Wednesday, April 24, 2024
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“क्या आप भारती नारायण को जानते हैं?”

आपने लेखकों की पत्नियों की शृंखला में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर, नाथू राम शर्मा “शंकर”, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, मैथिली शरण गुप्त, राजाराधिका रमण प्रसाद सिंह, आचार्य शिवपूजन सहाय, रामबृक्ष बेनीपूरी, जैनेंद्र, हजारी प्रसाद द्विवेदी, रामविलास शर्मा, गोपाल सिंह नेपाली, नागार्जुन, नरेश मेहता, विनोद कुमार शुक्ल, प्रयाग शुक्ल आदि की पत्नियों के बारे में पढ़ा। अब आप ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित कवि आलोचक कुँवर नारायण की पत्नी भारती जी के बारे में पढ़िए जो नोबेल पुरस्कार विजेता विश्व प्रसिद्ध अर्थ शास्त्री अमर्त्य सेन की कोलकत्ता में सहपाठी थी और प्रभा खेतान जैसी लेखिकाएँ उनकी शिष्या। स्वभाव से विनम्र और विदुषी भारती जी की छाया अपने पति के सामने दब गई। हिंदी की दुनिया कुँवर जी को ही जानती है,उनकी पत्नी को कम या नहीं। तो पढ़िए भारती जी के बारे में युवा कवयित्री -आलोचक पल्लवी प्रकाश का लेख। पल्लवी जी का हाल में राजेश जोशी की प्रेम कविताओं पर सुंदर लेख आया है। वह केदारनाथ सिंह की प्रेम कविताओं पर भी लिख चुकी हैं तो पढ़िए कुँवर जी के जीवन के आधार स्तम्भ के बारे में
उनकी यह टिप्पणी
 “जीवन का आधारस्तम्भ”
————————————————————————————————–किसी भी लेखक की रचना दृष्टि के निर्माण में उसके परिवेश की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। उसके आस-पास का वातावरण और परिवार भी उस परिवेश का अभिन्न अंग होते हैं। आमतौर पर हम हिंदी के सभी प्रसिद्ध लेखकों के जीवन के विषय में काफ़ी कुछ जानते हैं लेकिन उन लेखकों की जीवन संगनियों के विषय में बहुत कम या न के बराबर जानते हैं. कुँवर नारायण, हिंदी साहित्य जगत के एक ऐसे ही रचनाकार हैं जिनके नाम को परिचय की कोई आवश्यकता नहीं, लेकिन उनकी पत्नी भारती नारायण के विषय में बहुत ही कम जानकारी उपलब्ध है। इसकी मुख्य वजह तो यही है कि कुँवर नारायण एक प्राईवेट व्यक्ति रहे हैं, ना तो उन्होंने कोई आत्मकथा लिखी ना ही उनकी कोई जीवनी अभी तक हमारे सामने आई या कोई आलेख जिसमें उनके पारिवारिक जीवन का कोई वर्णन मिलता। इसके अलावे, भारती जी खुद भी, कुँवर नारायण से भी ज़्यादा प्राइवेट किस्म का व्यक्तित्व रही हैं, इसलिए उनके बारे में भी कुछ जानकारी हासिल कर लिखना जितना रोचक है उतना ही चुनौतीपूर्ण भी। तो आइये मिलते हैं कुँवर जी के जीवन की आधार स्तम्भ रहीं भारती जी से, जिन्होंने रचनाकार कुँवर नारायण के व्यक्तित्व को एक नया आयाम दिया। भारती गोयनका का जन्म कलकत्ते के एक उच्च शिक्षित परिवार में १९३२ में हुआ। पिता केशवदेव गोयनका ने दिल्ली के सेंट स्टीफ़ेंस कॉलेज तथा जर्मनी से शिक्षा प्राप्त की थी। बाद में नौकरी के सिलसिले में कलकत्ते जा बसे। उनकी पत्नी इंदुमती गोयनका तब गांधी जी के स्वाधीनता आन्दोलन में जेल जानेवाली बंगाल की प्रथम महिला थीं। अपने विचारों और जीवन शैली में वे लोग पक्के गांधीवादी थे। स्वाधीनता आन्दोलन में उन्होंने परिवार सहित हिस्सा लिया, जीवन भर खादी ही पहनी और स्त्री-शिक्षा के प्रबल समर्थक रहे। भारती जी के दादाजी, केदारनाथ गोयनका ने अपना व्यापार छोड़ कर पूरी तरह स्वाधीनता और साहित्य को अपना जीवन अर्पण कर दिया। उन्होंने सार्वजनिक मारवाड़ी पुस्तकालय (जो आज भी दिल्ली के चाँदनी चौक में है) का निर्माण करवाया जिन पर एक किताब और शोध भी हैं। भारती जी के परिवार का वातावरण निहायत ही प्रगतिशील था और तत्कालीन मारवाड़ी समाज के जड़ रीति-रिवाजों से कोसों दूर था। उनके माता-पिता ने अपने चारों बच्चों (दो बेटे और दो बेटियां) को उच्च शिक्षा दिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। भारती जी के व्यक्तित्व निर्माण में उन लोगों द्वारा प्रदत्त जीवन मूल्यों का गहरा प्रभाव रहा। भारती जी ने कलकत्ते के प्रसिद्ध प्रेसिडेंसी कॉलेज से अर्थशास्त्र में एम.ए. किया. वहां अर्थशास्त्री और नोबेल विजेता अमर्त्य सेन उनके क्लासमेट थे। बी.ए. के इस बैच में लड़कियों की संख्या केवल चार थी, शेष सारे लड़के ही थे। कॉलेज में भारती जी की छवि एक प्रबुद्ध छात्रा की थी जो शिक्षकों को भी प्रिय थीं और अपने क्लासमेट्स के बीच भी। वे क्लास लेक्चर्स को बहुत ध्यान से सुनती थीं और फिर परिश्रम से नोट्स बनाती थीं; यदि किसी दिन लेक्चर को लेकर कोई शंका रह गई तो वे शिक्षकों के घर जाकर भी उसका निवारण कर आती थीं। यही कारण है कि उनके नोट्स की डिमांड रहती थी उनके क्लासमेट्स के बीच। कॉलेज में भारती जी की लोकप्रियता का आलम यह था कि स्टूडेंट फेडरेशन—जो एक प्रगतिशील संस्था थी—की तरफ़ से वे स्टूडेंट यूनियन की निर्विरोध सदस्य चुनी गईं। प्रेसिडेंसी कॉलेज के बाद भारती जी ने बालीगंज शिक्षा सदन में लगभग एक साल पढ़ाया जहाँ उस समय मन्नू भंडारी भी हिंदी की शिक्षिका थीं। इसके बाद भारती जी ने श्री शिक्षायतन में अर्थशास्त्र के अध्यापक के रूप में पदभार संभाला जहाँ उन्होंने लगभग आठ वर्षों तक पढ़ाया। प्रभा खेतान, चन्द्रकिरण राठी, सुधा अरोड़ा, इशर अहलूवालिया आदि उनकी छात्राएं रहीं। अपनी छात्राओं के बीच भी भारती जी लोकप्रिय रहीं और हमेशा उनके मार्गदर्शन को अग्रसर रहीं। इशर अहलूवालिया ने अपनी आत्मकथात्मक पुस्तक “ब्रेकिंग थ्रू : अ मेमोयर” में भारती जी के प्रति आभार व्यक्त करते हुए उन्हें एक ऐसी शिक्षिका के रूप में याद किया है जिसने न केवल अर्थशास्त्र विषय में उनकी रूचि जगाई बल्कि उच्च शिक्षा के लिए भी प्रेरित किया।अर्थशास्त्र के साथ-साथ भारती जी की गहरी रूचि साहित्य, संगीत और रंगकर्म में थी, जिस कारण वे कलकत्ते की कुछ साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्थाओं से भी जुड़ी हुई थीं। ज्ञानवती लाठ के सञ्चालन में चलने वाली “अभिनव भारती” एक ऐसी ही शैक्षणिक संस्था थी जिससे भारती जी लम्बे समय तक जुड़ी रहीं। इसी तरह “संगीत श्यामला” नामक संस्था में, जिसकी कमिटी में वह रहीं, तब पंडित जसराज संगीत सिखाने आते थे। यहीं उनसे भारती जी का परिचय हुआ जो पारिवारिक मित्रता में तब्दील हुआ और आगे चलकर कुँवर जी से विवाह के बाद भी बना रहा। नाट्य संस्था “अनामिका”, जिसके संचालक श्यामानंद जालान थे, की भी भारती जी सदस्य रहीं। साहित्य से जुड़ाव के कारण भारती जी के जीवन में एक टर्निंग पॉइंट तब आया जब उन्होंने कुँवर नारायण की कविताओं को पढ़ना शुरू किया। पारिवारिक मित्र अशोक सेकसरिया तब अंग्रेज़ी और हिंदी साहित्य की महत्वपूर्ण पुस्तकें उन्हें पढ़ने के लिए उपलब्ध कराते थे। इन पुस्तकों से गुज़रने के क्रम में भारती जी का साहित्य के प्रति लगाव गहराता गया। इसी दौरान कुँवर जी की “आत्मजयी” पढ़ने का उन्हें अवसर मिला। इसे पढ़ कर भारती जी अभिभूत हो गईं। यह सिर्फ़ एक पाठक का एक लेखक के प्रति सामान्य सा लगाव नहीं था बल्कि इसमें भविष्य के एक प्रगाढ़ सम्बन्ध की संभावनाओं के बीज भी छिपे हुए थे। यहाँ यह बताना ज़रूरी है कि भारती जी ने तब तक विवाह में कोई रूचि नहीं दिखाई थी क्योंकि वह सिर्फ़ विवाह के लिए विवाह नहीं करना चाहती थीं। लेकिन कुँवर नारायण की “आत्मजयी” को पढ़ कर उन्हें अहसास हुआ कि शायद यही वह व्यक्ति है जिसकी आज तक उन्होंने प्रतीक्षा की थी। यह “शायद” शब्द इसलिए क्योंकि तब तक भारती जी को कुँवर जी के व्यक्तिगत जीवन के बारे में कुछ पता नहीं था, सिवाय इसके कि वह एक उभरते हुए युवा रचनाकार हैं। भारती जी ने उन्हें पत्र लिखा और दोनों के बीच पत्राचार शुरू हुआ। यह एक संयोग ही था कि कुँवर जी और भारती जी उच्च शिक्षित और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर थे लेकिन तत्कालीन समाज के नियमों से विवाह करने में दोनों को यकीन नहीं था। भारती जी कलकत्ते से लखनऊ आईं। इस मुलाक़ात के बाद आपसी सहमति से दोनों ने निर्णय लिया और 10 मार्च 1966 को उनका विवाह सम्पन्न हुआ। इस निर्णय से दोनों के परिजन भी अत्यंत प्रसन्न थे। भारती जी विवाह के पश्चात लखनऊ आ गयीं। कुँवर जी की साहित्यिक यात्रा में कोई खलल ना पड़े और पारिवारिक जिम्मेदारियों से उनका लेखन प्रभावित ना हो, भारती जी इसका विशेष ख़याल रखती थीं। 1967 में बेटे अपूर्व का जन्म हुआ और भारती जी एक पत्नी के साथ एक ममतामयी मां की भूमिका में भी आ गयीं। उन्होंने माँ के उत्तरदायित्व को भी बहुत गम्भीरता और सुन्दरता से निभाया। आज अपूर्व कृतज्ञ हैं कि वे उनके साथ रह रहे हैं। कुँवर नारायण भारती जी से मिलने के पूर्व ही एक उभरते हुए कवि के रूप में अपनी पहचान बना चुके थें लेकिन उनके जीवन में तब भी, मन का एक कोना ज़रूर खाली पड़ा हुआ था। विवाह के पश्चात मन के उस सूने कोने में जैसे आशाओं के दीप जगमगा उठें। भारती जी में कुँवर जी को अपनी मृत मां और बहन दोनों की भी झलक दिखती थी, जिनसे वे बहुत गहरे रूप से जुड़े हुए थे। भारती जी ने जो भावनात्मक संबल कुँवर जी को प्रदान किया, निश्चित रूप से उसने उनके लेखन को धार देने में एक अहम भूमिका निभाई। कुँवर नारायण की रचनाओं के पहले ड्राफ़्ट की पहली पाठक भारती जी ही रही हैं। वे हमेशा अपनी स्पष्ट राय देती थीं, जिसको कुँवर जी बहुत महत्व देते रहे हैं। कुँवर जी के आग्रह के बावजूद, भारती जी ने ख़ुद कभी लिखा या छपवाया नहीं—बल्कि हमेशा अदृश्य रहकर कुँवर जी के लेखन में साथ दिया। आमतौर पर विवाह के पश्चात कई लोगों की अपने परिवार और दोस्तों से दूरियाँ बढ़ जाती हैं लेकिन भारती जी के मामले में ठीक इसके उलट हुआ। कुँवर जी के अन्तर्मुखी स्वभाव और कम बोलने की वजह से कई लोग जो उनके घर आने में झिझकते थे, भारती जी के मिलनसार स्वभाव के कारण अब आने लगे। उस दौर के अनेक प्रमुख साहित्यकार और कलाकार कुँवर जी और भारती जी के लखनऊ के घर ‘विष्णु कुटी’ में ठहरते थे। अज्ञेय, शमशेर, नेमिचंद्र जैन, नामवर सिंह, साही, अशोक वाजपेयी, विष्णु खरे, प्रयाग शुक्ल, गिरधर राठी, विनोद भारद्वाज जैसे लेखक और अमीर खान, जसराज, संयुक्ता पाणिग्रही, सत्यजित राय, अलकाज़ी, कारंथ, लोठार लुत्ज़े आदि कलाकार यहाँ आते रहते थे। 60-70 के दशकों में लखनऊ की हैसियत भारत की सांस्कृतिक राजधानी की थी और शहर की साहित्यिक मित्र-मंडली से उनका घनिष्ठ सम्बंध था !90 के दशक तक उत्तर प्रदेश के सामाजिक-सांस्कृतिक वातावरण को, उसकी गंगा-जमुना तहजीब को सियासी हवा ने प्रदूषित कर दिया था। बाबरी मस्जिद विध्वंस से बहुत व्यथित होकर कुँवर नारायण जी ने “अयोध्या 1992” कविता लिखी। इस समय तक, बढ़ती उम्र के साथ वहाँ का घर और विस्तृत जीवन अकेले संभालना कुँवर जी और भारती जी के लिए मुश्किल होता जा रहा था। वे एक सरल जीवन चाहते थे। बेटे अपूर्व ने भी पारिवारिक व्यवसाय में कोई रूचि नहीं दिखाई और शिक्षण क्षेत्र में ही दिल्ली और अधिकतर विदेशों में रहे। भारती जी और कुँवर जी ने तब लखनऊ के बदलते माहौल और अपनी परिस्थितियों को समझ कर लखनऊ तथा अपने पारिवारिक व्यवसाय की हिस्सेदारी छोड़ कर दिल्ली आने का निर्णय लिया. यह एक कठिन और चुनौतीपूर्ण निर्णय था। जहाँ लोग छोटे से बड़े घर की ओर आकृष्ट होते हैं, लखनऊ के अपने ऐतिहासिक घर से दिल्ली के एक छोटे फ़्लैट में इसलिए आना कि कुँवर जी के लेखन को अधिक समय और निरन्तरता मिले, ऐसा निर्णय शायद भारती जी ही ले सकती थीं। 1995 से कुँवर जी और भारती जी दिल्ली ज़्यादा रहने लगे, और 2007 में पूर्ण रूप से यहाँ चितरंजन पार्क में शिफ़्ट हो गए। बेटे अपूर्व भी तब दिल्ली ज़्यादा रहने लगे थे। भारती जी ने तब कुँवर जी की कई अप्रकाशित रचनाओं को पुस्तक-रूप में प्रकाशित करवाने का काम आगे बढ़ाया। कुँवर जी लिखते वक्त बहुत व्यवस्थित तरीके से नहीं लिखते थे क्योंकि उनके ज़हन में प्रकाशन का मुद्दा होता ही नहीं था। इसलिए उनकी तमाम फ़ाइलों से ढूंढ कर रचनाओं को पुस्तक-रूप देना कठिन और श्रमसाध्य था, लेकिन भारती जी ने इसे अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया। इस काम में उन्हें अपूर्व और कई लेखकों तथा शोधकर्ताओं का साथ मिला। इनकी मेहनत का नतीजा यह निकला कि पहले जहाँ कुँवर जी की पुस्तकें सालों-साल के बाद आती थीं, वहीँ दिल्ली आने के दस वर्षों के भीतर ही अनेक किताबें प्रकाशित हुईं जिनमें कविता और कहानी- संग्रह, डायरी, भेंट वार्ताएं और वैचारिक निबन्ध आदि भी हैं।बाद के चार-पाँच वर्ष, आँखों की समस्या हो जाने पर, कुँवर जी की भारती जी पर निर्भरता और भी बढ़ गयी। कई चीज़ें वह भारती जी को बोल कर लिखवाते रहे। इसमें उनका तीसरा प्रबंधकाव्य “कुमारजीव” भी है, जिसके अधिकांश अंश कुँवर जी ने बोल कर ही लिखवाए और यह कृति भारती जी को समर्पित भी की। कुँवर जी की कुछ कविताओं की प्रेरणा स्रोत भी भारती जी रही हैं। यूं तो प्रत्यक्ष रूप से कुँवर जी ने उनके प्रति अपने प्रेम को शब्दों का जामा नहीं पहनाया लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से उनकी कुछ कविताओं में वे मौजूद हैं, जैसे “नदी बूढ़ी नहीं होती” और “एक हरा जंगल” आदि। कुँवर नारायण और भारती जी को हमेशा साथ-साथ ही देखा गया, साहित्यिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों में, देश-विदेश में। उन दोनों के बीच का रिश्ता कोई सामान्य पति-पत्नी वाला रिश्ता नहीं था बल्कि एक सम्पूर्णता के भाव को भर देने वाला रिश्ता था, जहाँ एक के बगैर दूसरे के अस्तित्व की कल्पना भी नहीं की जा सकती। कुँवर नारायण के बाद भी भारती जी, अपूर्व के साथ, निरंतर उनके काम और अप्रकाशित लेखन को व्यवस्थित करने में लगी हुई हैं. उन्होंने अपने व्यक्तित्व को कुँवर जी के व्यक्तित्व में तिरोहित कर दिया है। इसलिए उन्हें करीब से जानना हो तो शायद कुँवर जी की कवितायें ही उसका सबसे बेहतर माध्यम हैं। कुँवर जी के जीवन का आधार स्तम्भ यदि कोई है तो वह भारती जी ही हैं।(भारती जी के विषय में समस्त जानकारी उनके और कुँवर नारायण जी के सुपुत्र अपूर्व नारायण के सौजन्य से प्राप्त हुई है) – पल्लवी प्रकाश

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