Wednesday, May 29, 2024
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सत्ता के पतन का रूपक है मगध

आमतौर पर रचनाएं एक समय के बाद अपने समय तक में सीमित होने लगती हैं या अप्रासंगिक नहीं रह जाती हैं।ऐसे में जब कोई रचनाकार या कला मर्मज्ञ उसे उसके देशकाल से खींच कर ले आता है, और उसका रंग अपने वर्तमान में बिखेर देता है, तो न सिर्फ रचना को प्राणवायु मिलती है बल्कि वर्तमान को भी आत्म-मूल्यांकन करने का अवसर मिलता है। विमर्शों की एक नई खिड़की खुलती है जो समाज और व्यवस्था की एकरेखीय चाल से उपजी उमस में एक बड़ी राहत प्रदान करती है।

कुछ ऐसी ही खिड़की ‘मगध’ नाटक के मंचन से खुली है। “मगध “हिंदी के प्रख्यात कवि -पत्रकार श्रीकांत वर्मा की महत्वपूर्ण काव्य -कृति है।उन्हें इस संग्रह पर साहित्य अकेडमी पुरस्कार मिल चुका है।इस कृति ने तब सत्ता के अंदरूनी संघर्ष और पतन का एक बड़ा रूपक खड़ा किया था।वह अपने समय और शक्ति संरचना की आलोचना भी थी।श्रीकांत वर्मा ने जिस विचार और दृष्टि को काव्य का रूप दिया था, उसे पिछले दिनों मंडी हाउस में, नाटक के रूप में मंचित होते ,बहते देखने का अनुभव अविस्मरणीय रहा। इसके लिए रंग विमर्शकार अमितेश कुमार सराहना के पात्र हैं जिन्होंने काव्य की भावुकता को जीवित रखते हुए उसका मंचीय रूपांतरण बहुत ही सटीक तरीके किया है। प्रखर निर्देशक दिलीप गुप्ता ने पात्रों के चयन से लेकर अभिनय तक सभी क्षेत्रों में जिस बारीकी और निष्ठा से परिश्रम किया है, वह नाटक की समाप्ति के बाद देर तक, दर्शकों की बजती तालियों में बहुत अच्छे से महसूस किया जा सकता था।

बहरहाल नाटक की बात की जाए तो, नाटक ने राजनीति, सत्ता, काल, अस्तित्व, अस्मिता-बोध और इतिहास को निचोड़ कर दर्शक के सामने पेश करने का कार्य किया। नाटक के पात्र भले ही ऐतिहासिक थे, लेकिन उनमें बहने वाला जीवन-रस वर्तमान का था। जिसे सभी पात्रों ने उम्दा तरीके से अभिव्यक्त किया है। व्यवस्था किस तरह से उम्मीदों के समानांतर एक नरक का निर्माण कर रही है और किस तरह समाज खुद को बंधा हुआ महसूस कर रहा है, ये इस नाटक में जिस प्रकार उभर कर सामने आया है, वह एकबारगी भारतेंदु युग के मंचनो की याद दिला देता है जहां बिना कुछ कहे भी सब कुछ कह दिया जाता था।

यह नाटक की सफलता ही कही जाएगी कि उसने मगध के माध्यम से उस भारत का चित्र उकेर दिया है जहां जनता अपना शासक चुनने के लिए मत देने के अधिकार का प्रयोग करते ही, अपने प्रश्न पूछने का अधिकार खो देती है। और फिर भारत में भी वही होता है जो मगध में होता है “कोई छींकता तक नहीं/इस डर से कि/ मगध की शांति/ भंग न हो जाए”। और सत्ता का खौफ इतनी खामोशी ओढ़ा देता है कि “जब कोई नहीं करता/ तो नगर के बीच से गुजरता हुआ/ मुर्दा यह प्रश्न कर हस्तक्षेप करता है कि/ मनुष्य क्यों मरता है”। लेकिन सच कहें तो यह नाटक देख मन में प्रश्न आया कि ख़ामोशी और निष्क्रियता की सफेद चादर ओढ़े मनुष्य को असल में मौत क्यों नहीं आती, जो चुप हैं वो मरते क्यों नहीं ? लेकिन इसका उत्तर भी नाटक में ही सूत्र-रूप में छिपा है। इन सूत्रों को पकड़ना कठिन नहीं है क्योंकि नाट्य रूपांतरण इतने सहज रूप में किया गया है कि सामान्य दर्शक भी समझ सकता है कि सत्ता-व्यवस्था, जनता को मरने भी नहीं देती ताकी वो उनपर शासन कर सके और जनता उसका हुक्म बजाती रहे – “ दुराचार करो और सदाचार की चर्चा करते रहो”।

अपने समीक्षक मन से इजाजत लेकर एक कोरे दर्शक के तौर पर कहूं तो नाटक देखने के दौरान दर्शक दीर्घा में फैला अंधेरा, मंच पर बोले जा रहे संवादों में घुल कर मन में समाता जा रहा था। फिर जिधर देखूं-सोचूं हर ओर “मगध “ही दिख रहा था। एक ओर दहशत, मोहभंग, निराशा, निर्वेद में आकंठ डूबी हारी-थकी जनता तो दूसरी ओर भीड़ में परिणत होती जनता जो अपने नेता का राज्याभिषेक रक्त से कर के भी प्रसन्न है, भले वो रक्त उनके रीढ़ का ही क्यों न हो।

लेकिन ऐसा नहीं है ये नाटक सिर्फ गंभीर दर्शकों के लिए है। असल में ये नाटक दर्शकों को एक गंभीर दर्शक में बदल देता है। दर्शक अभी किसी चुटीले संवाद का आनंद ले ही रहे होते हैं कि तभी कोई पात्र आकर उनके विचार-तंतु को झकझोर देता है और यही इस नाटक की उपलब्धि है। वर्तमान समय में यह नाटक मगध का नया पाठ करता है क्योंकि सत्ता का चरित्र पहले से अधिक क्रूर हो गया है।

रूपाली सिन्हा

शोध छात्रा, दिल्ली विश्वविद्यालय

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