Wednesday, May 29, 2024
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स्त्री प्रतिरोध की कविता और उसका जीवन

प्रतिरोध की कविताएं

कवयित्री सविता सिंह

स्त्री दर्पण मंच पर मुक्तिबोध की स्मृति में आयोजित ‘प्रतिरोध कविता श्रृंखला’ प्रसिद्ध कवयित्री सविता सिंह द्वारा संयोजित की जा रही है। इस श्रृंखला में वरिष्ठ कवयित्रियों में अब तक शुभा, शोभा सिंह, निर्मला गर्ग, कात्यायनी, अजंता देव, प्रज्ञा रावत, सविता सिंह, रजनी तिलक, निवेदिता, अनिता भारती, हेमलता महिश्वर, सुशीला टाकभौरे जैसी कवयित्रियों की कविताओं के साथ समकालीन कवयित्री वंदना टेटे, रीता दास राम, नीलेश रघुवंशी, निर्मला पुतुल एवं सीमा आज़ाद की कविताओं को आपने पढ़ा।
आज मंच पर कवयित्री कविता कृष्णपल्लवी की कविताएं प्रस्तुत कर रहे हैं।
“प्रतिरोध कविता श्रृंखला” पाठ – 17 में कवयित्री सुशीला टाकभौरे की कविताओं को आप पाठकों ने पढ़ा। आपके महत्वपूर्ण विचार व टिप्पणियों से सभी लाभान्वित हुए।
आज “प्रतिरोध कविता श्रृंखला” पाठ – 18 में कवयित्री कविता कृष्णपल्लवी की कविताएं परिचय के साथ आप पाठकों के समक्ष प्रस्तुत हैं।
पाठकों के सहयोग, स्नेह व प्रोत्साहन का सादर आभार व्यक्त करते हुए प्रतिक्रियाओं का इंतजार है।
– सविता सिंह
रीता दास राम
आज हिन्दी में स्त्री कविता अपने उस मुकाम पर है जहां एक विहंगम अवलोकन ज़रुरी जान पड़ता है। शायद ही कभी इस भाषा के इतिहास में इतनी श्रेष्ठ रचना एक साथ स्त्रियों द्वारा की गई। खासकर कविता की दुनिया तो अंतर्मुखी ही रही है। आज वह पत्र-पत्रिकाओं, किताबों और सोशल मिडिया, सभी जगह स्त्री के अंतस्थल से निसृत हो अपनी सुंदरता में पसरी हुई है, लेकिन कविता किसलिए लिखी जा रही है यह एक बड़ा सवाल है। क्या कविता वह काम कर रही है जो उसका अपना ध्येय होता है। समाज और व्यवस्थाओं की कुरूपता को बदलना और सुन्दर को रचना, ऐसा करने में ढेर सारा प्रतिरोध शामिल होता है। इसके लिए प्रज्ञा और साहस दोनों चाहिए और इससे भी ज्यादा भीतर की ईमानदारी। संघर्ष करना कविता जानती है और उन्हें भी प्रेरित करती है जो इसे रचते हैं। स्त्रियों की कविताओं में तो इसकी विशेष दरकार है। हम एक पितृसत्तात्मक समाज में जीते हैं जिसके अपने कला और सौंदर्य के आग्रह है और जिसके तल में स्त्री दमन के सिद्धांत हैं जो कभी सवाल के घेरे में नहीं आता। इसी चेतन-अवचेतन में रचाए गए हिंसात्मक दमन को कविता लक्ष्य करना चाहती है जब वह स्त्री के हाथों में चली आती है। हम स्त्री दर्पण के माध्यम से स्त्री कविता की उस धारा को प्रस्तुत करने जा रहे हैं जहां वह आपको प्रतिरोध करती, बोलती हुई नज़र आएंगी। इन कविताओं का प्रतिरोध नए ढंग से दिखेगा। इस प्रतिरोध का सौंदर्य आपको छूए बिना नहीं रह सकता। यहां समझने की बात यह है कि स्त्रियां अपने उस भूत और वर्तमान का भी प्रतिरोध करती हुई दिखेंगी जिनमें उनका ही एक हिस्सा इस सत्ता के सह-उत्पादन में लिप्त रहा है। आज स्त्री कविता इतनी सक्षम है कि वह दोनों तरफ अपने विरोधियों को लक्ष्य कर पा रही है। बाहर-भीतर दोनों ही तरफ़ उसकी तीक्ष्ण दृष्टि जाती है। स्त्री प्रतिरोध की कविता का सरोकार समाज में हर प्रकार के दमन के प्रतिरोध से जुड़ा है। स्त्री का जीवन समाज के हर धर्म जाति आदि जीवन पितृसत्ता के विष में डूबा हुआ है। इसलिए इस श्रृंखला में हम सभी इलाकों, तबकों और चौहद्दियों से आती हुई स्त्री कविता का स्वागत करेंगे। उम्मीद है कि स्त्री दर्पण की प्रतिरोधी स्त्री-कविता सर्व जग में उसी तरह प्रकाश से भरी हुई दिखेंगी जिस तरह से वह जग को प्रकाशवान बनाना चाहती है – बिना शोषण दमन या इस भावना से बने समाज की संरचना करना चाहती है जहां से पितृसत्ता अपने पूंजीवादी स्वरूप में विलुप्त हो चुकी होगी।
स्त्री प्रतिरोध कविता की अठारहवीं कवि कविता कृष्णपाल्लवी हैं जिनकी विलक्षण कविताएं जीवन समाज के सारे यथार्थ को समाहित कर एक नए यथार्थ का सृजन करती सी लगती हैं। उन्हें मालूम हैं स्त्रियां सच्ची प्रेम कविताएं क्यों नहीं लिखती। वे शोकगीत बनने लगती हैं। इसी तरह ये बताती हैं स्त्रियां प्रेम भी क्यों नहीं करतीं। उन्हें कितनी ही यातनाएं याद आने लगती हैं _ वह नीला तंबू जिसमें खून ही खून हुआ, देह से लेकर मन तक का। लेकिन यह कवि लड़ना जानती है। इसे पता है की जूते भले हमारी मनहूस जिंदगियों में साथ घिसते हुए उदास हो जातें हैं, मगर वह दुनिया के तमाम घटिया और मक्कार लोगों के सिर पर भी मारे जा सकते है। पढ़िए इनकी फिलिस्तीन के बच्चों द्वारा लिखवाई गई प्रेम कविताएं जो इन्होंने ही लिखी है। दुनिया कितनी अन्याय पूर्ण है, इसका बखान और रोष भी यहां पाइए। और वह घर जिसे स्त्री बनाती है अपने सपनों और श्रम से, एक दिन उसे डायनामाइट से उड़ा देना चाहती है, मगर क्यों? अपनी यातनाओं से वह कैसे निपटती है और पार पाती है, यहां पढ़ें।
कविता कृष्णपल्लवी का परिचय :
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जन्म : गोरखपुर (उ.प्र) में, शिक्षा : एम. ए. (राजनीति शास्त्र)
लगभग दो दशकों से क्रान्तिकारी वाम विचारधारा के साथ मज़दूरों, विशेषकर स्त्री मज़दूरों के बीच शिक्षा, राजनीतिक जागरूकता बौर संगठन के कामों में सक्रिय रही हैं। 2006 से कविताएँ लिखना शुरू किया। विभिन्न सामाजिक राजनीतिक विषयों पर भी लिखती रही हैं। हिन्दी की कई महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित हुई हैं। उनकी कविताओं और क़िस्सों का पहला संकलन ‘नगर में बर्बर’ 2019 में प्रकाशित हुआ है।
उनकी अनेक कविताओं और क़िस्सों में स्त्री मन और जीवन के रहस्य और सपने, दर्द और उम्मीदें भी जीवन्त हो उठते हैं। लेकिन पिछले कई वर्षों की उनकी कविताओं का प्रमुख काम रहा है अपने समय की विसंगतियों और विद्रूपताओं को कभी व्यंग्य के नश्तर से उधेड़ डालना, तो कभी सीधे हाथ बढ़ाकर तमाम पर्देदारियों को हटा देना। आज के समय की ”अमानवीय और आश्चर्यजनक, लेकिन तार्किक बेवक़ूफ़ियों और बेतुकी बातों का अति-यथार्थवादी थिएटर” हो, या ”वामपन्थ की चूनर ओढ़े सत्ता संग रास” रचाने वाले हों, कृष्णपल्लवी की ”विद्वत्तापूर्ण, सुन्दर भ्रमों और झूठों के विरोध में सीधे-सादे सच की अनगढ़-फूहड़ कविता” किसी को नहीं बख़्शती। मगर तीखे व्यंग्य और गहरी अन्तर्दृष्टि से लैस अपनी कविताओं और क़िस्सों की सबसे प्रखर धार वे सत्ता में क़ाबिज़ फ़ासिस्टों के लिए सुरक्षित रखती हैं।
कविता कृष्णपल्लवी की कविताएं :
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(1)
मुक्ति की किसी ने नहीं दी शिक्षा,
किसी ने नहीं बताया
पराजितों और पीछे छूट गए लोगों की
गरिमा और मौलिकता के बारे में I
यह सब बताया मुझे ज़िन्दगी ने I
जीने की तरक़ीब मैंने खुद ईज़ाद की I
सपने देखने का शिल्प मैंने खुद से सीखा I
खुद ही मैंने जाना
असफलता के सम्मान के बारे में,
भीड़ के पीछे न चलने का
फैसला मैंने खुद लिया I
हाँ, मगर दुःख में हँसना मैं न सीख पायी I
दुःख में मैं अकेली होती हूँ
अपने साथ,
कुछ लिखती हूँ सिर्फ़ अपने लिए
और हाँ,
आँसू मेरे लिए तब शर्म की बात होते हैं,
अगर वे किसी निजी दुःख से उपजे हों I
अब भी मैं उन्हें छुपाती हूँ I
सीखा है मैंने बस खुद से
और ज़िन्दगी से
और किताबों से
और चन्द यात्राओं और सरायों में मिले राहियों से
और उन्हें मैं याद करती हूँ
और सलाम करती हूँ
हर रोज़ I
(2) कुछ निरर्थक काम जैसे कि …
सार्थक के साथ हरदम
करती रहती हूँ कुछ निरर्थक भी ।
अज्ञात के रहस्यों को जानने की
कोशिश करते हुए
स्वयं ही कुछ रहस्य रचती रहती हूँ ।
जैसे दे ही दूँ एक मिसाल, कि
निजी डायरियाँ भी लिखती हूँ
छिपाकर पूरी दुनिया से
और उन्हें कहीं दबा देती हूँ
कभी सुदूर रेगिस्तान में
रेत के किसी टीले के नीचे,
तो कभी किसी ग्लेशिअर के पास
या खोद कर गाड़ देती हूँ
उत्तर-पूर्व के किसी दुर्गम वर्षा-वन में ।
मेरे मरने के बहुत दिनों बाद, सदियों बाद,
यदि मिलेंगी किसी को वे डायरियाँ
तो पैग़म्बरों, क़ातिलों, नायकों, कवियों,
लकड़हारों, संगीत-निर्माताओं, गोताखोरों,
चिंतकों,सब्ज़ीफ़रोशों, न्यायाधीशों, प्रेमियों,
गली के शोहदों, रंगसाज़ों, पागलों, प्रोफ़ेसरों
और न जाने कितने लोगों के बारे में
रहस्यमय, या आश्चर्यजनक, या विस्फोटक
या अबूझ जानकारियाँ देंगी
पर वे जानकारियाँ तब
इतनी पुरानी हो चुकी रहेंगी कि
बस कोई ऐतिहासिक उपन्यास लिखने के
काम आ सकेंगी ।
उनमें मेरे भी वे सभी राज होंगे
जिन्हें जानने के लिए मरते रहे
मेरे शुभचिंतक और मेरे दुश्मन
और जिनके बारे में मेरे दोस्तों ने
कभी कुछ नहीं पूछा ।
उनमें मेरी तमाम अधूरी यात्राओं, खंडित स्वप्नों,
पलायनों, पाखंडों, अधूरे और विफल और अव्यक्त प्रेमों,
कुछ गुप्त कारगुजारियों,
विश्वासघातों और विचलनों और कुछ थोड़े से दुखों
और बहुत सी उदासियों के बारे में मुख़्तसर में
कुछ टीपें मिलेंगी
लेखों-कविताओं के ढेरों कच्चे मसविदों के बीच ।
लेकिन तब, युगों बाद, कोई मेरा
बिगाड़ भी क्या पायेगा ?
और सबसे बड़ी बात तो यह कि
जिन्हें मिलेंगी भी ये डायरियाँ,
उनमें लिखी बातों का उनके लिए
न कोई मतलब होगा, न ही कोई अहमियत ।
हाँ, उनमें से अगर कोई कवि हुआ,
या कोई उदास प्रेमी,
तो बात और है ।
(17 दिसम्बर, 2017)
(3) स्त्रियों की प्रेम कविताओं के बारे में एक अप्रिय, कटु यथार्थवादी कविता
आम तौर पर स्त्रियाँ जब प्रेम कविताएँ लिखती हैं
तो ज़्यादातर, वे भावुकता से लबरेज
और बनावटी होती हैं क्योंकि
उनमें वे सारी बातें नहीं होती हैं
जो वे लिख देना चाहती हैं और
लिखकर हल्का हो लेना चाहती हैं |
इसलिए प्रेम कविताएँ लिखने के बाद
उनका मन और भारी, और उदास हो जाता है |
स्त्रियाँ जब अपने किसी सच्चे प्रेमी के लिए भी
प्रेम कविताएँ लिखती हैं
तो उसमें सारी बातें सच्ची-सच्ची नहीं लिखतीं चाहते हुए भी |
शायद वे जिससे प्रेम करती हैं
उसे दुखी नहीं करना चाहतीं
या शायद वे उसपर भी पूरा भरोसा नहीं करतीं,
या शायद वे अपनी ज़िंदगी की कुरूपताओं को
किसी से बाँटकर
और अधिक असुरक्षित नहीं होना चाहतीं,
या फिर शायद, वे स्वयं कपट करके किसी अदृश्य
अत्याचारी से बदला लेना चाहती हैं |
स्त्रियाँ कई बार इस डर से सच्ची प्रेम कविताएँ नहीं लिखतीं
कि वे एक लंबा शोकगीत बनने लगती हैं,
और उन्हें लगता है कि दिग-दिगन्त तक गूँजने लगेगा
एक दीर्घ विलाप |
स्त्रियाँ चाहती हैं कि एक ऐसी
सच्ची प्रेम कविता लिखें
जिसमें न सिर्फ़ मन की सारी आवारगियों, फंतासियों,
उड़ानों का, अपनी सारी बेवफ़ाइयों और पश्चातापों का
बेबाक़ बयान हो, बल्कि यह भी कि
बचपन से लेकर जवान होने तक
कब, कहाँ-कहाँ, अँधेरे में, भीड़ में , अकेले में,
सन्नाटे में, शोर में, सफ़र में, घर में, रात में, दिन में,
किस-किस ने उन्हें दबाया, दबोचा, रगड़ा, कुचला,
घसीटा, छीला, पीसा, कूटा और पछींटा
और कितनों ने कितनी-कितनी बार उन्हें ठगा, धोखा दिया,
उल्लू बनाया, चरका पढ़ाया, सबक सिखाया और
ब्लैकमेल किया |
स्त्रियाँ प्रेम कविताएँ लिखकर शरीर से भी ज़्यादा
अपनी आत्मा के सारे दाग़-धब्बों को दिखलाना चाहती हैं
लेकिन इसके विनाशकारी नतीज़ों को सोचकर
सम्हल जाती हैं |
स्त्रियाँ अक्सर प्रेम कविताएँ भावनाओं के
बेइख्तियार इजहार के तौर पर नहीं
बल्कि जीने के एक सबब, या औज़ार के तौर पर लिखती हैं |
और जो गज़ब की प्रेम कविताएँ लिखने का
दावा करती कलम-धुरंधर हैं
वे दरअसल किसी और चीज़ को प्रेम समझती हैं
और ताउम्र इसी मुगालते में जीती चली जाती हैं |
कभी अपवादस्वरूप, कुछ समृद्ध-कुलीन स्त्रियाँ
शक्तिशाली हो जाती हैं,
वे प्रेम करने के लिए एक या एकाधिक
पुरुष पाल लेती हैं या फिर खुद ही ढेरों पुरुष
उन्हें प्रेम करने को लालायित हो जाते हैं |
वे स्त्रियाँ भी उम्र का एक खासा हिस्सा
वहम में तमाम करने के बाद
प्रेम की वंचना में बची सारी उम्र तड़पती रहती हैं
और उसकी भरपाई प्रसिद्धि, सत्ता और
सम्भोग से करती रहती हैं |
स्त्रियाँ सच्ची प्रेम कविताएँ लिखने के लिए
यथार्थवादी होना चाहती हैं,
लेकिन जीने की शर्तें उन्हें या तो छायावादी बना देती हैं
या फिर उत्तर-आधुनिक |
जो न मिले उसे उत्तर-सत्य कहकर
थोड़ी राहत तो मिलती ही है !
सोचती हूँ, एस.एम.एस. और व्हाट्सअप ने
जैसे अंत कर दिया प्रेम-पत्रों का,
अब आवे कोई ऐसी नयी लहर
कि नक़ली प्रेम कविताओं का पाखण्ड भी मिटे
और दुनिया की वे कुरूपताएँ थोड़ी और
नंगी हो जाएँ जिन्हें मिटा दिया जाना है
प्रेम कविताओं में सच्चाई और प्रेम को
प्रवेश दिलाने के लिए |
(27-28 नवम्बर, 2018)
(4) हादसा
यक ब यक ही हुआ वह हादसा
कि मैं इस क़दर सुखी और संतुष्ट लोगों से घिर गयी
एक वह्शतअंगेज़ वक़्त में
जब अँधेरा लोगों की रगों में खून के साथ
घुल-मिलकर बहने की खौफ़नाक कोशिशों में लगा हुआ था I
उन लोगों को अगर ज़माने से और हुक्मरानों से
कुछ शिकायतें भी थीं तो बस थोड़ी-बहुत
बेहद दोस्ताना शिकायतें थीं
और उनका कहना था कि जो ऊपर बैठे होते हैं
उनकी बहुत सारी मजबूरियाँ होती हैं
जिन्हें नीचे वाले समझ ही नहीं सकते I
वे सभी जैसे किसी अतियथार्थवादी पेंटिग के फ्रेम में
जकड़े हुए सपाट चेहरे वाले लोग थे
जो बड़े प्यार से मुझे अपने बीच
जगह देने की कोशिश कर रहे थे I
मैं किसीतरह बाहर निकल तो आयी
उस महफ़िल से मगर उसकी यादें मुझे
कई-कई दिनों तक
बुरे सपनों की तरह सताती रहीं !
(1 नवम्बर, 2019)
(5) साधारण के पीछे का रहस्यमय-रोमांचक गुप्त असाधारण
किचन के बर्तनों में, डिब्बों और शीशियों में कुछ ढूँढ़ते हुए
वह खुद भी नहीं जानती कि क्यों उसे लगता रहता है
कि वह कुछ षड्यंत्र कर रही है
दीवारों के ख़िलाफ़
या कि सुकूनतलब ज़िन्दगी के ख़िलाफ़ |
वह नहीं जानती कि क्यों सुबह सहसा याद आये
अपने बीस वर्षों पुराने प्यार के बारे में
वह इससमय फिर सोचने लगी है अनायास
जो वह सबसे छुपा लेने में सफल रही थी |
वह अभी भी चाँद से आधी रात को
कुछ गुफ़्तगू करने के बारे में सोचती है
और उसका पति बिस्तर में उसका इंतज़ार करता है
जल्दी से सेक्स करके सो जाने के लिए
क्योंकि कल सुबह उसे जल्दी उठना है
और कई ज़रूरी काम निपटाने हैं
दफ़्तर जाने से पहले |
वह खुद से भी छुपाती रहती है
अपने बेहद ख़तरनाक इरादों को,
पागलपन भरी योजनाओं को,
अविश्वसनीय मंसूबों को
और भोर की उड़ान के सपनों को |
जब वह सबसे विश्वसनीय और निरीह लगती है
तब उसके ज़ेहन में सबसे भयंकर साज़िशें
सुगबुगा रही होती हैं |
जब वह एकदम पालतू लगती है
तब वह एक मोटर बोट लेकर
सुदूर समुद्र में निकल जाने के बारे में
भरोसे के साथ सोच रही होती है |
घर को सजाते-सँवारते समय वह उसे
डायनामाइट से उड़ा देने के बारे में सोच रही होती है |
बच्चों के बारे में वह अक्सर सोचती है कि
उन्हें उड़ने के लिए सही समय पर बाहर धकेल देगी
जैसे पक्षी अपने बच्चों के साथ करते हैं |
इधर जबसे वह कुछ पढ़ने-लिखने लगी है,
एक लायब्रेरी में बैठने लगी है,
एक फिल्म क्लब की सदस्य हो गयी है,
थियेटर करने के बारे में सोचने लगी है फिर से,
कुछ धरना-प्रदर्शनों में जाने लगी है
और घर से बाहर अपनी दुनिया फैलाने लगी है,
बहुत कुछ अजीब खयालात आने लगे हैं
और अजीब घटनाएँ घटने लगी हैं |
हालाँकि यह अभी अपवाद है
पर अपवाद भी अगर समय से
मौत के शिकार न हो जाएँ तो कालान्तर में
अपने विपरीत में बदल जाते हैं
और आम प्रवृत्ति बन जाते हैं|
कभी-कभी तो आधी रात को अचानक उठकर
वह याद करने लगती है कि
यह जो मोटा, भदभद, तुंदियल
बिस्तर पर चित्त पड़ा
नाक से घनगर्जन कर रहा है
मूँछों को फड़फड़ाता हुआ,
यह कौन है और यहाँ कर क्या रहा है !
(4 नवम्बर, 2018)
(6) गाज़ा के एक बच्चे की कविता
बाबा! मैं दौड़ नहीं पा रहा हूँ.
ख़ून सनी मिट्टी से लथपथ
मेरे जूते बहुत भारी हो गये हैं।
मेरी आँखें अन्धी होती जा रही हैं
आसमान से बरसती आग की चकाचौंध से।
बाबा! मेरे हाथ अभी पत्थर
बहुत दूर तक नहीं फेंक पाते
और मेरे पंख भी अभी बहुत छोटे हैं।
बाबा! गलियों में बिखरे मलबे के बीच
छुपम-छुपाई खेलते
कहाँ चले गये मेरे तीनों भाई?
और वे तीन छोटे-छोटे ताबूत उठाये
दोस्तों और पड़ोसियों के साथ तुम कहाँ गये थे?
मैं डर गया था बाबा कि तुम्हें
पकड़ लिया गया होगा
और कहीं किसी गुमनाम अँधेरी जगह में
बन्द कर दिया गया होगा
जैसा हुआ अहमद, माजिद और सफ़ी के
अब्बाओं के साथ.
मैं डर गया था बाबा कि
मुझे तुम्हारे बिना ही जीना पड़ेगा
जैसे मैं जीता हूँ अम्मी के बिना
उनके दुपट्टे के दूध सने साये और लोरियों की
यादों के साथ।
मैं नहीं जानता बाबा कि वे लोग
क्यों जला देते हैं जैतून के बागों को,
नहीं जानता कि हमारी बस्तियों का मलबा
हटाया क्यों नहीं गया अबतक
और नये घर बनाये क्यों नहीं गये अब तक!
बाबा! इस बहुत बड़ी दुनिया में
बहुत सारे बच्चे होंगे हमारे ही जैसे
और उनके भी वालिदैन होंगे.
जो उन्हें ढेरों प्यार देते होंगे.
बाबा! क्या कभी वे हमारे बारे में भी सोचते होंगे?
बाबा! मैं समन्दर किनारे जा रहा हूँ
फुटबाल खेलने.
अगर मुझे बहुत देर हो जाये
तो तुम लेने ज़रूर आ जाना.
तुम मुझे गोद में उठाकर लाना
और एक बड़े से ताबूत में सुलाना
ताकि मैं उसमें बड़ा होता रहूँ।
तुम मुझे अमन-चैन के दिनों का
एक पुरसुक़ून नग़मा सुनाना,
जैतून के एक पौधे को दरख़्त बनते
देखते रहना
और धरती की गोद में
मेरे बड़े होने का इंतज़ार करना।
(3 अक्टूबर, 2015)
(7) इक्कीसवीं सदी के उजाड़ में प्यार
बात वर्षों पुरानी है !
जो मुझे बहुत चाहने लगा था
उसने भी तंग आकर घोषित कर दिया एक दिन कि
आने वाले दिनों की एक
अंधी प्रतीक्षा हूँ मैं I
और यह उससे भी बहुत-बहुत पहले की बात है I
जब मेरी आत्मा के पंख उगने लगे थे
तो मैंने किसी धूमकेतु से
प्यार करना चाहा था
पर मुझसे प्यार करना चाहता था
क़स्बे का घंटाघर
या कोई शाही फरमान
या कोई सजावटी साइन बोर्ड
या पंक्चर लगाने की दूकान के बाहर पड़ा
कोई उदास, परित्यक्त टायर I
जिन दिनों तमाम क़रार ढह रहे थे,
वायदे टूट रहे थे
और धीरज के साथ सपने कूटकर
सड़कें बनाई जा रही थीं,
मैं किसी पुरातन प्रतिशोध की तरह
जंगलों में सुलग रही थी I
फिर सूखे पत्ते धधक कर जलने लगे
और एक लंबा समय आग के हवाले रहा I
जलते हुए रास्ते से एक बार फिर मैं
प्यार की खोज में निकली
पर तबतक बहुत देर हो चुकी थी I
तब सपनों के अर्थ बताने वाले लोग
सड़कों पर मजमे लगा रहे थे,
दार्शनिक ताश के पत्ते फेंट रहे थे,
वैज्ञानिक सिर्फ अनिश्चितता के बारे में
अनुमान लगा रहे थे
और महाविनाश को लेकर
साइन्स फिक्शन लिख रहे थे,
मार्क्सवाद के प्रोफ़ेसर पंचांग बाँच रहे थे
और कविगण उत्तर-सत्य का आख्यान रच रहे थे
या देवकन्याओं के बारे में
अलौकिक वासनामय कविताएँ लिख रहे थे
और सोच रहे थे कि क्या अमर प्रेमी भी
कभी पा सके थे एक वास्तविक स्त्री का दिल ?
अगर कहीं थोड़ा-बहुत प्यार
शायद बचा रह गया था
तो बेहद मामूली,
नामालूम चेहरों वाले चन्द
आम नागरिकों के पास
पर उसे भी खोज पाना
इतना आसान नहीं था !
( 15 अक्टूबर, 2018 )
(😎 एक दिन की बात
सूरज तब रोज़ की तरह काला उगा था,
घर से निकाल डी टी सी की बस में बैठा वह आदमी अस्पताल जा रहा था
वहाँ भर्ती अपने बच्चे के पास |
पूरी रात जागी थी पत्नी वहाँ, अब पारी उसकी थी |
गंतव्य से आधी दूरी तय करने तक पढ़ चुका था लगभग पूरा अखबार,
बुंदेलखंड में कुपोषण से बच्चों की मौतों,
उजाड़े गए आदिवासियों के देशद्रोही बन जाने,
संसद के सामने तबाह तमिल किसानों के नग्न प्रदर्शन,
कश्मीर उपचुनाव में 6 प्रतिशत मतदान,
छात्रों पर लाठीचार्ज और आंसूगैस छोड़े जाने,
सड़कों पर अखलाक और पहलू खान को ढूंढती रक्तपिपासु भीड़
और अंबानी-अडानी के देश की तरक्की में योगदान से जुड़ी कई खबरें
कि अचानक बस रुकी और किसी भीड़ के पीछे भागती पुलिस घुसी भीतर
और मुसाफिरों को पीटने लगी |
बदहवास भागा वह आदमी और घुस गया पास ही ऊंचाई पर खड़े उस
भव्य प्रासाद में जो संस्कृति और चिंतन का केंद्र था
और वहाँ उससमय कला और विचार के सामने खड़ी मुश्किलों पर
गंभीर विचार-विमर्श चल रहा था |
बदहवास घुसा भीतर वह मामूली आदमी और बोला चीखकर ,
“अब देश एक ऐसे मुकाम पर आ गया है , जहां क्रांति के अलावा
कोई और रास्ता नहीं रह गया है |”
डिस्टर्ब हो गया सारा माहौल, सब भरभंड हो गया |
मोटे चश्मे वाला बुजुर्ग संस्कृति-चिंतक बोला, ” कला में यूं
राजनीति को सीधे लाना ही तो सारे विनाश की जड़ है |”
“कला और विचारों की दुनिया में यूं नारेबाजी?
हम प्रगतिशीलों का यह रोग कब छूटेगा?”–लगातार आत्मभर्त्सना करते रहने वाला वामपंथी लेखक भुनभुनाया |
फिर भी लेकिन एजेंडा बदल गया और क्रांति पर
होने लगा विचार, आने लगे नाना उदगार |
एक बूढ़ा समन्वयवादी मार्क्सवादी बोला,”क्रांति की आंधी?
पर मार्क्स तो दूर, कहाँ है कोई अंबेडकर,लोहिया,जे पी या गांधी ?”
एक सत्तर के दशक में लाल क्रांति के सपने देख चुका पुराना
अतिवामपंथी और अब संशयवादी हो चुका कवि बोला,”अजी, हम यह सब
करके देख चुके हैं, यहीं, इसीजगह, मंडीहाउस से कनाटप्लेस तक |”
मार्क्सवादी से ब्राह्मणवादी हो चुका एक आलोचक मुंह फुलकर बोला व्यंग्य से,
“कुछ लोग तो लगातार कर ही रहे हैं क्रांति और संतुष्ट भी हैं
अपनी उपलब्धियों से |”
एक युवा क्रांतिकारी शोध-छात्र बगल में बैठी अपनी प्रेमिका से फुसफुसाया,
“क्रांति की आग बस्तर से लगातार बढ़ रही है राजधानी की ओर,
हमें यहाँ कला और दर्शन में क्रांति के प्रश्न पर विमर्श कर
उसकी मदद करनी है |”
एक कहानीकार चीखा,”कैसे होगी क्रांति? यहाँ कहाँ है ऐसी पार्टी?
कम्युनिस्ट नाकारे हैं, कुछ कर ही नहीं रहे हैं !”
एक दूसरा बोला उसे काटते हुए,”अजी, यह पूरा देश हिंजड़ा है साला,
ये क्या क्रांति करेगा ! इसे ठीक करेगा तानाशाही का डंडा!”
प्राचीन साहित्य के बूढ़े मर्मज्ञ ने मर्मर ध्वनि की,”क्रांति नहीं है हमारी संस्कृति और हमारी परंपरा, यहाँ सबकुछ बदलता है शांति से,शनैः-शनैः |”
फिर सत्तर के दशक का दूसरा बूढ़ा युवा क्रांतिकारी कवि जिसका मिजाज़
इनदिनों कुछ शांतिवादी, कुछ सूफियाना हो गया था, बोला आह भरकर,
“कैसे होगी क्रांति , क्रांति करने वाली शक्तियाँ नदारद हैं!
फिलहाल तो हमें फासिस्टों से अपने को और कला को बचाना है|
काश, आज गांधी होते! चलो राजघाट चलें !”
हिन्दी विभाग का एक मोटा-तुंदियल विभागाध्यक्ष ,जो युवावस्था में वामपंथी
राजनीति कर चुका था, फटे गले से चिल्लाया ,”क्रांति का ठेका लिए हुए क्रांतिकारी तो कनफ्यूज हैं | अब तो शायद तभी कुछ होगा , जब
लोकतन्त्र पूरी तरह समाप्त हो जाए |”
मार्क्सवादी से उत्तर-आधुनिक हो चुका कवि-कथाकार, जो विवादित हुआ था
प्राक-आधुनिक के हाथों सम्मानित होकर, बोला बुद्ध की तरह,” क्रांति किस
वर्ग या वर्ण के पक्ष में? क्या हम उस वर्ग या वर्ण के लोग हैं? और क्रांति यदि हो भी जाए तो क्या गारंटी है कि अतीत की क्रांतियों की तरह विफलता, विचलन,
विघटन नहीं होगी उसकी नियति? अतः हे सज्जनो,क्रांति उत्पीड़ित
मनुष्यता का शाश्वत स्वप्न है | उसे वही बने रहने दो | यदि करने की कोशिश करोगे तो उत्पीड़ितों का वह स्वप्न भी छिन जाएगा |”
इसतरह सबने क्रांति न हो पाने के कारण बताए और तमाम दोषों और दोषियों की शिनाख्त की, अपने को पूरीतरह दोषों और जिम्मेदारियों से बरी करते हुए |
एक रिटायर्ड क्रांतिकारी और वर्तमान एकेदेमीशियन बोला,” साला हमको तो कुछ समझे में नहीं आ रहा है !”
और भी ढेरों बातें हुईं , जैसे कि लाल की जगह लाल-नीली या सतरंगी क्रांति करने की गर्दनतोड़ मौलिक बातें….
और फिर इस अनौपचारिक चर्चा को रोककर फिर से मूल एजेंडा पर
विमर्श होने लगा |
बाहर निकला वह आदमी ऊंचाई पर स्थापित उस आतंककारी भव्यता वाली
अट्टालिका से और सीढ़ियाँ उतरते हुए उसने पाया कि
संस्कृति और चिंतन का वह गरिमामय केंद्र
कुत्तों के गू की ढेरी पर खड़ा था !
May 18, 2017
(9) बाज़ार
बाज़ार हमें खुश रहने का आदेश देता है I
मौतों, युद्धों, अभावों, भुखमरी, और संगीनों के साये तले
बाज़ार हमें खुशियाँ ख़रीदने के लिए उकसाता है I
बाज़ार एक मसीहा का चोला पहनकर हमें हमारी ज़िंदगी के
अँधेरों से बाहर खींच लाने का भरोसा देता है I
बाज़ार हमें शोर और चकाचौंध भरी रोशनी की ओर बुलाता है I
बाज़ार हमें हमारी पसंद बताता है
और बताता है कि सबकुछ ख़रीदा और बेचा जा सकता है I
*
हम बहुत सारी चमकदार और जादुई चीज़ें खरीदते हैं
और लालच, हिंसा, स्वार्थपरता, ईर्ष्या, प्रतिस्पर्द्धा
और ढेर सारी मानसिक और शारीरिक बीमारियाँ
उनके साथ-साथ घर चली आती हैं I
*
कुछ लोग बाज़ार में बेचते हैं अपना हुनर,
कुछ काम करने की क़ूव्वत,
कुछ अपनी ज़रूरी चीज़ें,
कुछ अपनी स्मृतियाँ, स्वप्न और कल्पनाएँ
और कुछ लोग अपनी आत्मा I
*
बाज़ार पुरस्कृत करता है कवियों-कलाकारों-शिल्पियों को,
बाज़ार समाज-सेवियों को समाज-सेवा के लिए
मुक्त-हस्त मदद करता है और इसतरह
एक मानवीय चेहरा हासिल करता है
बाज़ार-विस्तार की नयी संभावनाओं के साथ-साथ I
बाज़ार अपने जादू के जोर से कोई भी चीज़ कहीं
बेच सकता है जैसेकि कुत्ता-मंडी में कला
सूअरों के मेले में समाज-सेवा
और बैलों के हाट में बुद्धिमत्ता !
बाज़ार को जब दिखाना होता है कि वही है मानवता का भविष्य
और मुक्ति की सारी संभावनाएँ उसी की चौहद्दियों में क़ैद हैं
तो वह पूँजी की पतुरिया को
समाजवाद के परिधान पहनाकर उसके साथ
मधुयामिनी मनाने लगता है I
*
हर रौशन बाज़ार के पीछे
गहन अँधेरे का एक विस्तार होता है
नीम उजाले के पैबन्दों से भरा हुआ
जहाँ बाज़ार में अपनी हड्डियाँ और खून बेचकर
लौटे हुए गुलाम पनाह लिए होते हैं,
जहाँ नदियाँ सूखती होती हैं,
धरती के नीचे पानी में ज़हर घुलता रहता है,
ग्लेशियर सिकुड़ते होते हैं ,
पशु-पक्षियों की अनगिन प्रजातियाँ विलुप्त होती रहती हैं,
जंगल कटते होते हैं और
खेत बंजर होते जाते हैं I
(17 दिसंबर, 2018)
(10) जूतों पर एक काव्यात्मक विमर्श
( पूर्व-कथन — कुछ दोस्तों ने कहा कि राजनीति और
विचारधारा छोड़ कुछ दूसरे विषयों पर भी
कुछ गप-शप किया करो कभी-कभी I
सो मैं सोचती हूँ इससमय कि
जूतों को लेकर की जाएँ कुछ बातें ! )
*
जूते यात्राओं से कभी थकते नहीं I
धरती नापते हुए
उनका जीवन घिसता रहता है I
जूते कभी शिकायत नहीं करते
बीहड़ रास्तों की I
*
यात्राओं के अलावा
जूते पसंद करते हैं
कमीने और घटिया लोगों के
सिरों और पीठों पर बरसना I
पर जूते आज़ाद नहीं होते I
दुनिया के सबसे घटिया लोग
सबसे सुन्दर जूते पहनते हैं
और आम लोगों को रौंदते हुए
चलते हैं I
खदेड़े जाने पर वे जूते छोड़कर भागते हैं I
जूते बेक़रारी से
उस दिन का इंतज़ार करते हैं I
*
सबसे अभागे और उदास होते हैं
पूरी ज़िन्दगी एक ही राह
चलते रहने वालों के जूते,
ताउम्र घर से दफ़्तर
दफ़्तर से घर की दूरी
तय करते रहने वाले जूते I
दिवंगत महापुरुषों के जूतों के
जीवन का सबसे बुरा दिन
तब आता है जब कोई कूपमंडूक
उनमें घुसकर श्रद्धापूर्वक
सो जाता है I
*
तोल्स्तोय अपनी मर्ज़ी से पहनते थे
गँवई किसानों जैसे जूते
और युवा गोर्की को मुफ़लिसी के दिनों में
यहाँ-वहाँ भटकते हुए
सबसे अधिक जिन चीज़ों की
चिंता करनी पड़ती थी
उनमें उनके सस्ते जूते भी शामिल थे I
अलास्का की बर्फ़ ढँकी वादियों में
शायद अभी भी कहीं दबे पड़े होंगे
जैक लंडन के छोड़े हुए स्नो-बूट I
तस्वीरों में मौजूद प्रेमचंद का
फटा हुआ जूता आज भी गवाही देता है
एक लेखक के साहस और
ईमानदारी के पक्ष में I
*
जूतों के जीवन पर सोचने के लिए
ऐसे समाज में लोगों के पास
भला कैसे समय होगा
जहाँ लोग अपने जीवन के बारे में भी
कुछ सोच नहीं पाते और इतिहास से
कुछ भी सीख नहीं पाते I
मुझे लगता है, इसतरह कविता में जूतों को लाकर
मैं कोई क़र्ज़ उतार रही हूँ
या एक किस्म का
कृतज्ञता-ज्ञापन कर रही हूँ
और साथ ही, कविता को मामूलीपन का
यशस्वी मुकुट पहना रही हूँ I
*
जूते युद्ध का मैदान कभी न छोड़ने वाले
योद्धा के समान होते हैं I
कहीं गली में, या पार्क में, या कूड़े के ढेर पर पड़े
एक अकेले जूते के पास बताने को
एक पूरा इतिहास होता है
और कई रोचक यात्रा-वृत्तांत I
कुत्ते उसमें सूँघते हैं
शायद विस्मृत जीवन की कोई गंध
और उससे खेलते हैं ।
नुक्कड़ का बूढ़ा मोची
उसे उठा ले जाता है
और उसके अलग-अलग हिस्सों को
दूसरे घायल जूतों की मरम्मत में
खर्च कर देता है ।
*
( उत्तर-कथन — तो देखिये नागरिको, बातें अगर
जूतों पर भी हो
तो आ ही जायेंगे आपके विचार
जीवन, समय और समाज के बारे में,
बशर्ते कि आप सोचने और महसूस करने की क्षमता
परित्यक्त जूतों की तरह
कहीं छोड़ न आये हों ।
और हालात अगर ऐसे ही बने रहे
तो वह दिन दूर नहीं जब
राजनीति पर आपको
जूते, छड़ी,झोला,चश्मा, घड़ी
या किसी और छोटी-मोटी चीज़ के बहाने
बात करनी पड़े
और फिर भी आप की सुरक्षा की
कोई गारंटी न हो। )
(10 फरवरी, 2018)
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