Monday, June 17, 2024
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विश्व पुस्तक मेले में हिंदी की लेखिकाओं की किताबों पर स्त्री दर्पण की रिपोर्ट –

मित्रो, आपने विश्व पुस्तक मेले में भाग लिया होगा तो आपने देखा होगा कि इस बार कितनी लेखिकाओं की भागीदारी हुई। पर जो लोग मेले में नहीं आ सके उनके लिए स्त्री दर्पण की रिपोर्ट पेश है। इसमें आपको पूरा लेखा जोखा मिलेगा। सम्भव है कुछ छूट भी गया हो।

– स्त्री दर्पण टीम

विश्व पुस्तक मेले में हिंदी की लेखिकाओं की किताबों पर स्त्री दर्पण की रिपोर्ट –

विश्व पुस्तक मेले में छा गयी लेखिकाएं
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अगर यह कहा जाए कि इस बार विश्व पुस्तक मेले में हिंदी की लेखिकाएं पूरी तरह छा गईं थी तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी क्योंकि हिंदी के स्टाल पर जितने कार्यक्रम हुए उसमें अधिकांश में लेखिकाओं की भागीदारी अधिक रही। हर बड़े स्टालों पर किसी न किसी लेखिका की किताबों का या तो लोकार्पण हो रहा था या उन पर बातचीत हो रही थी। कहीं लेखिकाओं के कविता संग्रहों पर बातचीत हो रही थी तो कहीं लेखिकाओं के कहानी संग्रहों पर तो कहीं उनके उपन्यासों और कहीं उनके किये गए अनुवादों पर चर्चा हो रही थी। इन कार्यक्रमों में एंकर करने वाली भी अधिकतर महिलाएं थी। इससे पता चलता है कि हिंदी की दुनिया में लेखिकाओं की सहभागिता लगातार बढ़ती जा रही है और वह दिन दूर नहीं जब भविष्य में वे हिंदी साहित्य का नेतृत्व न करने लगें। पुस्तक मेले में कविता कहानी उपन्यास अनुवाद सभी विधाओं में हिंदी की लेखिकाओं की किताबें सामने आई ।
मेले का मुख्य आकर्षण साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित अलका सरावगी के महात्मा गांधी और सरला देवी चौधुरानी के प्रेम प्रसंगों पर आधारित उपन्यास पर बातचीत के अलावा 1857 की नायिका बेगम हजरत महल के उपन्यास के साथ-साथ हिंदी की हिंदी की कवयित्री एवं आलोचक सुजाता की पंडिता रमाबाई पर लिखी गई किताब थी । अलका सरावगी की किताब तो मेले से पहले ही आ गयी थी लेकिन मेले में उस पर हुई बातचीत पाठकों के बीच चर्चा का विषय थी। पंडिता रमाबाई पर सुजाता की किताब में कुछ तथ्यों की प्रामाणिकता को लेकर सोशल मीडिया में कुछ विवाद भी हुए लेकिन यह सच है कि हिंदी में नए तरह के काम अब होने लगे हैं। इस तरह ये तीनों किताबें इस बात का सबूत है कि हिंदी में पाठकों का ध्यान अब कविता कहानी की तुलना में ऐतिहासिक विषयों पर लिखी गई कृतियां पर अधिक जा रहा है। चर्चित इतिहासकार चारु गुप्ता की पुस्तक “जाति और लिंग” ने भी ध्यान खींचा। वरिष्ठ कवयित्री अनामिका की “स्त्री मुक्ति की सामाजिकी” भी महत्वपूर्ण किताबें रहीं।विपिन चौधरी देवयानी भारद्वाज और हर्षबाला शर्मा के अनुवाद भी आकर्षण के केंद्र रहे।

 

राजधानी के प्रगति मैदान में 25 फरवरी से 5 मार्च तक चला विश्व पुस्तक मेला कई मायनों में महत्वपूर्ण रहा।कोविड के बाद हुए इस मेले में लेखकों और पाठकों तथा प्रकाशकों में विशेष उत्साह था क्योंकि तीन साल के बाद यह मेला लगा लेकिन यह मेला इस मायने में भी अनोखा रहा कि इसमें हिंदी की लेखिकाओं की आवाजें काफी गूंजी और बड़ी संख्या में उनकी पुस्तकों के लोकार्पण हुए और उन पर चर्चाएं हुई। हिंदी की कवयित्रियों ने तो इस मेले में विशेष छाप छोड़ी। पिछले कुछ साल से विश्व पुस्तक मेले में लेखिकाओं विशेषकर युवा लेखिकाओं की उपस्थिति बढ़ती जा रही है और उनकी किताबों की चर्चा भी काफी होती जा रही है। लेकिन इस बार का विश्व पुस्तक मेला स्त्री रचना शीलता की दृष्टि से उल्लेखनीय रहा क्योंकि मेले के दौरान एक प्रकाशक के स्टॉल पर तो हिंदी की लेखिकाओं की 30 पुस्तकों का लोकार्पण हुआ जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है। इससे पता चलता है कि स्त्री लेखन कितनी तादाद में हो रहा है। 21 वी सदी के आरंभिक दो दशक स्त्री लेखन के दशक रहे हैं। अब वे 21 वीं सदी के तीसरे दशक में प्रवेश कर रही हैं। इसके अलावा राजकमल प्रकाशन वाणी प्रकाशन आधार प्रकाशन सेतु प्रकाशन लोक भारती प्रकाशन लोक भारती प्रकाशन संवाद प्रकाशन पुस्तक नामा, सामयिक प्रकाशन रुख प्रकाशन, वनिका प्रकाशन हिंदी युग्म आदि ने स्टॉल पर हिंदी की अनेक लेखिकाओं की किताबों के लोकार्पण हुए और चर्चाएं हुई। इनमें हिंदी की वयोवृद्ध लेखिका मृदुला गर्ग ममता कालिया से लेकर नवोदित लेखिकाओ की किताबें भी शामिल है।
पुस्तक मेले में हिंदी की लेखिकाओं में सबसे ज्यादा आकर्षण कविता को लेकर रहा और इस बार में कवयित्रियों के कविता संग्रह और संपादित संग्रह भी सामने आए। समकालीन कवयित्रियों में रोहिणी अग्रवाल, लीना मल्होत्रा, बाबुषा कोहली, विपिन चौधरी, रश्मि भारद्वाज, अनुराधा सिंह वाजदा खान, संगीता गुंदेचा विजया सिंह प्रकृति कुकगरती रूपम मिश्र प्रज्ञा सिंह और प्रज्ञा तिवारी की किताबें शामिल हैं। इन कवयित्रियों ने हिंदी कविता के परिदृश्य का विस्तार किया है। युवा कवयित्री विपिन चौधरी का चौथा संग्रह “संसार तुम्हारी परछाई” मेले में आया जबकि लीना मल्होत्रा, बाबुषा कोहली रश्मि भारद्वाज ज्योति चावला के तीसरे संग्रह सामने आए। 2008 में विपिन का पहला संग्रह आया था और इस तरह 15 साल में उसके चार संग्रह आ गए यानी देखते देखते स्त्री कविता की यात्रा अब परवान चढ़ने लगी है। विपिन ने अपनी एक मुक्कमल पहचान बना ली है।
2009 में वाजदा खान का पहला संग्रह आया था।इसके बाद उनका एक और संग्रह आया। मेले में उनके दो काव्य संग्रह “खड़िया” और “जमीन पर गिरी इबारतें”आया है।
2012 में लीना मल्होत्रा का पहला संग्रह आया था ।दस वर्ष के भीतर उनका तीसरा संग्रह “धुरी से छूटी आह” सेतु प्रकाशन से आया है।
2015 में अपने पहले संग्रह “प्रेम दिल गिलहरी अखरोट” से सबका ध्यान खींचने वाली बाबुषा का यह तीसरा कविता संग्रह “उस लड़की का नाम ब्रह्मलता है” मेले में आया है। बाबुषा की किताब का इंतज़ार काव्य प्रेमियों को रहता है। वह हर बार अपनी कविता से लोगों को विस्मित करती हैं। रश्मि भारद्वाज ने भी 2016 में एक अतिरिक्त अ नाम से समकालीन कविता में पहचान बनाई थी। 7 साल के भीतर उनका तीसरा संग्रह “घो घो रानी कितना पानी” भी सेतु से सामने आया है जिसको लेकर लोगों के मन मे गहरी उत्सुकता है।
ज्योति मल्होत्रा की पहचान कहानीकार के रूप में भी रही है पर मूलतः वह कवयित्री है और उनके नए संग्रह “उनींदी रातों का समय से” भी इसकी पुष्टि होती है।
“ईश्वर नहीं नींद चाहिए” से हिंदी कविता में अपनी जगह बनाने वाली अनुराधा सिंह का दूसरा संग्रह” उत्सव का पुष्प नहीं हूं” वाणी से आया है। संगीता गुंदेचा का पडडीकम्मा भी उल्लेखनीय कविता संग्रह रहा।
प्रसिद्ध आलोचक रोहिणी अग्रवाल भी कविताएं लिखती रही हैं। मेले में उनका कविता संग्रह “लिखती हूँ मन” भी चर्चा में रहा।

रूपम मिश्र का पहला संग्रह “एक जीवन अलग से” लोकभारती से आया है।यह संग्रह कार्फ़ ताजगी लिए हुए है। उम्मीद है रूपम की भी जल्द ही विशिष्ट पहचान बनेगी।
विजया सिंह के पहला संग्रह “पार्क में हाथी” भी मेले में ध्यान खींचा।

प्रसिद्ध कवयित्री सविता सिंह के संपादन में हिंदी की बीस कवयित्रियों का एक संकलन “प्रतिरोध का स्त्री स्वर” नाम से आया।यह इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि अक्सर यह आरोप लगता है कि हिंदी की कवयित्रियाँ प्रतिरोध की कविताएं नहीं लिखती है। सविता ने यह संचयन निकालर इस मिथ्या अवधारणा का खंडन किया है और एक ऐसा दस्तावेज पेश किया है जिससे स्त्री कविता की शिनाख्त होगी।अब तक ऐसा कोई संकलन हिंदी में नहीं आया था।

हिंदी की वरिष्ठ कवयित्री गगन गिल और युवा आलोचक एवम कवयित्री सुजाता ने स्त्री विमर्श की परंपरा को रेखंकित करते हुए दो महत्वपूर्ण किताबें निकाली हैं।
गगन ने अक्का महादेवी की कविताओं का भाव अंतरण “तेजस्वनी” किया है। कुछ सालों से हिंदी प्रदेश में अक्का महादेवी की कविताओं के प्रति लोगों में दिलचस्पी जागी है। गगन गिल की प्रतिनिधि कविताओं का संकलन भी मेले में साहित्य प्रेमियों के लिए आकर्षण रहा।
इस तरह समकालीन स्त्री कविता ने 21 वीं सदी में एक पड़ाव हासिल किया है और स्त्री कविता पर बातचीत के लिए आधार सामग्री पेश कर दी है।इन कविताओं के परिप्रेक्ष्य में अब स्त्री कविता पर गम्भीर बातचीतहोनी चाहिए।
उपन्यास में लवली गोस्वामी का “वनिका”। विजय श्री तनवीर का सिस्टर लीसा की रान पर रुकी हुई रात और ममता सिंह का कहांनी संग्रह “किरकिरी” भी आया जो उनके दूसरे कहांनी संग्रह हैं। रूपा सिंह का पहला कहांनी संग्रह “दुखां दी कटोरी सूखा दी छल्ला” भी आया। इसके अलावा सपना सिंह का कहांनी संग्रह भी आकर्षण के केंद्र रहे। योजना रावत का ” पूर्व राग” संग्रह भी मेले में आया। वरिष्ठ लेखिकाओं में ममता कालिया की नई किताब “पचीस साल की लड़कीं” भी मेले में नजर आयी।
सिनेमा पर विजया शर्मा की सत्यजीत रे पर किताब ने भी ध्यान खींचा। मृदुला पंडित की “सिनेमा और यथार्थ” भी एक महत्वपूर्ण पुस्तक रही। गरिमा श्रीवास्तव का ‘उपन्यास का समाजशास्त्र” भी चर्चा के केंद्र में रहा। उनकी किताब आउशवित्ज पर भी मेले में अच्छी बातचीत रही।
आलोचना में रोहिणी अग्रवाल का “कहांनी का स्त्री समय” एक महत्वपूर्ण कृति रही जिसमें शिवरानी देवी से लेकर आज की लेखिकाओं पर चर्चा है। रीता दास राम ने एक शोध परक किताब हिंदी उपन्यासों में मुम्बई को लेकर लिखी है। अनंग प्रकाशन से वह भी मेले में आई। युवा आलोक रश्मि रावत की आलोचना की पहली किताब आधार से आई।
अनुवाद में लीनाक्षी फुकन की नेटिव अमरीका की लोक कथाएं ने भी ध्यान खींचा। सुनीता डागा जयश्री पुरवार, नम्रता चतुर्वेदी के अनुवाद की किताब भी मेले में आई। संतोष श्रीवास्तव की पुस्तक “कैथरीन और नागा साधुओं की रहस्यमयी दुनिया” का पुस्तक मेले में लोकार्पण हुआ। अनुराधा ओस की “वर्जित इच्छाओं की सड़क” भी पुस्तक मेले में आई।

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