Wednesday, May 29, 2024
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स्त्री प्रतिरोध की कविता और उसका जीवन

प्रतिरोध की कविताएं

कवयित्री सविता सिंह

स्त्री दर्पण मंच पर ‘प्रतिरोध कविता श्रृंखला’ के आयोजन में आप पाठकों ने तमाम कवयित्रियों की प्रतिरोध की कविताएं पढ़ी।
प्रसिद्ध कवयित्री सविता सिंह के संयोजन से आयोजित इस कार्यक्रम में अब तक वरिष्ठ कवयित्रियों में शुभा, शोभा सिंह, निर्मला गर्ग, कात्यायनी, अजंता देव, प्रज्ञा रावत, सविता सिंह, रजनी तिलक, निवेदिता, अनिता भारती, हेमलता महिश्वर के साथ समकालीन कवयित्री वंदना टेटे एवं रीता दास राम की कविताओं को पढ़ा।
आज कवयित्री नीलेश रघुवंशी की कविताएं प्रस्तुत हैं।
“प्रतिरोध कविता श्रृंखला” पाठ – 13 में कवयित्री रीता दास राम की कविताओं को पाठकों ने पढ़ा। सराहा व आपके विचार और महत्वपूर्ण टिप्पणियों से सभी लाभान्वित हुए।
आज “प्रतिरोध कविता श्रृंखला” पाठ – 14 के तहत आप पाठकों के लिए कवयित्री नीलेश रघुवंशी की कविताएं परिचय के साथ प्रस्तुत हैं।
पाठकों के सहयोग, स्नेह व प्रोत्साहन का सादर आभार व्यक्त करते हुए आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार है।
– सविता सिंह
रीता दास राम
आज हिन्दी में स्त्री कविता अपने उस मुकाम पर है जहां एक विहंगम अवलोकन ज़रुरी जान पड़ता है। शायद ही कभी इस भाषा के इतिहास में इतनी श्रेष्ठ रचना एक साथ स्त्रियों द्वारा की गई। खासकर कविता की दुनिया तो अंतर्मुखी ही रही है। आज वह पत्र-पत्रिकाओं, किताबों और सोशल मिडिया, सभी जगह स्त्री के अंतस्थल से निसृत हो अपनी सुंदरता में पसरी हुई है, लेकिन कविता किसलिए लिखी जा रही है यह एक बड़ा सवाल है। क्या कविता वह काम कर रही है जो उसका अपना ध्येय होता है। समाज और व्यवस्थाओं की कुरूपता को बदलना और सुन्दर को रचना, ऐसा करने में ढेर सारा प्रतिरोध शामिल होता है। इसके लिए प्रज्ञा और साहस दोनों चाहिए और इससे भी ज्यादा भीतर की ईमानदारी। संघर्ष करना कविता जानती है और उन्हें भी प्रेरित करती है जो इसे रचते हैं। स्त्रियों की कविताओं में तो इसकी विशेष दरकार है। हम एक पितृसत्तात्मक समाज में जीते हैं जिसके अपने कला और सौंदर्य के आग्रह है और जिसके तल में स्त्री दमन के सिद्धांत हैं जो कभी सवाल के घेरे में नहीं आता। इसी चेतन-अवचेतन में रचाए गए हिंसात्मक दमन को कविता लक्ष्य करना चाहती है जब वह स्त्री के हाथों में चली आती है। हम स्त्री दर्पण के माध्यम से स्त्री कविता की उस धारा को प्रस्तुत करने जा रहे हैं जहां वह आपको प्रतिरोध करती, बोलती हुई नज़र आएंगी। इन कविताओं का प्रतिरोध नए ढंग से दिखेगा। इस प्रतिरोध का सौंदर्य आपको छूए बिना नहीं रह सकता। यहां समझने की बात यह है कि स्त्रियां अपने उस भूत और वर्तमान का भी प्रतिरोध करती हुई दिखेंगी जिनमें उनका ही एक हिस्सा इस सत्ता के सह-उत्पादन में लिप्त रहा है। आज स्त्री कविता इतनी सक्षम है कि वह दोनों तरफ अपने विरोधियों को लक्ष्य कर पा रही है। बाहर-भीतर दोनों ही तरफ़ उसकी तीक्ष्ण दृष्टि जाती है। स्त्री प्रतिरोध की कविता का सरोकार समाज में हर प्रकार के दमन के प्रतिरोध से जुड़ा है। स्त्री का जीवन समाज के हर धर्म जाति आदि जीवन पितृसत्ता के विष में डूबा हुआ है। इसलिए इस श्रृंखला में हम सभी इलाकों, तबकों और चौहद्दियों से आती हुई स्त्री कविता का स्वागत करेंगे। उम्मीद है कि स्त्री दर्पण की प्रतिरोधी स्त्री-कविता सर्व जग में उसी तरह प्रकाश से भरी हुई दिखेंगी जिस तरह से वह जग को प्रकाशवान बनाना चाहती है – बिना शोषण दमन या इस भावना से बने समाज की संरचना करना चाहती है जहां से पितृसत्ता अपने पूंजीवादी स्वरूप में विलुप्त हो चुकी होगी।
स्त्री प्रतिरोध कविता श्रृंखला की हमारी चौदहवीं कवि नीलेश रघुवंशी हैं। इनकी कविताएं अपने पूरे अस्तित्व में विरोध की ही कविताएं लगती हैं जिस तरह वे इस दुनिया को अपने पैमाने से नापती हैं। जिधर भी देखती हैं भेद ही भेद नज़र आता है। सत्ताएं सत्ता को खेल और खेल को युद्ध में बदलती दिखती हैं। हर तरफ़ धर्म का शोर है जो माथे की शिराओं में तनाव पैदा कर रहा है, जीवन को पीड़ा के दरिया में उतार रहा है। ऐसे में इस पंक्ति का अर्थ किस कदर खतरे में पड़ता दिखता है,”मैं नदी सा बहता जीवन जीना चाहती हूं”। नदी पाट दी गई है, बाजार इतना फैल गया है कि शहर से गुजरती हुई जुलूस भी भीड़ का हिस्सा लगती है। प्रतिरोध को कुंद करती हुई हमारी पूंजीवादी व्यवस्था “नई दुनिया का निर्माण” करने का स्वप्न भी नहीं देखने देना चाहती है। और जब इन सारी विपरीत परिस्थितियों को पैदा करने में स्त्रियां ही साथ देने लगें तब क्या होगा। कुछ विषम ही होगा। एक औरत ही जन्म लेते एक नन्ही जन्मी बच्ची का गला दबाती है और फिर मिट्टी में गाड़ देती है। नीलेश रघुवंशी की ऐसी कविताएं पढ़ते हुए अंधकार का एक नया काला रंग दिख जाता है और आप एक आह से भर जाते हैं। आज आप भी इन महत्वपूर्ण कविताओं को पढ़ें।
नीलेश रघुवंशी का परिचय :
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जन्म : 04 अगस्त 1969 को मध्य प्रदेश के गंज बासौदा कस्बे में। हिन्दी की बहुचर्चित कवियों में शुमार। वे फ़िलहाल दूरदर्शन केन्द्र, भोपाल में कार्यरत हैं।
‘घर निकासी’ (1997), ‘पानी का स्वाद’ (2004), ‘अंतिम पंक्ति में’ (2008), ‘कवि ने कहा’ (चुनी हुई कविताएँ, 2016), ‘खिड़की खुलने के बाद’ (2017) की कविताएँ पाठकों और सह-लेखकों के बीच समान रूप से स्वीकृत और चर्चित हैं।
कविता और उपन्यास के अलावा उन्होंने बच्चों के लिए नाटक और कई टेली फिल्मों के लिए पटकथा-लेखन भी किया है। कई देशी-विदेशी भाषाओं में उनकी कविताओं का अनुवाद हो चुका है।
2012 में उनका पहला उपन्यास ‘एक कस्बे के नोट्स’ प्रकाशित हुआ था, जो कि हिन्दी के चर्चित उपन्यासों में से एक है। 2019 में ‘द गर्ल विद क्वेशचनिंग आईज़’ नाम से परमानेंट ब्लैक द्वारा उसे अंग्रेज़ी में अनूदित कर प्रकाशित किया गया।
सम्मान : भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार (1997), आर्य स्मृति साहित्य सम्मान (1997), दुष्यंत कुमार स्मृति सम्मान (1997), केदार सम्मान (2004), शीला स्मृति पुरस्कार (2006), भारतीय भाषा परिषद कोलकाता का युवा लेखन पुरस्कार (2009), स्पंदन कृति पुरस्कार, (2012), प्रेमचंद स्मृति सम्मान (2013), शैलप्रिया स्मृति सम्मान (2014)।
नीलेश रघुवंशी की कविताएं
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1 इस लोकतंत्र में
मैं जीना चाहती हूँ
लेकिन
वैसे नहीं जैसे तुम चाहते हो
मैं पेड़ को पेड़ कहना चाहती हूँ
उसके हरेपन और नए पत्तों में
खिल जाना चाहती हूँ
तुम उसके इतिहास में जाकर कहते हो
ये हमारे मूल का नहीं
तुम पेड़ की मूल प्रजाति में विश्वास करते हो
मुझे पेड़ के संग हरियाने से रोकते हो।
जिस दिन गिलहरी ने
अपना घोंसला बनाया पेड़ में
उस दिन से मेरा मन पेड़ के भीतर रहने लगा
गिलहरी कहीं भी किसी भी जगह गाँव देश परदेश में
बना सकती है किसी भी पेड़ पर अपना घर
एक गिलहरी दूसरी गिलहरी से
कभी नहीं पूछती- तुम्हारा पूरा नाम क्या है
मैं नदी सा बहता जीवन जीना चाहती हूँ
तुम हो कि नदी को घाट से पाट देना चाहते हो
वाल्मिकी घाट पर खड़े हो झाँकती हूँ नदी में
तुमने नदी को नदी से पाट दिया ।
किसी एक को राष्ट्रीय बग्गी में सुशोभित करते हो
लेकिन
हम सतरंगी सपनों के संग घोड़ी पर भी नहीं बैठ सकते
तुमने हमसे हमारे द्वीप छीने
सारा नमक ले लिया और सबसे ज्यादा
खारेपन की उम्मीद हमीं से करते हो।
देश का संविधान कहता है
हमें वोट देने का अधिकार है
तुम कहोगे लोकतंत्र में ऐसा ही होता है
मैं कहती हूँ
जब नदी को नदी, पेड़ को पेड़ और
अंधेरे को अंधेरा नहीं कह सकते तो
इस लोकतंत्र में
किससे कहूँ अपने मन की बात।
2 समय और मुश्किल
ये मेरा समय है
जिसमें दर्ज नहीं मेरा होना
मेरा रहना, मेरा कहना।
मैं चुप हूँ
मैं बहुत बोलती हूँ
मैं वैसा नहीं कहती
जैसा तुम चाहते हो।
चुप तो मुश्किल
कहो तो मुश्किल
जागो तो मुश्किल
सोओ तो मुश्किल।
ये कैसा समय है
जिसमें
दूध की मुस्कान में भी खोजे जाते हैं अर्थ।
जिसमें चुप को कहना
और
कहने को चुप समझा जाता है।
3 खेल और युद्ध
खेल को खेल की तरह खेलो
खेल को युद्ध में मत बदलो।
खेल की आड़ में युद्ध-युद्ध खेलोगे
तो मैदान नहीं बचेंगे फिर।
बिना खेल मैदान के
पहचाने जाएँगे हम ऐसे देश के रूप में
जो युद्ध को एक खेल समझता है
और इस तरह खेल की आड़ में
देश को युद्ध की आग में झोंकता है।
4 अंधेरे में अंधेरे से
मुझे तारे बहुत अच्छे लगते हैं
क्योंकि वो एक नहीं बहुत सारे होते हैं ।
मैं अकेली, कितनी अकेली हूँ
आसपास फैले शोर को चीरते हुए
बहुत जोर से चीखना चाहती हूँ
लड़ना चाहती हूँ
लेकिन किससे लडूँ और कैसे लड़ूँ ।
रोशनी की आड़ में छिपा अंधेरा हँसता है
मैं अंधेरे में अंधेरे से लड़ती हूँ
दूर कहीं एक तारा टूटता है
भीतर कहीं कुछ चटकता है
लड़ना बिखरता है, चुप्पी पसरती है
एक नहीं
हज़ार चोर दरवाजे हैं
किसी एक में मुझे भी घुस जाना है ।
5 हिकारत
जीने का अधिकार हमें भी है
हमारे हिस्से का भोजन हमें दो
तेज हार्न और गाड़ियों की आवाज के बीच
गुम हो रहे हैं नारे ।
हिकारत से देखते रैली जुलूस को
गाड़ी का एक्सीलैटर बढ़ाते हुए
मन ही मन बुदबुदा रहे हैं लोग गालियाँ ।
तख्ती पर लिखी इबारत पर कैसा तंज
‘इनको क्या
‘सबको रोटी सबको काम ‘ मजाक समझ रखा है । ’
‘स्कूल की छुटटी होने वाली है और पता नहीं
ये ट्रेफिक जॉम कब खत्म होगा’
‘ऑटो निकालने की जुगत में
बची हुई जगह में फँस गया वह ।‘
‘ओए
तुझे बहुत जल्दी है तो उड़कर चला जा
इन ऑटो रिक्षों को तो बंद होना चाहिए’
चार गाड़ियों की जगह घेरे हुए
बड़ी सी कार वाला चीख पड़ा है बुरी तरह ।
चमक रही हैं तख्तियाँ
‘पानी बचाओ, जल, जंगल, जमीन बचाओ
इस जोर जुल्म की धरती पर संघर्ष हमारा नारा है’
नारे लगाते हुए
जुलूस बैठ गया है सड़क के बीचों-बीच
‘ये, ये देखो, बैठ गए तम्बू तान के
बैठे-ठाले की राजनीति करते हैं ये एन जी ओ वाले
एकाध दिन की बात हो तो मान भी जाओ
हर दूसरे दिन का तमाशा है
इनके तो सारे फंड बंद हो जाने चाहिए ।’
कितनी आवाजें, कितनी गलतफहमियाँ, कितना शोर।
इसी चक्काजाम में घूम रहे हैं बच्चे
गिड़गिड़ाते हुए हाथ में फटा पुराना कपड़ा लिए
गाड़ियों से झूमते, बोनट पर कपड़ा फेरते
ए. सी. गाड़ियों के ग्लास से रगड़ खाते
कोई उन्हें दुत्कार रहा है तो कोई कर रहा है हँसीं ठिठोली
‘अबे यहाँ क्या कर रहा है
वहाँ उस तम्बू में जाकर बैठ
तेरा दिन भर का जुगाड़ हो जाएगा
चल फूट यहाँ से ।‘
क्या हड़तालें और जुलूस
बीते युग की बातें होने जा रही हैं
हड़ताल, धरना, चक्काजाम, विरोध प्रस्ताव
प्रतिरोध और
ऐसी नहीं वैसी दुनिया चाहिए
कहने का कौन सा कारगर तरीका होगा
जिससे संभव हो सके
एक नई दुनिया का निर्माण
ऐसी दुनिया
जिसमें किसी के हिस्से न आए हिकारत ।
6 मेरा देश
मेरे लिए देश के मायने
तीन कमरों का घर है मेरा ।
तीन कमरों में रहने वाले छह जन
देशवासी हैं मेरे ।
पड़ौसी घर और मेरे घर के बीच की दीवार
दो देशों के बीच की सरहद है मेरे लिए ।
कंटीले तार पर बैठी चिड़िया
प्रवासी पक्षी मालूम होती है मुझे ।
अब देश प्रेम की बात बीच में कहाँ से आ गई
न चाहते हुए भी छह जन एक साथ रह रहे हैं
तो उनके बीच प्रेम का कोई तो अर्थ होगा
चाहें तो इसे अर्थ प्रेम भी कह सकते हैं
देश प्रेम और अर्थ प्रेम
तराजू के दोनों पलड़े हैं भारी ।
देश से प्रेम करने के लिए
दायर नहीं की जा सकती जनहित याचिका
सूचना के अधिकार के तहत भी
नहीं झाँक सकते किसी के दिल में
देश को देखने के लिए ।
जितना बड़ा है देश मेरा
उतनी ही छोटी सोच है मेरी ।
7 शोर
कानफोड़ू शोर से तड़कती हैं नसें
जाने कितनी कीलें गढ़ती हैं मेरे भीतर ।
यह शोर मेरी नसों को फाड़ डालेगा ।
मेरे संग धरती भी काँपती है
दीवारें भी इस शोर के आगे नत मस्तक हैं
सारे के सारे वृक्ष ढूँढते हैं
अपने लिए कोई और ठिया
आकाश खुद से मुँह छिपाता रेंगता फिरता है ।
रो रहे हैं सारे प्रतीक इस शोर में ।
आसान नहीं इससे पार पाना
यह शोर
धर्म का शोर है ।
8 हत्यारे
आयेंगे हत्यारे
और ग़ायब हो जायेंगे
पल भर में जुगनू की तरह हँसते-गाते दिन।
चेहरे खुले होंगे हत्यारों के
नहीं होंगे नक़ाब।
तलाशेंगे बच्चे उनमें परिचित चेहरा
औरतें करेंगी कुछ याद करने की कोशिश
पर पहचाने नहीं जायेंगे हत्यारे
हत्यारे सिर्फ़ हत्यारे होंगे।
हत्यारों का निशाना होंगे अब
खुले मैदान और फूलों से भरे बगीचे
ले जायेंगे वे अपने साथ
त्यौहारों से भरे दिन।
होते हैं हत्यारे फ़िराक़ में
नई-नई इच्छाओं नये-नये स्वप्नों के।
एक दिन
सारे उत्सव और त्यौहार
होंगे हत्यारों की झोली में।
9 साँकल
कितने दिन हुए
किसी रैली जुलूस में शामिल हुए बिना
दिन कितने हुए
किसी जुल्म जोर जबरदस्ती के खिलाफ
नहीं लगाया कोई नारा
हुए दिन कितने नहीं बैठी धरने पर
किसी सत्याग्रह, पदयात्रा में नहीं चली जाने कितने दिनों से
‘कैंडल लाईट मार्च’ में तो शामिल नहीं हुई आज तक
तो क्या
सब कुछ ठीक हो गया है अब
इन दिनों क्या करना चाहिए
ऐसी ही आवाज़ों के बारे में बढ़-चढ़कर लिखना चाहिए
‘चुप’ लगाकर घर में बैठे रहना चाहिए
या इतनी जोर से हुंकार भरना चाहिए कि
निर्लज्जता से डकार रहे हैं जो दूसरों के हिस्से
उठ सके उनके पेट में मरोड़
यह और बात है कि
सड़कें इतनी छोटी और दुकानें इतनी फैल गई हैं कि
जुलूस भी तब्दील हो जाते हैं भीड़ में
विरोध के बिना जीवन कैसा होगा
घर के दरवाजे पर साँकल होगी
लेकिन उसमें खटखटाहट ना होगी
साँकल खटखटाए बिना दरवाजे के पार जाएँगे
तो चोर समझ लिए जाएँगे
चाँद आधा निकला होगा और कहा जाएगा हमसे
कहो- पूरा निकला है चाँद ।
10 सम्बोधन
दर्द और राहत एक हो गए
चीख और कराह घुल-मिल गए
जन्म देने की प्रक्रिया पूरी हुई
सयानापन और सन्नाटा उठ खड़े हुए
रोने की पहली आवाज़ सुने बिना माँ बेसुध हुई
क्या हुआ, क्या हुआ की आकुलता इतनी भयानक कि
घर की स्त्रियों में ‘क्या हुआ’ को लेकर द्वंद्व मच गया ।
बूढ़ी सयानी दाई रो पड़ी
थरथराते हाथों से सर पर कलश रखते
देहरी पार की उसने
लड़के के जन्मने पर ‘जय श्री कृष्ण ‘
लड़की के जन्मने पर ‘जय माता दी’
हर प्रसव के बाद इसी तरह बताना होता है
लड़का हुआ है कि लड़की हुई है ।
कलश का पानी छलका
जिसने शब्दों और अर्थों को पानी-पानी कर दिया
देहरी पार कहती है दाई’‘जय माता दी
बरात द्वारे आई है बिठाना है कि लौटाना है”
‘लौटाना है, लौटाना है जय माता दी’
‘मद्विम स्वर में एक मत से बोल उठा समूह’
‘हे देवी
हमारे यहाँ न पधारो, प्रस्थान करो, प्रस्थान करो’
‘देव की पूजा, देवी से प्रार्थना
साधारण मानुष का जन्म लेते ही वध ।
दाई ने सर पर रखे कलश को
पेड़ से टूटे पत्ते की तरह गाड़ दिया जमीन में
चाँद पेड़ की ओट में छिप गया
अंधेरे का फायदा उठाते अपने नवजात बच्चे को
दाँतों के बीच दबाए बिल्ली दबे पाँव निकल गई
माँ के कंठ से निकली रूलाई ने
प्रसव कक्ष में बिना तकिए के दम तोड़ दिया ।
एक स्त्री ने स्त्री को जन्म दिया
स्त्री की स्त्री से नाल एक स्त्री ने काटी
एक स्त्री ने स्त्री को जमीन में गाड़ दिया
पितृसत्ता का कैसा भयानक कुचक्र कि
स्त्री ने ही स्त्री का समूल नाश किया ।
यह किसी मध्ययुगीन नाटक का दृश्य नहीं
आधुनिक जीवन का दृश्य है
जिसमें आज भी निर्णायक पुरूष मूकदर्शक है ।
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