Wednesday, April 24, 2024
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“स्त्री और प्रकृति : समकालीन हिंदी साहित्य में स्त्री कविता”

स्त्री दर्पण मंच पर महादेवी वर्मा की जयंती के अवसर पर एक शृंखला की शुरुआत की गई। इस ‘प्रकृति संबंधी स्त्री कविता शृंखला’ का संयोजन प्रसिद्ध कवयित्री सविता सिंह कर रही हैं। इस शृंखला में स्त्री कवि की प्रकृति संबंधी कविताएं शामिल की जा रही हैं।
पिछले दिनों आपने इसी शृंखला के तहत महत्वपूर्ण कवयित्री रश्मि रेखा जी की कविताओं को पढ़ा।
आज आपके समक्ष कवयित्री रजत रानी मीनू की कविताएं हैं तो आइए उनकी कविताओं को पढ़ें।
आप पाठकों के स्नेह और प्रतिक्रिया का इंतजार है।

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कवयित्री सविता सिंह

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“स्त्री और प्रकृति : समकालीन हिंदी साहित्य में स्त्री कविता”
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स्त्री का संबंध प्रकृति से वैसा ही है जैसे रात का हवा से। वह उसे अपने बहुत निकट पाती है – यदि कोई सचमुच सन्निकट है तो वह प्रकृति ही है। इसे वह अपने बाहर भीतर स्पंदित होते हुए ऐसा पाती है जैसे इसी से जीवन व्यापार चलता रहा हो, और कायदे से देखें तो, वह इसी में बची रही है। पूंजीवादी पितृसत्ता ने अनेक कोशिशें की कि स्त्री का संबंध प्रकृति के साथ विछिन्न ही नहीं, छिन्न भिन्न हो जाए, और स्त्री के श्रम का शोषण वैसे ही होता रहे जैसे प्रकृति की संपदा का। अपने अकेलेपन में वे एक दूसरी की शक्ति ना बन सकें, इसका भी यत्न अनेक विमर्शों के जरिए किया गया है – प्रकृति और संस्कृति की नई धारणाओं के आधार पर यह आखिर संभव कर ही दिया गया। परंतु आज स्त्रीवादी चिंतन इस रहस्य सी बना दी गई अपने शोषण की गुत्थी को सुलझा चुकी है। अपनी बौद्धिक सजगता से वह इस गांठ के पीछे के दरवाजे को खोल प्रकृति में ऐसे जा रही है जैसे खुद में। ऐसा हम सब मानती हैं अब कि प्रकृति और स्त्री का मिलन एक नई सभ्यता को जन्म देगा जो मुक्त जीवन की सत्यता पर आधारित होगा। यहां जीवन के मसले युद्ध से नहीं, नये शोषण और दमन के वैचारिक औजारों से नहीं, अपितु एक दूसरे के प्रति सरोकार की भावना और नैसर्गिक सहानुभूति, जिसे अंग्रेजी में ‘केयर’ भी कहते हैं, के जरिए सुलझाया जाएगा। यहां जीवन की वासना अपने सम्पूर्ण अर्थ में विस्तार पाएगी जो जीवन को जन्म देने के अलावा उसका पालन पोषण भी करती है।

हिंदी साहित्य में स्त्री शक्ति का मूल स्वर भी प्रकृति प्रेम ही लगता रहा है मुझे। वहीं जाकर जैसे वह ठहरती है, यानी स्त्री कविता। हालांकि, इस स्वर को भी मद्धिम करने की कोशिश होती रही है। लेकिन प्रकृति पुकारती है मानो कहती हो, “आ मिल मुझसे हवाओं जैसी।” महादेवी से लेकर आज की युवा कवयित्रियों तक में अपने को खोजने की जो ललक दिखती है, वह प्रकृति के चौखट पर बार बार इसलिए जाती है और वहीं सुकून पाती है।

महादेवी वर्मा का जन्मदिन, उन्हें याद करने का इससे बेहतर दिन और कौन हो सकता है जिन्होंने प्रकृति में अपनी विराटता को खोजा याकि रोपा। उसके गले लगीं और अपने प्रियतम की प्रतीक्षा में वहां दीप जलाये। वह प्रियतम ज्ञात था, अज्ञात नहीं, बस बहुत दिनों से मिलना नहीं हुआ इसलिए स्मृति में वह प्रतीक्षा की तरह ही मालूम होता रहा. वह कोई और नहीं — प्रकृति ही थी जिसने अपनी धूप, छांह, हवा और अपने बसंती रूप से स्त्री के जीवन को सहनीय बनाए रखा। हिंदी साहित्य में स्त्री और प्रकृति का संबंध सबसे उदात्त कविता में ही संभव हुआ है, इसलिए आज से हम वैसी यात्रा पर निकलेंगे आप सबों के साथ जिसमें हमारा जीवन भी बदलता जाएगा। हम बहुत ही सुन्दर कविताएं पढ सकेंगे और सुंदर को फिर से जी सकेंगे, याकि पा सकेंगे जो हमारा ही था सदा से, यानी प्रकृति और सौंदर्य हमारी ही विरासत हैं। सुंदरता का जो रूप हमारे समक्ष उजागर होने वाला है उसी के लिए यह सारा उपक्रम है — स्त्री ही सृष्टि है एक तरह से, हम यह भी देखेंगे और महसूस करेंगे; हवा ही रात की सखी है और उसकी शीतलता, अपने वेग में क्लांत, उसका स्वभाव। इस स्वभाव से वह आखिर कब तक विमुख रहेगी। वह फिर से एक वेग बनेगी सब कुछ बदलती हुई।

स्त्री और प्रकृति की यह श्रृंखला हिंदी कविता में इकोपोएट्री को चिन्हित और संकलित करती पहली ही कोशिश होगी जो स्त्री दर्पण के दर्पण में बिंबित होगी।

स्त्री और प्रकृति श्रृंखला की हमारी बीसवीं कवि रजत रानी मीनू हैं। इनका खुद से और सारी दुनिया से सवाल है, “मैं कौन हूं? कोई भांगिन कहता है, कोई पासी तो कोई खटीक। लेकिन हूं तो एक दलित स्त्री ही जिसकी दादियों और नानियों ने प्रकृति से प्रेम किया और कहीं ज्यादा प्रेम पाया। उसे जल से सींचा, और उसी से अपना जीवन भी सींचा गया। पेड़ उनके घर बन गए जब उन्हे जंगलों और खेतों से खदेड़ा गया। आसमान छत बने और हवा सांस। नदी ने जल देने में कभी दोभाव नहीं किया। समाज से अधिक प्रकृति ने इन्हे अपनाया। तभी तो सारे अवसादों को अपने दामन में छिपा कर रहती रहीं ये स्त्रियां। वे कहती हैं, “मेरी मुस्कान से, सूरज के प्रकाश सा खिल उठता है मेरा परिवार समाज… मैं बसंत की मुस्कान हूं / आमों की बौर की खुशबू / कोयल सी कूकती हूं मैं”। उदासी फिर भी झरती नहीं पूरी तरह। प्रकृति की संपदा पर अभी भी उन्हीं लोगों का कब्जा है जिन्होंने हमें बांटा है, बेघर किया है।
रजत रानी मीनू की अत्यंत संवेदनशील एवं महत्वपूर्ण
कविताएं आप भी पढ़ें: हर तरफ हरियाली है/ साफ़ सुथरा आसमान/ धुले नहाए पेड़ पौधे/ मुस्काते फूल पत्तियां/ फिर क्यों आंखें गीली/ उदास चेहरा स्त्री का

डा. रजत रानी मीनू का परिचय:
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जन्म- 4 फरवरी 1966, को उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिला में जौराभूड़ गांव में दलित परिवार में जन्म। सम्प्रति- प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, कमला नेहरू काॅलेज, (दिल्ली विश्वविद्यालय)
विशेष- हिन्दी दलित साहित्य कविता, कहानी, आलोचना, समीक्षा और आलेख आदि विधाओं में निरंतर लेखन। हंस, कथादेश, आउटलुक, युद्धरत आमआदमी, अन्यथा, अपेक्षा, दलित दस्तक, हिन्दुस्तानी जुबान इत्यादि पत्र-पत्रिकाओं में कहानी, कविता, समीक्षात्मक लेख इत्यादि प्रकाशित होते रहे हैं।
शैक्षिक योग्यताएं :पोस्ट डाक्टरल रिसर्च अवार्ड, यू.जी.सी. 2012-2104, विषय- ‘समकालीन हिन्दी साहित्य में स्त्री विषयक विविध प्रश्न’, पी-एच.डी.,जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली 2000, विषय- ‘हिन्दी दलित कथा साहित्य में आलोचनात्मक मूल्यांकन’। एम.फिल. , जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली 1995, विषय- ‘नवें दशक की हिन्दी दलित कविता पर डा. अम्बेडकर का प्रभाव’, एम.ए. हिन्दी, रूहेलखण्ड विश्वविद्यालय, बरेली, (उ.प्र.), 1989
प्रकाशित रचनाएं : 1.‘पिता भी तो होते हैं मां’ (कविता संग्रह), 2. ‘हम कौन हैं?’ (कहानी संग्रह), 3. ‘हिन्दी दलित कविता’(आलोचना), 4. हिन्दी दलित कथा साहित्य की अवधारणाएं और विधाएं (आलोचना), 5. जाति, स्त्री और साहित्य (आलेख संकलन), 6. भारतीय साहित्य में दलित स्त्री’- संपादित, 7. अस्मितामूलक विमर्श और हिन्दी साहित्य- आलोचना एवं सम्पादन, 8.b vv रजनी तिलक एक अधूरा सफर…-संपादित, 9. अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य में हिंदी साहित्य’- संपादित, 10. हाशिए से बाहर’ (संपा. कहानी संकलन) संपादित, 11. दलित दखल’-(सह संपा.)
सम्मान/पुरस्कार : साबित्रीबाई फुले सम्मान 3 जनवरी 2020, बहुजन कल्चरल फ्रंट, दिल्ली विश्वविद्यालय, डा. अम्बेडकर सम्मान 2019, अम्बेडकरवादी लेखक संघ(अलेस), दिल्ली द्वारा ‘नवें दशक की हिन्दी दलित कविता’ पर, दलित साहित्य अकादमी, उज्जैन, म.प्र. द्वारा पुरस्कृत, 1997, इन्टरनेशनल अवार्ड, 4-5 अगस्त 2014 को फ्रांस की राजधानी पेरिस में ‘थर्ड अम्बेडकर इन्टर नेशनल कन्वेंस’ में अम्बेडकर लिटररी विजन, न्यजर्सी , अमेरिका द्वारा से सम्मानित किया गया।

रजत रानी मीनू की प्रकृति की कविताएं-
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1. प्रकृति और स्त्री
मैं सूरज का ताप हूं
तमाम अवसादों को
छिपा लेती हूं
अपने दामन में
मेरी मुस्कान से
सूरज के प्रकाश सा
खिल उठता है
मेरा परिवार-समाज।
मैं चांद की
शीतलता हूं
हर गरमाहट/टकराहट से
शीतलता देती हूं
सुकून की
सांस लेता है मेरा परिवार-समाज
चेहरा खिल जाता है
सभी का।
मैं वसंत की
मुस्कान हूं
आमों के बौर की खुशबू
बिखरेती हूं
कोयल सी कूकती हूं
परिवार-समाज में।
मैं बरसात की
राहत हूं
मैं फसलों-लोगों को
निजात दिलाती हूं
ताप से
मैं स्त्री भर नहीं
सखी हूं, मानवता की
समता और प्रकृति की
मुझमें जीती है प्रकृति और
मैं प्रकृति में।।

2.
जब-जब मूलनिवासियों को
खदेड़ा गया था
उनके घरों से
छल और प्रपंच से
छीने गये थे उनके
घर-आंगन
बाग-बगीचे, जमीनें
ढ़ोर-डांगर
डरा कर धमका कर
तब-
उनका सहारा
बने थे वे पेड़
उनकी छांवों में
वे रोये थे, हंसे थे
बतियाते थे बीवी बच्चों से
पेड़ ही तो थे
जो जीवन दे रहे थे
अपने फलों से
नदियां ही तो थीं
जो प्यास
बुझा कर
तृप्त कर रही थीं
उन मूल निवासियों को
पेड़ों की जड़ों में
छिपा दिए थे
दो-चार बर्तन-भाड़े
कपड़े-लत्ते
पेड़ ही तो उनका घर था,
सुरक्षा कवच
बन गये थे वे पेड़।
मैं सोचती हूं
वे पेड़ जंगल, नदियां
नहीं होतीं
तो मेरे पूर्वज
कैसे बचते?
मेरे तो अस्तित्व का
सवाल ही नहीं
मैं आज उन्हीं का अंश हूं
प्रकृति भेद नहीं करती
वह स्त्री-पुरूष
दलित, आदिवासी
नहीं बनाती
खुली बांहों से
स्वागत करती सबका
एक जैसा
मैं प्रकृति का
अश हूं अपने पूर्वजों की तरह।ं।

3.
दादी-नानी
लोटा में जल भर कर
चढ़ाया करती थीं
पीपल, बरगद और तुलसी
की जड़ में जल
पूछने पर
वे समझाती थीं
इनसे रिश्ता है हमारा
जन्म-जन्मातर का
ये जीते हैं
हम से
हम जीते हैं
इनसे।
ये रूठ न जाएं
मनाया करते हैं
हम इन्हें हर रोज
तन-मन से
दादी-नानी
दुखी होती थीं
मायके नहीं जा पातीं
अपने मन का दुख
पीपल की छांव में
उड़ेला करती थीं
कभी अकेले
तो कभी सखियों के बीच
पीपल-बरगद की छांव में।
ठंडक देते थे
उस वक्त वे पेड़।
जब नहीं थे
आज की तरह फोन, मोबाइल
न लिख पाती थीं
वे चिठ्ठी पत्री
क्योंकि वे अपढ़
रखी गयीं थीं।
पीपल की छांव में
उनका बचपन बीता था
वे खेला करती थीं लंगड़ी
कभी भागम-भाग के खेल
वे गुट्टे भी खेलती थीं
फुरसत के दो पल
निकाल कर
दादी-नानी की सखी
सहेली सा रिश्ता था
पीपल-बरगद के पेड़ के साथ।।

4.
सब तरफ हरियाली
साफ-सुथरा आसमान
धुले नहाये पेड़-पौधे
मुस्कराते फूल पत्तियां
फिर क्यों-
आंखें गीली
उदास चेहरा स्त्री का?

5.
स्त्री मां है
धरती भी मां
मां का पर्याय
त्याग-समर्पण!
दोनों समर्पित हैं
हर पल,
अपनी संतानों-
परिवारों के लिए
क्या यही नियति है
दोनों मांओं की?

6.
मेरी पूर्वजाएं
नानी, दादी, मौसी,
बुआ और मामियां
ये सब अल सुबह
उठती थीं
सूरज की रोशनी
चमकने से पहले
हर रोज जैसे अलार्म
लगा हुआ था
उनके शरीर में
पुरूष-बच्चे जागते थे
बाद में
खाती थीं
सबको खिला-पिला कर,
सोती थी
सबके सोने के बाद
पूरे दिन खटती थीं
बोलती कम ही थीं
या कहें बोलना
असंस्कारी का ठप्पा था
वे डरी सहमी रहती थीं
पूर्वजाएं
फिर भी वे पराई
कहलाई जाती थीं
जब-तब डपट दी जाती थीं
चुटिया भी खींच ली जाती थी
चुपके से रोती थीं
रोने पर पाबंदी लगी थी।
मायके को गालियां दी जाती थीं
मायका उन्हें पराया
कहता था
स्त्रियां अपना घर ढ़ूढ़ती थीं।
आज भी स्त्रियां जागती हैं
सबसे पहले
योग करती हैं
दौड़ती भी हैं
सुबह अखबार पढ़ नहीं पातीं
तो समेट कर रख लेती हैं
अपने बैग में
मैट्रो में केश बनाती हैं
मेकप की परत भी चढ़ाती हैं
उसके बाद अखबार खोल कर
दुनिया को निहारती हैं
अपनी नजरों से
आज की स्त्री भाग-दौड करती है
मगर-
थोड़ा-थोड़ा जीने लगी है
अपने लिए भी
लड़-झगड़ कर निकाल ही लेती
थोड़ा वक्त अपने आराम के लिए
अल सुबह उठती है
आज की स्त्री भी
मुर्गा की बांग
सुन कर नहीं
अलार्म की घंटी से।
पराई अभी भी है
अपना घर खुद बनाने लगी है
आज की स्त्री।।

7.
स्त्री और धरती
स्त्री धरती है
धरती सहती है भार
चुपचाप असंख्य प्राणियों का
स्त्री मूक नहीं है
धरती की तरह
मगर-
क्या उसे मूक नहीं बनाया
धरती पुत्रों ने?
स्त्री समर्पित रहती है
धरती की तरह
खुश देखना चाहती है
खुशियां बांटती है
फिर क्यों बरसते हैं सावन
उसकी आंखों में?
स्त्री अन्नपूर्णा है
पेट भरता है
परिवार-समाज का
उसके श्रम से
धरती भी अन्नदाता है
बिन मांगे उड़ेल देती है
धरती पुत्रों की सेवा में सर्वस्व
क्या धरती पुत्र
समझते हैं उसकी भावनाओं को?
लगातार फाड़ते जा रहे हैं
उसका सीना, अंतड़ियां
अपने स्वार्थ में
धरती चुप रहती है
हर पल स्त्री की तरह
मगर-
आक्रोश आता है
धरती और स्त्री को भी
कभी भूचाल
कभी सुनामी के रूप में
स्त्री की सहन शक्ति
जवाब देती है
जब-जब भूचाल आता है
परिवारों में
सुनामी की लहरों में
सब बह जाते हैं
सबके सपने, भावनाएं, प्यार, खुशियां
मगर-
स्त्री और धरती की
पूजा करते हैं
क्या सम्मान देते हैं
क्या संवेदनशील बनते हैं
क्या उसे न्याय देते हैं
क्या वह अपना अधिकार पाती है?
स्त्री और धरती का
रिश्ता है साथिन सा
कहा जाता है
सीता जब संकट में थीं
हिम्मत जवाब दे गयी
तब धरती ने ही तो
अपना आंचल खोल दिया था
सीता समां गयीं थीं उसकी गोद में
सच है स्त्री धरती को बचाती है
और धरती स्त्री को।।

8.
मैं कौन हूं?
मेरी पहचान क्या है?
कोई चमारिन कहता है
कोई भंगिन
कोई पासिन
कोई खटीक
कोई दलित/आदिवासी
वनवासी कहता है
कोई अमुक की बेटी, बहन, पत्नी, मां
कहता है
दलित स्त्री
मेरी पूर्वजाएं
इसी प्रश्न के अंधकार में
डुबकियां लगाती रहीं
और मैं भी वहीं खड़ी हूं।।

9.
आसमान विशाल है
चाहत हजारों हैं
कोशिशें भी जारी हैं
दुश्मन भी हाजिर है
आसमान खींच लेने को।।
10.बूंद और समुद्र
इक बूंद चली
इतरा कर
इठला कर
सदियों पुरानी
परिपाटी तोड़ कर
किनारों को पार कर
समुद्र को, ललकार कर,
बूंद को गरजता देख,
हिल गया उसका मन-मस्तिष्क
कौन है जो मुझे
जो मुझे चुनौती दे रहा खुले आम?
कभी समुद्र भी झुका है?
कभी उसने अपनी सीमाओं को छोड़ा है?
यह उसकी फितरत नहीं
अथाह गहराई ही उसका,
वजूद है।
इक बूंद से वह
क्यों डरे?
क्यों हिले?
यह तो सर्वनाश होगा
उस दिन-
जब समुद्र झुक जाएगा।
बूंद की ललकार सुन।
बूंद फिर भड़की
समुद्र की सदियों पुरानी
गर्जना सुन।
वर्जना की
तोड़ कर धुन
ऐ समुद्र!
तू क्या समझता है
अपने आप को?
आखिरकार तू है मेरा ही अंश,
तूने सुना नहीं
बूंद-बूंद से भरता सागर,
बूंदों ने समृद्ध किया है तेरा घर
क्या फिर भी चलेगा
‘तू कोई नयी चाल?’
इक बूंद की गर्जना सुन
चिंता मग्न हुआ
विचारों के गोते में डूबा
बुद्धिजीवी सा एकदम निशांत।
कुछ क्षण उपरान्त
पुनः फंुकारा सर्प की भांति
और उगल दीं
बूंद के समक्ष जहर की दो बूंदें।
‘इतिहास तो मेरा ही है
सत्य तो मैं ही हूं
रास्ते तो मेरे ही
कारण बदलते हैं लोग
तू क्या है?
तेरी बिसात क्या है?
तेरी पहचान क्या है?
तेरा स्वतंत्र अस्तित्व क्या है?
आखिर मुझ में ही
तेरा अस्तित्व है,
वरन् धरती की कठोरता-
नहीं देखी है तूने?

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