन जाते हैं नागमणियां यहीं!)
किसी को जानना
एक बड़ी उत्तप्त-सी छलांग है
पहले अपने बाहर,
फिर अपने भीतर-
देर तलक हिलता है जिससे
तालाब का पानी!
एक बार बरसते हैं बादल,
पेड़ तीन बार बरसते हैं-
हर बारिश के बाद
पेड़ों की डालियां हिलाते हुए
सोचते थे हम।
किसी को जानना
सब भूली-बीसरी बातों का
धीरे-धीरे याद आ जाना है!
जनना हो जाना है
बूंद-बूंद लोकती हुई
थर-थर-थर पत्ती!
8. नदियां
भिक्षां देहि!
अन्न एक मुट्ठी! सम्भव अगर हो!
ठठरी है। गठरी है!
जब तक है, है ही। तो द्वार खुले?
क्या खुलने ही चाहिए सारे दरवाजे?
पूरा ब्रह्माण्ड एक भीख की कटोरी-
तृष्णा-थेरी
मुण्डितमाथ
तृष्णा-नदी
प्रफुल्लगात!
प्रतिबिम्बित इसमें आकाश
और चांद और तारे! ये भिक्षापात्र सारे!
कानों के कान में कहीं
बह रही है कानों-कान
एक बतरस नदी!
आंखें की आँख जानती है,
जिह्वा की जिह्वा भी अन्न मांगती है
कि शब्द ब्रह्म है शायद ऐसे ही।
सूर्य नहीं है वहां, नहीं चन्द्रमा,
बिजली भी नहीं चमकती, सब अग्नियां मन्द है-
जठराग्नि के सिवा!
अंधियारी -सी कन्दरा में कहीं
बहती है तृष्णा-नदी!
× × ×
बन्द दरवाजे के पार
ऊंघती-सी दोपहर में
दूर किसी घर में कुछ गिरा है
पीतल की गगरी-सा!
लुढ़कती चली आई है टुनटुनाहट
कई देहलियां लांघकर!
आवाज की एक नदी बह गई है
इस घर से उस घर तक!
इसमें धोकर अपने थके हुए हाथ
सोचती है यह उसकी
चौंकी हुई उदासी-
हर घर से हर घर तक जाती है राह,
इतना अकेला नहीं होता है आदमी!
एक गूंज का दामन पकड़े
अनगूंजें कितनी चली आएं कब भीतर-
कौन कहे!
क्या जाने कौन-कहां-कब का खोया
किस रूप-रस-गन्ध-ध्वनि की उंगली पकड़े
आ जाए मिलने, कहे-
‘कहो, पहचाना? कैसे हो?’
× × ×
नहीं, नील नदी नहीं, मिसीसिपी भी नहीं, नहीं वोल्गा
दुनिया की सबसे प्रशस्तमन नदी है प्रतीक्षा।
नदियों की आंखों ने क्या-क्या देखा है,
देखे हैं भंवरों की बांहों में नाचते हुए सार्थवाह
और उधर तट पर
आकाशदीप बालती उनकी प्रेयसियां सदियों से
आंखें बिछाए हुए लहरों पर!
प्यास भी एक नदी है वैसे,
एक विलम्बित प्यास-
बालू के भीतर-भीतर बहती
ले जाती है हमको कहां से कहां!
दुनिया की सब सभ्यताएं
प्यास के तट पर बसीं!
सौदागर मोतियों से जहाज भरे हुए
आमरण भटकते रहे
एक प्यास से दूसरी तक!
× × ×
कहते हैं, एक नदी में दूसरी बार
पड़ता नहीं कोई जाल!
मछुवारे जब तक पहुंचते हैं-
शाम से अगली सुबह तक के बीच
नदियां हो जाती हैं नई-नई,
बह चुका होता है सब पुराना पानी,
बह जाती है सब आनी-बानी-
ऋतुमतियों-जैसी प्रगल्भ और कटी-कटी
रहती है रात को नदी-
करवटें बदलती हुई!
बह जाती हैं सारी स्मृतियां सपनों में,
अवचेतन में डूब जाते हैं सारे नैवैद्य
और चांद-तारे!
सुबह किसी भूले हुए स्वप्न-सी
उठ जाती है आंख मलती हुई!
विस्मृतियां भी हैं नदी शायद,
बोलो, तुम्हीं बोलो, है कि नहीं?
शकुन्तला मुझसे कल बोली-
‘मछली के पेट की अंगूठी
मेरा पहचान-पत्र क्यों होती।
भरत के पिता के जो साथ गई,
वह भरत की मां रही होगी,
मैं तो नहीं थी!
एक नदी में दूसरी बार
पड़ता नहीं कोई जाल,
मैं भी थी एक नदी-
स्मृतियों -विस्मृतियों
प्यास और प्रतीक्षा की
एक उद्दाम लहर-
एक अनन्त से
अनन्त तक
उद्भ्रांत-सी
घूमती!
9. ‘निर्भया की मां का बारहमासा’ सीरीज के तीन अंश :
(क) पूस
ठिठुर रही है ठठरी,
बुझ रही है देह की कांगड़ी
धुआं गया जीवन
पर पूरा पका नहीं-
कचकच रहा ये शकरकंद।
प्रेमचन्द के ‘पूस की रात’ का वह किसान,
नीलगायें, कुत्ता
लेट गए हैं एक साथ
धू-धू जले खेत की
उस गरम राख में।
चेखव के किस्सों की
घोड़ागाड़ी से जुता कोहरा
चला जा रहा चाल दुलकी
मॉस्को की सूनी सड़कों पर
नथुनों से धुआं-सा निकालता!
अभी-अभी एक डॉक्टर उतरेगा
घोड़ागाड़ी से
और एकदम से पकड़ लेगा
नब्ज समय की!
जैसे कि निर्भया नहीं जानती थी
उस रात मुझे ‘बाई’ कहने के पहले,
कि वो अब कभी नहीं लौटेगी घर,
डिप्थीरिया का मरीज-
वह रूसी बच्चा भी
क्या जानता था कि
पेंसिल चबानी नहीं चाहिए थी!
कितना भी भारी
सवाल हो गणित का
यह जिन्दगी,
दांतों-तले दबा रखने को
होती है बस उंगली-
एकदम से कनकनाती हुई!
मझको पढ़ाई थी
रूसी कहानियां निर्भया ने ही,
जब कुछ अच्छा पढ़ती-
उसकी आंखें
थोड़ी और बड़ी,
और भी स्पप्निल हो जातीं
जीवन की ट्रेन के बाहर
अचानक ही कूद पड़ी
अन्ना केरिनिना की आंखों-सी!
(ख) जेठ
ब्रह्मांड पर
चुल्लू-भर चिप-चिप धूप थाप
बरगद की रूखी लटें
उंगली से सुलझााए जाती वह चंचल हवा
निर्भया है क्या?
मनिहारिन-सी
मारकर पालथी
जेठ की दुपहरी
क्यों लगाती है बाजार अब भी?
रोल-गोल्ड की पत्तियां-डालियां,
बिंदियां, चूड़ियां फैन्सी
जिस पर फबती थीं इतनी ज्यादा,
वो तो चली गई!
लिखा था बड़े अक्षरों में
मरघट पर लिखा था-
‘यहीं तलक का साथ था,
पहुंचा दिया, धन्यवाद,
आगे हम खुद ही चले जाएंगे!’
ऐसा ही कहती थी वो मुझसे
रोज गली के मोड़ पर
“अब लौट जाओ न, अम्मा,
आगे हम खुद ही चले जाएंगे!’’
क्या सचमुच चली गई?
ऐसा नहीं है,
उल्टे पांव लौट आएगी
जैसे लहरें लौट आती हैं तट पर,
लौट-लौट आते हैं
उसके सब साथी,
जाते हैं जब मुझसे मिलकर
लौटती है मुझ तक
उनमें ही
मेरी नन्हीं निर्भया।
(ग) कातिक
शुरू हो गया होगा सोनपुर में
कातिक का मेला !
‘का हो, का गोदना गोदाई’
पूछ रहे होंगे
मेलाघुमनियों से
उनके साईं।
तरह-तरह के गोदने
उन दिनों थे फैशन में।
जो भी बिछड़ जाता था
कातिक मेले में
अपनों से-
गोदने दिखाता हुआ लौटता था घर,
कोई पूछे कि हो किसी लुगाई
तो झट से हाथ दिखाओ और छुट्टी-
बोलना भी न पड़े!
× × ×
तरह-तरह के गोदने
गिरमिटिया दस्तों में कहां-कहां तक गए!
देखो उधर-
किसी और के जुर्म में
जेल काटने को लाचार
एक बेकसूर आदमी
एकटक देखे चला जाता है
उस अपने ‘सियाराम’ को
जो उसके हाथ पर गुदे हैं।
× ×
चांद ने गुदवाए थे गोदने
रात के नाम के
सी-सी-सी करते हुए।
× ×
धरती पर स्वस्तिक का
गोदते हुए गोदना
हिटलर जब जोर से हंसा था,
खून की नदी बह गई थी
धरती की दूध-भरी छातियों से।
× ×
छोटा-सा एक फूल
गुदवाया था मेरी नानी ने
कि नाना जब लौटेंगे युद्ध से-
वो दिखाएगी!
पर नाना लौटे कहां।
प्रेम की सारी अधूरी कहानियां
हैं दरअसल गोदना
युद्ध-क्लांत इतिहास की छाती पर
जमकर गोदा हुआ!
जब भी चलती थी कातिक में हवा
कनकनाती हुई
पूछती थी निर्भया
संग-संग मेरे लगी
एक ढेर कपड़े पछीटती
‘ऐ अम्मा, क्यों है नदी इतनी ठंडी-
क्या बर्फ से इसने प्यार किया था कभी?’
10. महाभिषग
1.
दांड्यायन, ये ही वे जंगल हैं
जहां सिकन्दर मिलने आया था आपसे!
पूछा था उसने यहीं पर-
क्या वह कर सकता है आपके लिए!
‘सामने से हट जाओ,
तुम बाधित कर रहे हो धूप का रास्ता, ऐ विजेता
बोले थे आप जिस ठस्से से, दांड्यायन, जंगल के पोर-पोर में वो ही ठस्सा
फूल गया औषधि-लताओं-सा!
गौंडों और भीलों ने उन्हें रक्त से सींचा।
पेटेंटेड औषधियों के युग में, दांड्यायन
फिर बाधित है रास्ता-
धूप-हवा-रोशनी-नदी घेरे
उद्दंड खड़ा है विजेता!
2.
दो गौंड़ सखियां
खोदकर लाई हैं औषधियां
जरा सुनो-
क्या कह रही हैं वे-
‘औषधि लताओ-
तुम सब जो हो आस-पास अभी
और तुम जो यात्रा पर गई हो,
आपस में बातचीत कर लो-
एकमत होकर दो आशिष इन औषधियों को
जा हम लाई हैं
विनयपूर्वक खोदकर- धरती की गुम चोटों की खातिर!
3.
धरती की बांह से सटी-लेटी
औषधियां
दरअसल हैं उसकी बेटियां-
उसके पुण्यों का प्रसाद!
धरती की पीठ कड़कड़ा जाती है बोझ से जब भी
ये ही तो सहलाती हैं पीठ उसकी,
और सींच देती हैं उसकी पीड़ित संधियाँ
अपने अमृत से !
4.
घुमड़ रहे हैं हर दिशा से
ये बाण जहरीले!
बिंधती हैं, फिर भी नहीं चुकता अमृत
औषधियों का!…
उनकी नहीं होती एक्सपायरी डेट कोई,
हरदम ही रहती हैं हरी-भरी, प्रायः प्रसन्न।
और देखो तो मुझे!
दुर्वचनों से फक्क पड़ी हुई
मैं क्यों हूं फीकी-
लावण्यहीन खाद्य-सी श्रीहत, बेस्वाद, थोड़ी-सी कड़वी।
मेरे लिए उच्चरित
दुर्वचनों की औधधि, मुझे मधुर करेा!
आएं-न-आएं मुझे युक्तियां जीवन की-
तुम मेरे भीतर के खेत में खिलो-
बाड़ों पर जैसे दुपहरिया के फूल।
इतना खिलो, खिलो खुलकर ऐसे मुझमें-
मैं खुद ही बन जाऊं औषधि
धरती के घावों की!
कहते थे महाभिषग,
बुद्धत्व के बीज सबमें हैं,
सारी वनस्पतियां हैं औषधि
तो क्या मैं भी?
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