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Wednesday, July 10, 2024
Homeविरासत“स्त्री और प्रकृति : समकालीन हिंदी साहित्य में स्त्री कविता”

“स्त्री और प्रकृति : समकालीन हिंदी साहित्य में स्त्री कविता”

स्त्री दर्पण मंच पर महादेवी वर्मा की जयंती के अवसर पर एक शृंखला की शुरुआत की गई। इस ‘प्रकृति संबंधी स्त्री कविता शृंखला’ का संयोजन प्रसिद्ध कवयित्री सविता सिंह कर रही हैं। इस शृंखला में स्त्री कवि की प्रकृति संबंधी कविताएं शामिल की जा रही हैं।
पिछले दिनों आपने इसी शृंखला के तहत वरिष्ठ कवयित्री मुक्ता की कविताओं को पढ़ा।
आज आपके समक्ष हिंदी साहित्य में चर्चित नाम जया जादवानी की कविताएं हैं तो आइए उनकी कविताओं को पढ़ें।
आप पाठकों के स्नेह और प्रतिक्रिया का इंतजार है।
**
कवयित्री सविता सिंह
————————-

स्त्री का संबंध प्रकृति से वैसा ही है जैसे रात का हवा से। वह उसे अपने बहुत निकट पाती है – यदि कोई सचमुच सन्निकट है तो वह प्रकृति ही है। इसे वह अपने बाहर भीतर स्पंदित होते हुए ऐसा पाती है जैसे इसी से जीवन व्यापार चलता रहा हो, और कायदे से देखें तो, वह इसी में बची रही है। पूंजीवादी पितृसत्ता ने अनेक कोशिशें की कि स्त्री का संबंध प्रकृति के साथ विछिन्न ही नहीं, छिन्न भिन्न हो जाए, और स्त्री के श्रम का शोषण वैसे ही होता रहे जैसे प्रकृति की संपदा का। अपने अकेलेपन में वे एक दूसरी की शक्ति ना बन सकें, इसका भी यत्न अनेक विमर्शों के जरिए किया गया है – प्रकृति और संस्कृति की नई धारणाओं के आधार पर यह आखिर संभव कर ही दिया गया। परंतु आज स्त्रीवादी चिंतन इस रहस्य सी बना दी गई अपने शोषण की गुत्थी को सुलझा चुकी है। अपनी बौद्धिक सजगता से वह इस गांठ के पीछे के दरवाजे को खोल प्रकृति में ऐसे जा रही है जैसे खुद में। ऐसा हम सब मानती हैं अब कि प्रकृति और स्त्री का मिलन एक नई सभ्यता को जन्म देगा जो मुक्त जीवन की सत्यता पर आधारित होगा। यहां जीवन के मसले युद्ध से नहीं, नये शोषण और दमन के वैचारिक औजारों से नहीं, अपितु एक दूसरे के प्रति सरोकार की भावना और नैसर्गिक सहानुभूति, जिसे अंग्रेजी में ‘केयर’ भी कहते हैं, के जरिए सुलझाया जाएगा। यहां जीवन की वासना अपने सम्पूर्ण अर्थ में विस्तार पाएगी जो जीवन को जन्म देने के अलावा उसका पालन पोषण भी करती है।
हिंदी साहित्य में स्त्री शक्ति का मूल स्वर भी प्रकृति प्रेम ही लगता रहा है मुझे। वहीं जाकर जैसे वह ठहरती है, यानी स्त्री कविता। हालांकि, इस स्वर को भी मद्धिम करने की कोशिश होती रही है। लेकिन प्रकृति पुकारती है मानो कहती हो, “आ मिल मुझसे हवाओं जैसी।” महादेवी से लेकर आज की युवा कवयित्रियों तक में अपने को खोजने की जो ललक दिखती है, वह प्रकृति के चौखट पर बार बार इसलिए जाती है और वहीं सुकून पाती है।
महादेवी वर्मा का जन्मदिन, उन्हें याद करने का इससे बेहतर दिन और कौन हो सकता है जिन्होंने प्रकृति में अपनी विराटता को खोजा याकि रोपा। उसके गले लगीं और अपने प्रियतम की प्रतीक्षा में वहां दीप जलाये। वह प्रियतम ज्ञात था, अज्ञात नहीं, बस बहुत दिनों से मिलना नहीं हुआ इसलिए स्मृति में वह प्रतीक्षा की तरह ही मालूम होता रहा. वह कोई और नहीं — प्रकृति ही थी जिसने अपनी धूप, छांह, हवा और अपने बसंती रूप से स्त्री के जीवन को सहनीय बनाए रखा। हिंदी साहित्य में स्त्री और प्रकृति का संबंध सबसे उदात्त कविता में ही संभव हुआ है, इसलिए आज से हम वैसी यात्रा पर निकलेंगे आप सबों के साथ जिसमें हमारा जीवन भी बदलता जाएगा। हम बहुत ही सुन्दर कविताएं पढ सकेंगे और सुंदर को फिर से जी सकेंगे, याकि पा सकेंगे जो हमारा ही था सदा से, यानी प्रकृति और सौंदर्य हमारी ही विरासत हैं। सुंदरता का जो रूप हमारे समक्ष उजागर होने वाला है उसी के लिए यह सारा उपक्रम है — स्त्री ही सृष्टि है एक तरह से, हम यह भी देखेंगे और महसूस करेंगे; हवा ही रात की सखी है और उसकी शीतलता, अपने वेग में क्लांत, उसका स्वभाव। इस स्वभाव से वह आखिर कब तक विमुख रहेगी। वह फिर से एक वेग बनेगी सब कुछ बदलती हुई।
स्त्री और प्रकृति की यह श्रृंखला हिंदी कविता में इकोपोएट्री को चिन्हित और संकलित करती पहली ही कोशिश होगी जो स्त्री दर्पण के दर्पण में बिंबित होगी।
स्त्री और प्रकृति श्रृंखला की अठारहवीं कवि जया जादवानी हैं जिनकी कहानियों को ज्यादा पढ़ा गया है। इनकी कविताएं प्रकृति से किस तरह लिपटी हुई हैं यह हम आज देखेंगे। वे उसके फूलों का खिलना ऐसे देखती हैं जैसे नक्षत्रों का उगना, आसमान के अंतिम छोर का अंतिम आकाश हो जाना और प्रकृति का अपने सृष्टि रूप में लौट जाना, समाधिस्त हो जाना। प्रसव पीड़ा में शायद ही किसी ने किसी स्त्री का हंसना देखा होगा जो इन्होंने देखा। इन्हें पता है एक स्त्री कवि के रूप में “हम सबका अस्तित्व किसी और अस्तित्व को पोषित करने में है”.
ऐसी कवि ही अंजुली में जल लेकर खुद से खुद को वरती है, प्रकृति उसे उसकी संपूर्णता का ज्ञान कराती है। तब ही तो वह आगे की तरफ बढ़ती जाती है और हवा पीछे पलटे बिना जीवन प्राण सी चुपचाप उससे लग कर बहती रहती है। ऐसी स्त्री निर्वसन देह का ऐसा स्वप्न देखती है जिसमें वह सृष्टि के साथ एक हो जाती। अस्तित्व के गहरे अर्थों में घुली हुई जया जादवानी की बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण कविताएं आप भी पढ़ें –
रीत चुके पेड़ों की छालों का
अंतिम स्वर में रोना
जल रही अग्नि में अंतिम आकाश को देखा
अधबीच रुकी बारिश मुझमें भरती गई
मैने देखे कई कई अपने रूप
अनन्त रूपों में तुम्हारे ही…
जया जादवानी की कविताएं
——————————
1 मेरे खिलाफ़
ऐसे बोलते हो तुम
देह में
जैसे चिड़िया बोलती है
घने जंगलों में
और भर देती है
मौन हवाओं को
अजब सुगबुगाहट से
ऐसे चलते हो तुम
जैसे सूर्य उगता है आकाश में
और भर देता है पृथ्वी को
अपनी उजास से
पक्षियों की कतार से
कम्पित तरंग से
तुम्हारा बोलना
तुम्हारा चलना
पृथ्वी का उमगना
आकाश का खिलना
किसी करिश्मे की तरह
करता है साजिश
मेरी देह में
मेरे खिलाफ़….
2 मैंने देखा
मैंने देखा एक काल खंड का
बीतना अपने अंदर
मैंने देखा रीत चुके
पेड़ की छालों का
अंतिम स्वर में रोना
मैंने जल रही अग्नि में
अंतिम आकाश देखा
मैंने देखा अधबीच रुकी बारिश
मुझमें भरती गई
मैंने भरा जाना स्वयं को
और उलीचा जाना देखा
मैंने देखे अपने कई-कई रूप
अनंत रूपों में तुम्हारे
मैंने देखी सृष्टि की
समाधिस्थ अवस्था
मैंने उसका प्रसव पीड़ा में
हँसना देखा ….
3 हम सब का अस्तित्व
गुज़र चुकी चीज़ें
नहीं सोचतीं अपने होने के बारे में
न वे याद रखती हैं
कि अब वे नहीं हैं
वे बस थीं
समय की टिक टिक से परे
जिस तरह प्रेम
याद करने को कुछ भी तो नहीं है
हवा पीछे पलटे बिना चुपचाप बह रही है
फूल निरन्तर खिल रहे हैं
चिड़िया अपनी उड़ानों के बाद
कहाँ देख पाती है
अपने पीछे के आसमानों की लम्बाई
मैं इस सबसे आहिस्ते आहिस्ते गुज़र गयी
जिसके बीच में मुझे रोपित कर दिया गया था
उसी शाख पर खिली मैं
जिस पर प्रक्रति ने उगाया था
और फूल कर पक कर तोड़ ली गयी
वे सारे मौसम मुझ पर से गुज़र गए
शाख मेरा ‌बोझ संभाले खड़ी रही चुपचाप
हम सब का अस्तित्व
एक और अस्तित्व को पोषित करने में है
कही यही बात नदी ने
चुपके से कानों में मेरे
सागर में विलीन होने से पहले …….
4
स्त्री – 1
‘ले गया कपड़े सब मेरे
दूर…..बहुत दूर
काल बहती नदी में
मैं निर्वसना
तट पर
स्वप्न देखती देह का’
स्त्री -2
‘तहखानों में तहखाने
सुरंगों में सुरंगें
ये देह भी अजब ताबूत है
ढूंढ लेती हूँ जब ऊपर आने के रास्ते
ये फिर वापस खींच लेती है .’
स्त्री – 3
‘लेकर अंजुरी में पानी
खुद को देखो तो दिखता है
उसका चेहरा
यूँ मैं अपनी अंजुरी छोडती हूँ
वापस नदी में
खुद को ढूंढती हूँ
बहकर बहुत दूर नहीं गयी हूंगी
अभी घड़ी भर पहले जरा सा
घूँट पिया
अपना मुंह धोया था .’
स्त्री – 4
‘इतना ही था वह
जितना बर्फ में ताप
और मैंने
उम्र सारी गुजार दी
बर्फ लपेटे हुए .’
स्त्री – 5
‘उठाती हूँ जल
अंजलि में
वरती हूँ खुद को
खुद से .’
स्त्री – 6
‘तुमने कहा था तुम आओगे
और मैं ऋतु पूरी गुज़ार आयी
शाखें हुयी नंगी पाले मारे मौसम में
क़र्ज़ था आत्मा पर, देह उतार आयी .
5 अपनी तलाश में
मुझे नहीं पता था एक दिन
मैं अपनी तलाश में
खो दूँगी अपने को ही
खो देता है राख़ होकर
काग़ज़ अपना आकार
मौन होकर प्रार्थनायें
खो देती हैं शब्द अपने
धीरे –धीरे रंग सारे जीवन के
बैठ जाते जल की सतह में खामोश
धुले हुये सफ़ेद चेहरे लिये
धीरे –धीरे जाती खाली नाव
उस पार ….
कुहरे और धुंध से लिपटी हुई
कुहरे और धुंध की ओर …….
6 अभिव्यक्ति
लेकर नक्षत्र हाथों में
बजाऊँ मैं करताल की तरह
जिसकी धुन पर नाचे पूरी पृथ्वी
पूरा आसमान
समूची आकाशगंगायें
कि बरसे जल समस्त धाराओं में
प्रेम को कैसे व्यक्त कर सकती हूँ
मैं
इसके सिवाय ……..
7 एक अकेली मैं
कितने सारे पहाड़
कितनी सारी नदियाँ
कितनी सारी सदियाँ
और एक प्रेम
कितने सारे व्यक्ति
कितने समाज
कितने धर्म
और एक प्रेम
आसमान कितने सारे
कितनी सारी धरती
आकाशगंगाएं कितनी सारी
और एक प्रेम
समुद्र कितने सारे
कितनी सारी प्यास
सीपें कितनी सारी
एक मोती प्रेम
कितने सारे तुम
एक अकेली मैं.
8 दूर से जो घर दिखाई देता है
‘दूर से यह घर दिखाई देता है
एक तालाब
जिसमें नहाती हुई कई भैंसें
गले-गले तक मैले पानी में डूबी
पूंछ से डालतीं कीचड़ खुद पर और
उठाता है चरवाहा पीठ पर ठोंक लाठी
कीचड़ से लिथड़ी ज्यों की त्यों उठ आती है
धूल-धूप-शोर ट्रेफिक में से गुज़रती
अनसुना करती लगातार बजते बाजों को
ले जाकर बाँध दी जाएंगी बाड़ों में
गोबर करेंगी वहीँ, बैठ जाएंगी धप से
दूध दुहने आएगा ग्वाला, उठाएगा लात मार कर
पगुराती रहेंगी वे
नोचेगा बछड़ा बचे हुए को हो अतृप्त
रपटेंगी. बिछ्लेंगी, छोड़ दो तो लौटेंगी वहीँ
दूर से एक घर सुनाई देता है
पास से एक वधस्थल दिखाई देता है.’
9 उन्हें डर लगता है
वे कहते हैं हमने समंदर पिला दिए
ख़ाली कर दिए खेत ओ’ खलिहान
पर ख़त्म होते देखी नहीं
एक स्त्री की भूख और प्यास
वे नहीं देख पाए
सदियों से प्रतीक्षारत
सीप चाहती है बूंद एक
वे नहीं देख पाए
ख़ास कुछ दानों के लिए
सैकड़ों मैदान पार किए एक चिड़िया ने
वे नहीं देख पाए
सातों आसमान एक सांस में उतरते
उन्होंने चाहा जो वही देखा
वे नहीं देख पाए
घनघोर बारिश के बीच सूखा
कुछ ख़ास पर्वतारोही
चाहते हैं साफ़-शफ्फाक एवरेस्ट
कुछ हंस चुगते नहीं कुछ
मोती के सिवा
वे नहीं देख पाए
अपने सांचे तोड़ने से
उन्हें डर लगता है
यह सब देखने से
उन्हें डर लगता है.
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