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Wednesday, July 10, 2024
Homeगतिविधियाँकथक केवल देह की भाषा नहीं वह विचार का भी माध्यम है

कथक केवल देह की भाषा नहीं वह विचार का भी माध्यम है

नई दिल्ली।कथक सिर्फ देह की भाषा औरअभिव्यक्ति का माध्यम नहीं है बल्कि वह विचार का भी माध्यम है ।
यह बात कल हिंदी के प्रख्यात कवि संस्कृति कर्मी अशोक बाजपेई ने संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित जयपुर घराने कीप्रसिद्ध नृत्यांगना प्रेरणा श्रीमाली की पुस्तक “तत्कार” के विमोचन समारोह के मौके पर कही ।
सेतु प्रकाशन द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक के लोकार्पण समारोह का आयोजन रजा फाउंडेशन ने किया था। पुस्तक का लोकार्पण संगीत नाटक अकैडमी से सम्मानित वयोवृद्ध कथक नृत्यांगना मंजू श्री चटर्जी ने किया ।इस अवसर पर सुप्रसिद्ध नृत्यांगना माधवी मुद्गल नृत्य समीक्षक मंजरी सिन्हा प्रसिद्ध लेखिका अनामिका सुपरिचित कथाकार मनीषा कुलश्रेष्ठ ने भी पुस्तक के बारे में अपने विचार व्यक्त किए ।समारोह में विदुषी गायिका पद्मश्री रीता गांगुली शास्वती सेन लीला वेंकटरमन गीतांजलि लाल जयंत कस्तुवार साधनाश्रीवस्तव आदि मौजूद थे।

श्री वाजपयी ने समारोह के अंत में कहा कि वह प्रेरणा को गत 50 सालों से जानते हैं और कुछ लोगों की तरह उन्होंने उनकी प्रतिभा को बहुत पहले भांप लिया था ।वह पिछले 30 साल से प्रेरणा को यह पुस्तक लिखने के लिए उकसा रहे थे और आखिरकार उन्होंने यह महत्वपूर्ण पुस्तक लिखी।हिंदी में वैसे भी नृत्य पर कथक पर कम किताबें हैं और जो हैं उनमें घरानों और गुरुओं का बखान है लेकिन नृत्य के बारे में चिंतन परक और सृजनात्मक किताब नहीं है।प्रेरणा ने इस कमी को पूरा किया और सबसे बड़ी बात कि उसने योजना बनाकर यह किताब नहीं लिखी।
उन्होंने बताया कि प्रेरणा परम्परा में गृहस्थ होकर भी नृत्य में प्रयोग करती रहीं है।यूँ तो कविता का नृत्य से कोई संवाद नहीं है पर वर्षों पहले उन्होंने रजा के चित्रों और मेरी कविताओं पर नृत्य किया था जिसमें उनके चेहरे को नहीं बल्कि उनके पदाघात को ही दिखाया गया था और उसमें उनके घुंघरू बोलते थे।
उन्होंनेमीरा के पदों पर भी ऐसा प्रयोग किया था जिसमें शरीर को छोड़कर सिर्फ पैरों से ही भाव व्यक्त किया था।
उन्होंने कहा कि नृत्य में एक तरह का अमूर्तन और एकांत भी होता है पर उसके साथ एक विचार भी होताहै।
उन्होंने कहा कि कथक संसार का उत्सव नहीं बल्कि वह संसार पर विचार भी करता है।नृत्य करते हुएविचार करना और विचार करते हुए नृत्य करना दिलचस्प है और प्रेरणा ने यह सम्भव किया है।
अनामिका ने कहा कि नृत्य भी राजनीति में प्रतिरोध का काम करता है और चिक्तिसा से लेकर समाज शास्त्र में भी उसकी भूमिका है।वह भीतर की तकलीफों और दुख को भी कम करता है।
उन्होंने कहा कि नृत्य शरीर सेशुरू होकर शरीर से परे होता है और ग्रहों की वलयाकार निर्मिति की तरह होता है जिसमें नर्तक नाचते हुए एक वलय बनाता है और उसका अतिक्रमण करता है।
उन्होंने कहा कि नृत्य विचार के पत्तों केझरने के बाद खिला हुआ एक फूल है। यह किताब ओस के गिरते बूंदों की लय में लिखी गयी है।

श्रीमती मंजरी सिन्हा ने कहा कि यह किताब प्रेरणा की डायरी और आत्मकथा के रूप में लिखी गयीयह कथक की अन्तरयात्रा है।इसमें देखा परखा और जिया गया अनुभव है।
सुश्री मनीषा कुलश्रेष्ठ ने कहा कि प्रेरणा जी अमूर्तन की उपासक हैं औरपरम्परा को बेड़ियों की तरह नहीं पहनती। वर्षों पहले मैंने उनकी डायरी पढ़ी थी।उन्होंने उस डायरी को पुस्तकाकार दिया है।वह नृत्य के बारे में चिंतन भी करती रही है ।यह किताब अलग तरह की है अकादमिक पुस्तकों की तरह नहीं है।

समारोह मेप्रसिद्ध नर्तक राजेन्द्र गंगानी ने बताया कि प्रेरणा ने किस तरहगुरु जी के शब्दों को डायरी में लिपिबद्ध किया।उन्होंने बताया कि तत्कार से ही नृत्य को शुरू करते हैं।प्रेरणा ने कथक के सभी पदों को सरल भाषा में समझाया है।
प्रेरणा श्रीमाली ने बताया कि उन्होंने सोच समझकर यह किताब नहीं लिखी बल्कि वह तो किताब के छपने से नर्वस थीं।
वोडायरी के रूप में लिखती जा रहीं थी। उन्हें नहीं पता था किएक दिन उनकी डायरी किताब का रूप ले लेगी और आप सबको पसंद आएगी।

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