Wednesday, April 24, 2024
Homeलेखकों की पत्नियां"क्या आप सलमा शानी को जानते हैं?"

“क्या आप सलमा शानी को जानते हैं?”

“काला जल” और शानी जी को भला कौन भूल सकता है? एक समय काला जल का मतलब शानी और शानी का मतलब काला जल हो गया था। जो एक बार उनसे मिला, वह उनका मुरीद हो गया। आज अगर वह होते 90 साल के होते। उनके निधन को 22 साल हो गए। राही मासूम रज़ा के आधा गांव, बदीउज्जमा के “छाको की वापसी “और शानी का “काला जल ” भारतीय मुस्लिम समाज के दस्तावेज हैं।
साक्षात्कार और समकालीन भारतीय सहित्य तथा नवभारत टाइम्स के रविवार्ता परिशिष्ट के संपादक शानी जी ने कुछ दिन श्रीपत राय की कहानी का भी संपादन किया था लेकिन लोग सलमा शानी को कम जानते हैं। आज उनके पुत्र फिरोज शानी अपनी माँ के अनूठे व्यक्तित्व के बारे में बता रहे हैं।
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– फ़ीरोज़ शानी
पापा यानी शानी जी हिंदी साहित्यिक फ़लक पर एक भारी भरकम शख़्सियत के मालिक थे लेकिन ज़िंदगी में उनकी असली ताक़त मम्मी यानी सलमा शानी थीं।
जैसा कि जानी-मानी लेखिका चित्रा मुद्गल ने अपने नए उपन्यास नकटौरा में पापा के साथ हुई उनकी बातचीत का ज़िक्र किया है:
“चित्रा जी यक़ीन कीजिए, मैं बहुत बुरा आदमी हूं, इस बुरे, लुच्चे, लफंगे आदमी को सलमा जैसी पाक-साफ़ बीवी जाने कैसे मिल गई….।“
यह पापा की अपने बारे में राय थी। हमारे लिए तो वह पापा थे। हमें तो वह हमेशा अच्छे ही लगे। हां, चीज़ों को लेकर वह कभी-कभी ओवर रियेक्ट ज़रुर किया करते थे जो कई बार मुनासिब भी नहीं लगता था। लेकिन अम्मी के बारे में जो उनकी राय थी उससे सहमत न होने का सवाल ही पैदा नहीं होता।
पापा और मम्मी दोनों के मिज़ाज…एक ज़मीन तो दूसरा आसमान। पापा मुखर तो मम्मी ख़ामोश, पापा शोला तो मम्मी शबनम, पापा क़लम के कामिल तो मम्मी ख़ानेदरी की माहिर।
वह दोनों रेल की दो पटरियों की तरह एक दूसरे के पूरक थे…अलग-अलग भी साथ-साथ भी।
शायद इसीलिए पापा, मम्मी को सलमा कहते थे….सलमा यानी शांति..सुकून या मेहबूबा। जबकि मम्मी का असली तो सलीमा था। मम्मी के माता-पिता यानी हमारे नाना नानी उन्हें सलीमा कहकर ही पुकारते थे।
साहित्यिक दुनियां में पापा की शाम की महफ़लें बहुत मशहूर थीं। जैसे ही शाम ढलने लगती, पापा को लगने लगता, या तो ‘किसी को बुलाया जाए’ या ‘किसी के घर जाया जाए।‘
लेकिन ‘घर बुलाने’ का पलड़ा हमेशा भारी रहता। ज़ाहिर है बावर्ची ख़ाने से लेकर पार्टी की तमाम ज़िम्मेदारियां मम्मी के कंधों पर होतीं…लेकिन उनके माथे पर कभी कोई बल नहीं…हमेशा ख़ामोशी से मुस्कुराते हुए…वह ख़ुशी-ख़ुशी अपनी ज़िम्मेदारियां निभातीं। महफ़िल में जाम से जाम टकरा रहे होते, क़हक़हे गूंज रहे होते, लज़ीज़ खानों की ख़ुश्बू फैल रही होती…लेकिन दावत की कामियाबी की चमक मम्मी के चेहरे पर देखी जा सकती थी। कई बार तो पापा अचानक एक साथ आठ-दस मेहमानों के साथ घर पहुंचते…लेकिन मम्मी की पेशानी पर कोई शिकन नहीं।
पापा और मम्मी की शादी कब हुई थी, इस बारे में तो पता नहीं लेकिन जगदलपुर के ज़माने से पापा के बचपन के अंतरंग मित्र आलोचक प्रो. धनंजय वर्मा के अनुसार शादी शायद वर्ष 1957 में हुई थी लेकिन मुझे इस पर शक़ है। शादी के एक साल बाद ही पहली बेटी शहनाज़ हुई थीं जिनका जन्मवर्ष 1957 है। दो साल बाद दूसरी बेटी सूफ़िया हुई जिनका जन्मवर्ष 1959 है। इस लिहाज़ से शादी शायद 1956 में हुई होगी।
मम्मी का जन्म कब हुआ था इसकी भी कोई जानकारी हमारे पास नहीं है लेकिन हम लोग उनका जन्मदिन 11 मार्च को मना लिया करते थे। 16 मई 1933 में पापा का जन्म हुआ था।
मम्मी रायपुर के पास धरसिमां गांव में एक दारोग़ा परिवार में पैदा हुईं थीं। पढ़ाई-लिखाई कोई ख़ास नहीं। शादी के बाद भोपाल आकर उन्होंने 11वीं बोर्ड की परीक्षा ज़रुर पास की। ज़ाहिर है डिग्रियों की ‘क़ाब्लियत’ तो उनके पास नहीं थी लेकिन जन्मजात क़ाब्लियत इफ़रात में थी। वह दुनिया-शनास और ग़ज़ब की दुनियादार थीं। बड़ी से बड़े से बडे मुश्किल लम्हों में वह चट्टान की तरह खड़ी रहती थीं फिर चाहे वह पापा की बीमारी का मामला हो या कोई पारीवारिक मसला हो। यही वजह थी कि पापा दुनियां भर में किसी को कुछ भी कह सकते थे लेकिन मम्मी के सामने उनकी ज़बान को संयम के दायरे से बाहर जाते हुए नहीं देखा।
ख़ुद पापा ने बताया था कि एक महिला प्रशासनिक अधिकारी उनके मोहपाश में थीं और शादी भी करना चाहती थीं लेकिन चाहकर भी पापा, मम्मी को त्यागने का साहस नहीं बटोर पाए। उन्हें समाज का कोई भय नहीं था। वह मम्मी की शख़्सियत की कशिश ही थी, जिसके दायरे से बाहर निकलने का साहस पापा नहीं कर पाए।
मम्मी एक संपन्न परिवार से आती थीं लेकिन पति के गर्दिश के दिनों में काफी अभाव देखा। पापा के अनुसार अभाव के बावजूद तुम्हारी मां ने कभी कोई शिकायत नहीं की। अच्छे दिन (जो ज़्यादा दिन नहीं टिके थे) आने पर एक बार जब पापा ने उनसे कुछ मांगने को कहा था तो पहले तो उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया फिर अपनी सूनी कलाईयों पर नज़र डालकर बहुत आहिस्ता से कहा, ‘दिला सकते हो तो दो कंगन दिलवा दो।’ ये मामूली सी बात भी उन्होंने बहुत संकोच से कही थी। उन्हें कंगन मिले।
उनका आत्मविश्वास और धैर्य कमाल का था। ग्वालियर में मुझे बचपन डिप्थीरिया हो गया था और अस्पताल में दाख़िल करवाना पड़ा जहां एक के बाद बच्चे दम तोड़ रहे थे। सौ रुपये का इंजेक्शन लगाकर डॉक्टर ने कह दिया कि बस इसके आगे हम कुछ नहीं कर सकते। पिता जी के होश उड़ गए लेकिन मां के चेहरे पर ज़रा भी शिकन नहीं थी या हो सकता है कि वह इस संकट की घड़ी में मेरे साथ अपने पति को भी संभालना चाहती हों। बहरहाल, रात भर वो अस्पताल के बिस्तर पर मुझे गोद में लिए बैठी रहीं और एक दो दिन में मैं ख़तरे से बाहर आ गया।
पापा को हाई ब्लड प्रेशर और डायबिटीज़ की शिकायत थी। दिलचस्प बात ये है कि अंग्रेज़ी भाषा का ज़रा सा भी ज्ञान न होने के बावजूद मम्मी उन्हें वक़्त पर सही बीमारी की सही दवा दे देती थीं। यहां शायर निदा फ़ाज़ली का इस शेअर का पहला मिसरा उन पर एकदम सटीक बैठता-तुम्हारी लाचारियों में मैं, तुम्हारी बीमारियों में मैं………। उनकी तीमारदारी का ये आलम था कि कभी थकती ही नहीं थीं। पति को दिल का दौरा पड़ा हो या फिर किडनी ख़राब होने के बाद डायलिसिस चल रहा हो, मम्मी की तीमारदारी न तो कभी कोई कोताही हुई और न ही उन्होंने कभी धैर्य खोया।
मुझे मम्मी किसी भी स्टीरिओ टाइप मां की तरह कभी नहीं लगी, थीं भी नहीं। अमूमन भारतीय माएं पिता की ग़ैरहाज़री में बच्चों को लेकर थोड़ी लापरवाह हो जाती हैं या यूं कहें कि बच्चे पिता के आतंक से मुक्त होकर मां से लिबर्टी लेने लगते हैं। लेकिन मम्मी के साथ ऐसा बिल्कुल नहीं थी। वह पापा की ग़ैरहाज़री में काफ़ी सख्त हो जाया करती थीं, ख़ासकर मेरे साथ क्योंकि बहनें तो अनुशासित थीं और अमूमन घर में या पड़ौस में अपनी सहेलियों के साथ वक़्त बिता लेती थीं लेकिन मैं छुट्टे सांड की तरह हो जाया करता था। मुझे शाम सात बजे तक घर वापस आने का आदेश था ताकि होमवर्क और पढ़ाई कर सकूं। पापा के रहते इस नियम का कड़ाई से पालन होता था। लेकिन एक बार पापा जब शहर के बाहर थे तो मैं दोस्तों के साथ देर शाम तक खेल रहा था और तभी मम्मी हाथ में हैंगर लिए आईं और दो जमाकर, हाथ पकड़कर घर ले गईं, रास्ते में खरी-खोटी सुनाई सो अलग। हैंगर का प्रयोग एक बार तब भी हुआ जब उन्हें पता चला कि मैं कुछ दोस्तों के साथ चुपचाप घर में बताए बिना भदभदा चला गया। दरअसल भोपाल की भदभदा में अक़्सर हादसे होते रहते थे। बच्चे मौजमस्ती के लिए वहां जाते थे और फिर ख़बर आती थी कि दो बच्चे डूबकर मर गए। ये बात मम्मी को पता चल गई थी। लौटने पर उन्होंने मेरी फिर हैंगर से आवभगत की लेकिन इस बार एक दो नहीं बल्कि दस-बारह बार इसका प्रयोग किया गया। मैंने उन्हें इसके पहले इतने ग़ुस्से में कभी नहीं देखा था। दरअसल ये उनका ग़ुस्सा कम किसी हादसे की आशंका से पैदा हुई चिंता ज़्यादा थी। मेरे हाथों, पैरों और पीठ पर हैंगर के निशान पड़ गए थे। उनका ग़ुस्सा तो शांत हो गया लेकिन शायद आत्मग्लानि में उस रात उन्होंने खाना नहीं खाया था। एक बात मुझे आज तक समझ में नहीं आई कि अमूमन माएं जब ग़ुस्से में बच्चों को पीटती हैं तो हाथ या फिर चप्प्ल का इस्तेमाल करती हैं। ज़ाहिर है इन दोनों हथियारों से वे हमेशा लैस रहती हैं। फिर मम्मी क्यों हमेशा हैंगर उठा लेती थीं….?
पढ़ाई के बाद मैं नौकरी करने लगा और तभी मम्मी के साथ मेरा रिश्ता भी बदल गया, वो दोस्त की तरह व्यवहार करने लगीं और मेरी ज़रुरतों या शौक़ का ख़्याल रखने लगीं। सर्द रातों में जब मैं पीटीआई से नाइट शिफ़्ट करके रात तीन बजे लौटता था तो वह धीरे से मेरे कमरे में आकर खाने के साथ-साथ रम का एक लार्ज पैग भी रख जाती थीं। अक्सर रात तो जब पापा की सिगरेट ख़त्म हो जाती थी तो पापा मम्मी से कहकर मेरे पास से सिगरेट मंगवाते थे। मम्मी कमरे में आकर बोलती एक सिगरेट देना, पापा ने मंगवाई है। कभी-कभी तो सिगरेट लेकर और उसे वहीं ख़ुद जलाकर मुस्कुराते हुए धुंआ उड़ाकर कमरे से बाहर चली जाती थीं।
भोपाल आते-आते मम्मी का बुर्का उतर चुका था और वो पारंपरिक कुर्ता और ग़रारा छोड़कर साड़ी पहनने लगी थीं। और तो और उनका ब्लाउज़ स्लीव लैस होता था जो साठ के दशक के अंत में किसी मध्यम वर्गीय परिवार के लिए लगभग अकल्पनीय था। भोपाल के साउथ टी.टी. नगर की जिस लाइन में हम लोग रहते थे, वहां की औरतों के बीच इसे लेकर कानाफूसी भी हुआ करती थी। हम लोग यहां नए थे और लोगों से बातचीत का दौर शुरु भी नहीं हुआ था। शुरु-शुरु में शानी नाम से किसी को भी ये एहसास नहीं हुआ कि ये एक मुस्लिम परिवार है लेकिन बाद में लोगों को पता चला कि दरअसल शानी उपनाम है और उनका असली नाम गुलशेर ख़ान है। पड़ौस में डॉ. हफ़ीज़ रहा करते थे। उनका पूरा परिवार बेहद मज़हबी था, ख़ासकर मिसेज हफ़ीज़ तो कट्टर मुसलमान थीं जो पांचों वक़्त की नमाज़ पढ़ा करती थीं और जब भी बाहर निकलती थीं तो बुर्का ज़रुर पहनती थी। उन्हें जब शानी परिवार की असलियत पता चली बहुत हैरानी हुई। हैरानी की तो तब इंतहा हो गई जब उन्हें पता चला कि मिसेज शानी फ़िल्में भी देखती हैं। मम्मी अक़्सर न्यूमार्किट के पास रंगमहल थिएटर में फ़िल्म देखने जाया करती थीं। एक दिन मिसेज़ हफ़ीज़ ने इधर उधर की बातचीत के दौरान बहुत ही आहिस्ता से पूछा-
’सुना है तुम फ़िल्म देखने जाती है, क्या सच है? ’
’हां, देखती हूं, क्यूं? ’
’अरे….शानी साहब को पता है? ’
’मैं तो कई बार नाइट शो उनके ही साथ जाती हूं।’
’लेकिन इस्लाम में ये हराम है, गुनाह है।’
’क्यूं, इसमें क्या बुराई है, सब देखते हैं, मैं भी देखती हूं।’
’लेकिन इस्लाम में इसकी मनाही है, अच्छी बात नहीं है।’
’न हुआ करे, मुझे तो फ़िल्म देखना अच्छा लगता है…।’
एक पल के लिए तो मिसेज़ हफ़ीज़ ठिठक गईं और फिर बोलीं-
’अच्छा ये तो बताओ फ़िल्म में होता क्या है?’
’एक हीरो होता है एक हिरोइन होती है, दोनों में इश्क़ होता है फिर नाच गाना होता है और क्या।’
कुछ दिन के बाद मिसेज़ हफ़ीज़ ने मम्मी से धीरे से कहा कि अगली बार जब फ़िल्म देखने जाओ तो मुझे बताना, मैं भी चलूंगी, लेकिन डॉ. साहब या घर में किसी को भी पता नहीं चलना चाहिए। मम्मी ने मुस्कुराकर कहा कि फ़िक्र मत करो, हम बारह से तीन का शो देखेंगे, तब तक तुम्हारे डॉ. साहब भी कॉलेज जा चुके होते हैं।
इसके बाद तो मिसेज़ हफ़ीज़ को फ़िल्म देखने का वो चस्का लगा कि कोई भी नयी फ़िल्म नहीं छूटी। धीरे-धीरे उनका बुर्का भी कपड़े की अल्मारी में कहीं दफ़्न हो गया। इस तरह सलमा शानी ने एक सीधी-साधी अल्लाह से डरने वाली मिसेज़ हफ़ीज़ को ‘क़ाफ़िर’ बना दिया।
मम्मी पूरे जोश के साथ त्यौहार मनाती थीं, चाहे ईद हो, बक़रीद हो या फिर होली-दीवाली हो। होली पर वो बारह बजे तक दोपहर का खाना तैयार कर देती थीं और फिर मोहल्ले की तमाम औरतों की लीडर बनकर एक-एक घर जाकर औरतों को ऐसा रंगती थीं कि उनके आने की ख़बर से ही औरतें जान बचाकर भागने की कोशिश करने लगती थीं।
मम्मी ने अपने पति का लिखा कोई साहित्य नहीं पढ़ा, उन्हें इसमें कोई दिलचस्पी भी नहीं थी लेकिन हां, वह एक अलमारी में उनकी तमाम किताबें ताला लगाकर रखती थीं ताकि कोई ले न जाए। खाना बनाना उनका शौक़ था और पापा के सारे साहित्यकार मित्र उनके हाथ के बने खाने के कायल थे। यूं तो अक़्सर शामें महफ़िलों से सजी रहती थीं लेकिन ईद या बक़रीद के ख़ास मौक़ों पर पापा की मित्र मंडली का रुख़ मम्मी के घर की तरफ़ हो जाया करता था जहां वह बहुत शौक़ से बिरयानी, क़ोरमा और कवाब परोसा करती थीं।
मम्मी बहुत कम बोलती थीं लेकिन जब भी बोलती थीं पते की बात बोलती थीं। राजेंद्र यादव अक़्सर उनसे फ़्लर्ट किया करते थे और मज़ाक में कहते थे क्या यार सलमा, तुम कब तक इस आदमी के खूंटे से बंधी रहोगी, चलो भाग चलते हैं। इस पर वो बस मुस्कुरा दिया करती थीं। ये बात राजेंद्र जी ने कई बार कही थी। ऐसी ही एक शाम जब वो घर आए हुए थे तब उन्होंने यही बात फिर दोहराई। इस पर मम्मी किचन जाते रुकीं और पलटकर कहा- ‘चलो भागते हैं लेकिन पहले मन्नू (राजेद्र यादव जी की पत्नी मन्नू भंडारी) से तो पूछ लो…..।’
मम्मी की कमाल की यादाश्त थी। घर में रखा कोई दस्तावेज़ हो या फिर गली मोहल्ले की गलियाँ या सड़क, वो कभी नहीं भूलती थीं। लेकिन विडंबना ये रही कि अपने आख़िर समय में उनकी यादाश्त चली गई। वो किसी को भी नहीं पहचानती थीं, अपने बच्चों को भी नहीं। चार-पांच महीने की बीमारी के बाद आख़िरकार 22 जनवरी 2000 को दिन में उनकी तबीयत बहुत ख़राब हो गई। मैं हमारे पारिवारिक मित्र और डॉक्टर प्रदीप बिजलवान को लेने भागा। जब वो आए और उन्होंने मम्मी को देखा तो उनकी आंखे बंद थी लेकिन वह जोर-ज़ोर से सांस ले रहीं थीं जिसकी आवाज़ अजीब और भयावह भी थी। मैंने डॉ. साहब की तरफ़ सवालिया नज़र से देखा तो उन्होंने कहा, ‘Its death rattles”. मैंने फिर उन्हें उसी नज़रों से देखा तो उन्होंने कहा कि इनकी सांसे उखड़ रही हैं……और इस तरह हमेशा ख़ामोश रहने वाली सलमा शानी ज़रा-सा शोर मचाकर हमेशा के लिए ख़ामोश हो गईं।
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