Saturday, December 9, 2023
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2022 में  स्त्री रचनात्मकता के नए फलक

अपनी धरती अपना आकाश

—साधना अग्रवाल

कोविड की गिरफ्त के बाद फिर से सांस लेता हुआ यह साल (2022) हिंदी साहित्य के नक्शे पर एक गहरी लकीर खींच गया है।यह लकीर इस अर्थ में महत्वपूर्ण है कि रचनात्मकता की दृष्टि से महिलाओं ने अपनी सृजनात्मकता से सार्थक हस्तक्षेप किया है और उसके फलक को विस्तृत किया है। लेखिकाओं ने हर विधा में लिखा है चाहे कविता हो या कहांनी या उपन्यास या आलोचना।यद्यपि बाजारवाद ने हमारी जीवनशैली और संवेदना दोनों को ही प्रभावित किया है जिसका साक्ष्य यह है कि बड़ी से बड़ी घटनाओं पर भी हम चुप्पी साध लेते हैं। दूसरी ओर कोरोना जैसी महामारी ने विगत दो वर्षों में लोगों को कई तरह से प्रभावित किया है जिससे उबरने में हमें अभी और वक्त लगेगा। किसी भी रचना से जीवन बड़ा होता है। वैसे सच यह भी है कि एक छोटे से जीवन के संघर्ष को भी चित्रित करके बड़ी रचना की जा सकती है।

इस वर्ष प्रकाशित साहित्य की विभिन्न विधाओं से कुछ पुस्तकों को चुनना बड़ा कठिन और चुनौतीपूर्ण काम हैं। यह दावा तो नहीं किया जा सकता कि2022 वर्ष में प्रकाशित सभी पुस्तकों को पढ़ने का मौका मिला लेकिन लेकिन अपनी सीमा को जानते हुए जितना कुछ मैं पढ़ सकी, वह आपके सामने है।

सबसे पहले मैं बात करना चाहूंगी इस वर्ष प्रकाशित उपन्यासों पर क्योंकि यह प्रश्न जब—तब हमारे सामने उठता है कि आखिर उपन्यास से हमारी क्या अपेक्षा रही है? काल का यथार्थ, व्यक्ति—समाज का यथार्थ और इन दोनों से परे निजी मन का यथार्थ? इस साल कई लेखिकाओं के उपन्यास आये।पिछले कुछ सालों से कई लेखिकाएं लगातार उपन्यास लिख रहीं हैं। वरिष्ठ कथाकार चन्द्रकान्ता कश्मीर केन्द्रित लेखन के लिए जानी जाती हैं। उनके अब तक 14 कहानी—संग्रह और 8 उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं। प्रस्तुत उपन्यास ‘समय अश्व बेलगाम’ में भी कश्मीरी पंडितों के विस्थापन की ही कथा है जिसमें एक कश्मीरी पंडित परिवार अपने जमीन से उखड़कर महानगर दिल्ली में शरण लेता है और जिन्दगी की जद्दोजहद में नये सिरे से जीवन की शुरूआत करता है। इस परिवार की कहानी के माध्यम से चन्द्रकान्ता ने कई समस्याओं पर हमारा ध्यान केन्द्रित किया है जैसे अकेलेपन की त्रासदी,रिश्तों में बिखराव, दूरियां और टूटन, नई पीढ़ी का संघर्ष और भटकाव ,तनाव, पारिवारिक विघटन, पाश्चात्य संस्कृति और नई तकनीक का हस्तक्षेप, विस्थापन की पीड़ा,अविश्वास और संदेह आदि तमाम पहलूओं को सामने लाती हैं। लेकिन विडम्बना या कहें लेखिका का यह उपन्यास भी अपने पिछले कश्मीर से सम्बन्धित उपन्यासों के आगे कोई नई लकीर नहीं खींचता।

सुपरिचित कथाकार मधु कांकरिया का प्रस्तुत उपन्यास ‘ ढलती सांझ का सूरज’ इस वर्ष का एक उल्लेखनीय उपन्यास कहा जा सकता है। इसके केन्द्र में आत्महत्या करते किसानों का त्रासदीपूर्ण जीवन है। जहां सरकारी तंत्र, व्यवस्था, भूमंडलीकरण, शोषण, गरीबी, तंगहाली, संघर्ष, जिजीविषा आदि समस्याओं को लेखिका ने बड़ी बारीकी से चित्रित किया है। यह मधु कांकरिया का एक शोधपरक उपन्यास है जिसमें तथ्यों की  यथार्थपरक आधार भूमि पर कल्पना के रंगों से शब्दों की रेखाओं से आकार दिया गया है। उपन्यास का नायक अविनाश बीस साल के बाद स्विट्जरलैंड से अपनी मां से मिलने भारत आता है और उसे पीछे छूटी उन तमाम घटनाओं की याद आने लगती है, जिन्हें वह भूल गया था। वह गया तो था बेहतर जीवन की तलाश में, जिसे काफी हद तक वह प्राप्त भी कर लेता है, लेकिन उसे वहां अकेलपन और अवसाद का सामना भी करना पड़ता है। सब कुछ होते हुए भी वह वापस लौटता है तो यहां के किसानों के संघर्षपूर्ण जीवन को देखकर सिहर उठता है। वह कोशिश करता है कि उनकी बेहतरी के लिए कुछ कर सके। उसके मन में लगातार अन्तर्द्वंद्व चलता रहता है और सोचता है कि आखिर किसानों की आत्महत्या के लिए जिम्मेदार कौन है? बाजार की व्यवस्था,तंत्र या सरकारी नीतियां?

‘शहर से दस किलामीटर’ नीलेश रघुवंशी का दूसरा उपन्यास है जो उनके पहले उपन्यास’एक कस्बे के नोट्स’ के दस साल बाद आया है,इससे समझा जा सकता है कि लेखिका ने अपने अनुभवों को ताप के ताए में अच्छी तरह से तपाकर बिना किसी हड़बड़ी के एक ऐसे विषय को उठाया है जो बिल्कुल अलग हटकर है। यह उपन्यास अनेक मुद्दों को उठाता है जिनमें प्रमुख है किसानों का मुद्दा। किसान मजबूर होकर बाजारवाद की गिरफ्त में आकर अपनी जमीन बेचने को विवश हैं और शहर से दूर पिछड़े इलाकों में जाकर अपनी खेती—किसानी कर रहे हैं। लेकिन प्रश्न उठता है कि उन दूरस्थ क्षेत्रों के किसानों का अब क्या होगा? एक छोटा सा उदाहरण देना चाहूंगी जिससे किसानों की स्थिति का पता लगता है— किसान का कलेजा भौत बड़ा होता है, बाई। ये उपर वाले की माया ऐसा नाच नचाती है कि किसान ही उसके संग नाच पाता है।’ यह उपन्यास छोटी—छोटी कहानियों से शहर से दस किलोमीटर का बड़ा वितान उठाता है। यहां बाजार मात्र बाजार न होकर एक प्रतीक की तरह आता है जिसके अपने सुख—दुख हैं। शहर से अलग कुछ ही दूरी पर की यह दुनिया हमारी शहरी दुनिया से अलग है जहां अपने संघर्ष हैं,सपने हैं, कल्पना है, उम्मीद है, जद्दोजहद है, एक स्त्री की साइकिल है जो सबका हालचाल लेती घूमती रहती है। यह उपन्यास तेजी से बदलती दुनिया को बहुत नजदीकी से दिखाता है।


वरिष्ठ कथाकार नासिरा शर्मा के ‘अल्फा बीटा गामा’ उपन्यास कोरोना जैसी महामारी के दौरान उपजी समस्याओं और संघर्षों के बहाने एक ऐसे विषय को उठाता है जो अभी तक अ​लक्षित था, जिसकी तरफ इससे पहले संभवत: किसी का ध्यान नहीं गया। इसमें उन्होंने कुत्तों की अनेक प्रजातियों के गहरे अध्ययन और शोध के माध्यम से हामरी संवेदना को झकझोरा है। कोरोना के समय में इंसानी संघर्ष और जिन्दगी बचाने ​के लिए जिजीविषा की ओर तो ध्यान बहुत लोगों का गया लेकिन उसी अनुपात में जो पशु खासकर कुत्ते जो सार्वजनिक स्थलों जैसे दुकान, होटल, फुटपाथ पर रेहड़ी जैसी जगहों के बंद हो जाने के कारण न सिर्फ भूखे हो गये बल्कि बीमार और अकेले तथा बेसहारा भी। लेखिका ने कुत्तों की पीड़ा को मानवीय भाषा में समझाने का प्रयत्न किया है। साथ ही वह लिखती हैं कि—’ दुख इनसान और जानवर में फर्क नहीं करता।’ इससे समझा जा सकता है कि बेजुबान जानवरों की परेशानियों, दुखों, संघर्षों, तकलीफों के प्रति हमें कुछ ज्यादा संवेदनशील होने की जरुरत है।

सुपरिचित लेखिका जयश्री राय  का नया उपन्यास ‘थोड़ी सी जमीन थोड़ा आसमान’ मनुष्य की संवेदना को बहुत गहराई से कुरेदता है क्योंकि हमने अपने चारों ओर भाषा, धर्म, वर्ग, जाति, क्षेत्र, रंग आदि के न जाने कितने घेरे या बाड़े बना लिए हैं,जिनसे हम बाहर नहीं निकलना चाहते और अपने पूर्वग्रहों से ग्रसित होकर अपने में सिमटने को मजबूर हैं। हम यह भूल जाते हैं कि इन तमाम घेरेबंदियों की जकड़न से बाहर आकर बाहरी दुनिया भी बिल्कुल हमारे जैसी ही है। हमने अपने चारों ओर इतने आवरण ओढ़ लिए हैं कि अपनी मूलभूत पहचान यानी मनुष्यता को उसी में दफन कर दिया है। इसमें लेखिका ने बहुत सारे समूहों की पीड़ा और दर्द का बड़ी सहजता से मार्मिक चित्रण किया है जिसमें कश्मीरी पंडितों का विस्थापन, जर्मनी के यहूदियों की पीड़ा आदि देखे जा सकते हैं। लेखिका ने अंधेरे कोनों में मनुष्यता की रोशनी तलाशने की कोशिश की है। इसका लोकेल विशाल फलक तक फैला है जिसकी जद में न केवल हमारा देश आता है बल्कि कई देसरे देश भी। कहा जा सकता है कि जयश्री राय ने मनुष्यता को बचाने की कोशिश में भूगोल की तमाम दीवारों को लांघ दिया है।

‘अंत से शुरू’ कथाकार नीला प्रसाद का पहला ही उपन्यास है हांलाकि इससे पहले उनके चार कहानी—संग्रह प्रकाशित हो चुके है और चर्चित भी। नीला स्वयं कोल इंडिया के महाप्रबंधक पद पर कार्य कर चुकी हैं। संभवत: इसी लिए उनके लेखन के केन्द्र में कामकाजी स्त्री होती है। इस उपन्यास में भी नायिका नंदिता केन्द्र में है जो विवाहित होते हुए भी घर और बाहर के संघर्षों से जूझ रही है। विडम्बना यह है कि किसी भी कामकाजी स्त्री की तरह नंदिता भी घर, कार्यस्थल और बच्चे की तिहरी जिम्मेदारी संभालते और संतुलन बनाने तथा अपने स्वाभिमान को बचाए रखने की जद्दोजहद करती है। यही कारण है कि पति के विवाहेतर सम्बन्ध को भी जानते—समझते अपनी शादी को बचा लेना चाहती है। लेखिका कामकाजी स्त्री की स्थिति स्पष्ट करती है कि—’ नौकरीपेशा महिलाएं अपना दुख न मायके में बखान सकती हैं, न ससुराल में! सब उन्हें हर तरह से सक्षम और धनी समझते हैं। समझ ही नहीं पाते उनकी भावनात्मक समस्याएं।’ लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सच है कि पुरुष प्रधान समाज में अधिकतर स्त्री को ही हर हाल में समझौता करना पड़ता है चाहे वह कितनी भी पढ़ी—लिखी, नौकरीपेशा और आत्मनिर्भर क्यों न हो क्योंकि कामकाजी महिलाओं के लिए पति का सहयोग आज भी कोरा जुबानी जमा—खर्च ही है। उपर से भले वह कितनी शक्तिशाली दिखे लेकिन भीतर—भीतर वह खोखली होती जाती है।

‘चांद गवाह’ सुपरिचित कथाकार उर्मिला शिरीष का पहला ही उपन्यास है। यद्यपि इससे पहले उनके 10 कहानी—संग्रह प्रकाशित भी हो चुके हैं और भरपूर चर्चित भी। इस उपन्यास के केन्द्र में स्त्री है जो मन से लेकर देह तक का सफर ही नहीं करती बल्कि सवाल भी करती है कि देह के रिश्तों से बड़े रिश्ते आत्मा के होते हैं। यहां अकेलेपन की त्रासदी भी मौजूद है, बिखराव भी है और टूटन भी लेकिन विशेष बल दिया गया है कि जिन्दगी को अपने मनमाफिक जीने में ही सार्थकता है और वह भी निडर और निर्भीक होकर।

बहुचर्चित कथाकार मनीषा कुलश्रेष्ठ अपने उपन्यास ‘सोफिया’ में प्राचीन परम्पराओं और रुढ़ियों को चुनौती देती हुई एक नया आख्यान रचने की कोशिश करती हैं। इसमें बने—बनाये धार्मिक ढांचे को भी तोड़ने की पहल की गई है। चूंकि मनीषा का मानना है कि प्रेम इन तमाम बातों से उपर होता है। क्योंकि प्रेम एक ऐसी मन:स्थिति है जिसे समाज सहजता और खुलेपन से स्वीकार नहीं करता जिसका खामियाजा अंतत: मनुष्य को उठाना पड़ता है। इस उपन्यास के माध्यम से मनीषा एक ऐसी प्रेमकथा लेकर आईं हैं जो समाज के असहिष्णु चेहरे को सामने लाती है।

युवा कथाकार इन्दिरा दांगी ने अपने उपन्यास’ विपश्यना’ में हमारे सामने अनेक प्रश्न रखे हैं मसलन हमें क्या चाहिए? हम कौन हैं? क्यों हैं? सुख की परिभाषा क्या है? आदि। यह उपन्यास अपने अंतरतम की रोशनी में बाहर की दुनिया को देखना, जीना और जीवन की तलाश के साथ सत्य की खोज भी करता है।

वरिष्ठ कथाकार चित्रा मुद्गल का ‘नकटौरा’ पांचवां उपन्यास है। वर्ष 1990 में अपने पहले उपन्यास ‘एक जमीन अपनी’ से ही साहित्य जगत में वह चर्चा में आ गईं थीं। जैसा कि इसके शीर्षक से उद्घाटित होता है कि बारात वाली रात को स्त्रियों को अपनी स्वायत्ता मिलती है, के ताने बाने से उठाया है। लेकिन इस उपन्यास को उनका आत्मकथात्मक उपन्यास ही कहना चाहिए। चूंकि लेखिका ने सीधे—सीधे आत्मकथा न कहकर इसे उपन्यास का जामा पहना दिया है क्योंकि उपन्यास के नाम पर कई जगह छूट लेने की गुजांइश बनी रहती है। इस उपन्यास के माध्यम से पाठक को चित्रा जी के जीवन—संघर्षों, चुनौतियां, विवाह, परिवार, समाज, सामाजिक कार्यकर्ता, अन्तर्द्वंद्व , अन्तर्विरोध, निडरता, बेबाकी, साहस, निर्भीकता आदि स्पष्ट दिखाई देती है। एक अच्छी बात यह है कि वे बड़ी कुशलता से घर और बाहर दोनों में संतुलन बना लेती हैं। चित्रा मुद्गल को जानने के लिए यह उपन्यास बेहद जरुरी तो है ही पठनीय भी कम नहीं।

‘पंचम की फेल’ उपन्यास वरिष्ठ कथाकार कृष्णा अग्निहोत्री का नया और आठवां उपन्यास है जो इस बात की ताकीद करता है कि वे इस उम्र में भी (88 वर्ष) रचनात्मक रूप से सक्रिय हैं जो बड़ी बात है। अपनी रचनाओं से तो वे पाठकों में समादृत हैं ही लेकिन अपनी आत्मकथा के दो खंडों— ‘लगता नहीं है दिल मेरा’ एवं ‘और,और,औरत’ से वह काफी चर्चित रही हैं। इस उपन्यास में लेखिका ने मलिन बस्तियों में रहने वाले लोगों की जिन्दगी के सच को उजागर किया है जहां ये लोग सामान्य जिन्दगी के लिए भी संघर्षरत हैं और विकास से कोसों दूर। ये लोग अपने परिवार का पेट पालने हेतु किसी भी तरह का मानवीय या अमानवीय काम करने में भी नहीं हिचकिचाते क्योंकि संस्कारों और मनुष्यता से इनका कोइ सरोकार नहीं। यही कारण है कि इन बस्तियों में अपराध फलता—फूलता है जो पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहता है।

रामकथा से प्रेरित अनेक रचनाएं हमारे सामने आती हैं, उसी क्रम में सुपरिचित लेखिका आशा प्रभात का नया उपन्यास है ‘उर्मिला’। जैसा कि हम जानते है कि रामकथा में उर्मिला लगभग उपेक्षित पात्र है और उसी को केन्द्र में रखकर राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने ‘साकेत’ जैसा महाकाव्य लिखा था। यह उपन्यास इसी दृष्टि से उर्मिला के सम्पूर्ण अनुभव—जगत को सामने लाने का प्रयास करता है।

‘पारा पारा’ प्रत्यक्षा का एक ऐसा उपन्यास है जो एक स्त्री की अंतरंग कथा कहता है। इसकी मुख्य पात्र हीरा अपने विवाहित जीवन में आई प्रेम की ताजगी को सम्पूर्णता में बंधी निष्पाप भाव से जीना चाहती है। इसमें नैतिकता के द्वंद्व में उलझा एक मन है जो सुकून की चाहत में अतीत के सफर पर चलना चाहता है। अतीत में तमाम स्मृतियां हैं जिन्हें वह जीवित कर लेने की जुगत में है। यह उपन्यास स्मृति और चाहत की बुनावट से एक नया पाठ तैयार करता है और पाठकों को अपने आकर्षण में बांध लेने की सामर्थ्य रखता है।
युवा कथाकार शर्मिला बोहरा जालान का भी उपन्यास इस साल आया है।उन्नीसवीं बारिश उनका पहला उपन्यास है।चारुलता नामक पात्र के जरिये एक स्त्री मन को खोलने की काव्यात्मक कथा है।

कहानी—संग्रह

यह अच्छी बात है कि अपने समकालीन कथाकारों में प्रज्ञा ने अपनी अलग और विशिष्ट पहचान बनाई है। ‘मन्नत टेलर्स’ से उनको एक मुक्कमल पहचान मिली जो उनके चौथे कहानी—संग्रह ‘मालूशाही मेरा छलिया बुरांश’ तक निरन्तर प्रगाढ़ हो रही है। इस संग्रह में उनकी कुल नौ कहानियां हैं जिसमें उनके अनुभव जगत का दायरा विशाल फलक तक फैला है। इसमें यथार्थ के बीहड़ रास्ते हैं तो उन रास्तों पर संवेदना के कोमल और नाजुक फूल छिटके दिखाई देते हैं। यह बिल्कुल सच है कि मनुष्य एक साथ कई दुनियाओं में जीने को विवश है। इनमें मनुष्य की यातना,पीड़ा, सपने, उम्मीदें, आकांक्षाएं, संघर्ष, शोषण आदि पक्षों पर प्रज्ञा ने अपनी लेखनी चलाई है और शब्दों का खूबसूरत जामा पहनाया है। अति आधुनिक समय में भी स्त्रियां संघर्षरत हैं और उनका दुख—दर्द, पीड़ा और वेदना को वे सामने लाई हैं। कह सकते हैं कि इन कहानियों की फुलवारी में अलग—अलग किस्म और रंगों से एक कुशल कलाकार की भांति उकेरा है। प्रज्ञा के पास समृद्ध भाषा है जो पाठकों को अपनी गिरफ्त में लेने में सक्षम है।

युवा कथाकार दीपा गुप्ता के प्रस्तुत कहानी—संग्रह’अल्मोड़ा की अन्ना’के शीर्षक से ही पता लग जाता है कि इनका लोकेल पहाड़ी अंचल है जिसमें स्त्री पात्रों के माध्यम से लेखिका ने छोटे—छोटे प्रश्नों से हमारे मन में न केवल बेचैनी पैदा की है बल्कि हमें वे उद्वेलित भी करती हैं। दूर से खूबसूरत दिखने वाले पहाड़ों पर रहने वाले लोगों खासकर स्त्रियों के दुख—दर्द और तकलीफ भी पहाड़ की ही तरह होते हैं। दूसरी ओर दीपा अल्मोड़ा की भौगोलिक और नैसर्गिक खूबसूरती के चित्रण से यहां आने का निमंत्रण भी देती हैं। पहाड़ी परिवेश, रीति—रिवाज, भाषा की बानगी, रहन—सहन को भी स्वाभाविक रूप से इनमें देखा जा सकता है।

वरिष्ठ कथाकार सारा राय ने अपनी भाषा के चलते कथाजगत में अपनी एक अलग पहचान बनाई है। ‘नबीला और अन्य कहानियां’ में बहुत छोटी—छोटी घटनाओं की तलहटी में उतरते अनोखे अंदाज से कहानी लेकर वे बाहर आती हैं। यही कारण है कि इन कहानियों में साधारण से साधारण पात्र और घटनाएं कहानी के केन्द्र बिन्दु बन जाते हैं जिनमें एक तरफ मछली,उल्लू, कुत्ते,तितली, चींटा, कबूतर और कव्वों की दास्तान तो है ही तो दूसरी तरफ शीर्ष कहानी नबीला में एक बांग्लादेशी विस्थापित लड़की की कहानी के माध्यम से स्त्री विमर्श के भी वे तमाम सवाल उठाती हैं। संग्रह के अंत में लेखिका ने अम्मी यानी अपनी नानी पर एक संस्मरण लिखा है जिसमें 60 के दशक का परिदृश्य उभर कर सामने आता है। इन कहानियों में बच्चों का आश्चर्यलोक भी है और प्रौढ़ों की उदासियां, वृद्धों का अकेलापन भी, मध्यवर्ग का संघर्ष और विस्थापन की त्रासदी तथा उपेक्षित वर्ग के अनेक शेड्स दिखाई देते हैं।

युवा कहानीकार रश्मि शर्मा ने कविता के गलियारे से कहानी के आंगन में आने की सार्थक कोशिश की है इसका प्रमाण है कि तात्कालिक लोकप्रियता हासिल करने का कोई लोभ उनकी कहानियों में दिखाई नहीं देता। ‘बन्द कोठरी का दरवाजा’ उनका पहला कहानी—संग्रह है। इसमें भूमंडलीकरण के इस दौर की विभिन्न पार्श्वछवियां दिखाई देती हैं। शीर्ष कहानी में पढ़ी—लिखी मुस्लिम स्त्री नसरीन को शादी के बाद अपने पति रेहान के ‘गे’ होने का पता लगता है तो बहुत कुशलता से इस सम्बन्ध को स्वीकार कर लेती है और बन्द कोठरी के दरवाजे खोलने की सफल कोशिश करती है।
रीता दास राम का कहांनी संग्रह समय जो रुकता नहीं और डॉक्टर सुनीता का कहांनी संग्रह “सियोल से सरयू ” भी इस वर्ष की उल्लेखनीय किताबें हैं।दोनों लेखिकाएं अपने पहले संग्रह में पाठकों का ध्यान खींचती हैं।
सविता पाठक का पहला कहांनी संग्रह “हिस्टीरिया “भी काफी उम्मीद जगाता है।अंग्रेजी की लेक्चरर होने से उनके पास साहित्य की समझ थोड़ी अधिक विस्तृत है जो इन कहानियों में दिखती है।

कविता—संग्रह

सुपरिचित कथाकार और कवि अनामिका समकालीन लेखन की दुनिया में अपनी एक खास पहचान रखती हैं। उनकी कविताओं में बहुदा एकांत कई जगह आता है लेकिन वह उन्हें पसंद नहीं क्योंकि वह बहुविध समाज को देखने में यकीन करती हैं। उनके यहां अकेलापन जब—तब आता तो है लेकिन आहिस्ता—आहिस्ता। उनका नवीनतम कविता—संग्रह ‘बन्द रास्तों का सफर’ की पहली कविता छूटना’ में उनकी फिक्र साफ दिखाई देती है। लेकिन हमें यह याद रखना है कि कुछ भी स्थिर नहीं होता खासकर समय इसलिए ‘धीरे—धीरे जगहें छूट रही हैं/ बढ़ना सिमट आना है वापस अपने भीतर।’ अनामिका स्त्री होने के नाते स्त्री के अंतर्जगत को बखूबी जानती ही नहीं भावों को आमबोलचाल की भाषा में खूबसूरत शब्दों का लिबास भी पहना देती हैं।

‘ईश्वर और बाजार’ जसिंता केरकेट्टा का तीसरा कविता—संग्रह है। जसिंता की कविताओं की एक बड़ी खूबी यह है कि वह कल्पना के स्वप्नलोक में न फंसकर यथार्थ की खुरदुरी जमीन पर पैर रखती हैं और सफलतापूर्वक अपनी मंजिल की ओर बढ़ती हैं। उनकी कविताओं में यथार्थ की कई परतें हैं जिन्हें वह हमारे सामने लाती हैं ताकि खुली आंखों से हम सच का सामना कर सकें। वे अपनी सहज और संवाद परक मुद्रा में आदिवासी समाज की पीड़ा ही हमारे सामने नहीं लाती बल्कि बाजार की चकाचौंध, मनुष्य का डर और प्रताड़ना , शहरी सभ्यता का बढ़ता प्रभाव, प्रकृति, पेड़, जंगल, पहाड़, प्रेम, पशु—पक्षी, पृथ्वी, घर, परिवार, रोटी, किसान, लड़की आदि विषयों पर उनकी पैनी नजर गई है और वह अनचीन्हे सवालों से टकराने की हिम्मत रखती हैं और मनुष्यता को बचाने की पुरजोर कोशिश।

‘मुझे पतंग हो जाना है’ ऋतु त्यागी का नया कविता—संग्रह है जो स्मृतियों के धागे से बंधा शब्द रूपी मोतियों से पिरोया या है। ऋतु के यहां पर्यावरण भी है, प्रकृति भी है और प्रेम तो सर्वत्र है ही।

‘राबिया का ख़त’ मेधा का पहला ही कविता—संग्रह है।जिसमें उनकी छोटी—बड़ी कविताएं हैं जिनमें स्त्री कई रूपों में हमारे सामने आती है। इसके बिंब और प्रतीक बिल्कुल सहज और विश्वसनीय लगते हैं इसलिए भी मेधा बधाई की पात्र हैं।
अनुपम सिंह का पहला कविता संग्रह मैंने गढ़ा है अपना पुरुष रंजना मिश्र का पहला कविता संग्रह “पत्थर समय की सीढ़ियां “और अनुराधा ओस का पहला संग्रह ” वर्जित इच्छाओं की सड़क “भी इस साल हिंदी कविता की नई घटना है।तीनों कवयित्रियाँ अलग अलग मुहावरे में अलग स्वर से अलग अलग विषयों पर कविताएं लिख रही हैं।
इस साल एक और नई कवयित्री शेफाली का आगमन उनके पहले संग्रह “मेरे गर्भ में चाँद” के साथ हुआ है बिल्कुल नए बिंबों और प्रतीकों के साथ।

 

आलोचना/ समीक्षा/ निबंध/ अनुवाद

साहित्य की सबसे बदनाम और शुष्क विधा आलोचना है। पाठक से लेकर रचनाकार तक इसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाते रहे हैं। जब तब आलोचना की खोई हुई विश्वसनीयता वापस नहीं लौटती है,साहित्य में अराजकता की गंभीर स्थिति बनी रहेगी। क्रमश: अच्छे—बुरे साहित्य की पहचान मिटती जाएगी। हमें याद रखना चाहिए कि रचना और आलोचना एक—दूसरे के विरोधी नहीं बल्कि बराबरी के पायदान पर हैं क्योंकि रचना भी अंतत: आलोचना है और आलोचना रचना। इस बात को रचनाकार भी समझें और आलोचक भी।

इस वर्ष प्रकाशित सुधा अरोड़ा के संपादन में मन्नू भंडारी पर केन्द्रित पुस्तक ‘ संघर्षों का अलाव: आखरों की आंच’ आई है जो वस्तुत: मन्नू जी की स्मृति में हंस ने एक अंक केन्द्रित किया था जो अब पुस्तक रूप में हमारे सामने है। इसमें मन्नू जी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर तो लेख हैं ही बल्कि उनके जीवन से जुड़े तमाम नये पहलू सामने आते हैं।सुधा अरोड़ा अपने संपादकीय में लिखती हैं—’ मन्नू जी जितनी बड़ी लेखक थीं, उतनी ही संवेदनशील इंसान भी। कोई लेखकीय नखरा नहीं था उनमें। रचना हो या जीवन—वे दोहरेपन की कायल न थीं।’
हंस के स्त्री विमर्श पर केंद्रित अंकों को 9 खंडों में पुस्तकाकार निकलना भी इस साल की उल्लेखनीय घटना है।इन 9 खंडों में 30 – 35 साल के स्त्री विमर्श को एक जगह समेटा जा सकता है।

‘दुनिया में औरत’ युवा लेखिका सुजाता की स्त्री विमर्श की एक ऐसी पुस्तक है जिसमें 13 अध्याय हैं जो विश्व की तमाम स्त्रियों के बीच एक ऐसा सम्बन्ध बनाते हैं जिससे स्त्री विमर्श का एक नया पाठ किया जा सकता है। हालांकि सुजाता अपनी ही पहली आलोचनात्मक पुस्तक ‘ आलोचना का स्त्री पक्ष’ का अतिक्रमण नहीं कर पातीं,जो इसकी सीमा कही जा सकती है। यद्यपि अपने तईं उन्होंने स्त्रीवाद क्या है, जैसा प्रश्न हमारे सामने रखा है और उससे जूझने के लिए पाठकों को प्रेरित भी किया है।

‘समकालीन लेखन और हिन्दी आलोचना’ पुस्तक वंदना मिश्रा के समीक्षात्मक लेखों का संग्रह है जो समय—समय पर लिखे गए हैं। जो अधिकांश कथा साहित्य पर केन्द्रित हैं। लेकिन इसे सिलसिलेवार नहीं रखा गया है बल्कि जब कभी उन्होंने किसी कृति पर समीक्षा लिखी है तो उनको संगृहीत कर लिया गया है।

सुपरिचित कवयित्री सुमन केशरी की पुस्तक ‘कविता के देश में’ यूं तो एक आलोचनात्मक पुस्तक है लेकिन यह इसलिए महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि एक कवि दूसरे कवियों की कविताओं को कैसे पढ़ता है,गुनता है, विवेचन करता है, हमारे सामने लाती है। जिसके घेरे में एक ओर पूर्वज कवि हैं तो दूसरी ओर कुछ नये कवि भी। कह सकते हैं कि उन्होंने कविता के देश में एक नया प्रयोग किया है।

‘शाहीनबाग: लोकतंत्र की नई करवट’ पत्रकार भाषा सिंह की एक ऐसी पुस्तक है जो शाहीनबाग आंदोलन पर केन्द्रित है। इस आंदोलन को इसलिए भी याद रखा जाएगा क्योंकि आजादी के बाद यह एक ऐसा व्यापक जन आंदोलन के रूप में उभरा जिसने राष्ट्रवाद—राष्ट्रप्रेम और देश से रिश्ते को भी नये सिरे से परिभाषित करने पर हमें विवश कर दिया। भाषा सिंह ने बहुत परिश्रमपूर्वक इस आंदोलन का दस्तावेजी करण कर इसे इतिहास में अमर कर दिया। यह आंदोलन इसलिए भी खास था कि इसने साबित कर दिया कि शांतिपूर्वक ढंग से इंसाफ की लड़ाई लड़ने का जज्बा भारतीय औरतों में पूरे दम—खम के साथ मौजूद है।

आजादी मेरा ब्रांड जैसी पुस्तक से चचित हुईं लेखिका अनुराधा बेनीवाल की ‘लोग जो मुझमे रह गए’ नई पुस्तक है। यह मात्र यायावरी श्रृंखला की पुस्तक नहीं है बल्कि यात्रा में मिले तमाम लोगों की मार्फत खुद को जानने और अपने भीतर घटित हो रहे बदलावों की स्मृतियां हैं।

हिन्दी और मैथिली की सुप्रसिद्ध कथाकार उषाकिरण खान का मूल रूप से मैथिली में लिखा गया नया उपन्यास ‘ पोखरि रजोखरि’ का हिन्दी में अनूदित होकर ‘कथा रजोखर’ नाम से आया है जिसका अनुवाद मीना झा ने किया है। इस उपन्यास में मिथिला की सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक परिस्थितियों का चित्रण किया गया है।

दो अनूदित पुस्तकों का जिक्र करना भी मुझे जरुरी ल रहा है। यद्यपि दोनों पुस्तकों के लेखक हैं बांग्ला के प्रसिद्ध लेखक रंजन बंद्योपाध्याय। चूंकि इनका हिन्दी अनुवाद किया है शुभ्रा उपाध्याय ने इसीलिए इन दोनों पुस्तकों को मैंने अपने इस लेख् में शामिल करना एचित समझा। पहली पुस्तक है मूल बांग्ला कृति ‘आमि रवि ठाकुरेर बोउ: मृणालिनीर   लुकानो आत्मकथा’ जिसका हिन्दी अनुवाद है ‘ मैं रवीन्द्रनाथ की पत्नी: मृणालिनी की गोपन आत्मकथा’ इसमें गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर की पत्नी मृणालिनी देवी की कहानी है जिनका जीवन रवीन्द्रनाथ की विराट छाया में रहकर भी हमेशा अंधेरे में रहने को ही अभिशप्त रहा।

दूसरी पुस्तक है मूल बांग्ला कृति ‘ कादम्बरी देवीर सुसाइड नोट: रवीन्द्रनाथेर नोतुन बोउठाकेर शेष चिठि’, जिसका हिन्दी अनुवाद है’कादम्बरी देवी का सुसाइड नोट: रवीन्द्रनाथ की भाभी का अंतिम पत्र’। इसमें विश्वकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर की भाभी के त्रासद जीवन की मार्मिक कथा है। इस पुस्तक के प्राक्कथन में लेखक ने स्पष्ट किया है कि ‘महज 25 वर्ष की उम्र में रवीन्द्रनाथ की भाभी—जिन्हें वे नोतुन बोउठान कहते थे। कादम्बरी देवी ने आत्महत्या कर ली थी। कहा जाता है कि आत्महत्या का कारण बताते हुए उन्होंने एक सुसाइड नोट भी लिखा था।’ उस चिट्ठी का नष्ट कर दिया गया था। उसी चिट्ठी को ध्यान में रखकर अनुमान से यह उपन्यास लिखा गया है। और लेखक ने बहुत सारे अनुत्तरित प्रश्नों का जवाब खोजने की कोशिश की है।
नासिरा शर्मा द्वारा ईरान के लेखक सादिक हिदायत के उपन्यासका अनुवाद अंधा उल्लू भी इस साल आया।सादिक ने मुंबई में रहकर यह उपन्यास लिखा था जो ईरान में प्रतिबंधित कर दिया गया था।सादिक ने 48 साल की उम्र में 1951 में आत्महत्या कर ली थी।कहा जाता है कि ईरान में कुछ लोगों ने इस उपन्यास को पढ़कर आत्महत्या की या करने की कोशिश की। बहरहाल हिंदी पाठकों को इस साल यह उपन्यास पढ़ने को मिला यह अच्छी बात है।

 

माया ने घुमायो – मृणाल पाण्डे- कहानी
जीते जी इलाहाबाद – ममता कालिया – उपन्यास
अंधारी – नमिता गोखले – उपन्यास
हिंदी की पहली आधुनिक कविता – सुदीप्ति –

खुश्देश का सफ़र – पल्लवी त्रिवेदी – यात्रा वृतांत

 

लक्ष्मी . राजकमल प्रकाशन
कुल मिलाकर यह वर्ष रचनात्मक दृष्टि से खासकर स्त्री लेखन का उर्वर वर्ष कहा जा सकता है क्योंकि अभी तक यह माना जाता रहा है कि स्त्रियों की चौहद्दी घर—परिवार तक सीमित है जिसे उन्होंने हर विधा में हस्तक्षेप करके गलत साबित कर दिया है। आप सभी को नये वर्ष की शुभकामनाएं! गालिब के शब्दों में—

बादशाह सिर्फ वक्त होता है

इंसान तो यूं ही गुरुर करता है।

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